सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 872, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 872

अंगैरावरणं पूर्वमनंताद्यैरनन्तरम् । उमादिभिः समुद्दिष्टं तृतीयं लोकनायकैः ॥१०६॥ चतुर्थं पंचमं तेषामायुधैः परिकीर्तितम् । एवं प्रतिदिनं देवं पूजयेत्साधकोत्तमः ॥१०७॥ पुत्रपौत्रादिकां लक्ष्मीं संप्राप्य ह्यत्र मोदते । तारः स्थिरा सर्कर्णेन्दुर्भृगुः सर्गसमन्वितः ॥१०८॥ अक्षरात्मा निगदितो मन्त्रो मृत्युञ्जयात्मकः । ऋषिः कहोलो देव्यादिगायत्री छन्द ईरितम् ॥१०९॥ मृत्युञ्जयो महादेबो देवतास्य समीरितः । भृगुणा दीर्घयुक्तेन षडंगानि समाचरेत् ॥११०॥ चंद्रांकहुतभुङ्नेत्रं स्मितास्यं युग्मपद्मगम् । मुद्रापाशैणाक्षसूत्रलसत्पाणिं शशिप्रभम् ॥१११॥ मालेन्दुविगलत्पीयूषप्लुतांगमलंकृतम् । हाराद्यैर्निजकांत्या तु ध्यायेद्विश्वविमोहनम् ॥११२॥ गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं हुनेत्सुधीः । अमृताशकलैः शुद्धदुग्धाज्यसमभिप्लुतैः ॥११३॥ शैवे संपूजयेत्पीठे मूर्ति संकल्पमलतः । अंगावरणमाराध्य पश्चाल्लोकेश्वरान्यजेत् ॥११४॥ तवस्त्राणि ततो बाह्ये पूजयेत्साधकोत्तमः । जपपूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्मुनिसत्तमः ॥११५॥ कुर्यात्प्रयोगान्कल्पोक्तानभीष्टफलसिद्धये । दुग्धसिक्तैः सुधाखंडैर्हुत्वा प्रत्यहमादरात् ॥११६॥ सहस्रमासपर्यंतं लभेदायुर्धनं सुतान् । सुधावटतितान्पूर्वापयः सर्पिः पयो हविः ॥११७॥ सप्त द्रव्याणि वारेषु क्रमाद्दशशतं हुनेत् । सप्ताधिकान् द्विजान्नित्यं भोजयेन्मधुरान्वितम् ॥११८॥ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यादरुणां गां पयस्विनीम् । गुरुं संप्रीणयेत्पश्चाद्धनाद्यैर्देवताबिया ॥११९॥ अनेन विधिना साध्यः कृत्याद्रोहज्वरादिभिः । विमुक्तः सुचिरं जीवेच्छरदां शतमज्जसा ॥१२०॥ अभिचारे ज्वरे स्तंभघोरोन्मादे शिरोगदे । असाध्यरोगे श्वेडातौ मोहे दाहे महाभये ॥१२१॥ होमोऽयं शांतिदः प्रोक्तः सर्वाभयप्रदायकः । द्रव्यैरेतैः प्रजुहुयात्त्रिजन्मसु यथाविधि ॥१२२॥

जो साधक प्रतिदिन इस तरह शंकर को अर्चना करता है वह पुत्र, पौत्र तथा लक्ष्मी को प्राप्त कर आनन्द करता है ॥९९-१०७॥ तार, स्थिर, कर्ण, इन्दु, भृगु, तथा सर्ग सहित अक्षर रूप मन्त्र मृत्युंजय कहा गया है, इसके ऋषि कहोल, छन्द गायत्री और देवता मृत्युंजय महादेव माने गये हैं। दीर्घयुक्त भृगु से षडंग- न्यास करना चाहिये । तदनन्तर सूर्य, चंद्र तथा अग्निरूप नेत्र वाले, मंद मुसकान से युक्त मुखवाले, पद्मों पर आसीन होनेवाले, मुद्रा, पाश, मृगचर्म तथा अक्षसूत्र से सुशोभित पाणिवाले शशि के समान प्रभावाले, ललाट स्थित चंद्रमा से टपकते हुए अमृत से सिक्त गात्रवाले और हार आदि से अलंकृत विश्व विमोहन शिव का ध्यान कर विज्ञ व्यक्ति तीन लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश शुद्ध दूध तथा घी से युक्त गुडूच की समिधा से हवन करे । उत्तम साधक शैव पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर सांगोपांग देव की पूजा करे । पीठ से बाहर आयुध सहित लोकपालों को भी अर्चना करनी चाहिये ॥१०८-११४॥ मुनिश्रेष्ठ ! जप, पूजा आदि से मन्त्र सिद्ध हो जाने पर अभीष्ट-फल-प्राप्ति के लिये मन्त्र का प्रयोग करे । प्रतिदिन दुग्धसिक्त गुडूच के खण्डों से आदर पूर्वक होम करे । एक मास तक ऐसा करने से आयु, धन तथा पुत्रों की प्राप्ति होती हैं। गुडूची की समिधा, दूध, घी तथा सात द्रव्यों से एक सहस्र होम करे, सात से अधिक ब्राह्मणों को नित्य मधुर भोजन कराये । ऋत्विजों को पयस्विनी गो दक्षिणा में दे और गुरू को देव बुद्धया धन आदि से संतुष्ट करे । इस तरह साधन करने से मनुष्य कृत्या, द्रोह, ज्वर आदि से विमुक्त होकर आनन्दपूर्वक सो वर्ष जीता है । यह होम भूतोपद्रव, ज्वर, स्तंभन, घोर उन्माद, शिरोव्यथा, असाध्यरोग, कफ, मोह, दाह तथा महाभय को शान्त करनेवाला तथा भयनाशक है ॥११५-१२१॥ तीन बार जन्म नक्षत्रों के दिन उपर्युक्त द्रव्यों से विधिपूर्वक हवन तथा वेदपारंगत विप्रों को मधुर भोजन कराने से दीर्घ आयु और अभिलषित श्री को