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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 884, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 884

द्विनवतितमोऽध्यायः ८६५ हविष्याशी च नियमात्स लभेदब्रह्मणः पदम् । किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः तत्सर्वं लभते वत्स पुराणस्यास्य कीर्तनात् ॥४८॥ इति श्री बृहन्ना० पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे ब्राह्मपुराणेतिहासकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः ॥६२॥ त्रिनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं पद्मसंज्ञकम् । महत्पुण्यप्रदं नृणां शृण्वतां पठतां मुदा ॥१॥ यथा पंचेन्द्रियः सर्वः शरीरीति निगद्यते । तथेदं पंचभिः खंडैरुदितं पापनाशनम् ॥२॥ पुलस्त्येन तु भीष्माय सृष्ट्यादिक्रमतो द्विज । नानाख्यानेतिहासाद्यैर्यत्रोक्तो धर्मविस्तरः ॥३॥ पुष्करस्य च माहात्म्यं विस्तरेण प्रकीर्तितम् । ब्रह्मयज्ञविधानं च वेदपाठादिलक्षणम् ॥४॥ करता है, उसे ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। वत्स ! अधिक क्या कहें, उस पुराण के कीर्तन करने से मनुष्य जो कुछ चाहता है, वह सब उसे मिल जाता है ॥४४-४८॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में ब्रह्मपुराण का इतिहास कथन नामक बानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥६२॥ अध्याय ६३ पद्मपुराण की विषय-सूची ब्रह्मा बोले—पुत्र ! सुनो, अब मैं हर्ष से पद्मपुराण के सम्बन्ध में कहूँगा, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के लिये महापुण्यदायक है। जैसे पांच इन्द्रियों से युक्त प्राणी शरीरी कहलाता है, उसी तरह पांच खण्डों से युक्त यह पुराण पापनाशन कहा जाता है। द्विज ! इस पुराण में जहाँ पुलस्त्य ने भीष्म से सृष्टि के आदि से लेकर अनेक आख्यान, इतिहास, धर्म, पुष्करमाहात्म्य, ब्रह्मयज्ञविधान, वेदपाठ आदि के लक्षण, दान तथा व्रतों का पृथक् १०९ ना० पु०