बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८५४ नारदीयपुराणम् भोजयेन्मधुरैर्भोज्यैर्ब्राह्मणान्वेदपारगान् । दीर्घमायुरवाप्नोति वांछितां विदति श्रियम् ॥१२३॥ एकादशाहुतीर्नित्यं दूर्वाभिर्जुहुयाद् बुधः । अपमृत्युजिदेव स्यादायुरारोग्यवर्द्धनम् ॥१२४॥ त्रिजन्मसु सुधावल्लीकाश्मीरीबकुलोद्भवैः । समिद्वरैः कृतो होमः सर्वमृत्युगदापहः ॥१२५॥ सिद्धार्थैर्विहितो होमो महाज्वरविनाशनः । अपामार्ग समिद्धोमः सर्वमयनिषूदनः ॥१२६॥ दक्षिणामूर्तये पूर्वं तुभ्यं पदमनंतरम् । वटमूलपदस्यांते प्रवदेच्च निवासिने ॥१२७॥ ध्यानेकनिरतांगाय पश्चाद् ब्रूयान्नमः पदम् । रुद्राय शंभवे तारशक्तिरुढोऽयमीरितः ॥१२८॥ षट्त्रिंशदक्षरो मंत्रः सर्वकामफलप्रदः । मुनिः शुकः समुद्दिष्टश्छंदोऽनुष्टुप्प्रकीर्तितम् ॥१२९॥ देवता दक्षिणामूर्तिर्नाम्ना शंभुरुदीरितः । तारशक्तियुतैः पूर्वं ह्रीमाद्यैस्तैश्च मंत्रजैः ॥१३०॥ षट्ष्वष्ठाष्टेषु वह्निचर्णैर्हृदयाद्यंगकल्पनम् । मूर्ध्नि भाले दृशोः श्रोत्रे गंडयुग्मे सनासिके ॥१३१॥ आस्यदोःसंधिषु गले स्तनहृन्नाभिमंडले । कट्यां गुह्ये पुनः पादसंधिष्वर्णान्यसेन्मनोः ॥१३२॥ व्यापकं तारशक्तिभ्यां कुर्याद्देहे ततः परम् । हिमाचलतटे रम्ये सिद्धकिन्नरसेविते ॥१३३॥ विविधद्रुमशाखाभिः सर्वतो वारितातपे । सुपुष्पितैलताजालैराश्लिष्टकुसुमद्रुमे ॥१३४॥ शिलाविवरनिर्गच्छन्निर्झरानिलशीतले । गायद्देवांगनासंघे नृत्यद्वर्हिकदम्बके ॥१३५॥ कूजत्कोकिलसंघेन मुखरीकृतदिक्मुखे । परस्परविनिर्मुक्तमात्सर्यमृगसेविते ॥१३६॥ जलजैः स्थलजैः पुष्पैरामोदिभिरलंकृते । आद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरजस्रसुखसेविते ॥१३७॥ पुरंवरमुखैर्देवैः सांगनाथैर्विलोकिते । वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् ॥१३८॥ प्राप्ति होती है । नित्य दूर्वाओं से ग्यारह आहुतियां देने से अपमृत्यु का नाश एवम् आयु और आरोग्य की वृद्धि होतो है । तीन जन्मक्षत्रों में गुडूच, कुंकुम तथा मोलसिरी की समिधा से होम करने से सकल अपमृत्युओं का नाश होता है । उजले सरसों से हवन करने से महाज्वर का नाश होता है । अपामार्ग की समिधा से होम करने से समस्त रोगों का नाश होता है ॥१२२-१२६॥ पहिले ‘दक्षिणामूर्ति’ पश्चात् ‘तुभ्यम्’ पद को रखे । फिर ‘वटमूल’ पद को रख कर अन्त में ‘निवासिने’ ‘ध्यानेकनिरतांगाय’, ‘नमः’, ‘तारशक्ति’ और ‘रुद्राय शंभवे’ को जोड़े । इस तरह यह छत्तीस अक्षरों का मन्त्र समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है । इसके मुनि शुक हैं, छन्द अनुष्टुप् है ओर देवता दक्षिणामूर्ति हैं । शंभु के नाम से इसका व्यवहार होता है । आदि अन्त में ‘ह्रीं’, ‘मा’, तथा तारशक्ति से युक्त मन्त्रों से छह एवम् आठ अंगों का न्यास करे । मस्तक, भाल, नेत्र, कर्ण, कपोल, नासिका, मुख, भुजा, अस्थिसंधि, कंठ, स्तन, नाभि, कटि, गुह्य तथा पाद संधियों में मन्त्रवर्णों का न्यास करे ॥१२७-१३२॥ शरीर में स्मर तथा शक्तियों से व्यापक न्यास करे । तत्पश्चात् रमणीय हिमालय के तट पर वटवृक्ष के मूल में आसीन शंकर का न्यास करे । कल्पना करे कि हिमालय का तट सिद्ध तथा किन्नरगणों से सुसेवित हैं । वहाँ विविध वृक्ष लगे हुए हैं, जिनकी शाखायें धूप को नहीं आने देतीं । वृक्षों में नाना प्रकार के फूल खिले हुए हैं । लतायें, वृक्षों से लिपट कर शोभा बढ़ा रही हैं । शीतल वायु तथा खिले मन को आनन्दित कर देती हैं । देवांगनायें गाती हैं, मयूर नाचते हैं । कोकिल समूह अपने कलरव से दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हैं । इन्द्र आदि देवगण अपनी अपनी प्रियतमाओं के साथ उस स्थान को देखने के लिये आते हैं । उसी स्थान में एक महाविशाल वटवृक्ष अवस्थित है, उसके फल पद्मराग मणि की तरह उज्ज्वल होते हैं ॥१३३-१३८॥ पत्र नो रत्नों के बने हुए से प्रतीत होते हैं । वे बहुत