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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 891, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 891

८७२ नारदीयपुराणम् सोऽपि सर्वपुराणस्य फलं श्रवणजं लभेत् । ॥२०॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वायुपुराणानुक्रमणिकानिरूपणं नाम पञ्चनवतितमोऽध्यायः ॥९५॥ षण्णवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच मरीचे शृणु वक्ष्यामि वेदव्यासेन यत्कृतम् । श्रीमद्भागवतं नाम पुराणं ब्रह्मसम्मितम् ॥१॥ तदष्टादशसाहस्रं कीर्तितं पापनाशनम् । सुरपादपरूपोऽयं स्कंधैर्द्वादशभिर्युतः ॥२॥ भगवानेव विप्रेन्द्र विश्वरूपी समीरितः । तत्र तु प्रथमस्कंधे सूतर्षीणां समागमे ॥३॥ व्यासस्य चरितं पुण्यं पांडवानां तथैव च । पारीक्षितमुपाख्यानमितीदं समुदाहृतम् ॥४॥ परीक्षिच्छुकसंवादे सृष्टिद्वर्यानिरूपणम् ब्रह्मानारदसंवादे देवताचरितामृतम् ॥५॥ इसमें संशय नहीं । जो इस अनुक्रमणिका का श्रवण करता है या कराता है, उसे भी संपूर्ण वायुपुराण सुनने का फल लाभ होता है ॥१३-२०॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वायुपुराण का अनुक्रमणिका वर्णन नामक पंचानबेवां अध्याय समाप्त ॥९५॥ अध्याय ९६ श्रीमद्भागवत के द्वादश स्कन्ध के अनुसार उसकी अनुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले—मरीचे ! सुनो, वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत नामक जो ब्रह्मसम्मत पुराण का निर्माण किया है, उसे मैं कहूँगा । उस पाप-नाशन पुराण में अठारह हजार श्लोक हैं । बारह स्कंधों में वह विभक्त है । विप्रेन्द्र ! वह कल्पवृक्ष के समान है । विश्वरूपी भगवान् का ही उसे स्वरूप समझना चाहिये । उसके प्रथम स्कंध में सूत और ऋषियों का संवाद हुआ है, जिसमें व्यास तथा पांडवों का पवित्र चरित्र और परीक्षित का उपाख्यान वर्णित किया गया है ॥१-४॥ परीक्षित और शुक के संवादरूप द्वितीय स्कंध में श्रीमान् व्यास ने सृष्टिद्वय का