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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 889, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 889

सहितं विष्णुभक्ताय पुराणार्थविदे द्विज । स याति वैष्णवं धाम विमानेनार्कवर्चसा ॥२३॥ यश्च विष्णुपुराणस्य समनुक्रमणीं द्विज । कथयेच्छृणुयाद्वापि स पुराणफलं लभेत् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे विष्णुपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम चतुर्नवतितमोऽध्यायः ॥६४॥

पञ्चनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं वायवीयकम् । यस्मिञ्छ्रुते लभेदाम रुद्रस्य परमात्मनः ॥१॥ चतुर्विंशतिसाहस्रं तत्पुराणं प्रकीर्तितम् । श्वेतकल्पप्रसंगेन धर्मानत्राह मारुतः ॥२॥ तद्वायवीयमुदितं भागद्वयसमन्वितम् । सर्गादिलक्षणं यत्र प्रोक्तं विप्र सविस्तरम् ॥३॥ मन्वंतरेषु वंशाश्च राज्ञां ये तत्र कीर्तिताः । गयासुरस्य हननं विस्तराद्यत्र कीर्तितम् ॥४॥

कर आषाढ़ की पूर्णिमा में पुराणवेत्ता तथा विष्णुभक्त विप्र को घृतधेनु सहित इसे प्रदान करता है, वह सूर्य के समान चमकने वाले विमान से वैकुण्ठ को प्रयाण करता है। जो विष्णुपुराण की अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, उसे भी संपूर्ण पुराण का फल प्राप्त होगा ॥२१-२४॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में विष्णुपुराणानुक्रमणी निरूपण नामक चौरानबेवां अध्याय समाप्त ॥९४॥

अध्याय ६५ वायुपुराण की विषय सूची ब्रह्मा बोले—विप्र ! सुनो, मैं वायवीय पुराण कहूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य परमात्मा रुद्र के धाम को प्राप्त करता है। उस पुराण में चौबीस हजार श्लोक हैं, वायु ने श्वेतकल्प के प्रसंग से धर्मों को बतलाया है। उसमें दो भाग हैं। प्रथम भाग में सृष्टि आदि का लक्षण विस्तारपूर्वक बतलाया गया है, मन्वन्तरों में जहाँ जो राजा हुए हैं, उनका वंशवर्णन किया गया है; गयासुर का वध विस्तार से वर्णित हुआ है, मासों का माहात्म्य