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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 903, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 903

८८४ नारदीयपुराणम् विष्णुमाहात्म्यकथन मंबरीषकथा ततः । सनत्कुमारनंदीशसंवादश्च पुनर्मुने ॥१३॥ शिवमाहात्म्यसंयुक्तः स्ना नयागादिकं ततः । सूर्यपूजाविधिश्चैव शिवपूजा च मुक्तिदा ॥१४॥ दानानि बहुधोक्तानि श्राद्धप्रकरणं ततः । प्रतिष्ठातंत्रमुदितं ततोऽघोरस्य कीर्तनम् ॥१५॥ वज्रेश्वरी महाविद्या गायत्रीमहिमा ततः । त्र्यंबकस्य च माहात्म्यं पुराणश्रवणस्य च ॥१६॥ एवं चोपरि भागस्ते लैङ्गस्य कथितो मया । व्यासेन हि विलक्ष्य रुद्रमाहात्म्यसूचितः ॥१७॥ लिखित्वाैतत्पुराणं तु तिलधेनुसमन्वितम् । फाल्गुन्यां पूर्णिमायां यो दद्याद्भक्त्या द्विजातये ॥१८॥ स लभेच्छिवसायुज्यं जरामरणवर्जितम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्व पापापहं नरः ॥१९॥ स भुक्तभोगो लोकेऽस्मिन्नंते शिवपुरं व्रजेत् । लिङ्गानुक्रमणीमेतां पठेद्यः शृणुयात्तथा ॥२०॥ तावुभौ शिवभक्तौ तु लोकद्वितयभोगिनौ । जायेतां गिरिजापर्तः प्रसादान्नात्र संशयः ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे लिङ्गपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम द्व्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०२॥ मुने ! इसके उत्तर भाग में विष्णुमाहात्म्य, अंबरीषकथा, सनत्कुमार और नंदीश, संवाद, शिवमाहात्म्य- संयुक्त स्नान, याग आदि, सूर्यपूजाविधि, मुक्तिदायिनी शिवपूजा, विविधदान, श्राद्धप्रकरण, तंत्रोक्त प्रतिष्ठा, अघोर- कीर्तन, वज्रेश्वरी, महाविद्या, तथा गायत्री की महिमा, त्र्यंबक तथा पुराणश्रवण का माहात्म्य बताया गया है। इस प्रकार व्यास द्वारा रचित लिंगपुराण के उत्तर भाग का वर्णन हुआ, जिसमें रुद्र का माहात्म्य कहा गया है। जो व्यक्ति लिंगपुराण को लिखकर फाल्गुन की पूर्णिमा में द्विजाति को भक्तिपूर्वक तिलधेनु सहित उक्त पुराण समर्पित करता है, उसे जन्म-मरण रहित शिवसायुज्यमोक्ष की प्राप्ति होती है। जो नर पापहारी लिंग- पुराण का श्रवण या पाठ करता है, वह इस लोक में समस्त भोगों को भोगता हुआ अंत में शिवलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को पढ़ता है तथा जो इसे सुनता है, वे दोनों गिरिजापति की कृपा से उभयलोकों में सुखभोग करते हैं, इसमें संशय नहीं ॥१३-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में लिंगपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ दूसरा अध्याय समाप्त ॥१०२॥