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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 874, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 874

गारुत्मतमयैः पत्रैर्निबिडैरुपशोभितम् । नवरत्नमयाकल्पैर्विमानैरलंकृतम् ॥१३६॥ संसारतापविच्छेदकुशलच्छायमद्भुतम् । तस्यमूले सुसंकॢप्तरत्नसिंहासने शुभे ॥१४०॥ आसीनमसिताकल्पं शरच्चंद्रनिभाननम् । कैलासाद्रिनिभं त्र्यक्षं चंद्रांकितकपर्दकम् ॥१४१॥ नासाग्रालोकनपरं वीरासनसमाश्रितम् । भद्राटके कुरंगाढ्यजानुस्थकरपल्लवम् ॥१४२॥ कक्षाबद्धभुजंगं च सुप्रसन्नं हरं स्मरेत् । अयुतद्वयसंयुक्तगुणलक्षं जपेन्मनुम् ॥१४३॥ तद्दशांशं तिलैः शुद्धैर्जुहुयात्क्षीरसंयुतैः । पंचाक्षरोविते पीठे तद्विधानेन पूजयेत् ॥१४४॥ भिक्षाहारो जपेन्मासं मनुमेमं जितेंद्रियः । नित्यं सहस्रमष्टाढ्यं परां विंदति वाग्विभूयम् ॥१४५॥ त्रिवारं जप्तमेतेन पयस्तु मनुना पिबेत् । दक्षिणामूर्तिसंधानाच्छास्त्रव्याख्यानकृद्भवेत् ॥१४६॥ प्रणवो हृदयं पश्चाद्भवेद्भगवतेपदम् । ङेयुतं दक्षिणामूर्ति महामेधामुपोरयेत् ॥१४७॥ प्रयच्छ ठद्वयांतोऽयं द्वाविंशत्यक्षरो मनुः । मुनिश्चतुर्मुखश्छंदो गायत्री देवतोदिता ॥१४८॥ ताररुद्धैः स्वरैर्दीर्घैः षड्भिरंगानि कल्पयेत् । पदैर्मंत्रभवैर्वापि ध्यानाद्यं पूर्ववन्मतम् ॥१४९॥ लोहितोऽन्यासतः सद्यो बिंदुमान्प्रथमं ततः । द्वितीयं वह्निबीजस्था दीर्घा शांत्यांदुभूषिता ॥१५०॥ तृतीया लांगलीशार्णमंत्रो बीजत्रयान्वितः । नीलकंठात्मकः प्रोक्तो विषद्वयहरः परः ॥१५१॥ हरद्वयं वह्निजाया हृदयं परिकीर्तितम् । कपर्दिने पदयुगं शिरोमंत्र उदाहृतः ॥१५२॥ नीलकंठाय द्वंद्वंदं शिखामंत्रोऽयमीरितः । कालकूटपदस्यांते विषभक्षणडेयुतम् ॥१५३॥ हुं फट् कवचमुद्दिष्टं नीलकंठिन इत्यतः । स्वाहांतमस्त्रमेतानि पंचांगानि मनोर्विदुः ॥१५४॥ मूर्ध्नि कंठे हृदंभोजे क्रमाद्बीजत्रयं न्यसेत् । बालार्कयुतवर्चस्कं जटाजूटेंदुशोभितम् ॥१५५॥


सघन तथा मरकतमणि के समान नील हैं। छाया संसार के ताप को विनष्ट करती है। उस वृक्ष के मूल में शुक्लकाय शंकर विराजमान हैं, उनका मुख शरत्कालीन चंद्रमा के समान है। शरीर की आभा कैलासपर्वत जैसी है, नेत्र तीन हैं। भाल चंद्रमा से सुशोभित है। दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर गिर रही है। स्वयं वीरासन लगाये हुए हैं। जानु पर करपल्लव रखे हुए हैं। उनके कक्षों में सर्प बन्धे हुए हैं और मन में अत्यन्त प्रसन्नता है, ऐसे शिव का ध्यान कर तीन लाख बीस हजार मन्त्र का जप करे। और उसका दशांश क्षीरयुक्त शुद्ध तिलों से हवन करे। पश्चात् पंचाक्षर मन्त्र से पीठ पर विधान पूर्वक पूजन करे ॥१३९-१४४॥ जो व्यक्ति एक मास तक भिक्षाटन करते हुए इंद्रिय निग्रह पूर्वक नित्य एक हजार आठ बार उपर्युक्त मंत्र का जप करता है, वह महाश्री तथा वाणी को प्राप्त करता है। जो दक्षिणामूर्ति का ध्यान करते हुए इस मन्त्र को तीन बार जप कर जल पीता है, वह शास्त्रव्याख्याता होता है। 'प्रणव ..... तोयम्'--यह बाईस अक्षरों का मंत्र है। इसके ऋषि चतुर्मुख हैं। छंद गायत्री है, और देवता दक्षिणामूर्ति हैं। मन्त्र के तारयुक्त दीर्घ वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये। मंत्र के पदों से ध्यान आदि पूर्ववत् करना चाहिये ॥१४५-१४९॥ "लोहित ... लांगली"--यह ईशाणमन्त्र है। "नीलकंठ ... पदयुगम्"--यह शिरो मंत्र है। "नील- कंठाय द्वन्द्वम्"--यह शिखामन्त्र है। 'कालकूट' पद के अन्त में 'विषभक्षण' से लेकर 'स्वाहा' तक जोड़ने से पंचांग मन्त्र बनता है। मस्तक, कंठ तथा हृत्कमल में क्रमशः तीनों बीजों का न्यास करे। तदनन्तर बालचन्द्र के समान तेजस्वी, जटाकलाप से उपशोभित, सर्पों से विभूषित हाथों में जपवटी, त्रिशूल, ब्रह्मकपाल तथा खट्वांग धारण करने वाले त्रिनेत्र शिव का ध्यान कर तीन लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश घी से