बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८५२ नारदीयपुराणम् शक्तिं डमरुकाभीतिवरान्संदधतं करैः । ईशानं त्रीक्षणं शुभ्रमैशान्यं दिशि पूजयेत् ॥६२॥ परश्वेणवराभीतिर्दधानं विद्युदुज्ज्वलम् । चतुर्मुखं तत्पुरुषं त्रिनेत्रं पूर्वतोऽर्चयेत् ॥६३॥ अक्षस्रजं वेदपाशो ऋषिं डमरुकं ततः । खट्वांगं निशितं शूलं कपालं बिभ्रतं करैः ॥६४॥ अंजनाभं चतुर्वक्त्रं भीमदंतं भयावहम् । अघोरं त्रीक्षणं याम्ये पूजयेन्मंत्रवित्तमः ॥६५॥ कुंकुमाभचतुर्वक्त्रं वामदेवं त्रिलोचनम् । हरिणाक्षगणाभीतिवरहस्तं चतुर्मुखम् ॥६६॥ बालेंदुशेखरोल्लासिमुकुटं पश्चिमे यजेत् । कर्पूरेंदुनिभं सौम्यं सद्योजातं त्रिलोचनम् ॥६७॥ वराभयाक्षवलयकुठारान्संदधतं करैः । विलासिनं स्मेरवक्त्रं सौम्ये सम्यक्समर्चयेत् ॥६८॥ कोणेष्वर्चेश्चिन्निवृत्त्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात् । विघ्नेश्वराननन्ताद्यान्पत्रेषु परितो यजेत् ॥६९॥ उमादिकास्ततो बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इति संपूज्य देवेशं भक्त्या परमया युतः ॥१००॥ प्रीणयेन्नृत्यगीताद्यैः स्तोत्रैमंत्रौ मनोहरैः । तारो मायावियद्विंदुमनुस्वरसमन्वितः ॥१०१॥ पञ्चाक्षरसमायुक्तो वसुवर्णो मनुर्मतः । पंचाक्षरोक्तवत्कुर्यादंगन्यासादिकं बुधः ॥१०२॥ सिंदूराभं लसद्रत्नमुकुटं चन्द्रमौलिनम् । दिव्यभूषांगरागं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥१०३॥ वामोरुस्थप्रियारोज न्यस्तहस्तं च बिभ्रतम् । वेदटंकेंष्टमभयं ध्यायेत्सर्वेश्वरं शिवम् ॥१०४॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं घृतान्वितैः । पायसैर्जुहुयात्पीठे मूर्तिं संकल्य मूलतः ॥१०५॥ चाहिये । ईशान कोण में शक्ति, डमरु, अभयास्त्र, तथा वरास्त्र को हाथों में रखने वाले तीन नेत्रों वाले और शुक्लवर्ण वाले शंकर की पूजा करे। पूर्व दिशा में परशु, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, विद्युत् के समान चमकने वाले, चार मुख तथा तीन नेत्रों वाले शिव की अर्चना करे । दक्षिण दिशा में रुद्राक्ष की माला, वेद, पाश, डमरु, खट्वांग, तीक्ष्ण त्रिशूल तथा कपाल धारण करनेवाले, अंजन के समान आभा वाले, चार मुख तथा भयंकर दांत वाले, भयानक, अघोर एवम् त्रिनयनयुक्त शंभु की पूजा करे । पश्चिम दिशा में कुंकुम के सदृश प्रभावोले, चार मुख एवम् तीन नेत्र वाले, करों में रुद्राक्ष, अभयास्त्र, तथा वरास्त्र, धारणा करने वाले ललाट पर बाल चन्द्र से सुशोभित मुकुट वाले वामदेव की पूजा करे उत्तर दिशा में कर्पूर तथा इन्दु के समान धवल, तीन नेत्रों वाले, हाथों में वरास्त्र, अभयास्त्र, रुद्राक्ष तथा कुठार धारण करने वाले, मंद मुसकान से सुशोभित मुख वाले, विलासी महादेव की आराधना करे ॥६२-९८॥ कोणों में निवृत्ति आदि तेजोरूप कलाओं की क्रमशः पूजा कर चारों ओर पत्रों पर विघ्नेश्वर, अनन्त आदि देवों की अर्चना करे । बारह उमा आदि देवियों तथा आयुध सहित शक्र आदि देवों का पूजन करे । मन्त्री इस प्रकार परम भक्ति से देवेश कीपूजा कर नृत्य, गीत, तथा मनोहर स्तोत्र आदि से उनको प्रसन्न करे । प्रणव, माया वियत् तथा बिंदुयुक्त मन्त्र अष्टाक्षर मन्त्र कहलाता है । सुधी व्यक्ति इसमें भी पंचा- क्षर मन्त्र की तरह अंगन्यास आदि करे । तत्पश्चात् सिंदूर के समान आभा वाले, ललाट पर चंद्रमा को धारण करने वाले, रत्न मुकुट, दिव्य आभूषण, अंगराग तथा नागयज्ञोपवीत से विभूषित, बांयी जंघे पर बैठी प्रिया के उरोज पर हाथ रखने वाले, वेद, टंक, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले सर्वेश्वर शिव का ध्यान कर आठ लाख मन्त्र का जप करे । और उतने ही सहस्र घृतयुक्त खीर से हवन करे । अनन्तर पीठ पर मूल- मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर सांगोपांग पूजन करे । बारह उमा आदि देवियों तथा आयुध समेत शक्र आदि देवों की पूजा करनी चाहिये ।