बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 890, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चनवतितमोऽध्यायः ८७१ मासानां चैव माहात्म्यं माघस्योक्तं फलाधिकम् । दानधर्मा राजधर्मा विस्तरेणोदितास्तथा ॥५॥ भूपातालककुब्द्योमचारिणां यत्र निर्णयः । व्रतादीनां च पूर्वोऽयं विभागः समुदाहृतः ॥६॥ उत्तरे तस्य भागे तु नर्मदातीर्थवर्णनम् । शिवस्य संहितोक्ता वै विस्तरेण मुनीश्वर ॥७॥ यो देवः सर्वदेवानां दुर्विज्ञेयः सनातनः । स तु सर्वात्मना यस्यास्तीरे तिष्ठति संततम् ॥८॥ इदं ब्रह्मा हरिरिदं साक्षाच्चेदं परो हरः । इदं ब्रह्म निराकारं कैवल्यं नर्मदाजलम् ॥६॥ ध्रुवं लोकहितार्थाय शिवेन स्वशरीरतः । शक्तिः कापि सरिद्रूपा रेवेयमवतारिता ॥१०॥ ये वसंत्युत्तरे कूले रुद्रस्यानुचरा हि ते । वसन्ति याम्यतीरे ये लोकं ते यांति वैष्णवम् ॥११॥ ओंकारेश्वरमारभ्य यावत्पश्चिमसागरः । संगमाः पंच च त्रिंशन्नदीनां पापनाशनी ॥१२॥ दशकमुत्तरे तीरे त्रयोविंशतिदक्षिणे । पंचविंशत्तमः प्रोक्तो रेवासागरसंगमः ॥१३॥ संगमः सहितान्येव रेवातीरद्वयेऽपि च । चतुःशतानि तीर्थानि प्रसिद्धानि च संति हि ॥१४॥ षष्टितीर्थसहस्राणि षष्टिकोट्यो मुनीश्वर । संति चान्यानि रेवायास्तीरयुग्मे पदे पदे ॥१५॥ संहितेयं महापुण्या शिवस्य परमात्मनः । नर्मदाचरितं यत्र वायुना परिकीर्तितम् ॥१६॥ लिखित्त्वेदं पुराणं तु गुडधेनुसमन्वितम् । श्रावण्यां यो ददेद्भक्त्या ब्राह्मणाय कुटुम्बिने ॥१७॥ रुद्रलोके वसेत्सोऽपि यावदिन्द्राश्चतुर्दश । यः श्रावयेद्वा शृणुयाद्वायवीयमिदं नरः ॥१८॥ नियमेन हविष्याशी स रुद्रो नात्र संशयः । यश्चानुक्रमणीमेतां शृणोति श्रावयेत्तथा ॥१९॥
एवम् माघ का फल प्रचुरतया बताया गया है; दानधर्म तथा राजधर्मों का विस्तृत वर्णन है ॥१-५॥ भू, पाताल, दिशा तथा आकाशचारियों का और व्रत आदिकों का निर्णय किया गया है। मुनीश्वर ! उत्तर भाग में नर्मदातीर्थ तथा शिवसंहिता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। जैसे जो सनातन देव समस्त देवों से दुर्ज्ञेय हैं, वे सब प्रकार से नर्मदा नदी के तट पर सदा वास करते हैं। नर्मदा का जल ब्रह्मा, साक्षात् हरि, हर, निराकार ब्रह्म तथा निर्वाण रूप है। निश्चय ही लोककल्याण के लिये शिव ने अपने शरीर से किसी शक्ति को रेवा नदी के रूप में अवतरित किया है। जो नर्मदा के उत्तर तट पर वास करते हैं, वे मानो रुद्र के अनुचर हो हैं। जो दक्षिण तट पर वास करते हैं, वे विष्णुलोक को जाते हैं। ओंकारेश्वर से लेकर पश्चिमसागर पर्यन्त पैंतीस पापनाशिनी नदियों का संगम है ॥६-१२॥ ग्यारह नदियाँ तो रेवा के उत्तर तीर से मिली हैं और तेईस दक्षिण तट से। पैंतीसवां संगम तो समुद्र के साथ ही नर्मदा का माना जाता है। रेवा के उभय तट पर संगमीय तीर्थों सहित चार सो प्रसिद्ध तीर्थ विराजते हैं। मुनीश्वर ! साठ करोड़ और साठ हजार अन्य तीर्थ भी रेवा के युगल तटों के पद-पद में विद्यमान हैं। परमात्मा शिव की यह संहिता महापुण्यदायिनी है, जिसमें वायु ने नर्मदा का चरित्रवर्णन किया है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर गुडधेनु सहित कुटुम्बी ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक समर्पित करता है, वह तब तक रुद्रलोक में वास करता है जब तक चौदहों इन्द्र हो जाते हैं। जो नर नियम पूर्वक हविष्य-भोजन करते हुए उस वायुपुराण को सुनता है या सुनाता है, वह रुद्र होता है,