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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 883, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 883

८६४ नारदीयपुराणम् ततो लोकेश्वरस्याथ सूर्यस्य परमात्मनः । वंशानुकीर्तनं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥३३॥ यत्रावतारः कथितः. परमानन्दरूपिणः । श्रीमतो रामचंद्रस्य चतुर्व्यूहावतारिणः ॥३४॥ ततश्च सोमवंशस्य कीर्तनं यत्र वर्णितम् । कृष्णस्य जगदीशस्य चरितं कल्मषापहम् ॥३५॥ द्वीपानां चैव सर्वेषां वर्षाणां चाप्यशेषतः । वर्णनं यत्र पातालस्वर्गाणां च प्रदृश्यते ॥३६॥ नरकाणां समाख्यानं सूर्यस्तुतिकयानकम् । पार्वत्याश्च तथा जन्म विवाहश्च निगद्यते ॥३७॥ दक्षाख्यानं ततः प्रोक्तमेकाम्रक्षेत्रवर्णनम् । पूर्वभागोऽयमुदितः पुराणस्यास्य नारद ॥३८॥ अस्योत्तरे विभागे तु पुरुषोत्तमवर्णनम् । विस्तरेण समाख्यातं तीर्थयात्राविधानतः ॥३९॥ अत्रैव कृष्णचरितं विस्तरात्समुदीरितम् । वर्णनं यमलोकस्य पितृश्राद्धविधस्तथा ॥४०॥ वर्णाश्रमाणां धर्माश्च कीर्तिता यत्र विस्तरात् । विष्णुधर्मयुगाख्यानं प्रलयस्य च वर्णनम् ॥४१॥ योगानां च समाख्यानं सांख्यानां चापि वर्णनम् । ब्रह्मवादसमुद्देशः पुराणस्य प्रशंसनम् ॥४२॥ एतद्ब्रह्मपुराणं तु भागद्वयसमन्वितम् । वर्णितं सर्वपापघ्नं सर्वसौख्यप्रदायकम् ॥४३॥ सूतशौनकसंवादं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । लिखित्त्वैतत्पुराणं यो वैशाख्यां हेमसंयुतम् ॥४४॥ जलधेनुयुतं चापि भक्त्या दद्याद्विजातये । पौराणकाय संपूज्य वस्त्रभोज्यविभूषणैः ॥४५॥ स वसेद्ब्रह्मणो लोके यावच्चंद्रार्कतारकम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मानुक्रमणीं द्विज ॥४६॥ सोऽपि सर्वपुराणस्य श्रोतुर्वक्तुः फलं लभेत् । शृणोति यः पुराणं तु ब्राह्मं सर्वं जितेंद्रियः ॥४७॥ परमात्मा सूर्य के वंश का वर्णन किया गया है, जो महापातकों का नाशक है; चतुर्व्यूहावतारी परमानन्दरूपी श्रीमान् रामचन्द्र का अवतार वर्णित है; सोमवंश का कीर्तन तथा जगदीश कृष्ण के पापनाशन चरित्र का वर्णन आता है; अखिल द्वीपों, वर्षों, पाताल, स्वर्ग तथा नरक का आख्यान मिलता है; सूर्य की स्तुति एवम् कथा, पार्वती का जन्म और विवाह वर्णित किया गया है; दक्ष का आख्यान और एकाम्रक्षेत्र का वर्णन भी मिलता है। नारद ! इतना तो उस पुराण के पूर्वभाग का विषय है ॥३२-३८॥ उत्तर भाग में विस्तार से पुरुषोत्तम क्षेत्र का वर्णन और तीर्थयात्रा का विधान बताया गया है। इसी भाग में विस्तार से कृष्णचरित्र यमलोक, पितृश्राद्ध, वर्णाश्रमधर्म, विष्णुधर्म, युग, प्रलय, योग तथा सांख्य का वर्णन किया गया है; ब्रह्मवाद का उद्देश्य कथन तथा पुराण की प्रशंसा की गई है । बस, यही विषय ब्रह्मपुराण के दोनों भागों में आते हैं । यह पुराण सकल पापनाशक, सर्वसौख्यदायक एवम् भुक्ति-मुक्ति प्रदायक हैं। उसमें सूत और शौनक का संवाद हुआ है ॥३९-४३॥ वैशाख की पूर्णिमा को जो व्यक्ति वस्त्र, भोज्य तथा आभूषणों से पौराणिक ब्राह्मण का पूजन कर सुवर्ण तथा जलधेनु सहित लिखित ब्रह्मपुराण की पुस्तक प्रदान करता है, वह जब तक सूर्य-चन्द्रमा रहते हैं तब तक ब्रह्मलोक में वास करता है। जो द्विज ब्रह्मपुराण का श्रवण या पाठ करता है, उसे समस्त पुराणों के पारायण तथा श्रवण करने का फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय होकर नियमपूर्वक हविष्य भक्षण करते हुए ब्रह्मपुराण का श्रवण

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