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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 881, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 881

८६२ नारदीयपुराणम् श्रुत्वेत्थं नारदो वाक्यं कुमारस्य महात्मनः । प्रणम्य विनयोपेतः सनातनमथाब्रवीत् ॥७॥ नारद उवाच ब्रह्मन्पुराणविच्छ्रेष्ठ ज्ञानविज्ञानतत्पर । पुराणानां विभागं मे साकल्येनानुकीर्तय ॥८॥ यस्मिन् श्रुते श्रुतं सर्वं ज्ञाते ज्ञातं कृते कृतम् ॥६॥ वर्णाश्रमाचारधर्मं साक्षात्कारमुपैष्यति । कियन्ति च पुराणानि कियत्संख्यानि मानतः ॥१०॥ किंकिमाख्यानयुक्तानि तद्वदस्व मम प्रभो । चातुर्वर्ण्याश्रया नानाव्रतादीनां कथास्तथा ॥११॥ सृष्टिकमेण वंशानां कथाः सम्यक्प्रकाशय । त्वत्तोऽधिको न चान्योऽस्ति पुराणाख्यानवित्प्रभो ॥१२॥ तस्मादाख्याहि मह्यं त्वं सर्वसन्देहभंजनम् । सूत उवाच ॥१३॥ ततः सनातनो विप्राः श्रुत्वा नारदभाषितम् । नारायणं क्षणं ध्यात्वा प्रोवाचाथ विदां वरः । सनातन उवाच ॥१४॥ साधु साधु मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकोपकारिका पुराणाख्यानविज्ञाने यज्जाता नैष्ठिकी मतिः । तुभ्यं समभिधास्यामि यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पुरा ॥१५॥ मरीच्यादिऋषिभ्यस्तु पुत्रस्नेहावृतात्मना । एकदा ब्रह्मणः पुत्रो मरीचिर्नाम विश्रुतः ॥१६॥ स्वाध्यायश्रुतसंपन्नो वेदवेदांगपारगः । उपसृत्य स्वपितरं ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥१७॥ प्रणम्य भक्त्या पप्रच्छ इदमेव मुनीश्वर । पुराणाख्यानममलं यस्त्वं पृच्छसि मानव ॥१८॥ महात्मा कुमार की यह बात सुनकर नारद विनयपूर्वक सनातन को प्रणाम करके निवेदन करने लगे ॥७॥ नारद बोले—ब्रह्मन् ! पुराणवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! ज्ञान-विज्ञान से भरे पुराणों के आख्यानों को समग्रतया मुझे बता दीजिये, जिनके सुनने से सब कुछ सुना हुआ जानने से जाना हुआ तथा करने से किया हुआ हो जाता है और जिनमें वर्णाश्रमधर्म एवम् आचारधर्म का साक्षात्कार कराया गया है। प्रभो ! कितने पुराण हैं ? उनकी कितनी संख्या है ? कौन-कौन-से आख्यान कहे गये हैं ? सब कुछ मुझे बतला दीजिये। नानाव्रत, चातुर्वर्ण्य तथा सृष्टिक्रम से वंशों की कथायें सम्यक् प्रकार से कहिये। आपसे बढ़ कर पुराणों का ज्ञाता कोई नहीं है। इसलिये मेरे समस्त संशयों का आप निराकरण कीजिये। सूत बोले—विप्रगण ! तदुपरान्त नारद का वचन सुनकर वेत्ताओं में श्रेष्ठ सनातन क्षण भर नारायण का ध्यान कर कहने लगे। सनातन बोले—मुनिश्रेष्ठ ! साधु ! साधु ! पुराणों के आख्यान सुनने में जो तुम्हारी प्रीति हुई है, उससे सकल लोकों का उपकार होगा। प्राचीन काल में पुत्र-स्नेह-वशीभूत ब्रह्मा ने मरीचि आदि ऋषियों से जो बताया था, वह मैं तुमसे कहूँगा। मुनीश्वर ! एक समय अत्यन्त विख्यात, वेदवेदांगपारंगत स्वाध्याय संपन्न ब्रह्मपुत्र मरीचि अपने पिता लोककर्ता ब्रह्मा के समीप जाकर भक्ति पूर्वक प्रणाम करते हुए यही पुराणों के पवित्र आख्यान, जो तुमने प्रश्न किया है, पूछ बैठे ॥८-१८॥