बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
८६६ नारदीयपुराणम् दानानां कीर्तनं यत्र व्रतानां च पृथक्पृथक् । विवाहः शैलजायाश्च तारकाख्यानकं महत् ॥५॥ माहात्म्यं च गवादीनां कीर्तितं सर्वपुण्यदम् । कालकेयादिदैत्यानां वधो यत्र पृथक्पृथक् ॥६॥ ग्रहाणामर्चनं दानं यत्र प्रोक्तं द्विजोत्तम । तत्सृष्टिखण्डमुद्दिष्टं व्यासेन सुमहात्मना ॥७॥ पितृमात्रादिपूज्यत्वे शिवशर्मकथा पुरा । सुव्रतस्य कथा पश्चाद्वृत्रस्य च वधस्तथा ॥८॥ पृथोर्वेनस्य चाख्यानं सुनीथायाः कथा तथा । सुकलाख्यानकं चैव धर्माख्यानं ततः परम् ॥६॥ पितृशुश्रूषणाख्यानं नहुषस्य कथा ततः । ययातिचरितं चैव गुरुतीर्थनिरूपणम् ॥१०॥ राज्ञा जैमिनिसंवादो बह्वाश्चर्यकथायुतः । कथा ह्याशोकसुन्दर्या हुण्डदैत्यवधान्विता ॥११॥ कामोदाख्यानकं तत्र विहुण्डवधसंगुतम् । कुंजलस्य च संवादश्च्यवनेन महात्मना ॥१२॥ सिद्धाख्यानं ततः प्रोक्तं खंडस्यास्य फलोहनम् । सूतशौनकसंवादं भूमिखंडमिदं स्मृतम् ॥१३॥ ब्रह्माण्डोत्पत्तिस्तद्विता यत्राभिषिच सौतिना । सन्तूमि लोकसंस्थानं तीर्थाख्यानं ततः परम् ॥१४॥ नर्मदोत्पत्तिकथनं तत्तीर्थानां कथाः पृथक् । कुरुक्षेत्रादितीर्थानां कथा पुण्या प्रकीर्तिता ॥१५॥ कालिन्दापुण्यकथनं काशीमाहात्म्यवर्णनम् । गयायाश्चैव माहात्म्यं प्रयागस्य च पुण्यकम् ॥१६॥ वर्णाश्रमानुरोधेन कर्मयोगनिरूपणम् । व्यासजैमिनिसंवादः पुण्यकर्मकथान्वितः ॥१७॥ समुद्रमथनाख्यानं व्रताख्यानं ततः परम् । ऊर्जपंचाहमाहात्म्यं स्तोत्रं सर्वापराधनुत् ॥१८॥ एतत्स्वर्गभिधं विप्र सर्वपातकनाशनम् । रामाश्वमेधं प्रथमं रामराज्याभिषेचनम् ॥१९॥ अगस्त्याद्यागमनञ्चैव पौलस्त्यान्वयकीर्त्तनम् । अश्वमेधोपदेशश्च हयचर्या ततः परम् ॥२०॥ नानाराजकथाः पुण्या जगन्नाथानुवर्णनम् । वृन्दावनस्य माहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२१॥ कथन, पार्वती का विवाहवर्णन, तारक तथा कालकेय आदि दैत्यों का वध, गो आदिकों का माहात्म्यवर्णन, ग्रहों का अर्चन तथा दान बतलाये हैं, उसे महात्मा व्यास ने सृष्टि खंड कहा है॥१-६॥ पिता-माता के पूज्यत्व के विषय में शिवशर्मा की कथा, सुव्रत की कथा, वृत्रवध, पृथुवेन का आख्यान, सुनीथा की कथा, सुकला का आख्यान, धर्माख्यान, पितृशुश्रूषा का आख्यान, नहुष की कथा, ययातिचरित्र, गुरुतीर्थनिरूपण, राजा और जैमिनि का अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त संवाद, अशोकसुन्दरी की कथा, हुंडदैत्य का वध, कामोदा-आख्यान, विहुंडवध, महात्मा च्यवन के साथ कुंजल का संवाद, सिद्धाख्यान, और सूत-शौनक-संवाद जहाँ निर्दिष्ट किये गये हैं, उसका नाम भूमिखण्ड है ॥७-१३॥ जहाँ सूतपुत्र द्वारा ऋषियों से ब्रह्मांड की उत्पत्ति का वर्णन, भूलोक का संस्थान, तीर्थाख्यान, नर्मदोत्पत्ति- कथन, तीर्थों की पृथक्-पृथक् कथायें, कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों की पवित्र कथा, कालिन्दीपुण्यकथन, काशीमाहात्म्य वर्णन, गया तथा प्रयाग का माहात्म्यवर्णन, वर्णाश्रम के अनुरोध से कर्मयोगनिरूपण, व्यास और जैमिनि का संवाद, पुण्यकर्म की कथा, समुद्रमंथन का आख्यान, व्रताख्यान,कार्तिक के पाँच दिनों का माहात्म्य और सर्वापरा- धनोदनस्तोत्र, बतलाये गये हैं, उसे स्वर्गखण्ड कहते हैं, जो सकल पातकों का नाशक है । विप्र ! रामाश्वमेध, रामराज्याभिषेक, अगस्त्य आदि का आगमन, पौलस्त्यवंशवर्णन, अश्वमेध का उप- देश, अश्वचर्या, अनेक राजाओं की पवित्र कथायें, जगन्नाथ वर्णन, समस्त पापनाशन, वृन्दावन का माहात्म्य, कृष्णावतार की नित्यलीलाओं का कथन, माधवस्नानमाहात्म्य, स्नान, दान तथा अर्चन का फल, पृथ्वी तथा
त्रिनवतितमोऽध्यायः ८६७ नित्यलीलानुकथनं यत्र कृष्णावतारिणः । माधवस्नानमाहात्म्यं स्नानदानाच्चने फलम् ॥२२॥ धरावराहसंवादो यमब्राह्मणयोः कथा । संवादो राजदूतनां कृष्णस्तोत्रनिरूपणम् ॥२३॥ शिवशंभुसमायोगो दधीच्याख्यानकं ततः । भस्ममाहात्म्यमतुलं शिवमाहात्म्यमुत्तमम् ॥२४॥ देवरातसुताख्यानं पुराणप्रशंसनम् । गौतमाख्यानकं चैव शिवगोता ततः स्मृता ॥२५॥ कल्पांतरे रामकथा भारद्वाजाश्रमस्थिता । पातालखंडमेतद्धि शृण्वतां पठतां सदा ॥२६॥ सर्वपापप्रशमनं सर्वाभीष्टफलप्रदम् । पर्वताख्यानकं पूर्वं गौर्ये प्रोक्तं शिवेन वै ॥२७॥ जालंधरकथा पश्चाच्छ्रीशैलाद्यनुकीर्तनम् । सगरस्य कथा पुण्या ततः परमुदीरितम् ॥२८॥ गंगाप्रयागकाशीनां गयायाश्चाधिपुण्यकम् । अन्नादिदानमाहात्म्यं तन्महाद्वादशीव्रतम् ॥२९॥ चतुर्विशेकादशीनां माहात्म्यं पृथगीरितम् । विष्णुधर्मसमाख्यानं विष्णुनामसहस्रकम् ॥३०॥ कार्त्तिकव्रतमाहात्म्यं माघस्नानफलं ततः । जम्बूद्वीपस्य तीर्थानां माहात्म्यं पापनाशनम् ॥३१॥ साभ्रमत्ययाश्च माहात्म्यं नृसिंहोत्पत्तिवर्णनम् । देवशर्मादिकाख्यानं गीतामाहात्म्यवर्णनम् ॥३२॥ भक्त्याख्यानं च माहात्म्यं श्रीमद्भागवतस्य ह । इन्द्रप्रस्थस्य माहात्म्यं बहुतीर्थकथान्वितम् ॥३३॥ मन्त्ररत्नाभिधानं च त्रिपाद्भूत्यनुवर्णनम् । अवतारकथाः पुण्या मत्स्यादीनामतः परम् ॥३४॥ रामनामशतं दिव्यं तन्माहात्म्यं च वाडव । परीक्षणं च भृगुणा श्रीविष्णोर्वैवमस्य च ॥३५॥ इत्येतदुत्तरं खण्डं पंचमं सर्वपुण्यदम् । पंचखंडयुतं पाद्मं यः शृणोति नरोत्तमः ॥३६॥ स लभेद्वैष्णवं धाम भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । एतद्वै पंचपंचाशत्सहस्रं पद्मसंज्ञकम् ॥३७॥ पुराणं लेखयित्वा वै ज्येष्ठयां स्वर्णब्जसंयुक्तम् । यः प्रदद्यात्सुसत्कृत्य पुराणज्ञाय मानव ॥३८॥
वाराह का संवाद, यम और ब्राह्मण की कथा, राजा का दूतों से संवाद, कृष्णस्तोत्रनिरूपण, शिव तथा शम्भु का समायोग, दधीच का आख्यान, अतुलनीय भस्ममाहात्म्य, उत्तम शिवमाहात्म्य, देवरात के पुत्र का आख्यान, पुराणों की प्रशंसा, गौतमाख्यान, शिवगोता और कल्पांतर में भारद्वाजआश्रम सम्बन्धी राम की कथा जिसमें वर्णित है, वह पातालखंड है, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के लिये सकलपापनाशक एवम् वांछितफलदायक है ॥१४- २६॥ पांचवें खण्ड का नाम उत्तर है। इसमें गौरी के प्रति शंकर द्वारा पर्वत का आख्यान, जालंधर कथा, श्रीशैल आदि का कीर्तन, सगर की पवित्र कथा, गंगा, प्रयाग, काशी तथा गया का पुण्यवर्णन, अन्नादिदान माहात्म्य, महाद्वादशीव्रत, चोबीस एकादशियों का पृथक्-पृथक् माहात्म्यवर्णन, विष्णुधर्म का आख्यान, विष्णु- सहस्रनाम, कार्तिक व्रतमाहात्म्य, माघस्नानफल, जम्बूद्वीप के तोर्थों का पापनाशक माहात्म्य, साभ्रमती का माहात्म्य, नृसिंहोत्पत्तिवर्णन, देवशर्मा आदि का आख्यान, गीतामाहात्म्यवर्णन, भक्ति का आख्यान, श्रीमद्भागवत का माहात्म्य, अनेक तीर्थ कथाओं के साथ इन्द्रप्रस्थ का माहात्म्य, मन्त्ररत्न का कथन, त्रिपाद्भूति का वर्णन, मत्स्य आदि अवतारों की पवित्र कथायें, राम नाम का सतनाम तथा दिव्यमाहात्म्य और भृगु द्वारा श्रीविष्णु के वैभव का परीक्षण बतलाये गये हैं। यह खंड समस्त पुण्यों को देने वाला है ॥२७-३५॥ जो श्रेष्ठ मनुष्य पांच खंडों से युक्त पद्मपुराण का श्रवण करेगा, वह इस लोक में अभिलषित भोगों का भोग कर वैकुण्ठ को जायेगा । मानद ! जो व्यक्ति पचपन हजार श्लोकों से परिपूर्ण पद्मपुराण को लिखकर ज्येष्ठ की पूर्णिमा में पौराणिक ब्राह्मण को स्वर्ग कमल सहित यह पुराण प्रदान करता है, वह सर्वदेववन्द्य होकर
८६८ नारदीयपुराणम् स याति वैष्णवं धाम सर्वदेवनमस्कृतः । पद्मानुक्रमणीमेतां यः पठेच्छृणुयात्तथा ॥३९॥ सोऽपि पद्मपुराणस्य लभेच्छ्रवणजं फलम् ॥४०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे पद्मपुराणानुक्रमणिकावर्णनं नाम त्रिनवतितमोऽध्यायः ॥९३॥ चतुर्नवतितमोऽध्यायः श्रीब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं वैष्णवं महत् । त्रयोविंशतिसाहस्रं सर्वपातकनाशनम् ॥१॥ यत्रादिभागे निर्दिष्टाः षडंशा शक्तिजेन ह । मैत्रेयायादिमे तत्र पुराणस्यावतारिकाम् ॥२॥ आदिकारणसर्गश्च देवादीनां च संभवः । समुद्रमथनाख्यानं दक्षादीनां ततोऽन्वयः ॥३॥ ध्रुवस्य चरितं चैव पृथोश्चरितमेव च । प्राचेतसं तथाख्यानं प्रह्लादस्य कथानकम् ॥४॥ विष्णुलोक को जाता है। जो मानव पद्मपुराण की इस अनुक्रमणी को सुनेगा या पढ़ेगा, वह भी इस पुराण के श्रवणजन्य फल को प्राप्त करेगा ॥३६-४०॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में पद्मपुराण का अनुक्रमणिका वर्णन नामक तिरानवेवां अध्याय समाप्त ॥६३॥ अध्याय ९४ विष्णुपुराण की विषय-सूची श्री ब्रह्मा बोले- वत्स ! सुनो, अब मैं अखिल पातकों के नाश करने वाले तथा तेईस हजार श्लोक वाले विष्णु महापुराण के सम्बन्ध में कहूँगा, जिसके आदि भाग में पराशर ने छह अंशों का निर्देश किया है। उसके प्रारंभ में मुनि ने मैत्रेय से पुराण की अवतारिका बतलाई है। तदनन्तर सृष्टि का आदिकारण, देवादिकों की उत्पत्ति, समुद्रमंथन का आख्यान, दक्ष आदि का वंशवर्णन, ध्रुव का चरित्र, प्रचेता का आख्यान, प्रह्लाद का कथानक, राज्यों का पृथक्-पृथक् अधिकार वर्णन-ये सब बातें प्रथम अंश में कही गई हैं ॥१-४१/२॥ द्वितीय अंश
चतुर्नवतितमोऽध्यायः ८६६ पृथुराज्याधिकाराख्या प्रथमोऽश ईरितिः । प्रियव्रताऽन्वयाख्यानं द्वीपवर्षनिरूपणम् ।।५।। पातालनरकाख्यानं सप्तस्वर्गनिरूपणम् । सूर्यादिवारकथनं पृथग्लक्षणसंयुक्तम् ।।६।। चरितं भरतस्याथ मुक्तिमार्गनिदर्शनम् । निदाघऋभुसंवादो द्वितीयोंऽश उदाहृतः । ७। मन्वन्तरसमाख्यानं वेदव्यासावतारकम् । नरकोद्धारकं कर्म गदितं च ततः परम् ।।८।। सगरस्योर्वसंवादे सर्वधर्मनिरूपणम् । श्राद्धकल्पं तथोद्दिष्टं वर्णाश्रमनिबन्धनम् ।।६।। सदाचारश्च कथितो मायामोहकथा ततः । तृतीयोंऽशाऽयमुदितः सर्वपापप्रनाशनः ।।१०।। सूर्यवंशकथा पुण्या सोमवंशाऽनुकीर्तनम् । चतुर्थेऽशे मुनिश्रेष्ठ नानाराजकथान्वितम् ।।११।। कृष्णोवतारसंश्लो गोकुलोथा कथा ततः । पूतनाविवधो बाल्ये कोमारेऽघाविहिंसनम् ।।१२।। कौशोरे कंसहननं माथुरं चरितं तथा । ततस्तु यौवने प्रोक्ता लीला द्वारवतीभवा ।।१३।। सर्वदैत्यवधो यत्र विवाहाश्च पृथग्विधाः । यत्र स्थित्वा जगन्नाथः कृष्णो योगेश्वरेश्वरः ।।१४।। भूभारहरणं चक्रे परेषां हननार्दिभिः । अष्टावक्रोपाख्यानं पंचमोंऽश ईरितिः ।।१५।। कलिजं चरितं प्रोक्तं चातुर्विध्यं लयस्य च । ब्रह्मज्ञानसमुद्देशः खांडिक्यस्य निरूपितः ।।१६।। केशिध्वजेन चेत्येष षष्ठोऽशः परिकीर्तितः । अतः परं तु सूतेन शौनकादिभिरादरात् ।।१७।। पृष्टेन बोधिताः शश्वद्विष्णुधर्मोत्तराह्वयाः । नानाधर्मकथाः पुण्या व्रतानि नियमा यमाः ।।१८।। धर्मशास्त्रं चार्थशास्त्रं वेदांतं ज्योतिषं तथा । वंशाख्यानं प्रकरणात् स्तोत्राणि मन्त्रस्तथा ।।१६।। नानाविद्यास्तथा प्रोक्ताः सर्वलोकोपकारिकाः । एतद्विष्णुपुराणं वै सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ।।२०।। वाराहकल्पवृत्तांतं व्यासेन कथितं त्विह । यो नरः पठते भक्त्या यः श्रृणोति च सादरम् ।।२१।। तावुभौ विष्णुलोकं हि व्रजेतां भुक्तभोगकौ । तल्लिखित्वा च यो दद्यादाषाढ्यां घृतधेनुना ।।२२।।
में प्रियव्रत का वंशवर्णन, द्वीपों और वर्षों का निरूपण, रवि आदि दिनों का पृथक्-पृथक् लक्षण निर्देश, भरत का चरित्र-वर्णन मुक्तिमार्ग का निदर्शन, निदाघ और ऋभु का संवाद, कहा गया है। सकल पापनाशन तृतीय अंश में मन्वन्तर का आख्यान, वेदव्यास का अवतार, नरकोद्धारक कर्म, सगर तथा ओर्व का संवाद, समस्त धर्मों का निरूपण, श्राद्धकल्प, वर्णाश्रमनिबन्धन, सदाचार तथा माया-मोह की कथा बताई गई है। मुनिश्रेष्ठ ! चतुर्थ अंश में अनेक राजाओं की कथा, कृष्णावतार के विषय में प्रश्न, गोकुल की कथा, (कृष्ण की) बाल्यावस्था में पूतना आदि का वध, कौमार अवस्था में अघासुर आदि की हिंसा, किशोरावस्था में कंस हनन तथा मथुरा का चरित्र- वर्णन, युवावस्था में द्वारिका की लीला, अखिल दैत्यों का वध और अनेक विवाह बतलाये गये हैं ॥५-१३३॥ जिस अंश में जगन्नाथ एवम् योगेश्वरेश्वर कृष्ण ने शत्रुओं को मारकर पृथ्वी का भार उतारा, वह पाँचवां अंश है। छठें अंश में कलि का चरित्र, चार प्रकार के लय, ब्रह्मज्ञान, केशिध्वजोपाख्यान और खांडिक्य की मंत्रणा बताई गई है। एतदुपरान्त शौनक आदि ऋषियों से आदरपूर्वक पूछे जाने पर सूत ने शाश्वत विष्णु धर्म संबन्धी अनेक कथायें, व्रत, नियम, यम धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, प्रकरणवश वंशाख्यान, स्तोत्र, मंत्र तथा अखिल लोकोपकारक अनेक तरह की विद्यायें बताई हैं। इस विष्णुपुराण में सब शास्त्रों का तत्त्व संगृहीत है ॥१४-२०॥ व्यास ने इस पुराण में वाराहकल्प का वृत्तान्त वर्णन किया है। जो नर आदरपूर्वक इसका पाठ करता है और जो श्रवण करता है, वे दोनों सकल भोगों को भोगकर विष्णुलोक को जाते हैं। द्विज ! जो इसको लिख
सहितं विष्णुभक्ताय पुराणार्थविदे द्विज । स याति वैष्णवं धाम विमानेनार्कवर्चसा ॥२३॥ यश्च विष्णुपुराणस्य समनुक्रमणीं द्विज । कथयेच्छृणुयाद्वापि स पुराणफलं लभेत् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे विष्णुपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥६४॥
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं वायवीयकम् । यस्मिञ्छ्रुते लभेदाम रुद्रस्य परमात्मनः ॥१॥ चतुर्विंशतिसाहस्रं तत्पुराणं प्रकीर्तितम् । श्वेतकल्पप्रसंगेन धर्मानत्राह मारुतः ॥२॥ तद्वायवीयमुदितं भागद्वयसमन्वितम् । सर्गादिलक्षणं यत्र प्रोक्तं विप्र सविस्तरम् ॥३॥ मन्वंतरेषु वंशाश्च राज्ञां ये तत्र कीर्तिताः । गयासुरस्य हननं विस्तराद्यत्र कीर्तितम् ॥४॥
कर आषाढ़ की पूर्णिमा में पुराणवेत्ता तथा विष्णुभक्त विप्र को घृतधेनु सहित इसे प्रदान करता है, वह सूर्य के समान चमकने वाले विमान से वैकुण्ठ को प्रयाण करता है। जो विष्णुपुराण की अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, उसे भी संपूर्ण पुराण का फल प्राप्त होगा ॥२१-२४॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में विष्णुपुराणानुक्रमणी निरूपण नामक चौरानबेवां अध्याय समाप्त ॥९४॥
अध्याय ६५ वायुपुराण की विषय सूची ब्रह्मा बोले—विप्र ! सुनो, मैं वायवीय पुराण कहूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य परमात्मा रुद्र के धाम को प्राप्त करता है। उस पुराण में चौबीस हजार श्लोक हैं, वायु ने श्वेतकल्प के प्रसंग से धर्मों को बतलाया है। उसमें दो भाग हैं। प्रथम भाग में सृष्टि आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, मन्वन्तरों में जहाँ जो राजा हुए हैं, उनका वंशवर्णन किया गया है; गयासुर का वध विस्तार से वर्णित हुआ है, मासों का माहात्म्य
पञ्चनवतितमोऽध्यायः ८७१ मासानां चैव माहात्म्यं माघस्योक्तं फलाधिकम् । दानधर्मा राजधर्मा विस्तरेणोदितास्तथा ॥५॥ भूपातालककुब्द्योमचारिणां यत्र निर्णयः । व्रतादीनां च पूर्वोऽयं विभागः समुदाहृतः ॥६॥ उत्तरे तस्य भागे तु नर्मदातीर्थवर्णनम् । शिवस्य संहितोक्ता वै विस्तरेण मुनीश्वर ॥७॥ यो देवः सर्वदेवानां दुर्विज्ञेयः सनातनः । स तु सर्वात्मना यस्यास्तीरे तिष्ठति संततम् ॥८॥ इदं ब्रह्मा हरिरिदं साक्षाच्चेदं परो हरः । इदं ब्रह्म निराकारं कैवल्यं नर्मदाजलम् ॥६॥ ध्रुवं लोकहितार्थाय शिवेन स्वशरीरतः । शक्तिः कापि सरिद्रूपा रेवेयमवतारिता ॥१०॥ ये वसंत्युत्तरे कूले रुद्रस्यानुचरा हि ते । वसन्ति याम्यतीरे ये लोकं ते यांति वैष्णवम् ॥११॥ ओंकारेश्वरमारभ्य यावत्पश्चिमसागरः । संगमाः पंच च त्रिंशन्नदीनां पापनाशनी ॥१२॥ दशकमुत्तरे तीरे त्रयोविंशतिदक्षिणे । पंचविंशत्तमः प्रोक्तो रेवासागरसंगमः ॥१३॥ संगमः सहितान्येव रेवातीरद्वयेऽपि च । चतुःशतानि तीर्थानि प्रसिद्धानि च संति हि ॥१४॥ षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यो मुनीश्वर । संति चान्यानि रेवायास्तीरयुग्मे पदे पदे ॥१५॥ संहितेयं महापुण्या शिवस्य परमात्मनः । नर्मदाचरितं यत्र वायुना परिकीर्तितम् ॥१६॥ लिखित्त्वेदं पुराणं तु गुडधेनुसमन्वितम् । श्रावण्यां यो ददेद्भक्त्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥१७॥ रुद्रलोके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश । यः श्रावयेद्वा शृणुयाद्वायवीयमिदं नरः ॥१८॥ नियमेन हविष्याशी स रुद्रो नात्र संशयः । यश्चानुक्रमणीमेतां शृणोति श्रावयेत्तथा ॥१९॥
एवम् माघ का फल प्रचुरतया बताया गया है; दानधर्म तथा राजधर्मों का विस्तृत वर्णन है ॥१-५॥ भू, पाताल, दिशा तथा आकाशचारियों का और व्रत आदिकों का निर्णय किया गया है। मुनीश्वर ! उत्तर भाग में नर्मदातीर्थ तथा शिवसंहिता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जैसे जो सनातन देव समस्त देवों से दुर्ज्ञेय हैं, वे सब प्रकार से नर्मदा नदी के तट पर सदा वास करते हैं। नर्मदा का जल ब्रह्मा, साक्षात् हरि, हर, निराकार ब्रह्म तथा निर्वाण रूप है। निश्चय ही लोककल्याण के लिये शिव ने अपने शरीर से किसी शक्ति को रेवा नदी के रूप में अवतरित किया है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर वास करते हैं, वे मानो रुद्र के अनुचर हो हैं। जो दक्षिण तट पर वास करते हैं, वे विष्णुलोक को जाते हैं। ओंकारेश्वर से लेकर पश्चिमसागर पर्यन्त पैंतीस पापनाशिनी नदियों का संगम है ॥६-१२॥ ग्यारह नदियाँ तो रेवा के उत्तर तीर से मिली हैं और तेईस दक्षिण तट से। पैंतीसवां संगम तो समुद्र के साथ ही नर्मदा का माना जाता है। रेवा के उभय तट पर संगमीय तीर्थों सहित चार सो प्रसिद्ध तीर्थ विराजते हैं। मुनीश्वर ! साठ करोड़ और साठ हजार अन्य तीर्थ भी रेवा के युगल तटों के पद-पद में विद्यमान हैं। परमात्मा शिव की यह संहिता महापुण्यदायिनी है, जिसमें वायु ने नर्मदा का चरित्रवर्णन किया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर गुडधेनु सहित कुटुम्बी ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक समर्पित करता है, वह तब तक रुद्रलोक में वास करता है जब तक चौदहों इन्द्र हो जाते हैं। जो नर नियम पूर्वक हविष्य-भोजन करते हुए उस वायुपुराण को सुनता है या सुनाता है, वह रुद्र होता है,
८७२ नारदीयपुराणम् सोऽपि सर्वपुराणस्य फलं श्रवणजं लभेत् । ॥२०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वायुपुराणानुक्रमणिकानिरूपणं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥९५॥ षण्णवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच मरीचे शृणु वक्ष्यामि वेदव्यासेन यत्कृतम् । श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥१॥ तदष्टादशसाहस्रं कीर्तितं पापनाशनम् । सुरपादपरूपोऽयं स्कंधैर्द्वादशभिर्युतः ॥२॥ भगवानेव विप्रेन्द्र विश्वरूपी समीरितः । तत्र तु प्रथमस्कंधे सूतर्षीणां समागमे ॥३॥ व्यासस्य चरितं पुण्यं पांडवानां तथैव च । पारीक्षितमुपाख्यानमितीदं समुदाहृतम् ॥४॥ परीक्षिच्छुकसंवादे सृष्टिद्वर्यानिरूपणम् ब्रह्मानारदसंवादे देवताचरितामृतम् ॥५॥ इसमें संशय नहीं । जो इस अनुक्रमणिका का श्रवण करता है या कराता है, उसे भी संपूर्ण वायुपुराण सुनने का फल लाभ होता है ॥१३-२०॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वायुपुराण का अनुक्रमणिका वर्णन नामक पंचानबेवां अध्याय समाप्त ॥९५॥ अध्याय ९६ श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के अनुसार उसकी अनुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले—मरीचे ! सुनो, वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत नामक जो ब्रह्मसम्मत पुराण का निर्माण किया है, उसे मैं कहूँगा । उस पाप-नाशन पुराण में अठारह हजार श्लोक हैं । बारह स्कंधों में वह विभक्त है । विप्रेन्द्र ! वह कल्पवृक्ष के समान है । विश्वरूपी भगवान् का ही उसे स्वरूप समझना चाहिये । उसके प्रथम स्कंध में सूत और ऋषियों का संवाद हुआ है, जिसमें व्यास तथा पांडवों का पवित्र चरित्र और परीक्षित का उपाख्यान वर्णित किया गया है ॥१-४॥ परीक्षित और शुक के संवादरूप द्वितीय स्कंध में श्रीमान् व्यास ने सृष्टिद्वय का
षण्णवतितमोऽध्यायः ८७३ पुराणलक्षणं चैव सृष्टिकारणसंभवः । द्वितीयोऽयं समुदितः स्कंधो व्यासेन धीमता ॥६॥ चरितं विदुरस्याथ मैत्रेयेणास्य संगमः । सृष्टिप्रकरणं पश्चाद्ब्रह्मणः परमात्मनः ॥७॥ कापिलं सांख्यमप्यत्र तृतीयोऽयमुदाहृतः । सत्याश्चरितमादौ तु ध्रुवस्य चरितं ततः ॥८॥ पृथोः पुण्यसमाख्यानं ततः प्राचीनबर्हिषम् । इत्येष तुर्यो गदितो विसर्गे स्कंध उत्तमः ॥६॥ प्रियव्रतस्य चरितं तद्वंशानां च पुण्यदम् । ब्रह्मांडांतर्गतानां च लोकानां वर्णनं ततः ॥१०॥ नरकस्थितिरित्येष संस्थाने पंचमो मतः । अजामिलस्य चरितं दक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥११॥ प्रह्लादचरितं पुण्यं वर्णाश्रमनिरूपणम् । सप्तमो गदितो वत्स वासनाकर्मकीर्तने ॥१२॥ वृत्राख्यानं ततः पश्चान्मरुतां जन्म पुण्यदम् । षष्ठोऽयमुदितः स्कंधो व्यासेन परिपोषणे ॥१३॥ गजेन्द्रमोक्षणाख्यानं मन्वंतरनिरूपणे । समुद्रमथनं चैव बलिवैमवबंधनम् ॥१४॥ मत्स्यावतारचरितमष्टमोऽयं प्रकीर्तितः । सूर्यवंशसमाख्यानं सोमवंशनिरूपणम् ॥१५॥ वंश्यानुचरिते प्रोक्तो नवमोऽयं महामते । कृष्णस्य बालचरितं कौमारं च व्रजस्थितिः ॥१६॥ कैशोरं मथुरास्थानं यौवनं द्वारकास्थितिः । भूभारहरणं चात्र निरोधे दशमः स्मृतः ॥१७॥ नारदेन तु संवादो वसुदेवस्य कीर्तितः । यदोश्च दत्तात्रेयेण श्रीकृष्णेनोद्धवस्य च ॥१८॥ यादवानां मिथोऽत्तश्च मुक्तावेकादशः स्मृतः । भविष्यकलिनिर्देशो मोक्षो राज्ञः परीक्षितः ॥१९॥ वेदशाखाप्रणयनं मार्कंडेयतपः क्रिया । सौरो विभूतिरुदिता सात्वती च ततः परम् ॥२०॥ पुराणसंख्याकथनमाश्रये द्वादशो ह्ययम् । इत्येवं कथितं वत्स श्रीमद्भागवतं तव ॥२१॥ वक्तुः श्रोतुश्चोपवेष्टुरनिमोदितुरेव च । साहाय्यकर्तुर्गदितं भक्तिभुक्तिविमुक्तिदम् ॥२२॥ निरूपण किया है तथा ब्रह्मा और नारद के संवाद में देवताओं का चरित्र, पुराणों का लक्षण और सृष्टि का कारण बतलाया है । तृतीय स्कंध में विदुर का चरित्र, मैत्रेय के साथ उसका संगम, परमात्मा ब्रह्मा का सृष्टि- प्रकरण और कपिलनिर्मित सांख्य शास्त्र का निरूपण किया गया है । चतुर्थ स्कंध में सत्या एवम् ध्रुव का चरित्र, पृथु तथा प्राचीन बहिष् का पवित्र उपाख्यान आता है । पंचम स्कंध में प्रियव्रत तथा उनके वंशजों का पवित्र चरित्र, ब्रह्मांड के अन्तर्वर्ती लोकों तथा नरकों की स्थिति दिखलाई गई है । छठे स्कंध में अजामिल का चरित्र, दक्षसृष्टि का निरूपण, वृत्राख्यान और मरुतों का उद्भव बताया गया है । वत्स ! सातवें स्कंध में वासनाजन्य कर्मों का कथन, प्रह्लाद का चरित्र और वर्णाश्रमों का निरूपण किया गया है ॥५-१३॥ अष्टम स्कंध में मन्वन्तरों का निरूपण, गजेन्द्रमोक्ष का आख्यान, सागरमंथन, बलिवैभव बंधन तथा मत्स्यावतार का चरित्र वर्णन किया गया है । महामते ! नवम स्कंध में सूर्यवंश का आख्यान, सोमवंश का निरूपण तथा वंशावालों का चरित्र वर्णन मिलता है । दशम स्कंध में कृष्ण की बाललीला, कौमार अवस्था में उनका व्रजवास, कैशोर अवस्था में मथुरावास, युवावस्था में द्वारकावास तथा भूभार का हरण बतलाया गया है । एकादश स्कंध में नारद और वसुदैव का संवाद, यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद, श्रीकृष्ण एवम् उद्धव का संवाद और यादवां का परस्पर नाश बताया गया है । द्वादश स्कंध में भविष्यकाल का निर्देश, राजा परीक्षित् का मोक्ष, वेदशाखाप्रणयन, मार्कंडेय का तप, सौरी सनातनी विभूति और पुराणों की संख्या का निर्देश किया गया है । वत्स ! यह श्रीमद्भागवत तुमसे कहा है, जो वक्ता, श्रोता, उपदेष्टा, अनुमोदिता तथा साहाय्यकर्ता को मुक्ति, मुक्ति एवम् भक्ति प्रदान करता है ॥१४-२२॥ भगवद्भक्ति के इच्छुक को चाहिये कि वह भादों की पूर्णिमा ११० ना० पु०
८७४ नारदीयपुराणम् प्रोष्ठपद्यां पूर्णिमायां हेमसिंहसमन्वितम्। देयं भागवताख्यं द्विजाय प्रीतिपूर्वकम् ॥२३॥ संपूज्य वस्त्रहेमाद्यैर्भगवद्भक्तिमिच्छता । योऽप्यनुक्रमणीमेतां श्रावयेच्छृणुयात्तथा ॥ स पुराणश्रवणजं प्राप्नोति फलमुत्तमम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे श्रीमद्भागवतानुक्रमणी- निरूपणं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥९६॥ * सप्तनवतितमोऽध्यायः श्रीब्रह्मोवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम्। पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहत्कल्पकथाश्रयम् ॥१॥ सूतशौनकसंवादः सृष्टिसंक्षेपवर्णनम् । नानाधर्मकथाः पुण्याः प्रवृत्ते समुदाहृताः ॥२॥ प्राग्भागे प्रथमे पादे सनकेन महात्मना । द्वितीये मोक्षधर्माख्ये मोक्षोपायनिरूपणम् ॥३॥ वेदांगानां च कथनं शुकोत्पत्तिश्च विस्तरात् । सनंदनेन गदिता नारदाय महात्मने ॥४॥ महातंत्रे समुद्दिष्टं पशुपाशविमोक्षणम् । मंत्राणां शोधनं दीक्षामंत्रोद्धारश्च पूजनम् ॥५॥ प्रयोगाः कवचं नामसहस्रं स्तोत्रमेव च । गणेशसूर्यविष्णूनां शिवशक्त्योरनुक्रमात् ॥६॥ में वस्त्र, सुवर्ण आदि से प्रीतिपूर्वक भगवद्भक्त ब्राह्मण की पूजा कर स्वर्णसिंह समेत भागवतपुराण समर्पित करे। जो व्यक्ति इस अनुक्रमणिका को सुनेगा या सुनावेगा, उसे भी पुराण सुनने का उत्तम फल मिलेगा ॥२३-२४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में श्रीमद्भागवतानुक्रमणी निरूपण नामक छानबेवां अध्याय समाप्त ॥९६॥ अध्याय ९७ श्रीनारदीयपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले-विप्र ! अब नारदीयपुराण को सुनो । उसमें पचीस हजार श्लोक हैं; वह बृहत्कल्प की कथा से युक्त है । पूर्वार्ध के प्रथम पाद में सूत और शौनक का संवाद, सृष्टि का संक्षिप्त वर्णन तथा महात्मा सनक द्वारा अनेक धर्म कथायें कही गई हैं । मोक्षधर्म नामक द्वितीय पाद में सनंदन ने महात्मा नारद से मोक्ष का उपाय, वेदांगों तथा शुक की उत्पत्ति बताई है ॥१-३½॥ तृतीय पाद में मुनि सनत्कुमार ने नारद से महातंत्रोद्दिष्ट पशुपाशविमोक्षण, मंत्रों का संशोधन, दीक्षा, मंत्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम, गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव
सप्तनवतितमोऽध्यायः ८७५ सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके । पुराणलक्षणं चैव प्रमाणं दानमेव च ॥७॥ पृथक्पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरःसरम् । चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक्पृथक् ॥८॥ प्रोक्तं प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् । सनातनेन मुनिना नारदाय चतुर्थके ॥६॥ पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः । अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते ॥१०॥ वसिष्ठेनाथ संवादो मांघातुः परिकीर्तितः । रुक्मांगदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च ॥११॥ वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया । गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् ॥१२॥ काश्या माहात्म्यमतुलं पुरुषोत्तमवर्णनम् । यात्राविधानं क्षेत्रस्य बह्वाख्यानसमन्वितम् ॥१३॥ प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् । हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकं तथा ॥१४॥ बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाक्षायास्तथैव च । प्रभासस्य च माहात्म्यं पुष्कराख्यानकं ततः ॥१५॥ गौतमाख्यानकं पश्चाद्वेदपादस्तवस्ततः । गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं लक्ष्मणाख्यानकं तथा ॥१६॥ सेतुमाहात्म्यकथनं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ॥१७॥ वृन्दावनस्य महिमा वसुर्ब्रह्मांतिके गतिः । मोहिनीचरितं पश्चादेवं वै नारदीय कम् ॥१८॥ यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥१९॥ यस्त्वेताविषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकान्वितम् । प्रवद्याद्विद्वद्वर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥२०॥ यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गति लभेत् ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे नारदीयपुराणानुक्रमणी- कथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥६७॥ तथा शक्ति के स्तोत्र बताये हैं । तृतीय पाद में सनत्कुमार मुनि ने नारद से पुराणों का लक्षण तथा प्रमाण, दान तथा दान-काल आदि को पृथक्-पृथक् बतलाया है । चैत्र आदि मासों में प्रतिपदा आदि तिथिक्रम से पृथक्-पृथक् व्रतनिरूपण किया है । सनातन मुनि ने चतुर्थपाद में नारद को यह बतलाया है । इतना पूर्वभाग है, जो बृहदाख्यान कहलाता है ॥४-९॥ पुराण के उत्तरार्ध में एकादशीव्रत संबन्धी प्रश्न, वसिष्ठ और मांधाता का संवाद, पवित्र रुक्मांगदकथा, मोहिनी की उत्पत्ति और कर्म, मोहिनी के प्रति पुरोहित वसु का शाप तथा उद्धारक्रिया, पुण्यतम गंगाकथा, गयायात्राकीर्तन, काशीमाहात्म्य, अतुलनीय पुरुषोत्तम-वर्णन, अनेक आख्यान युक्त पुरुषोत्तम क्षेत्र का यात्राविधान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, कामोदा, बदरीतीर्थ, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर तथा गौतमतीर्थ का माहात्म्य, वेदपादस्तुति, गोकर्णक्षेत्र माहात्म्य, लक्ष्मणाख्यान, सेतुमाहात्म्य, नर्मदातीर्थ-वर्णन, अवंती, मथुरा तथा वृन्दावन की महिमा, ब्रह्मा के निकट वसु का गमन और फिर मोहिनी का चरित्र चित्रण किया गया है । यही नारदीयपुराण है ॥१०-१८॥ जो मनुष्य समाहित होकर भक्तिपूर्वक इसको सुनता है अथवा सुनाता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । जो व्यक्ति आश्विन की पूर्णिमा में सात धेनुओं के साथ यह पुराण उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है । जो नारदीयपुराण की इस अनुक्रमणी का वर्णन करेगा या तन्मनस्क होकर सुनेगा, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति होगी ॥१९-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में नारदीयपुराणानुक्रमणी कथन नामक सत्तानबेवां अध्याय समाप्त ॥९७॥
अष्टनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि मार्कण्डेयाभिधं मुने । पुराणं सुमहत्पुण्यं पठतां शृण्वतां सदा ॥१॥ यत्राधिकृत्य शकुनीन्सर्वधर्मनिरूपणम् । मार्कण्डेयपुराणं तन्नवसाहस्रमीरितम् ॥२॥ मार्कण्डेयमुनेः प्रश्नो जैमिनेः प्राक्समीरितः । पक्षिणां धर्मसंज्ञानां ततो जन्मनिरूपणम् ॥३॥ पूर्वजन्मकथा चैषां विक्रिया चादिवस्पतेः । तीर्थयात्रा बलस्याथ द्रौपदेयकथानकम् ॥४॥ हरिश्चन्द्रकथा पुण्या युद्धमाडीवकाभिधम् । पितापुत्रसमाख्यानं दत्तात्रेयकथा ततः ॥५॥ हैहयस्याथ चरितं महाख्यानसमन्वितम् । मदालसाकथा प्रोक्ता ह्यलर्कचरितान्विता ॥६॥ सृष्टिसंकीर्तनं पुण्यं नवधा परिकीर्तितम् । कल्पांतकालनिर्देशो यक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥७॥ रुद्रादिसृष्टिरप्युक्ता द्वीपचर्यानुकीर्तनम् । मनूनां च कथा नाना कीर्तिताः पापहारिकाः ॥८॥ तासु दुर्गाकथार्यन्तं पुण्यदा चाष्टमेऽन्तरे । तत्पश्चात्प्रणवोत्पत्तिस्त्रयीतेजःसमुद्भवा ॥९॥ मार्तण्डस्य च जन्माख्या तन्माहात्म्यसमन्विता । वैवस्वतान्वयश्चापि वत्सप्रीश्चरितं ततः ॥१०॥ खनित्रस्य ततः प्रोक्ता कथा पुण्या महात्मनः । अविक्षिच्चरितं चैव किमिच्छव्रतकीर्तनम् ॥११॥
अध्याय ९८ मार्कण्डेयपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले—मुने ! अब मैं पढ़ने तथा सुनने वालों के लिये महापुण्यदायक मार्कण्डेयपुराण के संबन्ध में कहूँगा, जिसमें शकुनियों को अवलम्बन करके समस्त धर्मों का निरूपण किया गया है। मार्कण्डेयपुराण में नौ हजार श्लोक हैं। उसमें जैमिनि से मार्कण्डेयमुनि का प्रश्न, धर्मसंज्ञक पक्षियों का जन्म-निरूपण, पूर्वजन्मकथा, दिवस्पति की विक्रिया, बलभद्र की तीर्थयात्रा, द्रौपदेयकथानक, हरिश्चन्द्रकथा, आडी तथा बक का युद्ध, पिता-पुत्र का आख्यान, दत्तात्रेयकथा, हैहय-चरित्र का महाआख्यान, मदालसाकथा, अलर्कचरित, नवधा सृष्टिकीर्तन, कल्पांतकाल निर्देश, यक्षसृष्टिनिरूपण, रुद्रादिसृष्टि, द्वीपचर्या, मनुओं की अनेक पापहरिणी कथायें, उनमें अष्टम मन्वन्तर में अत्यन्त पुण्यप्रद दुर्गा की कथा, प्रणवोत्पत्ति, त्रयोतेज का उद्भव, मार्तंड का जन्म तथा माहात्म्य, वैवस्वतवंश वर्णन, वत्सप्री का चरित्र, महात्मा खनित्र की पवित्र कथा, अविक्षित् का चरित्र, किमिच्छव्रतकीर्तन, नरिष्यंतचरित, इक्ष्वाकुचरित, नलचरित, रामचंद्र की सत्कथा, कुशवंशाख्यान, सोमवंश का कीर्तन, पुरूरवा तथा नहुष की अद्भुत कथा, ययातिचरित्र, पवित्र-यदुवंशकीर्तन, श्रीकृष्णबालचरित्र, मथुरा का चरित्र, द्वारकाचरित, सकल अवतारों की
नरिष्यंतस्य चरितं इक्ष्वाकुचरितं ततः । नलस्य चरितं पश्चाद्रामचन्द्रस्य सत्कथा ॥१२॥ कुशवंशसमाख्यानं सोमवंशानुकीर्तनम् । पुरुरवःकथा पुण्या नहुषस्य कथाद्भुता ॥१३॥ ययातिचरितं पुण्यं यदुवंशानुकीर्तनम् । श्रीकृष्णबालचरितं माथुरं चरितं ततः ॥१४॥ द्वारकाचरितं चाथ कथा सर्वावताराजा । ततः सांख्यसमुद्देशः प्रपञ्चासत्त्वकीर्तनम् ॥१५॥ मार्कण्डेयस्य चरितं पुराणश्रवणे फलम् । यः शृणोति नरो भक्त्या पुराणमिदमादरात् ॥१६॥ मार्कण्डेयाभिधं वत्स स लभेत्परमां गतिम् । यस्तु व्याकुरुते चैतच्छैवं स लभते पदम् ॥१७॥ तत्तच्छ्लोल्लिखित्वा यः सौवर्णकरिसंयुतम् । कार्तिकां द्विजवर्याय स लभेद्ब्रह्मणः पदम् ॥१८॥ शृणोति श्रावयेद्वापि यश्चानुक्रमणीमिमाम् । मार्कण्डेयपुराणस्य स लभेद्वान्छितं फलम् ॥१९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥९८॥
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नवनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच अथातः संप्रवक्ष्यामि त्वाग्नेयपुराणकम् । ईशानकल्पवृत्तांतं वसिष्ठायानलोऽब्रवीत् ॥१॥ तत्पंचदशसाहस्रं नानाचरितमद्भुतम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं नृणाम् ॥२॥
कथा, सांख्यशास्त्र का उद्देश, प्रपंचसत्त्वकीर्तन, मार्कण्डेयचरित्र तथा पुराणश्रवण का फल बताया गया है। वत्स ! जो मानव भक्ति एवम् आदर से मार्कण्डेयपुराण का श्रवण करता है, उसे परम गति की प्राप्ति होती है। जो इसका पाठ करता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो इसे लिखकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के दिन उत्तम ब्राह्मण को स्वर्णगजसहित इसे समर्पित करता है, वह ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। मार्कण्डेयपुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनता है या सुनाता है, उसे वांछित फल की प्राप्ति होती है ॥१-१९॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक अठानबेवां अध्याय समाप्त ॥९८॥
अध्याय ९९
अग्निपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले--अब इसके बाद मैं तुम्हें अग्निपुराण सुनाऊंगा । अग्नि ने वसिष्ठ से ईशानकल्प का वृत्तान्त सुनाया था। यह पुराण अनेक अद्भुत चरित्रों से युक्त तथा पन्द्रह सहस्र श्लोकों में विभक्त है।
८७८ नारदीयपुराणम् प्रश्नः पूर्वं पुराणस्य कथा सर्वावतारजा । सृष्टिप्रकरणं चाथ विष्णुपूजादिकं ततः ॥३॥ अग्निकार्यं ततः पश्चान्मन्त्रमुद्रादिलक्षणम् । सर्वदीक्षाविधानं च अभिषेकनिरूपणम् ॥४॥ लक्षणं मंडलादीनां कुशामार्जनं ततः । पवित्रारोपणविधिर्देवालयविधिस्ततः ॥५॥ शालग्रामादिपूजा च मूर्तिलक्षण पृथक्पृथक् । न्यासादीनां विधानं च प्रतिष्ठापूर्वकं ततः ॥६॥ विनायकादिपूजा च नानादीक्षाविधिः परम् । प्रतिष्ठा सर्वदेवानां ब्रह्मांडस्य निरूपणम् ॥७॥ गंगादितीर्थमाहात्म्यं द्वीपवर्षानुवर्णनम् । ऊर्ध्वाधोलोकरचना ज्योतिश्चक्रनिरूपणम् ॥८॥ ज्योतिषं च ततः प्रोक्तं शास्त्रं युद्धजयार्णवम् । षट्कर्म च ततः प्रोक्तं मंत्रमंत्रौषधीगणः ॥९॥ कुब्जिकादिसमर्चत्वं षोढा न्यासविस्तरयाः । कोटिहोमविधानं च मन्वंतरनिरूपणम् ॥१०॥ ब्रह्मचर्यादिधर्मांश्च श्राद्धकल्पविधिस्ततः । ग्रहयज्ञस्ततः प्रोक्तो वैदिकस्मार्तकर्म च ॥११॥ प्रायश्चित्तानुकथनं तिथीनां च व्रतादिकम् । वारव्रतानुकथनं नक्षत्रव्रतकीर्तनम् ॥१२॥ मासिकव्रतनिर्देशो दीपदानविधिस्तथा । नवव्यूहार्चनं प्रोक्तं नरकाणां निरूपणम् ॥१३॥ व्रतानां चापि दानानां निरूपणमिहोदितम् । नाडीचक्रसमुद्देशः संध्याविधिरनुत्तमः ॥१४॥ गायत्र्यर्थस्य निर्देशो लिंगस्तोत्रं ततः परम् । राज्याभिषेकमन्त्रोक्तिर्द्धर्मकृत्यं च भूभुजाम् ॥१५॥ स्वप्नाध्यायस्ततः प्रोक्तः शकुनादिनिरूपणम् । मंडलादिकनिर्देशो रणदीक्षाविधिस्ततः ॥१६॥ रामोक्तनीतिनिर्देशो रत्नानां लक्षणं ततः । धनुर्विद्या ततः प्रोक्ता व्यवहारप्रदर्शनम् ॥१७॥ देवासुरविमर्दाख्या ह्यायुर्वेद निरूपणम् । गजादीनां चिकित्सा च तेषां शांतिस्ततः परम् ॥१८॥ गोनरादिचिकित्सा च नानापूजास्ततः परम् । शांतयश्चापि विविधाश्छन्दः शास्त्रमतः परम् ॥१९॥ साहित्यं च ततः पश्चादेकार्णादिसमाह्वयाः । सिद्धशब्दानुशिष्टिश्च कोशः स्वर्गादिवर्गकः ॥२०॥ प्रलयानां लक्षणं च शारीरकनिरूपणम् । वर्णनं नरकानां च योगशास्त्रमतः परम् ॥२१॥ इसके पढ़ने-सुनने वाले मनुष्यों के सकल पाप दूर हो जाते हैं। इसमें पहले पुराण संवन्धी प्रश्न किया गया है। पश्चात् समस्त अवतारों की कथा, सृष्टिप्रकरण, विष्णु पूजन, अग्निकार्य, मन्त्र तथा मुद्रा आदि का लक्षण, अखिल दिशाओं का विधान, अभिषेक निरूपण, मंडल आदि का लक्षण, कुशा का मार्जन, पवित्रारोपणविधि देवालयविधि, शालग्रामादि पूजा, पृथक्-पृथक् मूर्तिचिह्न न्यासादि का विधान, प्रतिष्ठापूर्वक, विनायक आदि की पूजा, अनेक दीक्षा विधि, समस्त देवों की प्रतिष्ठा, ब्रह्मांड का निरूपण, गंगादि-तीर्थ-माहात्म्य, द्वीपों तथा वर्षों का वर्णन, ऊर्ध्व तथा अधोलोक की रचना, ज्योतिश्चक्र निरूपण ॥१-८॥ ज्योतिष, मंत्र और यन्त्रौषधिसमूह, षट्कर्म, युद्धजयशास्त्र, कुब्जा आदि की समर्चा, छः प्रकार की न्यासविधि, कोटिहोम विधान, मन्वन्तर निरूपण ब्रह्मचर्य आदि धर्म, श्राद्ध-कल्पविधि, ग्रहयज्ञ, वैदिक तथा स्मार्तं कर्म, प्रायश्चित्त कथन, तिथि अनुसार व्रतादि, दिनव्रतानुकथन, नक्षत्रव्रतकीर्तन, मासिकव्रत निर्देश, दीपदानविधि, नवव्यूहार्चन, नरकों का निरूपण, नाडीचक्र- समुद्देश, संध्याविधि, गायत्री के अर्थ का निर्देश, लिगस्तोत्र, राज्याभिषेकमन्त्र, राजाओं का धर्मकार्य, स्वप्ना- ध्याय, शकुनादि निरूपण, मंडलादिक निर्देश, रणदीक्षाविधि, रामोक्तनीति निर्देश, रत्नों का लक्षण, धनु- विद्या और व्यवहार प्रदर्शन, देवासुर विमर्दाख्यान, आयुर्वेदनिरूपण, गजादि चिकित्सा, उनकी शान्ति ॥९-१८॥ गो, नर आदि की चिकित्सा, अनेक प्रकार की पूजा, विविध शान्ति, छंदःशास्त्र, साहित्य, एकार्णादि समाह्वय- सिद्ध-शब्दानुशिष्ट स्वर्गादिवर्गविशिष्टकोष, प्रलयों का लक्षण, शारीरक निरूपण, नरकवर्णन, योगशास्त्र,
शततमोऽध्यायः ८७६ ब्रह्मज्ञानं ततः पश्चात्पुराणश्रवणे फलम् । एतदाग्नेयकं विप्र पुराणं परिकीर्तितम् ॥२२॥ तल्लिखित्वा तु यो दद्यात्सुवर्णकमलान्वितम् । तिलधेनुयुतं चापि मार्गशीर्ष्यां विधानतः ॥२३॥ पुराणार्थविदे सोऽथ स्वर्गलोके महीयते । एषानुक्रमणी प्रोक्ता तवाग्नेयस्य मुषितवा ॥२४॥ शृण्वतां पठतां चैव नृणां चेह परत्र च ॥२५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपावेऽग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपणं नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥६६॥
शततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि पुराणं सर्वसिद्धिदम् । भविष्यं भवतः सर्वलोकाभीष्टप्रदायकम् ॥१॥ यत्राहं सर्वदेवानामादिकर्ता समुद्गतः । सृष्ट्यर्थं तत्र संजातो मनु स्वायंभुवः पुरा ॥२॥ स मां प्रणम्य पप्रच्छ धर्मं सर्वार्थसाधकम् । अहं तस्मै तदा प्रीतः प्रावोचं धर्मसंहिताम् ॥३॥ पुराणानां यदा व्यासो व्यासं चक्रे महामतिः । तदा तां संहितां सर्वां पंचधा व्यभजन्मुनिः ॥४॥
ब्रह्मज्ञान, और पुराणश्रवण का फल बतलाया गया है । विप्र ! यह आग्नेय पुराण का वर्णन हुआ । जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर अग्रहण की पूर्णिमा में विधिपूर्वक सुवर्ण कमलं तथा तिलधेनु सहित यह पुराण पौराणिक द्विज को समर्पित करता है, वह स्वर्ग में पूजित होता है । आग्नेय पुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनेगा तथा पढ़ेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी ॥१९-२५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में अग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक निन्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥६६॥
अध्याय १०० भविष्यपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले— अब मैं सर्वसिद्धिदायक तथा अखिलकामनापूरक भविष्यपुराण के संबन्ध में कहूँगा । उस पुराण में मैं सब देवों का आदिकर्ता माना गया हूँ । पहले सृष्टिकार्य के लिये स्वायंभुव मनु का प्रादुर्भाव हुआ । उसने मुझे प्रणाम कर समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले धर्म के विषय में प्रश्न किया । तब मैं प्रीतिपूर्वक धर्मसंहिता को सुनाने लगा । जब महामति व्यास को पुराणों के व्यष्टीकरण करने की इच्छा हुई तब
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८८० | नारदीयपुराणम् अघोरकल्पवृत्तांतं नानावर्यकथान्वितम् । तत्रादिमं स्मृतं पर्व ब्राह्मं यत्रास्त्युपक्रमः ॥५५॥ सूतशौनकसंवादे पुराणप्रश्नसंक्रमः । आदित्यचरितप्रायः सर्वाख्यानसमन्वितः ॥५६॥ सृष्ट्यादिलक्षणोपेतः शास्त्रसर्वस्वरूपकः । पुस्तलेखकलेखानां लक्षणं च ततः परम् ॥५७॥ संस्काराणां च सर्वेषां लक्षणं चात्र कीर्तितम् । पक्षस्यादितिथीनां च कल्पाः सप्त च कीर्तिताः ॥५८॥ अष्टम्याद्याः शेषकल्पा वैष्णवे पर्वणि स्मृताः । शैवे च कामतो भिन्नाः सौरे चांत्यकथान्वयः ॥५६॥ प्रतिसर्गाद्वयं पश्चान्नानाख्यानसमन्वितम् । पुराणस्योपसंहारसंहितं पर्व पंचमम् ॥६०॥ एषु पंचसु पूर्वेस्मिन् ब्रह्मणो महिमाधिकाः । धर्मे कामे च मोक्षे तु विष्णोश्चापि शिवस्य च ॥६१॥ द्वितीये च तृतीये च सौरे वर्गचतुष्टये । प्रतिसर्गाद्वयं त्वंत्यं प्रोक्तं सर्वकथान्वितम् ॥६२॥ सप्तविष्यं विनिर्दिष्टं पर्वव्यासेन धीमता । चतुर्दशसहस्रं तु पुराणं परिकीर्तितम् ॥६३॥ भविष्यं सर्वदेवानां साम्यं यत्र प्रकीर्तितम् । गुणानां तारतम्येन समं ब्रह्म ति हि श्रुतिः ॥६४॥ तं लिखित्वा तु यो दद्यात्पौष्यां विद्वान्विमत्सरः । गुडधेनुयुतं हेमवस्त्रमाल्याविभूषणैः ॥६५॥ वाचकं पुस्तकं चापि पूजयित्वा विधानतः । गंधाद्यैर्भोज्यभक्ष्यैश्च कृत्वा नीराजनादिकम् ॥६६॥ यो वै जितेंद्रियो भूत्वा सोपवासः समाहितः । अथ वैकहविष्यासी कीर्तयेच्छृणुयादपि ॥६७॥ स मुक्तः पातकैर्घोरैः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । योऽप्यनुक्रमणीमेतां भविष्यस्य निरूपिताम् ॥६८॥ पठेद्वा शृणुयाच्चैतां भुक्तिं मुक्तिं च विदति ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे भविष्यपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम शततमोऽध्यायः ॥१००॥
तब मुनिने संपूर्ण संहिता को, पाँच भागों में विभक्त कर दिया। उसमें अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त अघोर कल्प का वृत्तान्त है। उसका पहिला पर्व ब्राह्म है, जिसमें उसका उपक्रम है ॥५५॥ उसी पर्व में सूत और शौनक के संवाद में पुराणप्रश्न, सर्वाख्यानयुक्त आदित्यचरित्र, सृष्टि आदि के लक्षणों से युक्त सकलशास्त्र स्वरूप, पुस्तक लेखक और लेख्य का लक्षण, समस्त संस्कारों का लक्षण और प्रतिपदादि तिथियों के सात कल्प वर्णित हुए हैं। वैष्णवपर्व में अष्टमी आदि अवशिष्ट कल्पों का वर्णन है। शैव पर्व में कामानुसार विभिन्नता सौर पर्व में अन्त्यकथा और प्रतिसर्ग पर्व में अनेक आख्यान तथा पुराण का उपसंहार बतलाया गया है। इस तरह पाँच पर्व होते हैं। प्रथम पर्व में ब्रह्मा का महिमा, द्वितीय में विष्णु एवम् धर्म, काम और मोक्ष को तृतीय में शिव की, चतुर्थ में सूर्य की और पांचवे में समस्त कथायें बताई गई है। धीमान् व्यास ने पर्वों में विभक्त करके भविष्यपुराण की रचना की है। इस पुराण में चौदह हजार श्लोक हैं ॥५६-६३॥ इसमें सकल देवों की कथा समभाव से कही गई है। श्रुति भी 'गुणों के तारतम्य से ब्रह्म सम है' ऐसा कहती है। जो विद्वान् इस पुराण को लिखकर पौषी पूर्णिमा के दिन गुडधेनु, सुवर्ण, वस्त्र, माला, सुगंधित द्रव्य, भोज्य तथा भक्ष्य पदार्थों से विधिपूर्वक ब्राह्मण एवम् पुस्तक की पूजा कर इसे समर्पित करता है, वह घोर पातकों से विमुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जो इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास या हविष्यभोजन करते हुए सावधानी से इसका श्रवण तथा कीर्तन करता है, उसे भी पूर्वकथित फल की प्राप्ति होती है। जो भविष्यपुराण की इस अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, वह भोग-मोक्ष लाभ करेगा ॥६४-१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में भविष्यपुराणानुक्रमणिनिरूपण नामक सौवां अध्याय समाप्त ॥१००॥
एकाधिकशततमोऽध्यायः श्री ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं दशमं तव । ब्रह्मवैवर्तकं नाम वेदमार्गानुदर्शकम् ॥१॥ सावर्णिर्यत्र भगवान्साक्षाद्देवर्षये स्थितः । नारदाय पुराणार्थं प्राह सर्वमलौकिकम् ॥२॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां सारः प्रीतिर्हरौ हरे । तयोरभेदसिद्धयर्थं ब्रह्मवैवर्तमुत्तमम् ॥३॥ रथंतरस्य कल्पस्य वृत्तांतं यन्मयोदितम् । शतकोटिपुराणे तत्संक्षिप्य प्राह वेदवित् ॥४॥ व्यासश्चतुर्द्धा संव्यस्य ब्रह्मवैवर्तसंज्ञिते । अष्टादशसहस्रं तत्पुराणं परिकीर्तितम् ॥५॥ ब्रह्मप्रकृतिविघ्नेशकृष्णखंडसमन्वितम् । तत्र सूतर्षिसंवादे पुराणोपक्रमस्ततः ॥६॥ सृष्टेःप्रकरणं त्वाद्यं ततो नारदवेधसोः । विवादः सुमहानेत्र द्वयोरासीत्पराभवः ॥७॥ शिवलोकगतिः पश्चाज्ज्ञानलाभः शिवात्तने । शिववाक्येन तत्पश्चान्मरीचेर्नारदस्य तु ॥८॥ गमनं चैव सावर्णेनार्थं सिद्धसेविते । आश्रमे सुमहापुण्ये त्रैलोक्याश्चर्यकारिणी ॥६॥ एतद्धि ब्रह्मखंडं हि श्रुतं पापविनाशनम् । ततः सावर्णि संवादो नारदस्य समीरितः ॥१०॥ कृष्णमाहात्म्यसंयुक्तो नानाख्यानकथोत्तरम् । प्रकृतेरंशभूतानां कलानां चापि वर्णितम् ॥११॥
अध्याय १०१ ब्रह्मवैवर्तपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं ब्रह्मवैवर्तक नामक वेदमार्गानुदर्शक दशम पुराण को तुमसे कहता हूँ, जिसमें साक्षात् भगवान् सावर्णि ने देवर्षि नारद से पुराण के अलौकिक अर्थ को बताया है हरि तथा हर में प्रेम करना । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सार है। उन दोनों में अभेदसिद्धि करने के लिये उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण का निर्माण हुआ है । मैंने रथंतर कल्प का जो वृत्तान्त कहा था, उसे वेदवेत्ता व्यास ने सौ करोड़ श्लोक वाले पुराण में संक्षेप से वर्णित किया है । व्यास ने अठारह हजार श्लोकों में ब्रह्मवैवर्त का निर्माण करके ब्रह्मप्रकृति, गणेश तथा कृष्णखंड नामक चार भागों में इसे विभक्त कर दिया । सूत और शौनक के संवाद में पुराण का उप- क्रम है । आदि में सृष्टि प्रकरण है। तत्पश्चात् नारद और ब्रह्मा का महान् विवाद, दोनों का पराभव, शिवलोक में गति, शिव से ज्ञानलाभ और शिव के वाक्य से ज्ञान लाभ के लिये सिद्धों से सुसेवित, महापुण्य- दायक एवम् तीनों लोक को आश्चर्यित करने वाले सावर्णि के आश्रम में मरीचि तथा नारद का गमन बताया गया है। यही ब्रह्म खण्ड है, जिसे सुनने से सकल पापों का नाश होता है ॥१-९॥ प्रकृतिखंड में सावर्णि तथा नारद का संवाद, कृष्ण का माहात्म्य, अनेक आख्यानक, प्रकृति के अंश भूत कलासमूह का माहात्म्य और पूजन आदि का विस्तृत रूप से वर्णन हुआ है। इस खंड के श्रवण करने से ऐश्वर्य १११ ना० पु०
६८२ नारदीयपुराणम् माहात्म्यं पूजनाद्यं च विस्तरेण यथास्थितम् । एतत्प्रकृतिखंडं हि श्रुतं श्रुतिविधायकम् ॥१२॥ गणेशजन्म संप्रश्नः सपुण्यकमहाव्रतम् । पार्वत्याः कार्तिकेयेन सह विघ्नेशसंभवम् ॥१३॥ चरितं कार्तवीर्यस्य जामदग्न्यस्य चाद्भुतम् । विवादः सुमहानासीज्जामदग्न्यगणेशयोः ॥१४॥ एतद्विघ्नेशखंडं हि सर्वविघ्नविनाशनम् । श्रीकृष्णजन्मसंश्प्रश्नो जन्माख्यानं ततोऽद्भुतम् ॥१५॥ गोकुले गमनं पश्चात्पूतनादिवधाद्भुताः । बाल्यकौमारजा लीला विविधास्तत्र वर्णिताः ॥१६॥ रासक्रीडा च गोपीभिः शारदी समुदाहृता । रहस्ये राधया क्रीडा वर्णिता बहुविस्तरा ॥१७॥ सहाक्रूरेण तत्पश्चान्मथुरागमनं हरेः । कंसादीनां वधे वृत्ते कृष्णस्य द्विजसंस्कृतिः ॥१८॥ काश्यसांदिपनेः पश्चाद्विद्योपादानमद्भुतम् । यवनस्य वधः पश्चाद्द्वारका गमनं हरेः ॥१९॥ नरकादिवधस्तत्र कृष्णेन विहितोऽद्भुतः । कृष्णखंडमिदं विप्र नृणां संसारखंडनम् ॥२०॥ पठितं च श्रुतं ध्यातं पूजितं चाभिवंदितम् । इत्येतद्ब्रह्मवैवर्तपुराणं चात्यलौकिकम् ॥२१॥ व्यासोक्तं चादि संभूतं पठञ्शृण्वन्विमुच्यते । विज्ञानाज्ञानशमनाद्धोरात्संसारसागरात् ॥२२॥ लिखित्त्वेदं च यो दद्यान्माध्यां धेनुसमन्वितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति स मुक्तोऽज्ञानबंधनात् ॥२३॥ यश्चानुक्रमणीं चापि पठेद्वा शृणुयादपि । सोऽपि कृष्णप्रसादेन लभते वांछितं फलम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने ब्रह्मवैवर्तपुराणानुक्रमणी निरूपणं नामैकोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०१॥ नाभ होता है। गणेशखंड में विघ्नेश जन्म का प्रश्न, पार्वती का पुण्यकव्रत, कार्तिकेय और विनायक की उत्पत्ति, कार्तवीर्य और जामदग्न्य का अद्भुत चरित्र, गणेश और जामदग्न्य का घोर विवाद बताया गया है। यह खण्ड समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है ॥१०-१४३॥ कृष्ण खंड में श्रीकृष्ण के जन्म विषयक प्रश्न, अद्भुत जन्माख्यान, गोकुल में गमन, पूतनादिवध, बाल्या- वस्था तथा कौमार अवस्था में की गई अनेक लीलायें गोपियों के संग श्रीकृष्ण की शारदी रासक्रीड़ा, निर्जन में राधा के साथ क्रीडा, फिर अक्रूर के साथ हरि का मथुरागमन, कंस आदि का वध, कृष्ण का द्विजसंस्कार, काशी में सांदीपनि से विद्याग्रहण, यवन का वध, हरि का द्वारिकागमन, वहाँ कृष्ण द्वारा नरकासुर आदि का आश्चर्यजनक वध वर्णित हुआ है। विप्र ! कृष्णखंड के श्रवण करने से मनुष्यों का भवबन्धन कट जाता है। यह ब्रह्मवैवर्तपुराण अत्यन्त विलक्षण है ॥१५-२१॥ इसके पाठ, श्रवण, पूजन, ध्यान तथा अभिवन्दना करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होतो है। यह संसार-सागर से उद्धार करने वाला, अज्ञान का नाश करने वाला और विज्ञान का प्रकाश देने वाला है। जो इसे लिखकर माघी पूर्णिमा के दिन धेनु सहित प्रदान करता है, वह अज्ञान बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को सुनेगा या पढ़ेगा, वह भी कृष्ण की कृपा से वांछित फल को को प्राप्त करेगा ॥२२-२४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थ पाद में ब्रह्मवैवर्तपुराण का अनुक्रमणी-वर्णन नामक एक सौ एक अध्याय समाप्त ॥१०१॥
द्वयधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं लिङ्गसंज्ञितम् । पठतां शृण्वतां चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥१॥ यच्च लिङ्गाभिधं तिष्ठन्वह्निलिङ्गे हरोऽभ्यधात् । मह्यं धर्मादिसिद्ध्यर्थमग्निकल्पकथाश्रयम् ॥२॥ तदेव व्यासदेवेन भागद्वयसमन्वितम् । पुराणं लिङ्गमुदितं बह्वाख्यानविचित्रितम् ॥३॥ तदेकादशसाहस्रं हरमाहात्म्यसूचकम् । परं सर्वपुराणानां सारभूतं जगत्त्रये ॥४॥ पुराणोपक्रमे प्रश्नः सृष्टिः संक्षेपतः पुरा । योगाख्यानं ततः प्रोक्तं कल्पाख्यानं ततः परम् ॥५॥ लिङ्गोद्भवस्तदर्चा च कीर्तिता हि ततः परम् । सनत्कुमारशैलादिसंवादश्चाथ पावनः ॥६॥ ततो दधीचचरितं युगधर्मनिरूपणम् । ततो भुवनकोशाख्या सूर्यसोमान्वयस्ततः ॥७॥ ततश्च विस्तरात्सर्गस्त्रिपुराख्यानकं तथा । लिङ्गप्रतिष्ठा च ततः पशुपार्शविमोक्षणम् ॥८॥ शिवव्रतानि च तथा सदाचारनिरूपणम् । प्रायश्चित्तान्यरिष्टानि काशीश्रीशैलवर्णनम् ॥९॥ अंधकाख्यानकं पश्चाद्वाराहचरितं पुनः । नृसिंहचरितं पश्चाज्जलंघरवधस्ततः ॥१०॥ शैवं सहस्रनामाथ दक्षयज्ञविनाशनम् । कामस्य वहनं पश्चाद्गिरिजायाः करग्रहः ॥११॥ ततो विनायकाख्यानं नृपाख्यानं शिवस्य च । उपमन्युकथा चापि पूर्वभाग इतीरितः ॥१२॥ अध्याय १०२ लिंगपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले- पुत्र ! सुनो, अब मैं लिंगपुराण को बतलाऊँगा, जिसके श्रवण एवम् पाठ करने से भोग- मोक्ष की प्राप्ति होती है । वह्निलिंग में रहते हुए भगवान् हर ने धर्म आदि की सिद्धि के लिये मुझसे जो अग्नि- कल्पकथा-संबन्धी लिंगपुराण को कहा था, उसी को व्यासदेव ने दो भागों में विभक्त किया । वह पुराण अनेक आख्यानों से युक्त है । उसमें ग्यारह हजार श्लोकों में शिव का माहात्म्य वर्णित हुआ है । तीनों लोक में वह सब पुराणों का सारभूत है ॥१-४॥ उसमें प्रथमतः पुराणोपक्रम संबन्धी प्रश्न और संक्षेप से सृष्टिवर्णन है । उसके पूर्व भाग में योगाख्यान, कल्पाख्यान, लिंगोत्पत्ति, उसकी अर्चना, सनत्कुमार और शैलादि का पवित्रसंवाद, दधीचि- चरित, युगधर्मनिरूपण, भुवनकोशाख्यान, सूर्य और सोमवंश, विस्तृत रूप से सृष्टि, त्रिपुराख्यान, लिंगप्रतिष्ठा, पशुपाशविमोक्षण, शिवव्रत, सदाचारनिरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी तथा श्रीशैलवर्णन, अंधकाख्यान, वाराहचरित, नृसिंहचरित, जलंधरवध, शिवसहस्रनाम, दक्षयज्ञविनाशन, कामदहन, पार्वतीविवाह, गणेशारूयान, नृपाख्यान, शिवोपाख्यान तथा उपमन्यु की कथा वर्णित है ॥५-१२॥
८८४ नारदीयपुराणम् विष्णुमाहात्म्यकथन मंबरीषकथा ततः । सनत्कुमारनंदीशसंवादश्च पुनर्मुने ॥१३॥ शिवमाहात्म्यसंयुक्तः स्ना नयागादिकं ततः । सूर्यपूजाविधिश्चैव शिवपूजा च मुक्तिदा ॥१४॥ दानानि बहुधोक्तानि श्राद्धप्रकरणं ततः । प्रतिष्ठातंत्रमुदितं ततोऽघोरस्य कीर्तनम् ॥१५॥ वज्रेश्वरी महाविद्या गायत्रीमहिमा ततः । त्र्यंबकस्य च माहात्म्यं पुराणश्रवणस्य च ॥१६॥ एवं चोपरि भागस्ते लैङ्गस्य कथितो मया । व्यासेन हि विलक्ष्य रुद्रमाहात्म्यसूचितः ॥१७॥ लिखित्वाैतत्पुराणं तु तिलधेनुसमन्वितम् । फाल्गुन्यां पूर्णिमायां यो दद्याद्भक्त्या द्विजातये ॥१८॥ स लभेच्छिवसायुज्यं जरामरणवर्जितम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्व पापापहं नरः ॥१९॥ स भुक्तभोगो लोकेऽस्मिन्नंते शिवपुरं व्रजेत् । लिङ्गानुक्रमणीमेतां पठेद्यः शृणुयात्तथा ॥२०॥ तावुभौ शिवभक्तौ तु लोकद्वितयभोगिनौ । जायेतां गिरिजापर्तः प्रसादान्नात्र संशयः ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे लिङ्गपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम द्व्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०२॥ मुने ! इसके उत्तर भाग में विष्णुमाहात्म्य, अंबरीषकथा, सनत्कुमार और नंदीश, संवाद, शिवमाहात्म्य- संयुक्त स्नान, याग आदि, सूर्यपूजाविधि, मुक्तिदायिनी शिवपूजा, विविधदान, श्राद्धप्रकरण, तंत्रोक्त प्रतिष्ठा, अघोर- कीर्तन, वज्रेश्वरी, महाविद्या, तथा गायत्री की महिमा, त्र्यंबक तथा पुराणश्रवण का माहात्म्य बताया गया है। इस प्रकार व्यास द्वारा रचित लिंगपुराण के उत्तर भाग का वर्णन हुआ, जिसमें रुद्र का माहात्म्य कहा गया है। जो व्यक्ति लिंगपुराण को लिखकर फाल्गुन की पूर्णिमा में द्विजाति को भक्तिपूर्वक तिलधेनु सहित उक्त पुराण समर्पित करता है, उसे जन्म-मरण रहित शिवसायुज्यमोक्ष की प्राप्ति होती है। जो नर पापहारी लिंग- पुराण का श्रवण या पाठ करता है, वह इस लोक में समस्त भोगों को भोगता हुआ अंत में शिवलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को पढ़ता है तथा जो इसे सुनता है, वे दोनों गिरिजापति की कृपा से उभयलोकों में सुखभोग करते हैं, इसमें संशय नहीं ॥१३-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में लिंगपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ दूसरा अध्याय समाप्त ॥१०२॥
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि वाराहं वै पुराणकम् । भागद्वययुतं शश्वद्विष्णुमाहात्म्यसूचकम् ॥१॥ मानवस्य तु कल्पस्य प्रसंगं मत्कृतं पुरा । निबबंध पुराणेऽस्मिंश्चतुर्विंशसहस्रके ॥२॥ व्यासो हि विदुषां श्रेष्ठः साक्षान्नारायणो भुवि । तत्रादौ शुभसंवादः स्मृतो भूमिवराहयोः ॥३॥ अथादिकृतवृत्तांते रंभस्य चरितं ततः । दुर्जयस्य च तत्पश्चाच्छाद्धकल्प उदीरितः ॥४॥ महातपस आख्यानं गौर्युत्पत्तिस्ततः परा । विनायकस्य नागानां सेनान्यादित्ययोरपि ॥५॥ गणानां च तथा देव्या धनदस्य वृषस्य च । आख्यानं सत्यतपसो व्रताख्यानसमन्वितम् ॥६॥ अगस्त्यगीता तत्पश्चाद्रुद्रगीता प्रकीर्तिता । महिषासुरविध्वंसमाहात्म्यं च त्रिशक्तिजम् ॥७॥ पर्वाऽध्याग्रस्ततः श्वेतोपाख्यानं गोप्रदानिकम् । इत्यादिकृतवृत्तांतं प्रथमे दर्शितं मया ॥८॥ भगवद्धर्मके पश्चाद्व्रततीर्थकथानकम् । द्वात्रिंशदपराधानां प्रायश्चित्तं शरीरगम् ॥६॥ तीर्थानां चापि सर्वेषां माहात्म्यं पृथगीरितम् । मथुराया विशेषेण श्राद्धादीनां विधितस्ततः ॥१०॥ वर्णनं यमलोकस्य ऋषिपूत्रप्रसंगतः । विपाकः कर्मणां चैव विष्णुव्रतनिरूपणम् ॥११॥ गोकर्णस्य च माहात्म्यं कीर्तितं पापनाशनम् । इत्येवं पूर्वभागोऽयं पुराणस्य निरूपितः ॥१२॥
अध्याय १०३ वाराहपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले-वत्स ! सुनो, सनातन विष्णु के माहात्म्य को बताने वाले तथा दो भागों से युक्त वाराह पुराण के संबन्ध में कहूँगा । पूर्व में मानवकल्प का जो कुछ प्रसंग मैंने वर्णन किया है, उसे इस चौबीस सहस्र श्लोकों से परिपूर्ण पुराण में व्यास ने निबद्ध कर दिया है । व्यास विद्वानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, पृथ्वी पर साक्षात् नारायण ही इन्हें समझना चाहिये । इस पुराण के प्रारम्भ में भूमि ओर वराह का शुभ संवाद हुआ है, तदनन्तर आदि वृत्तान्त में रंभ-चरित, श्राद्धकल्प, महातपा का आख्यान, गौरी की उत्पत्ति, विनायक, नाग, कार्तिकेय तथा आदित्य के गणों का उपाख्यान, देवी, कुबेर, और वृष का आख्यान, सत्यतपा का व्रत, अगस्त्य- गीता, रुद्रगीता, शक्तित्रय द्वारा महिषासुर विध्वंस माहात्म्य, पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदान आदि विषयों का वर्णन है। पुनः भगवद्धर्म में व्रततीर्थकथा, बत्तीस अपराधों का शारीरिक प्रायश्चित्त, सकल तीर्थों का पृथक्-पृथक् माहात्म्य, मथुरा में विशेष रूप से श्राद्ध आदि की विधि, ऋषिपूत्र प्रसंग में यमलोक वर्णन, कर्म- विपाक, विष्णुव्रत निरूपण, पापनाशन गोकर्ण माहात्म्य—इतने विषय पूर्वभाग में निरूपित हुए हैं ॥१-१२॥