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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 894, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 894

सप्तनवतितमोऽध्यायः ८७५ सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके । पुराणलक्षणं चैव प्रमाणं दानमेव च ॥७॥ पृथक्पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरःसरम् । चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक्पृथक् ॥८॥ प्रोक्तं प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् । सनातनेन मुनिना नारदाय चतुर्थके ॥६॥ पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः । अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते ॥१०॥ वसिष्ठेनाथ संवादो मांघातुः परिकीर्तितः । रुक्मांगदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च ॥११॥ वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया । गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् ॥१२॥ काश्या माहात्म्यमतुलं पुरुषोत्तमवर्णनम् । यात्राविधानं क्षेत्रस्य बह्वाख्यानसमन्वितम् ॥१३॥ प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् । हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकं तथा ॥१४॥ बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाक्षायास्तथैव च । प्रभासस्य च माहात्म्यं पुष्कराख्यानकं ततः ॥१५॥ गौतमाख्यानकं पश्चाद्वेदपादस्तवस्ततः । गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं लक्ष्मणाख्यानकं तथा ॥१६॥ सेतुमाहात्म्यकथनं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ॥१७॥ वृन्दावनस्य महिमा वसुर्ब्रह्मांतिके गतिः । मोहिनीचरितं पश्चादेवं वै नारदीय कम् ॥१८॥ यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥१९॥ यस्त्वेताविषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकान्वितम् । प्रवद्याद्विद्वद्वर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥२०॥ यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गति लभेत् ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे नारदीयपुराणानुक्रमणी- कथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥६७॥ तथा शक्ति के स्तोत्र बताये हैं । तृतीय पाद में सनत्कुमार मुनि ने नारद से पुराणों का लक्षण तथा प्रमाण, दान तथा दान-काल आदि को पृथक्-पृथक् बतलाया है । चैत्र आदि मासों में प्रतिपदा आदि तिथिक्रम से पृथक्-पृथक् व्रतनिरूपण किया है । सनातन मुनि ने चतुर्थपाद में नारद को यह बतलाया है । इतना पूर्वभाग है, जो बृहदाख्यान कहलाता है ॥४-९॥ पुराण के उत्तरार्ध में एकादशीव्रत संबन्धी प्रश्न, वसिष्ठ और मांधाता का संवाद, पवित्र रुक्मांगदकथा, मोहिनी की उत्पत्ति और कर्म, मोहिनी के प्रति पुरोहित वसु का शाप तथा उद्धारक्रिया, पुण्यतम गंगाकथा, गयायात्राकीर्तन, काशीमाहात्म्य, अतुलनीय पुरुषोत्तम-वर्णन, अनेक आख्यान युक्त पुरुषोत्तम क्षेत्र का यात्राविधान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, कामोदा, बदरीतीर्थ, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर तथा गौतमतीर्थ का माहात्म्य, वेदपादस्तुति, गोकर्णक्षेत्र माहात्म्य, लक्ष्मणाख्यान, सेतुमाहात्म्य, नर्मदातीर्थ-वर्णन, अवंती, मथुरा तथा वृन्दावन की महिमा, ब्रह्मा के निकट वसु का गमन और फिर मोहिनी का चरित्र चित्रण किया गया है । यही नारदीयपुराण है ॥१०-१८॥ जो मनुष्य समाहित होकर भक्तिपूर्वक इसको सुनता है अथवा सुनाता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । जो व्यक्ति आश्विन की पूर्णिमा में सात धेनुओं के साथ यह पुराण उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है । जो नारदीयपुराण की इस अनुक्रमणी का वर्णन करेगा या तन्मनस्क होकर सुनेगा, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति होगी ॥१९-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में नारदीयपुराणानुक्रमणी कथन नामक सत्तानबेवां अध्याय समाप्त ॥९७॥

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