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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 902, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 902

द्वयधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं लिङ्गसंज्ञितम् । पठतां शृण्वतां चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥१॥ यच्च लिङ्गाभिधं तिष्ठन्वह्निलिङ्गे हरोऽभ्यधात् । मह्यं धर्मादिसिद्ध्यर्थमग्निकल्पकथाश्रयम् ॥२॥ तदेव व्यासदेवेन भागद्वयसमन्वितम् । पुराणं लिङ्गमुदितं बह्वाख्यानविचित्रितम् ॥३॥ तदेकादशसाहस्रं हरमाहात्म्यसूचकम् । परं सर्वपुराणानां सारभूतं जगत्त्रये ॥४॥ पुराणोपक्रमे प्रश्नः सृष्टिः संक्षेपतः पुरा । योगाख्यानं ततः प्रोक्तं कल्पाख्यानं ततः परम् ॥५॥ लिङ्गोद्भवस्तदर्चा च कीर्तिता हि ततः परम् । सनत्कुमारशैलादिसंवादश्चाथ पावनः ॥६॥ ततो दधीचचरितं युगधर्मनिरूपणम् । ततो भुवनकोशाख्या सूर्यसोमान्वयस्ततः ॥७॥ ततश्च विस्तरात्सर्गस्त्रिपुराख्यानकं तथा । लिङ्गप्रतिष्ठा च ततः पशुपार्शविमोक्षणम् ॥८॥ शिवव्रतानि च तथा सदाचारनिरूपणम् । प्रायश्चित्तान्यरिष्टानि काशीश्रीशैलवर्णनम् ॥९॥ अंधकाख्यानकं पश्चाद्वाराहचरितं पुनः । नृसिंहचरितं पश्चाज्जलंघरवधस्ततः ॥१०॥ शैवं सहस्रनामाथ दक्षयज्ञविनाशनम् । कामस्य वहनं पश्चाद्गिरिजायाः करग्रहः ॥११॥ ततो विनायकाख्यानं नृपाख्यानं शिवस्य च । उपमन्युकथा चापि पूर्वभाग इतीरितः ॥१२॥ अध्याय १०२ लिंगपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले- पुत्र ! सुनो, अब मैं लिंगपुराण को बतलाऊँगा, जिसके श्रवण एवम् पाठ करने से भोग- मोक्ष की प्राप्ति होती है । वह्निलिंग में रहते हुए भगवान् हर ने धर्म आदि की सिद्धि के लिये मुझसे जो अग्नि- कल्पकथा-संबन्धी लिंगपुराण को कहा था, उसी को व्यासदेव ने दो भागों में विभक्त किया । वह पुराण अनेक आख्यानों से युक्त है । उसमें ग्यारह हजार श्लोकों में शिव का माहात्म्य वर्णित हुआ है । तीनों लोक में वह सब पुराणों का सारभूत है ॥१-४॥ उसमें प्रथमतः पुराणोपक्रम संबन्धी प्रश्न और संक्षेप से सृष्टिवर्णन है । उसके पूर्व भाग में योगाख्यान, कल्पाख्यान, लिंगोत्पत्ति, उसकी अर्चना, सनत्कुमार और शैलादि का पवित्रसंवाद, दधीचि- चरित, युगधर्मनिरूपण, भुवनकोशाख्यान, सूर्य और सोमवंश, विस्तृत रूप से सृष्टि, त्रिपुराख्यान, लिंगप्रतिष्ठा, पशुपाशविमोक्षण, शिवव्रत, सदाचारनिरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी तथा श्रीशैलवर्णन, अंधकाख्यान, वाराहचरित, नृसिंहचरित, जलंधरवध, शिवसहस्रनाम, दक्षयज्ञविनाशन, कामदहन, पार्वतीविवाह, गणेशारूयान, नृपाख्यान, शिवोपाख्यान तथा उपमन्यु की कथा वर्णित है ॥५-१२॥