बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६८२ नारदीयपुराणम् माहात्म्यं पूजनाद्यं च विस्तरेण यथास्थितम् । एतत्प्रकृतिखंडं हि श्रुतं श्रुतिविधायकम् ॥१२॥ गणेशजन्म संप्रश्नः सपुण्यकमहाव्रतम् । पार्वत्याः कार्तिकेयेन सह विघ्नेशसंभवम् ॥१३॥ चरितं कार्तवीर्यस्य जामदग्न्यस्य चाद्भुतम् । विवादः सुमहानासीज्जामदग्न्यगणेशयोः ॥१४॥ एतद्विघ्नेशखंडं हि सर्वविघ्नविनाशनम् । श्रीकृष्णजन्मसंश्प्रश्नो जन्माख्यानं ततोऽद्भुतम् ॥१५॥ गोकुले गमनं पश्चात्पूतनादिवधाद्भुताः । बाल्यकौमारजा लीला विविधास्तत्र वर्णिताः ॥१६॥ रासक्रीडा च गोपीभिः शारदी समुदाहृता । रहस्ये राधया क्रीडा वर्णिता बहुविस्तरा ॥१७॥ सहाक्रूरेण तत्पश्चान्मथुरागमनं हरेः । कंसादीनां वधे वृत्ते कृष्णस्य द्विजसंस्कृतिः ॥१८॥ काश्यसांदिपनेः पश्चाद्विद्योपादानमद्भुतम् । यवनस्य वधः पश्चाद्द्वारका गमनं हरेः ॥१९॥ नरकादिवधस्तत्र कृष्णेन विहितोऽद्भुतः । कृष्णखंडमिदं विप्र नृणां संसारखंडनम् ॥२०॥ पठितं च श्रुतं ध्यातं पूजितं चाभिवंदितम् । इत्येतद्ब्रह्मवैवर्तपुराणं चात्यलौकिकम् ॥२१॥ व्यासोक्तं चादि संभूतं पठञ्शृण्वन्विमुच्यते । विज्ञानाज्ञानशमनाद्धोरात्संसारसागरात् ॥२२॥ लिखित्त्वेदं च यो दद्यान्माध्यां धेनुसमन्वितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति स मुक्तोऽज्ञानबंधनात् ॥२३॥ यश्चानुक्रमणीं चापि पठेद्वा शृणुयादपि । सोऽपि कृष्णप्रसादेन लभते वांछितं फलम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने ब्रह्मवैवर्तपुराणानुक्रमणी निरूपणं नामैकोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०१॥ नाभ होता है। गणेशखंड में विघ्नेश जन्म का प्रश्न, पार्वती का पुण्यकव्रत, कार्तिकेय और विनायक की उत्पत्ति, कार्तवीर्य और जामदग्न्य का अद्भुत चरित्र, गणेश और जामदग्न्य का घोर विवाद बताया गया है। यह खण्ड समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है ॥१०-१४३॥ कृष्ण खंड में श्रीकृष्ण के जन्म विषयक प्रश्न, अद्भुत जन्माख्यान, गोकुल में गमन, पूतनादिवध, बाल्या- वस्था तथा कौमार अवस्था में की गई अनेक लीलायें गोपियों के संग श्रीकृष्ण की शारदी रासक्रीड़ा, निर्जन में राधा के साथ क्रीडा, फिर अक्रूर के साथ हरि का मथुरागमन, कंस आदि का वध, कृष्ण का द्विजसंस्कार, काशी में सांदीपनि से विद्याग्रहण, यवन का वध, हरि का द्वारिकागमन, वहाँ कृष्ण द्वारा नरकासुर आदि का आश्चर्यजनक वध वर्णित हुआ है। विप्र ! कृष्णखंड के श्रवण करने से मनुष्यों का भवबन्धन कट जाता है। यह ब्रह्मवैवर्तपुराण अत्यन्त विलक्षण है ॥१५-२१॥ इसके पाठ, श्रवण, पूजन, ध्यान तथा अभिवन्दना करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होतो है। यह संसार-सागर से उद्धार करने वाला, अज्ञान का नाश करने वाला और विज्ञान का प्रकाश देने वाला है। जो इसे लिखकर माघी पूर्णिमा के दिन धेनु सहित प्रदान करता है, वह अज्ञान बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को सुनेगा या पढ़ेगा, वह भी कृष्ण की कृपा से वांछित फल को को प्राप्त करेगा ॥२२-२४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थ पाद में ब्रह्मवैवर्तपुराण का अनुक्रमणी-वर्णन नामक एक सौ एक अध्याय समाप्त ॥१०१॥