बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 904, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंत्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि वाराहं वै पुराणकम् । भागद्वययुतं शश्वद्विष्णुमाहात्म्यसूचकम् ॥१॥ मानवस्य तु कल्पस्य प्रसंगं मत्कृतं पुरा । निबबंध पुराणेऽस्मिंश्चतुर्विंशसहस्रके ॥२॥ व्यासो हि विदुषां श्रेष्ठः साक्षान्नारायणो भुवि । तत्रादौ शुभसंवादः स्मृतो भूमिवराहयोः ॥३॥ अथादिकृतवृत्तांते रंभस्य चरितं ततः । दुर्जयस्य च तत्पश्चाच्छाद्धकल्प उदीरितः ॥४॥ महातपस आख्यानं गौर्युत्पत्तिस्ततः परा । विनायकस्य नागानां सेनान्यादित्ययोरपि ॥५॥ गणानां च तथा देव्या धनदस्य वृषस्य च । आख्यानं सत्यतपसो व्रताख्यानसमन्वितम् ॥६॥ अगस्त्यगीता तत्पश्चाद्रुद्रगीता प्रकीर्तिता । महिषासुरविध्वंसमाहात्म्यं च त्रिशक्तिजम् ॥७॥ पर्वाऽध्याग्रस्ततः श्वेतोपाख्यानं गोप्रदानिकम् । इत्यादिकृतवृत्तांतं प्रथमे दर्शितं मया ॥८॥ भगवद्धर्मके पश्चाद्व्रततीर्थकथानकम् । द्वात्रिंशदपराधानां प्रायश्चित्तं शरीरगम् ॥६॥ तीर्थानां चापि सर्वेषां माहात्म्यं पृथगीरितम् । मथुराया विशेषेण श्राद्धादीनां विधितस्ततः ॥१०॥ वर्णनं यमलोकस्य ऋषिपूत्रप्रसंगतः । विपाकः कर्मणां चैव विष्णुव्रतनिरूपणम् ॥११॥ गोकर्णस्य च माहात्म्यं कीर्तितं पापनाशनम् । इत्येवं पूर्वभागोऽयं पुराणस्य निरूपितः ॥१२॥
अध्याय १०३ वाराहपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले-वत्स ! सुनो, सनातन विष्णु के माहात्म्य को बताने वाले तथा दो भागों से युक्त वाराह पुराण के संबन्ध में कहूँगा । पूर्व में मानवकल्प का जो कुछ प्रसंग मैंने वर्णन किया है, उसे इस चौबीस सहस्र श्लोकों से परिपूर्ण पुराण में व्यास ने निबद्ध कर दिया है । व्यास विद्वानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, पृथ्वी पर साक्षात् नारायण ही इन्हें समझना चाहिये । इस पुराण के प्रारम्भ में भूमि ओर वराह का शुभ संवाद हुआ है, तदनन्तर आदि वृत्तान्त में रंभ-चरित, श्राद्धकल्प, महातपा का आख्यान, गौरी की उत्पत्ति, विनायक, नाग, कार्तिकेय तथा आदित्य के गणों का उपाख्यान, देवी, कुबेर, और वृष का आख्यान, सत्यतपा का व्रत, अगस्त्य- गीता, रुद्रगीता, शक्तित्रय द्वारा महिषासुर विध्वंस माहात्म्य, पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदान आदि विषयों का वर्णन है। पुनः भगवद्धर्म में व्रततीर्थकथा, बत्तीस अपराधों का शारीरिक प्रायश्चित्त, सकल तीर्थों का पृथक्-पृथक् माहात्म्य, मथुरा में विशेष रूप से श्राद्ध आदि की विधि, ऋषिपूत्र प्रसंग में यमलोक वर्णन, कर्म- विपाक, विष्णुव्रत निरूपण, पापनाशन गोकर्ण माहात्म्य—इतने विषय पूर्वभाग में निरूपित हुए हैं ॥१-१२॥