बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 888, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुर्नवतितमोऽध्यायः ८६६ पृथुराज्याधिकाराख्या प्रथमोऽश ईरितिः । प्रियव्रताऽन्वयाख्यानं द्वीपवर्षनिरूपणम् ।।५।। पातालनरकाख्यानं सप्तस्वर्गनिरूपणम् । सूर्यादिवारकथनं पृथग्लक्षणसंयुक्तम् ।।६।। चरितं भरतस्याथ मुक्तिमार्गनिदर्शनम् । निदाघऋभुसंवादो द्वितीयोंऽश उदाहृतः । ७। मन्वन्तरसमाख्यानं वेदव्यासावतारकम् । नरकोद्धारकं कर्म गदितं च ततः परम् ।।८।। सगरस्योर्वसंवादे सर्वधर्मनिरूपणम् । श्राद्धकल्पं तथोद्दिष्टं वर्णाश्रमनिबन्धनम् ।।६।। सदाचारश्च कथितो मायामोहकथा ततः । तृतीयोंऽशाऽयमुदितः सर्वपापप्रनाशनः ।।१०।। सूर्यवंशकथा पुण्या सोमवंशाऽनुकीर्तनम् । चतुर्थेऽशे मुनिश्रेष्ठ नानाराजकथान्वितम् ।।११।। कृष्णोवतारसंश्लो गोकुलोथा कथा ततः । पूतनाविवधो बाल्ये कोमारेऽघाविहिंसनम् ।।१२।। कौशोरे कंसहननं माथुरं चरितं तथा । ततस्तु यौवने प्रोक्ता लीला द्वारवतीभवा ।।१३।। सर्वदैत्यवधो यत्र विवाहाश्च पृथग्विधाः । यत्र स्थित्वा जगन्नाथः कृष्णो योगेश्वरेश्वरः ।।१४।। भूभारहरणं चक्रे परेषां हननार्दिभिः । अष्टावक्रोपाख्यानं पंचमोंऽश ईरितिः ।।१५।। कलिजं चरितं प्रोक्तं चातुर्विध्यं लयस्य च । ब्रह्मज्ञानसमुद्देशः खांडिक्यस्य निरूपितः ।।१६।। केशिध्वजेन चेत्येष षष्ठोऽशः परिकीर्तितः । अतः परं तु सूतेन शौनकादिभिरादरात् ।।१७।। पृष्टेन बोधिताः शश्वद्विष्णुधर्मोत्तराह्वयाः । नानाधर्मकथाः पुण्या व्रतानि नियमा यमाः ।।१८।। धर्मशास्त्रं चार्थशास्त्रं वेदांतं ज्योतिषं तथा । वंशाख्यानं प्रकरणात् स्तोत्राणि मन्त्रस्तथा ।।१६।। नानाविद्यास्तथा प्रोक्ताः सर्वलोकोपकारिकाः । एतद्विष्णुपुराणं वै सर्वशास्त्रार्थसंग्रहम् ।।२०।। वाराहकल्पवृत्तांतं व्यासेन कथितं त्विह । यो नरः पठते भक्त्या यः श्रृणोति च सादरम् ।।२१।। तावुभौ विष्णुलोकं हि व्रजेतां भुक्तभोगकौ । तल्लिखित्वा च यो दद्यादाषाढ्यां घृतधेनुना ।।२२।।
में प्रियव्रत का वंशवर्णन, द्वीपों और वर्षों का निरूपण, रवि आदि दिनों का पृथक्-पृथक् लक्षण निर्देश, भरत का चरित्र-वर्णन मुक्तिमार्ग का निदर्शन, निदाघ और ऋभु का संवाद, कहा गया है। सकल पापनाशन तृतीय अंश में मन्वन्तर का आख्यान, वेदव्यास का अवतार, नरकोद्धारक कर्म, सगर तथा ओर्व का संवाद, समस्त धर्मों का निरूपण, श्राद्धकल्प, वर्णाश्रमनिबन्धन, सदाचार तथा माया-मोह की कथा बताई गई है। मुनिश्रेष्ठ ! चतुर्थ अंश में अनेक राजाओं की कथा, कृष्णावतार के विषय में प्रश्न, गोकुल की कथा, (कृष्ण की) बाल्यावस्था में पूतना आदि का वध, कौमार अवस्था में अघासुर आदि की हिंसा, किशोरावस्था में कंस हनन तथा मथुरा का चरित्र- वर्णन, युवावस्था में द्वारिका की लीला, अखिल दैत्यों का वध और अनेक विवाह बतलाये गये हैं ॥५-१३३॥ जिस अंश में जगन्नाथ एवम् योगेश्वरेश्वर कृष्ण ने शत्रुओं को मारकर पृथ्वी का भार उतारा, वह पाँचवां अंश है। छठें अंश में कलि का चरित्र, चार प्रकार के लय, ब्रह्मज्ञान, केशिध्वजोपाख्यान और खांडिक्य की मंत्रणा बताई गई है। एतदुपरान्त शौनक आदि ऋषियों से आदरपूर्वक पूछे जाने पर सूत ने शाश्वत विष्णु धर्म संबन्धी अनेक कथायें, व्रत, नियम, यम धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र, वेदान्त, ज्योतिष, प्रकरणवश वंशाख्यान, स्तोत्र, मंत्र तथा अखिल लोकोपकारक अनेक तरह की विद्यायें बताई हैं। इस विष्णुपुराण में सब शास्त्रों का तत्त्व संगृहीत है ॥१४-२०॥ व्यास ने इस पुराण में वाराहकल्प का वृत्तान्त वर्णन किया है। जो नर आदरपूर्वक इसका पाठ करता है और जो श्रवण करता है, वे दोनों सकल भोगों को भोगकर विष्णुलोक को जाते हैं। द्विज ! जो इसको लिख