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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 870, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 870

\hfill एकनवतितमोऽध्यायः \hfill ८५१

व्याधिस्तु पंचमी प्रोक्ता शर्वेभ्यस्तदनंतरम् । मृत्युर्निगदिता षष्ठी नमस्ते अस्तु तत्परम् ॥७३॥ क्षुधा स्यात्सप्तमी रुद्ररूपेभ्यः कथिता तृषा । अष्टमी कथिता एता ध्रुवाद्या नमसान्विताः ॥७४॥ गुह्ययुग्मोरुयुग्मेषु जानुजंघास्फिजोः पुनः । कट्यां पार्श्वद्वये वामकला न्यस्येत्त्रयोदश ॥७५॥ प्रथमा वामदेवाय नमोऽंते स्याद्रजा कला । स्याज्ज्येष्ठाय नमो रक्षा द्वितीया परिकीर्तिता ॥७६॥ कलकामा पंचमी स्यात्ततो विकरणाय च । नमः संयमनी षष्ठी कथिता तदनंतरम् ॥७७॥ बलक्रिया सप्तमीष्टा कला विकरणाय च । नमो वृद्धिस्र्व्वष्टमी स्याद्बलांते च स्थिरा कला ॥७८॥ पश्चात्प्रमथनायांते नमो रात्रिरुदीरिता । सर्वभूतदमनाय नमो॑ते भ्रामणी कला ॥७९॥ नमोऽन्ते मोहिनी प्रोक्ता मन्त्रज्ञैर्द्वादशी कला । मनोन्मन्यै नमः पश्चाज्ज्वरा प्रोक्ता त्रयोदशी ॥८०॥ प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यंता नमोतास्तु प्रकीर्तिताः । पाददोस्तननासासु मूर्ध्नि बाहुयुगे न्यसेत् ॥८१॥ सद्योजातभवाः सम्यगष्टौ मन्त्राः कलाः क्रमात् । सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्धिः स्यात्प्रथमा कला ॥८२॥ सद्योजाताय वै भूयो नमः स्याद् बुद्धिरीरिता । भवेद्युतिस्तृतीया स्याद्भववे तदनंतरम् ॥८३॥ लक्ष्मी चतुर्थी कथिता ततो नातिभवेपदम् । मेधा स्यात्पञ्चमी प्रोक्ता कलाभूयो भवस्व माम् ॥८४॥ प्राज्ञा समीरीता षष्ठी भवांते स्यात्प्रभा कला । उद्भबाय नमः पश्चात्सुधा स्यादष्टमी कला ॥८५॥ प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यंता कला सर्वा नमोन्विताः । अष्टांत्रिशत्कलाः प्रोक्ताः पंच ब्रह्मपदादिकाः ॥८६॥ इति विन्यस्तदेहोऽसौ भवेद्गंगाधरः स्वयम् । ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवम् ॥८७॥ सितपीतासितश्वेतजपामैः पंचभिर्मुखैः । अक्षैर्युक्तं ग्लौमुकुटं कोटिपूर्णेंदुसंप्रभम् ॥८८॥ शूलं टंकं कृपाणं च वज्राम्न्यहिपतीन्करैः । दधानं भूषणोद्दीप्तं घण्टापाशवराभयान् ॥८९॥ एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रं पञ्चलक्षं मधुप्लुतैः । प्रसूनैः करवीरोत्थैर्जुहुयात्तद्दशांशतः ॥९०॥ पूर्वोदिते यजेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । आवाह्य पूजयेत्तस्यां मूर्त्तावावरणैः सह ॥९१॥

गुह्य प्रदेश, ऊरुयुग्म, जानु, जंघा, चूतड़, कटि, तथा दोनों पाश्वों में तेरह वामकलाओं का न्यास करना चाहिये । वामदेव के लिये पहली कला रजा बताई गई है, ज्येष्ठ के लिये रक्षा और विकरण के लिये कल- कामा । चौथी कला संयमनी, पांचवीं बलक्रिया, छठी वृद्धि, सातवीं स्थिरा, आठवीं रात्रि, नवीं भ्रामणी, दशवीं मोहिनी, ग्यारहवीं मनोन्मनी, बारहवीं ज्वरा, और तेरहवीं बना कहलाती हैं ॥६७-८०॥ इनके आदि में प्रणव और अन्त में चतुर्थी विभक्ति तथा नमः शब्द आते हैं। चरण, भुजा, स्तन, नासिका तथा मस्तक पर आठ सद्योजात मन्त्रकलाओं का न्यास करना चाहिये । सिद्धि, वृद्धि, द्युति, लक्ष्मो, मेधा, प्राज्ञा, प्रभा तथा सुधा- ये आठ सद्योजात कलायें हैं । इनके आदि में प्रणव तथा अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः शब्द आते हैं। इस तरह पाँच ब्रह्मपदा आदि को मिलाकर अड़तीस कलायें होती हैं ॥८१-८६॥

जो व्यक्ति उपर्युक्त प्रकार से शरीर न्यास करता है, वह साक्षात् शिव होता है । इसके बाद समा- हित होकर सित, पीत, असित श्वेत तथा रक्तवर्ण वाले पाँच मुखों से युक्त, रुद्राक्ष एवम् देदीप्यमान मुकुट धारण करने वाले, कोटि पूर्णचन्द्र के समान प्रभा वाले, करों में त्रिशूल, टंक, कृपाण, वज्र, अग्नि, अहिपति, घण्टा पाश, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले और आभूषणों से विभूषित शंकर का ध्यान कर पाँच लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुयुक्त करवीर के पुष्पों से हवन करे। फिर पूर्वकथित पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर आवाहन करके पूजन करे ॥८७-६१॥ मूर्ति में आवरणों के साथ पूजन करना