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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 885, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 885

८६६ नारदीयपुराणम् दानानां कीर्तनं यत्र व्रतानां च पृथक्पृथक् । विवाहः शैलजायाश्च तारकाख्यानकं महत् ॥५॥ माहात्म्यं च गवादीनां कीर्तितं सर्वपुण्यदम् । कालकेयादिदैत्यानां वधो यत्र पृथक्पृथक् ॥६॥ ग्रहाणामर्चनं दानं यत्र प्रोक्तं द्विजोत्तम । तत्सृष्टिखण्डमुद्दिष्टं व्यासेन सुमहात्मना ॥७॥ पितृमात्रादिपूज्यत्वे शिवशर्मकथा पुरा । सुव्रतस्य कथा पश्चाद्वृत्रस्य च वधस्तथा ॥८॥ पृथोर्वेनस्य चाख्यानं सुनीथायाः कथा तथा । सुकलाख्यानकं चैव धर्माख्यानं ततः परम् ॥६॥ पितृशुश्रूषणाख्यानं नहुषस्य कथा ततः । ययातिचरितं चैव गुरुतीर्थनिरूपणम् ॥१०॥ राज्ञा जैमिनिसंवादो बह्वाश्चर्यकथायुतः । कथा ह्याशोकसुन्दर्या हुण्डदैत्यवधान्विता ॥११॥ कामोदाख्यानकं तत्र विहुण्डवधसंगुतम् । कुंजलस्य च संवादश्च्यवनेन महात्मना ॥१२॥ सिद्धाख्यानं ततः प्रोक्तं खंडस्यास्य फलोहनम् । सूतशौनकसंवादं भूमिखंडमिदं स्मृतम् ॥१३॥ ब्रह्माण्डोत्पत्तिस्तद्विता यत्राभिषिच सौतिना । सन्तूमि लोकसंस्थानं तीर्थाख्यानं ततः परम् ॥१४॥ नर्मदोत्पत्तिकथनं तत्तीर्थानां कथाः पृथक् । कुरुक्षेत्रादितीर्थानां कथा पुण्या प्रकीर्तिता ॥१५॥ कालिन्दापुण्यकथनं काशीमाहात्म्यवर्णनम् । गयायाश्चैव माहात्म्यं प्रयागस्य च पुण्यकम् ॥१६॥ वर्णाश्रमानुरोधेन कर्मयोगनिरूपणम् । व्यासजैमिनिसंवादः पुण्यकर्मकथान्वितः ॥१७॥ समुद्रमथनाख्यानं व्रताख्यानं ततः परम् । ऊर्जपंचाहमाहात्म्यं स्तोत्रं सर्वापराधनुत् ॥१८॥ एतत्स्वर्गभिधं विप्र सर्वपातकनाशनम् । रामाश्वमेधं प्रथमं रामराज्याभिषेचनम् ॥१९॥ अगस्त्याद्यागमनञ्चैव पौलस्त्यान्वयकीर्त्तनम् । अश्वमेधोपदेशश्च हयचर्या ततः परम् ॥२०॥ नानाराजकथाः पुण्या जगन्नाथानुवर्णनम् । वृन्दावनस्य माहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२१॥ कथन, पार्वती का विवाहवर्णन, तारक तथा कालकेय आदि दैत्यों का वध, गो आदिकों का माहात्म्यवर्णन, ग्रहों का अर्चन तथा दान बतलाये हैं, उसे महात्मा व्यास ने सृष्टि खंड कहा है॥१-६॥ पिता-माता के पूज्यत्व के विषय में शिवशर्मा की कथा, सुव्रत की कथा, वृत्रवध, पृथुवेन का आख्यान, सुनीथा की कथा, सुकला का आख्यान, धर्माख्यान, पितृशुश्रूषा का आख्यान, नहुष की कथा, ययातिचरित्र, गुरुतीर्थनिरूपण, राजा और जैमिनि का अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त संवाद, अशोकसुन्दरी की कथा, हुंडदैत्य का वध, कामोदा-आख्यान, विहुंडवध, महात्मा च्यवन के साथ कुंजल का संवाद, सिद्धाख्यान, और सूत-शौनक-संवाद जहाँ निर्दिष्ट किये गये हैं, उसका नाम भूमिखण्ड है ॥७-१३॥ जहाँ सूतपुत्र द्वारा ऋषियों से ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन, भूलोक का संस्थान, तीर्थाख्यान, नर्मदोत्पत्ति- कथन, तीर्थों की पृथक्-पृथक् कथायें, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों की पवित्र कथा, कालिन्दीपुण्यकथन, काशीमाहात्म्य वर्णन, गया तथा प्रयाग का माहात्म्यवर्णन, वर्णाश्रम के अनुरोध से कर्मयोगनिरूपण, व्यास और जैमिनि का संवाद, पुण्यकर्म की कथा, समुद्रमंथन का आख्यान, व्रताख्यान,कार्तिक के पाँच दिनों का माहात्म्य और सर्वापरा- धनोदनस्तोत्र, बतलाये गये हैं, उसे स्वर्गखण्ड कहते हैं, जो सकल पातकों का नाशक है । विप्र ! रामाश्वमेध, रामराज्याभिषेक, अगस्त्य आदि का आगमन, पौलस्त्यवंशवर्णन, अश्वमेध का उप- देश, अश्वचर्या, अनेक राजाओं की पवित्र कथायें, जगन्नाथ वर्णन, समस्त पापनाशन, वृन्दावन का माहात्म्य, कृष्णावतार की नित्यलीलाओं का कथन, माधवस्नानमाहात्म्य, स्नान, दान तथा अर्चन का फल, पृथ्वी तथा