बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 880, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्विनवतितमोऽध्यायः सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा नारदस्तु कुमारस्य वचो मुदा । पुनरप्याह सुप्रीतो जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ॥१॥ नारद उवाच साधु साधु महाभाग सर्वलोकोपकारकम् । महातंत्रं त्वया प्रोक्तं सर्वतंत्रोत्तमोत्तमम् ॥२॥ अधुना श्रोतुमिच्छामि पुराणाख्यानमुत्तमम् । यस्मिन्यस्मिन्पुराणे तु यद्यदाख्यानकं मुने । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व सर्वज्ञस्त्वं यतो मतः ॥३॥ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रा नारदस्य शुभावहम् । पुराणाख्यानसंप्रश्नं कुमारः प्रत्युवाच ह ॥४॥ सनत्कुमार उवाच पुराणाख्यानकं विप्र नानाकल्पसमुद्भवम् । नानाउथासमायुक्तमद्भुतं बहुविस्तरम् ॥५॥ ऋषिः सनातनश्चायं यथा वेद तथाऽपरः । न वेद तस्मात्पृच्छ त्वं बहुकल्पविदां वरम् ॥६॥ अध्याय ६२ संक्षेप में ब्रह्मपुराण का इतिहास सूत बोले- कुमार के वचन को सुनकर जिज्ञासु नारद परम प्रसन्न हुए और कल्याण की बातें फिर पूछने लगे ॥१। नारद बोले- महाभाग ! साधु ! साधु ! आपने अखिल लोकोपकारक तथा समस्त तन्त्रों में उत्तम महा- तन्त्र को बता दिया । अब मैं पुराणों के पवित्र आख्यान को सुनना चाहता हूँ । मुने ! जिस-जिस पुराण में जो आख्यान आते हैं, वह सब मुझे बता दीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥२-३॥ सूत बोले- विप्रवृन्द ! नारद के पुराणाख्यान सम्बन्धी कल्याणकारक प्रश्न को सुनकर कुमार कहने लगे ॥४॥ सनत्कुमार बोले- "विप्र ! अनेक कल्पों में होने वाले, पुराणों के आख्यान विविध कथाओं से युक्त, अद्भुत तथा अत्यन्त विस्तृत हैं। ये सनातन नामक ऋषि अपर वेदावतार ही हैं। ये अनेक कल्पज्ञाताओं में श्रेष्ठ हैं। इनसे तुम अपनी जिज्ञासा पूरी कर लो ॥५-६॥"