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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 882, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 882

द्विनवतितमोऽध्यायः ८६३ मरीचिरुवाच भगवन्देवदेवेश लोकानां प्रभवाप्यय । सर्वज्ञ सर्वकल्याण सर्वाध्यक्ष नमोऽस्तु ते ॥१९॥ पुराणबीजमाख्याहि मह्यं शुश्रूषवे पितः । लक्षणं च प्रमाणं च वक्तारं पृच्छकं तथा ॥२०॥ ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिञ्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ॥२१॥ पुराणमेकमेवासीत्सर्वकल्पेषु मानव । चतुर्वर्गस्य बीजं च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२२॥ प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ॥२३॥ हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥२४॥ तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२५॥ अस्त्येव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च वायवीयं तथैव च ॥२६॥ भागवतं नारदीयं मार्कंडेयं च कीर्तितम् । आग्नेयं च भविष्यं च ब्रह्मवैवर्तलिंगके ॥२७॥ वाराहं च तथा स्कांदं वामनं कूर्मसंज्ञकम् । मात्स्यं च गारुडं तद्वद्ब्रह्मांडाख्यमिति त्रिषट् ॥२८॥ एकं कथानकं सूत्रं वस्तुः श्रोतुः समाह्वयम् । प्रवक्ष्यामि समासेन निशामय समाहितः ॥२९॥ ब्राह्मं पुराणं तत्रादौ सर्वलोकहिताय वै । व्यासेन वेदविदुषा समाख्यातं महात्मना ॥३०॥ तद्वै सर्वपुराणाद्ययं धर्मकामार्थमोक्षदम् । नानाख्यानेतिहासाढ्यं दशसाहस्रमुच्यते ॥३१॥ देवानां च सुराणां च यत्रोत्पत्तिः प्रकीर्तिता । प्रजापतीनां च तथा दक्षादीनां मुनीश्वर ॥३२॥ मरीचि बोले—भगवन् ! देवदेवेश ! लोकों के उत्पादक तथा विनाशक ! सर्वज्ञ ! सर्वकल्याण ! सर्वाध्यक्ष आपको नमस्कार है । पिता ! मुझ शुश्रूषु को पुराण के बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता तथा प्रष्ठा के विषय में समझाइये ॥१९-२०॥ ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं पुराणों का संग्रह बतला रहा हूँ, जिसके जान लेने से चराचर सहित संपूर्ण वाङ्मय ज्ञात हो जाता है । मानद ! समस्त कल्पों में एक ही पुराण चतुर्वर्ग का बीजरूप तथा सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत था । उस पुराण से सकल शास्त्रों की उत्पत्ति हुई । समय-समय पर लोकों में उस विस्तृत पुराण के ग्रहण करने की अक्षमता देखकर महामति हरि व्यासरूप से युग-युग में अवतार लेते हैं । प्रत्येक द्वापर युग में चतुर्लक्ष श्लोकों के प्रमाण से उस पुराण को अट्ठारह भागों में विभक्त करके भूलोक में छोड़ देते हैं ॥२१-२४ १/२॥ देवलोक में आज भी उस पुराण का सौ करोड़ श्लोकों में विस्तार है । उस शतकोटि विस्तृत पुराण का सार चार लाख श्लोकों में वर्णन किया गया है । ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, वायवीय, भागवत, नारदीय, मार्कंडेय, आग्नेय, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, लिंग, वाराह, स्कांद, वामन, कूर्म, मात्स्य, गारुड, तथा ब्रह्मांड—ये अठारह पुराणों के नाम हैं । सब का एक ही कथानक-सूत्र हैं । उस सूत्र को तथा वक्ता और श्रोता के नाम को मैं संक्षेप से बता देता हूँ, तुम सावधानी से सुनो । सब पुराणों में प्रथम पुराण ब्राह्म है, जिसकी रचना वेद के विद्वान् महात्मा व्यास ने अखिल लोकों के कल्याण के लिये की । वह सर्वप्रथम पुराण कहलाता है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देता है । उसमें अनेक आख्यान तथा इतिहास भरे हैं; श्लोकों की संख्या दस हजार हैं ॥२५-३१॥ मुनीश्वर ! ब्रह्मपुराण में देवों, असुरों, प्रजापतियों तथा दक्ष, आदिकों की उत्पत्ति बताई गई हैं; लोकेश्वर