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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 892, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 892

षण्णवतितमोऽध्यायः ८७३ पुराणलक्षणं चैव सृष्टिकारणसंभवः । द्वितीयोऽयं समुदितः स्कंधो व्यासेन धीमता ॥६॥ चरितं विदुरस्याथ मैत्रेयेणास्य संगमः । सृष्टिप्रकरणं पश्चाद्ब्रह्मणः परमात्मनः ॥७॥ कापिलं सांख्यमप्यत्र तृतीयोऽयमुदाहृतः । सत्याश्चरितमादौ तु ध्रुवस्य चरितं ततः ॥८॥ पृथोः पुण्यसमाख्यानं ततः प्राचीनबर्हिषम् । इत्येष तुर्यो गदितो विसर्गे स्कंध उत्तमः ॥६॥ प्रियव्रतस्य चरितं तद्वंशानां च पुण्यदम् । ब्रह्मांडांतर्गतानां च लोकानां वर्णनं ततः ॥१०॥ नरकस्थितिरित्येष संस्थाने पंचमो मतः । अजामिलस्य चरितं दक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥११॥ प्रह्लादचरितं पुण्यं वर्णाश्रमनिरूपणम् । सप्तमो गदितो वत्स वासनाकर्मकीर्तने ॥१२॥ वृत्राख्यानं ततः पश्चान्मरुतां जन्म पुण्यदम् । षष्ठोऽयमुदितः स्कंधो व्यासेन परिपोषणे ॥१३॥ गजेन्द्रमोक्षणाख्यानं मन्वंतरनिरूपणे । समुद्रमथनं चैव बलिवैमवबंधनम् ॥१४॥ मत्स्यावतारचरितमष्टमोऽयं प्रकीर्तितः । सूर्यवंशसमाख्यानं सोमवंशनिरूपणम् ॥१५॥ वंश्यानुचरिते प्रोक्तो नवमोऽयं महामते । कृष्णस्य बालचरितं कौमारं च व्रजस्थितिः ॥१६॥ कैशोरं मथुरास्थानं यौवनं द्वारकास्थितिः । भूभारहरणं चात्र निरोधे दशमः स्मृतः ॥१७॥ नारदेन तु संवादो वसुदेवस्य कीर्तितः । यदोश्च दत्तात्रेयेण श्रीकृष्णेनोद्धवस्य च ॥१८॥ यादवानां मिथोऽत्तश्च मुक्तावेकादशः स्मृतः । भविष्यकलिनिर्देशो मोक्षो राज्ञः परीक्षितः ॥१९॥ वेदशाखाप्रणयनं मार्कंडेयतपः क्रिया । सौरो विभूतिरुदिता सात्वती च ततः परम् ॥२०॥ पुराणसंख्याकथनमाश्रये द्वादशो ह्ययम् । इत्येवं कथितं वत्स श्रीमद्भागवतं तव ॥२१॥ वक्तुः श्रोतुश्चोपवेष्टुरनिमोदितुरेव च । साहाय्यकर्तुर्गदितं भक्तिभुक्तिविमुक्तिदम् ॥२२॥ निरूपण किया है तथा ब्रह्मा और नारद के संवाद में देवताओं का चरित्र, पुराणों का लक्षण और सृष्टि का कारण बतलाया है । तृतीय स्कंध में विदुर का चरित्र, मैत्रेय के साथ उसका संगम, परमात्मा ब्रह्मा का सृष्टि- प्रकरण और कपिलनिर्मित सांख्य शास्त्र का निरूपण किया गया है । चतुर्थ स्कंध में सत्या एवम् ध्रुव का चरित्र, पृथु तथा प्राचीन बहिष् का पवित्र उपाख्यान आता है । पंचम स्कंध में प्रियव्रत तथा उनके वंशजों का पवित्र चरित्र, ब्रह्मांड के अन्तर्वर्ती लोकों तथा नरकों की स्थिति दिखलाई गई है । छठे स्कंध में अजामिल का चरित्र, दक्षसृष्टि का निरूपण, वृत्राख्यान और मरुतों का उद्भव बताया गया है । वत्स ! सातवें स्कंध में वासनाजन्य कर्मों का कथन, प्रह्लाद का चरित्र और वर्णाश्रमों का निरूपण किया गया है ॥५-१३॥ अष्टम स्कंध में मन्वन्तरों का निरूपण, गजेन्द्रमोक्ष का आख्यान, सागरमंथन, बलिवैभव बंधन तथा मत्स्यावतार का चरित्र वर्णन किया गया है । महामते ! नवम स्कंध में सूर्यवंश का आख्यान, सोमवंश का निरूपण तथा वंशावालों का चरित्र वर्णन मिलता है । दशम स्कंध में कृष्ण की बाललीला, कौमार अवस्था में उनका व्रजवास, कैशोर अवस्था में मथुरावास, युवावस्था में द्वारकावास तथा भूभार का हरण बतलाया गया है । एकादश स्कंध में नारद और वसुदैव का संवाद, यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद, श्रीकृष्ण एवम् उद्धव का संवाद और यादवां का परस्पर नाश बताया गया है । द्वादश स्कंध में भविष्यकाल का निर्देश, राजा परीक्षित् का मोक्ष, वेदशाखाप्रणयन, मार्कंडेय का तप, सौरी सनातनी विभूति और पुराणों की संख्या का निर्देश किया गया है । वत्स ! यह श्रीमद्भागवत तुमसे कहा है, जो वक्ता, श्रोता, उपदेष्टा, अनुमोदिता तथा साहाय्यकर्ता को मुक्ति, मुक्ति एवम् भक्ति प्रदान करता है ॥१४-२२॥ भगवद्भक्ति के इच्छुक को चाहिये कि वह भादों की पूर्णिमा ११० ना० पु०