बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
षण्णवतितमोऽध्यायः ८७३ पुराणलक्षणं चैव सृष्टिकारणसंभवः । द्वितीयोऽयं समुदितः स्कंधो व्यासेन धीमता ॥६॥ चरितं विदुरस्याथ मैत्रेयेणास्य संगमः । सृष्टिप्रकरणं पश्चाद्ब्रह्मणः परमात्मनः ॥७॥ कापिलं सांख्यमप्यत्र तृतीयोऽयमुदाहृतः । सत्याश्चरितमादौ तु ध्रुवस्य चरितं ततः ॥८॥ पृथोः पुण्यसमाख्यानं ततः प्राचीनबर्हिषम् । इत्येष तुर्यो गदितो विसर्गे स्कंध उत्तमः ॥६॥ प्रियव्रतस्य चरितं तद्वंशानां च पुण्यदम् । ब्रह्मांडांतर्गतानां च लोकानां वर्णनं ततः ॥१०॥ नरकस्थितिरित्येष संस्थाने पंचमो मतः । अजामिलस्य चरितं दक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥११॥ प्रह्लादचरितं पुण्यं वर्णाश्रमनिरूपणम् । सप्तमो गदितो वत्स वासनाकर्मकीर्तने ॥१२॥ वृत्राख्यानं ततः पश्चान्मरुतां जन्म पुण्यदम् । षष्ठोऽयमुदितः स्कंधो व्यासेन परिपोषणे ॥१३॥ गजेन्द्रमोक्षणाख्यानं मन्वंतरनिरूपणे । समुद्रमथनं चैव बलिवैमवबंधनम् ॥१४॥ मत्स्यावतारचरितमष्टमोऽयं प्रकीर्तितः । सूर्यवंशसमाख्यानं सोमवंशनिरूपणम् ॥१५॥ वंश्यानुचरिते प्रोक्तो नवमोऽयं महामते । कृष्णस्य बालचरितं कौमारं च व्रजस्थितिः ॥१६॥ कैशोरं मथुरास्थानं यौवनं द्वारकास्थितिः । भूभारहरणं चात्र निरोधे दशमः स्मृतः ॥१७॥ नारदेन तु संवादो वसुदेवस्य कीर्तितः । यदोश्च दत्तात्रेयेण श्रीकृष्णेनोद्धवस्य च ॥१८॥ यादवानां मिथोऽत्तश्च मुक्तावेकादशः स्मृतः । भविष्यकलिनिर्देशो मोक्षो राज्ञः परीक्षितः ॥१९॥ वेदशाखाप्रणयनं मार्कंडेयतपः क्रिया । सौरो विभूतिरुदिता सात्वती च ततः परम् ॥२०॥ पुराणसंख्याकथनमाश्रये द्वादशो ह्ययम् । इत्येवं कथितं वत्स श्रीमद्भागवतं तव ॥२१॥ वक्तुः श्रोतुश्चोपवेष्टुरनिमोदितुरेव च । साहाय्यकर्तुर्गदितं भक्तिभुक्तिविमुक्तिदम् ॥२२॥ निरूपण किया है तथा ब्रह्मा और नारद के संवाद में देवताओं का चरित्र, पुराणों का लक्षण और सृष्टि का कारण बतलाया है । तृतीय स्कंध में विदुर का चरित्र, मैत्रेय के साथ उसका संगम, परमात्मा ब्रह्मा का सृष्टि- प्रकरण और कपिलनिर्मित सांख्य शास्त्र का निरूपण किया गया है । चतुर्थ स्कंध में सत्या एवम् ध्रुव का चरित्र, पृथु तथा प्राचीन बहिष् का पवित्र उपाख्यान आता है । पंचम स्कंध में प्रियव्रत तथा उनके वंशजों का पवित्र चरित्र, ब्रह्मांड के अन्तर्वर्ती लोकों तथा नरकों की स्थिति दिखलाई गई है । छठे स्कंध में अजामिल का चरित्र, दक्षसृष्टि का निरूपण, वृत्राख्यान और मरुतों का उद्भव बताया गया है । वत्स ! सातवें स्कंध में वासनाजन्य कर्मों का कथन, प्रह्लाद का चरित्र और वर्णाश्रमों का निरूपण किया गया है ॥५-१३॥ अष्टम स्कंध में मन्वन्तरों का निरूपण, गजेन्द्रमोक्ष का आख्यान, सागरमंथन, बलिवैभव बंधन तथा मत्स्यावतार का चरित्र वर्णन किया गया है । महामते ! नवम स्कंध में सूर्यवंश का आख्यान, सोमवंश का निरूपण तथा वंशावालों का चरित्र वर्णन मिलता है । दशम स्कंध में कृष्ण की बाललीला, कौमार अवस्था में उनका व्रजवास, कैशोर अवस्था में मथुरावास, युवावस्था में द्वारकावास तथा भूभार का हरण बतलाया गया है । एकादश स्कंध में नारद और वसुदैव का संवाद, यदु तथा दत्तात्रेय का संवाद, श्रीकृष्ण एवम् उद्धव का संवाद और यादवां का परस्पर नाश बताया गया है । द्वादश स्कंध में भविष्यकाल का निर्देश, राजा परीक्षित् का मोक्ष, वेदशाखाप्रणयन, मार्कंडेय का तप, सौरी सनातनी विभूति और पुराणों की संख्या का निर्देश किया गया है । वत्स ! यह श्रीमद्भागवत तुमसे कहा है, जो वक्ता, श्रोता, उपदेष्टा, अनुमोदिता तथा साहाय्यकर्ता को मुक्ति, मुक्ति एवम् भक्ति प्रदान करता है ॥१४-२२॥ भगवद्भक्ति के इच्छुक को चाहिये कि वह भादों की पूर्णिमा ११० ना० पु०
८७४ नारदीयपुराणम् प्रोष्ठपद्यां पूर्णिमायां हेमसिंहसमन्वितम्। देयं भागवताख्यं द्विजाय प्रीतिपूर्वकम् ॥२३॥ संपूज्य वस्त्रहेमाद्यैर्भगवद्भक्तिमिच्छता । योऽप्यनुक्रमणीमेतां श्रावयेच्छृणुयात्तथा ॥ स पुराणश्रवणजं प्राप्नोति फलमुत्तमम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे श्रीमद्भागवतानुक्रमणी- निरूपणं नाम षण्णवतितमोऽध्यायः ॥९६॥ * सप्तनवतितमोऽध्यायः श्रीब्रह्मोवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि पुराणं नारदीयकम्। पञ्चविंशतिसाहस्रं बृहत्कल्पकथाश्रयम् ॥१॥ सूतशौनकसंवादः सृष्टिसंक्षेपवर्णनम् । नानाधर्मकथाः पुण्याः प्रवृत्ते समुदाहृताः ॥२॥ प्राग्भागे प्रथमे पादे सनकेन महात्मना । द्वितीये मोक्षधर्माख्ये मोक्षोपायनिरूपणम् ॥३॥ वेदांगानां च कथनं शुकोत्पत्तिश्च विस्तरात् । सनंदनेन गदिता नारदाय महात्मने ॥४॥ महातंत्रे समुद्दिष्टं पशुपाशविमोक्षणम् । मंत्राणां शोधनं दीक्षामंत्रोद्धारश्च पूजनम् ॥५॥ प्रयोगाः कवचं नामसहस्रं स्तोत्रमेव च । गणेशसूर्यविष्णूनां शिवशक्त्योरनुक्रमात् ॥६॥ में वस्त्र, सुवर्ण आदि से प्रीतिपूर्वक भगवद्भक्त ब्राह्मण की पूजा कर स्वर्णसिंह समेत भागवतपुराण समर्पित करे। जो व्यक्ति इस अनुक्रमणिका को सुनेगा या सुनावेगा, उसे भी पुराण सुनने का उत्तम फल मिलेगा ॥२३-२४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्द्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में श्रीमद्भागवतानुक्रमणी निरूपण नामक छानबेवां अध्याय समाप्त ॥९६॥ अध्याय ९७ श्रीनारदीयपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले-विप्र ! अब नारदीयपुराण को सुनो । उसमें पचीस हजार श्लोक हैं; वह बृहत्कल्प की कथा से युक्त है । पूर्वार्ध के प्रथम पाद में सूत और शौनक का संवाद, सृष्टि का संक्षिप्त वर्णन तथा महात्मा सनक द्वारा अनेक धर्म कथायें कही गई हैं । मोक्षधर्म नामक द्वितीय पाद में सनंदन ने महात्मा नारद से मोक्ष का उपाय, वेदांगों तथा शुक की उत्पत्ति बताई है ॥१-३½॥ तृतीय पाद में मुनि सनत्कुमार ने नारद से महातंत्रोद्दिष्ट पशुपाशविमोक्षण, मंत्रों का संशोधन, दीक्षा, मंत्रोद्धार, पूजन, प्रयोग, कवच, सहस्रनाम, गणेश, सूर्य, विष्णु, शिव
सप्तनवतितमोऽध्यायः ८७५ सनत्कुमारमुनिना नारदाय तृतीयेके । पुराणलक्षणं चैव प्रमाणं दानमेव च ॥७॥ पृथक्पृथक् समुद्दिष्टं दानकालपुरःसरम् । चैत्रादिसर्वमासेषु तिथीनां च पृथक्पृथक् ॥८॥ प्रोक्तं प्रतिपदादीनां व्रतं सर्वाघनाशनम् । सनातनेन मुनिना नारदाय चतुर्थके ॥६॥ पूर्वभागोऽयमुदितो बृहदाख्यानसंज्ञितः । अस्योत्तरे विभागे तु प्रश्न एकादशीव्रते ॥१०॥ वसिष्ठेनाथ संवादो मांघातुः परिकीर्तितः । रुक्मांगदकथा पुण्या मोहिन्युत्पत्तिकर्म च ॥११॥ वसुशापश्च मोहिन्यै पश्चादुद्धरणक्रिया । गंगाकथा पुण्यतमा गयायात्रानुकीर्तनम् ॥१२॥ काश्या माहात्म्यमतुलं पुरुषोत्तमवर्णनम् । यात्राविधानं क्षेत्रस्य बह्वाख्यानसमन्वितम् ॥१३॥ प्रयागस्याथ माहात्म्यं कुरुक्षेत्रस्य तत्परम् । हरिद्वारस्य चाख्यानं कामोदाख्यानकं तथा ॥१४॥ बदरीतीर्थमाहात्म्यं कामाक्षायास्तथैव च । प्रभासस्य च माहात्म्यं पुष्कराख्यानकं ततः ॥१५॥ गौतमाख्यानकं पश्चाद्वेदपादस्तवस्ततः । गोकर्णक्षेत्रमाहात्म्यं लक्ष्मणाख्यानकं तथा ॥१६॥ सेतुमाहात्म्यकथनं नर्मदातीर्थवर्णनम् । अवन्त्याश्चैव माहात्म्यं मथुरायास्ततः परम् ॥१७॥ वृन्दावनस्य महिमा वसुर्ब्रह्मांतिके गतिः । मोहिनीचरितं पश्चादेवं वै नारदीय कम् ॥१८॥ यः शृणोति नरो भक्त्या श्रावयेद्वा समाहितः । स याति ब्रह्मणो धाम नात्र कार्या विचारणा ॥१९॥ यस्त्वेताविषुपूर्णायां धेनूनां सप्तकान्वितम् । प्रवद्याद्विद्वद्वर्याय स लभेन्मोक्षमेव च ॥२०॥ यश्चानुक्रमणीमेतां नारदीयस्य वर्णयेत् । शृणुयाद्वैकचित्तेन सोऽपि स्वर्गति लभेत् ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे नारदीयपुराणानुक्रमणी- कथनं नाम सप्तनवतितमोऽध्यायः ॥६७॥ तथा शक्ति के स्तोत्र बताये हैं । तृतीय पाद में सनत्कुमार मुनि ने नारद से पुराणों का लक्षण तथा प्रमाण, दान तथा दान-काल आदि को पृथक्-पृथक् बतलाया है । चैत्र आदि मासों में प्रतिपदा आदि तिथिक्रम से पृथक्-पृथक् व्रतनिरूपण किया है । सनातन मुनि ने चतुर्थपाद में नारद को यह बतलाया है । इतना पूर्वभाग है, जो बृहदाख्यान कहलाता है ॥४-९॥ पुराण के उत्तरार्ध में एकादशीव्रत संबन्धी प्रश्न, वसिष्ठ और मांधाता का संवाद, पवित्र रुक्मांगदकथा, मोहिनी की उत्पत्ति और कर्म, मोहिनी के प्रति पुरोहित वसु का शाप तथा उद्धारक्रिया, पुण्यतम गंगाकथा, गयायात्राकीर्तन, काशीमाहात्म्य, अतुलनीय पुरुषोत्तम-वर्णन, अनेक आख्यान युक्त पुरुषोत्तम क्षेत्र का यात्राविधान, प्रयाग, कुरुक्षेत्र, हरिद्वार, कामोदा, बदरीतीर्थ, कामाक्षा, प्रभास, पुष्कर तथा गौतमतीर्थ का माहात्म्य, वेदपादस्तुति, गोकर्णक्षेत्र माहात्म्य, लक्ष्मणाख्यान, सेतुमाहात्म्य, नर्मदातीर्थ-वर्णन, अवंती, मथुरा तथा वृन्दावन की महिमा, ब्रह्मा के निकट वसु का गमन और फिर मोहिनी का चरित्र चित्रण किया गया है । यही नारदीयपुराण है ॥१०-१८॥ जो मनुष्य समाहित होकर भक्तिपूर्वक इसको सुनता है अथवा सुनाता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं । जो व्यक्ति आश्विन की पूर्णिमा में सात धेनुओं के साथ यह पुराण उत्तम ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे मोक्ष प्राप्त होता है । जो नारदीयपुराण की इस अनुक्रमणी का वर्णन करेगा या तन्मनस्क होकर सुनेगा, उसे भी स्वर्ग की प्राप्ति होगी ॥१९-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में नारदीयपुराणानुक्रमणी कथन नामक सत्तानबेवां अध्याय समाप्त ॥९७॥
अष्टनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि मार्कण्डेयाभिधं मुने । पुराणं सुमहत्पुण्यं पठतां शृण्वतां सदा ॥१॥ यत्राधिकृत्य शकुनीन्सर्वधर्मनिरूपणम् । मार्कण्डेयपुराणं तन्नवसाहस्रमीरितम् ॥२॥ मार्कण्डेयमुनेः प्रश्नो जैमिनेः प्राक्समीरितः । पक्षिणां धर्मसंज्ञानां ततो जन्मनिरूपणम् ॥३॥ पूर्वजन्मकथा चैषां विक्रिया चादिवस्पतेः । तीर्थयात्रा बलस्याथ द्रौपदेयकथानकम् ॥४॥ हरिश्चन्द्रकथा पुण्या युद्धमाडीवकाभिधम् । पितापुत्रसमाख्यानं दत्तात्रेयकथा ततः ॥५॥ हैहयस्याथ चरितं महाख्यानसमन्वितम् । मदालसाकथा प्रोक्ता ह्यलर्कचरितान्विता ॥६॥ सृष्टिसंकीर्तनं पुण्यं नवधा परिकीर्तितम् । कल्पांतकालनिर्देशो यक्षसृष्टिनिरूपणम् ॥७॥ रुद्रादिसृष्टिरप्युक्ता द्वीपचर्यानुकीर्तनम् । मनूनां च कथा नाना कीर्तिताः पापहारिकाः ॥८॥ तासु दुर्गाकथार्यन्तं पुण्यदा चाष्टमेऽन्तरे । तत्पश्चात्प्रणवोत्पत्तिस्त्रयीतेजःसमुद्भवा ॥९॥ मार्तण्डस्य च जन्माख्या तन्माहात्म्यसमन्विता । वैवस्वतान्वयश्चापि वत्सप्रीश्चरितं ततः ॥१०॥ खनित्रस्य ततः प्रोक्ता कथा पुण्या महात्मनः । अविक्षिच्चरितं चैव किमिच्छव्रतकीर्तनम् ॥११॥
अध्याय ९८ मार्कण्डेयपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले—मुने ! अब मैं पढ़ने तथा सुनने वालों के लिये महापुण्यदायक मार्कण्डेयपुराण के संबन्ध में कहूँगा, जिसमें शकुनियों को अवलम्बन करके समस्त धर्मों का निरूपण किया गया है। मार्कण्डेयपुराण में नौ हजार श्लोक हैं। उसमें जैमिनि से मार्कण्डेयमुनि का प्रश्न, धर्मसंज्ञक पक्षियों का जन्म-निरूपण, पूर्वजन्मकथा, दिवस्पति की विक्रिया, बलभद्र की तीर्थयात्रा, द्रौपदेयकथानक, हरिश्चन्द्रकथा, आडी तथा बक का युद्ध, पिता-पुत्र का आख्यान, दत्तात्रेयकथा, हैहय-चरित्र का महाआख्यान, मदालसाकथा, अलर्कचरित, नवधा सृष्टिकीर्तन, कल्पांतकाल निर्देश, यक्षसृष्टिनिरूपण, रुद्रादिसृष्टि, द्वीपचर्या, मनुओं की अनेक पापहरिणी कथायें, उनमें अष्टम मन्वन्तर में अत्यन्त पुण्यप्रद दुर्गा की कथा, प्रणवोत्पत्ति, त्रयोतेज का उद्भव, मार्तंड का जन्म तथा माहात्म्य, वैवस्वतवंश वर्णन, वत्सप्री का चरित्र, महात्मा खनित्र की पवित्र कथा, अविक्षित् का चरित्र, किमिच्छव्रतकीर्तन, नरिष्यंतचरित, इक्ष्वाकुचरित, नलचरित, रामचंद्र की सत्कथा, कुशवंशाख्यान, सोमवंश का कीर्तन, पुरूरवा तथा नहुष की अद्भुत कथा, ययातिचरित्र, पवित्र-यदुवंशकीर्तन, श्रीकृष्णबालचरित्र, मथुरा का चरित्र, द्वारकाचरित, सकल अवतारों की
नरिष्यंतस्य चरितं इक्ष्वाकुचरितं ततः । नलस्य चरितं पश्चाद्रामचन्द्रस्य सत्कथा ॥१२॥ कुशवंशसमाख्यानं सोमवंशानुकीर्तनम् । पुरुरवःकथा पुण्या नहुषस्य कथाद्भुता ॥१३॥ ययातिचरितं पुण्यं यदुवंशानुकीर्तनम् । श्रीकृष्णबालचरितं माथुरं चरितं ततः ॥१४॥ द्वारकाचरितं चाथ कथा सर्वावताराजा । ततः सांख्यसमुद्देशः प्रपञ्चासत्त्वकीर्तनम् ॥१५॥ मार्कण्डेयस्य चरितं पुराणश्रवणे फलम् । यः शृणोति नरो भक्त्या पुराणमिदमादरात् ॥१६॥ मार्कण्डेयाभिधं वत्स स लभेत्परमां गतिम् । यस्तु व्याकुरुते चैतच्छैवं स लभते पदम् ॥१७॥ तत्तच्छ्लोल्लिखित्वा यः सौवर्णकरिसंयुतम् । कार्तिकां द्विजवर्याय स लभेद्ब्रह्मणः पदम् ॥१८॥ शृणोति श्रावयेद्वापि यश्चानुक्रमणीमिमाम् । मार्कण्डेयपुराणस्य स लभेद्वान्छितं फलम् ॥१९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥९८॥
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नवनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मोवाच अथातः संप्रवक्ष्यामि त्वाग्नेयपुराणकम् । ईशानकल्पवृत्तांतं वसिष्ठायानलोऽब्रवीत् ॥१॥ तत्पंचदशसाहस्रं नानाचरितमद्भुतम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं नृणाम् ॥२॥
कथा, सांख्यशास्त्र का उद्देश, प्रपंचसत्त्वकीर्तन, मार्कण्डेयचरित्र तथा पुराणश्रवण का फल बताया गया है। वत्स ! जो मानव भक्ति एवम् आदर से मार्कण्डेयपुराण का श्रवण करता है, उसे परम गति की प्राप्ति होती है। जो इसका पाठ करता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो इसे लिखकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के दिन उत्तम ब्राह्मण को स्वर्णगजसहित इसे समर्पित करता है, वह ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। मार्कण्डेयपुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनता है या सुनाता है, उसे वांछित फल की प्राप्ति होती है ॥१-१९॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक अठानबेवां अध्याय समाप्त ॥९८॥
अध्याय ९९
अग्निपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले--अब इसके बाद मैं तुम्हें अग्निपुराण सुनाऊंगा । अग्नि ने वसिष्ठ से ईशानकल्प का वृत्तान्त सुनाया था। यह पुराण अनेक अद्भुत चरित्रों से युक्त तथा पन्द्रह सहस्र श्लोकों में विभक्त है।
८७८ नारदीयपुराणम् प्रश्नः पूर्वं पुराणस्य कथा सर्वावतारजा । सृष्टिप्रकरणं चाथ विष्णुपूजादिकं ततः ॥३॥ अग्निकार्यं ततः पश्चान्मन्त्रमुद्रादिलक्षणम् । सर्वदीक्षाविधानं च अभिषेकनिरूपणम् ॥४॥ लक्षणं मंडलादीनां कुशामार्जनं ततः । पवित्रारोपणविधिर्देवालयविधिस्ततः ॥५॥ शालग्रामादिपूजा च मूर्तिलक्षण पृथक्पृथक् । न्यासादीनां विधानं च प्रतिष्ठापूर्वकं ततः ॥६॥ विनायकादिपूजा च नानादीक्षाविधिः परम् । प्रतिष्ठा सर्वदेवानां ब्रह्मांडस्य निरूपणम् ॥७॥ गंगादितीर्थमाहात्म्यं द्वीपवर्षानुवर्णनम् । ऊर्ध्वाधोलोकरचना ज्योतिश्चक्रनिरूपणम् ॥८॥ ज्योतिषं च ततः प्रोक्तं शास्त्रं युद्धजयार्णवम् । षट्कर्म च ततः प्रोक्तं मंत्रमंत्रौषधीगणः ॥९॥ कुब्जिकादिसमर्चत्वं षोढा न्यासविस्तरयाः । कोटिहोमविधानं च मन्वंतरनिरूपणम् ॥१०॥ ब्रह्मचर्यादिधर्मांश्च श्राद्धकल्पविधिस्ततः । ग्रहयज्ञस्ततः प्रोक्तो वैदिकस्मार्तकर्म च ॥११॥ प्रायश्चित्तानुकथनं तिथीनां च व्रतादिकम् । वारव्रतानुकथनं नक्षत्रव्रतकीर्तनम् ॥१२॥ मासिकव्रतनिर्देशो दीपदानविधिस्तथा । नवव्यूहार्चनं प्रोक्तं नरकाणां निरूपणम् ॥१३॥ व्रतानां चापि दानानां निरूपणमिहोदितम् । नाडीचक्रसमुद्देशः संध्याविधिरनुत्तमः ॥१४॥ गायत्र्यर्थस्य निर्देशो लिंगस्तोत्रं ततः परम् । राज्याभिषेकमन्त्रोक्तिर्द्धर्मकृत्यं च भूभुजाम् ॥१५॥ स्वप्नाध्यायस्ततः प्रोक्तः शकुनादिनिरूपणम् । मंडलादिकनिर्देशो रणदीक्षाविधिस्ततः ॥१६॥ रामोक्तनीतिनिर्देशो रत्नानां लक्षणं ततः । धनुर्विद्या ततः प्रोक्ता व्यवहारप्रदर्शनम् ॥१७॥ देवासुरविमर्दाख्या ह्यायुर्वेद निरूपणम् । गजादीनां चिकित्सा च तेषां शांतिस्ततः परम् ॥१८॥ गोनरादिचिकित्सा च नानापूजास्ततः परम् । शांतयश्चापि विविधाश्छन्दः शास्त्रमतः परम् ॥१९॥ साहित्यं च ततः पश्चादेकार्णादिसमाह्वयाः । सिद्धशब्दानुशिष्टिश्च कोशः स्वर्गादिवर्गकः ॥२०॥ प्रलयानां लक्षणं च शारीरकनिरूपणम् । वर्णनं नरकानां च योगशास्त्रमतः परम् ॥२१॥ इसके पढ़ने-सुनने वाले मनुष्यों के सकल पाप दूर हो जाते हैं। इसमें पहले पुराण संवन्धी प्रश्न किया गया है। पश्चात् समस्त अवतारों की कथा, सृष्टिप्रकरण, विष्णु पूजन, अग्निकार्य, मन्त्र तथा मुद्रा आदि का लक्षण, अखिल दिशाओं का विधान, अभिषेक निरूपण, मंडल आदि का लक्षण, कुशा का मार्जन, पवित्रारोपणविधि देवालयविधि, शालग्रामादि पूजा, पृथक्-पृथक् मूर्तिचिह्न न्यासादि का विधान, प्रतिष्ठापूर्वक, विनायक आदि की पूजा, अनेक दीक्षा विधि, समस्त देवों की प्रतिष्ठा, ब्रह्मांड का निरूपण, गंगादि-तीर्थ-माहात्म्य, द्वीपों तथा वर्षों का वर्णन, ऊर्ध्व तथा अधोलोक की रचना, ज्योतिश्चक्र निरूपण ॥१-८॥ ज्योतिष, मंत्र और यन्त्रौषधिसमूह, षट्कर्म, युद्धजयशास्त्र, कुब्जा आदि की समर्चा, छः प्रकार की न्यासविधि, कोटिहोम विधान, मन्वन्तर निरूपण ब्रह्मचर्य आदि धर्म, श्राद्ध-कल्पविधि, ग्रहयज्ञ, वैदिक तथा स्मार्तं कर्म, प्रायश्चित्त कथन, तिथि अनुसार व्रतादि, दिनव्रतानुकथन, नक्षत्रव्रतकीर्तन, मासिकव्रत निर्देश, दीपदानविधि, नवव्यूहार्चन, नरकों का निरूपण, नाडीचक्र- समुद्देश, संध्याविधि, गायत्री के अर्थ का निर्देश, लिगस्तोत्र, राज्याभिषेकमन्त्र, राजाओं का धर्मकार्य, स्वप्ना- ध्याय, शकुनादि निरूपण, मंडलादिक निर्देश, रणदीक्षाविधि, रामोक्तनीति निर्देश, रत्नों का लक्षण, धनु- विद्या और व्यवहार प्रदर्शन, देवासुर विमर्दाख्यान, आयुर्वेदनिरूपण, गजादि चिकित्सा, उनकी शान्ति ॥९-१८॥ गो, नर आदि की चिकित्सा, अनेक प्रकार की पूजा, विविध शान्ति, छंदःशास्त्र, साहित्य, एकार्णादि समाह्वय- सिद्ध-शब्दानुशिष्ट स्वर्गादिवर्गविशिष्टकोष, प्रलयों का लक्षण, शारीरक निरूपण, नरकवर्णन, योगशास्त्र,
शततमोऽध्यायः ८७६ ब्रह्मज्ञानं ततः पश्चात्पुराणश्रवणे फलम् । एतदाग्नेयकं विप्र पुराणं परिकीर्तितम् ॥२२॥ तल्लिखित्वा तु यो दद्यात्सुवर्णकमलान्वितम् । तिलधेनुयुतं चापि मार्गशीर्ष्यां विधानतः ॥२३॥ पुराणार्थविदे सोऽथ स्वर्गलोके महीयते । एषानुक्रमणी प्रोक्ता तवाग्नेयस्य मुषितवा ॥२४॥ शृण्वतां पठतां चैव नृणां चेह परत्र च ॥२५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपावेऽग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपणं नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥६६॥
शततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि पुराणं सर्वसिद्धिदम् । भविष्यं भवतः सर्वलोकाभीष्टप्रदायकम् ॥१॥ यत्राहं सर्वदेवानामादिकर्ता समुद्गतः । सृष्ट्यर्थं तत्र संजातो मनु स्वायंभुवः पुरा ॥२॥ स मां प्रणम्य पप्रच्छ धर्मं सर्वार्थसाधकम् । अहं तस्मै तदा प्रीतः प्रावोचं धर्मसंहिताम् ॥३॥ पुराणानां यदा व्यासो व्यासं चक्रे महामतिः । तदा तां संहितां सर्वां पंचधा व्यभजन्मुनिः ॥४॥
ब्रह्मज्ञान, और पुराणश्रवण का फल बतलाया गया है । विप्र ! यह आग्नेय पुराण का वर्णन हुआ । जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर अग्रहण की पूर्णिमा में विधिपूर्वक सुवर्ण कमलं तथा तिलधेनु सहित यह पुराण पौराणिक द्विज को समर्पित करता है, वह स्वर्ग में पूजित होता है । आग्नेय पुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनेगा तथा पढ़ेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी ॥१९-२५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में अग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक निन्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥६६॥
अध्याय १०० भविष्यपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले— अब मैं सर्वसिद्धिदायक तथा अखिलकामनापूरक भविष्यपुराण के संबन्ध में कहूँगा । उस पुराण में मैं सब देवों का आदिकर्ता माना गया हूँ । पहले सृष्टिकार्य के लिये स्वायंभुव मनु का प्रादुर्भाव हुआ । उसने मुझे प्रणाम कर समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले धर्म के विषय में प्रश्न किया । तब मैं प्रीतिपूर्वक धर्मसंहिता को सुनाने लगा । जब महामति व्यास को पुराणों के व्यष्टीकरण करने की इच्छा हुई तब
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८८० | नारदीयपुराणम् अघोरकल्पवृत्तांतं नानावर्यकथान्वितम् । तत्रादिमं स्मृतं पर्व ब्राह्मं यत्रास्त्युपक्रमः ॥५५॥ सूतशौनकसंवादे पुराणप्रश्नसंक्रमः । आदित्यचरितप्रायः सर्वाख्यानसमन्वितः ॥५६॥ सृष्ट्यादिलक्षणोपेतः शास्त्रसर्वस्वरूपकः । पुस्तलेखकलेखानां लक्षणं च ततः परम् ॥५७॥ संस्काराणां च सर्वेषां लक्षणं चात्र कीर्तितम् । पक्षस्यादितिथीनां च कल्पाः सप्त च कीर्तिताः ॥५८॥ अष्टम्याद्याः शेषकल्पा वैष्णवे पर्वणि स्मृताः । शैवे च कामतो भिन्नाः सौरे चांत्यकथान्वयः ॥५६॥ प्रतिसर्गाद्वयं पश्चान्नानाख्यानसमन्वितम् । पुराणस्योपसंहारसंहितं पर्व पंचमम् ॥६०॥ एषु पंचसु पूर्वेस्मिन् ब्रह्मणो महिमाधिकाः । धर्मे कामे च मोक्षे तु विष्णोश्चापि शिवस्य च ॥६१॥ द्वितीये च तृतीये च सौरे वर्गचतुष्टये । प्रतिसर्गाद्वयं त्वंत्यं प्रोक्तं सर्वकथान्वितम् ॥६२॥ सप्तविष्यं विनिर्दिष्टं पर्वव्यासेन धीमता । चतुर्दशसहस्रं तु पुराणं परिकीर्तितम् ॥६३॥ भविष्यं सर्वदेवानां साम्यं यत्र प्रकीर्तितम् । गुणानां तारतम्येन समं ब्रह्म ति हि श्रुतिः ॥६४॥ तं लिखित्वा तु यो दद्यात्पौष्यां विद्वान्विमत्सरः । गुडधेनुयुतं हेमवस्त्रमाल्याविभूषणैः ॥६५॥ वाचकं पुस्तकं चापि पूजयित्वा विधानतः । गंधाद्यैर्भोज्यभक्ष्यैश्च कृत्वा नीराजनादिकम् ॥६६॥ यो वै जितेंद्रियो भूत्वा सोपवासः समाहितः । अथ वैकहविष्यासी कीर्तयेच्छृणुयादपि ॥६७॥ स मुक्तः पातकैर्घोरैः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । योऽप्यनुक्रमणीमेतां भविष्यस्य निरूपिताम् ॥६८॥ पठेद्वा शृणुयाच्चैतां भुक्तिं मुक्तिं च विदति ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे भविष्यपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम शततमोऽध्यायः ॥१००॥
तब मुनिने संपूर्ण संहिता को, पाँच भागों में विभक्त कर दिया। उसमें अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त अघोर कल्प का वृत्तान्त है। उसका पहिला पर्व ब्राह्म है, जिसमें उसका उपक्रम है ॥५५॥ उसी पर्व में सूत और शौनक के संवाद में पुराणप्रश्न, सर्वाख्यानयुक्त आदित्यचरित्र, सृष्टि आदि के लक्षणों से युक्त सकलशास्त्र स्वरूप, पुस्तक लेखक और लेख्य का लक्षण, समस्त संस्कारों का लक्षण और प्रतिपदादि तिथियों के सात कल्प वर्णित हुए हैं। वैष्णवपर्व में अष्टमी आदि अवशिष्ट कल्पों का वर्णन है। शैव पर्व में कामानुसार विभिन्नता सौर पर्व में अन्त्यकथा और प्रतिसर्ग पर्व में अनेक आख्यान तथा पुराण का उपसंहार बतलाया गया है। इस तरह पाँच पर्व होते हैं। प्रथम पर्व में ब्रह्मा का महिमा, द्वितीय में विष्णु एवम् धर्म, काम और मोक्ष को तृतीय में शिव की, चतुर्थ में सूर्य की और पांचवे में समस्त कथायें बताई गई है। धीमान् व्यास ने पर्वों में विभक्त करके भविष्यपुराण की रचना की है। इस पुराण में चौदह हजार श्लोक हैं ॥५६-६३॥ इसमें सकल देवों की कथा समभाव से कही गई है। श्रुति भी 'गुणों के तारतम्य से ब्रह्म सम है' ऐसा कहती है। जो विद्वान् इस पुराण को लिखकर पौषी पूर्णिमा के दिन गुडधेनु, सुवर्ण, वस्त्र, माला, सुगंधित द्रव्य, भोज्य तथा भक्ष्य पदार्थों से विधिपूर्वक ब्राह्मण एवम् पुस्तक की पूजा कर इसे समर्पित करता है, वह घोर पातकों से विमुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जो इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास या हविष्यभोजन करते हुए सावधानी से इसका श्रवण तथा कीर्तन करता है, उसे भी पूर्वकथित फल की प्राप्ति होती है। जो भविष्यपुराण की इस अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, वह भोग-मोक्ष लाभ करेगा ॥६४-१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में भविष्यपुराणानुक्रमणिनिरूपण नामक सौवां अध्याय समाप्त ॥१००॥
एकाधिकशततमोऽध्यायः श्री ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं दशमं तव । ब्रह्मवैवर्तकं नाम वेदमार्गानुदर्शकम् ॥१॥ सावर्णिर्यत्र भगवान्साक्षाद्देवर्षये स्थितः । नारदाय पुराणार्थं प्राह सर्वमलौकिकम् ॥२॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां सारः प्रीतिर्हरौ हरे । तयोरभेदसिद्धयर्थं ब्रह्मवैवर्तमुत्तमम् ॥३॥ रथंतरस्य कल्पस्य वृत्तांतं यन्मयोदितम् । शतकोटिपुराणे तत्संक्षिप्य प्राह वेदवित् ॥४॥ व्यासश्चतुर्द्धा संव्यस्य ब्रह्मवैवर्तसंज्ञिते । अष्टादशसहस्रं तत्पुराणं परिकीर्तितम् ॥५॥ ब्रह्मप्रकृतिविघ्नेशकृष्णखंडसमन्वितम् । तत्र सूतर्षिसंवादे पुराणोपक्रमस्ततः ॥६॥ सृष्टेःप्रकरणं त्वाद्यं ततो नारदवेधसोः । विवादः सुमहानेत्र द्वयोरासीत्पराभवः ॥७॥ शिवलोकगतिः पश्चाज्ज्ञानलाभः शिवात्तने । शिववाक्येन तत्पश्चान्मरीचेर्नारदस्य तु ॥८॥ गमनं चैव सावर्णेनार्थं सिद्धसेविते । आश्रमे सुमहापुण्ये त्रैलोक्याश्चर्यकारिणी ॥६॥ एतद्धि ब्रह्मखंडं हि श्रुतं पापविनाशनम् । ततः सावर्णि संवादो नारदस्य समीरितः ॥१०॥ कृष्णमाहात्म्यसंयुक्तो नानाख्यानकथोत्तरम् । प्रकृतेरंशभूतानां कलानां चापि वर्णितम् ॥११॥
अध्याय १०१ ब्रह्मवैवर्तपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं ब्रह्मवैवर्तक नामक वेदमार्गानुदर्शक दशम पुराण को तुमसे कहता हूँ, जिसमें साक्षात् भगवान् सावर्णि ने देवर्षि नारद से पुराण के अलौकिक अर्थ को बताया है हरि तथा हर में प्रेम करना । धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का सार है। उन दोनों में अभेदसिद्धि करने के लिये उत्तम ब्रह्मवैवर्तपुराण का निर्माण हुआ है । मैंने रथंतर कल्प का जो वृत्तान्त कहा था, उसे वेदवेत्ता व्यास ने सौ करोड़ श्लोक वाले पुराण में संक्षेप से वर्णित किया है । व्यास ने अठारह हजार श्लोकों में ब्रह्मवैवर्त का निर्माण करके ब्रह्मप्रकृति, गणेश तथा कृष्णखंड नामक चार भागों में इसे विभक्त कर दिया । सूत और शौनक के संवाद में पुराण का उप- क्रम है । आदि में सृष्टि प्रकरण है। तत्पश्चात् नारद और ब्रह्मा का महान् विवाद, दोनों का पराभव, शिवलोक में गति, शिव से ज्ञानलाभ और शिव के वाक्य से ज्ञान लाभ के लिये सिद्धों से सुसेवित, महापुण्य- दायक एवम् तीनों लोक को आश्चर्यित करने वाले सावर्णि के आश्रम में मरीचि तथा नारद का गमन बताया गया है। यही ब्रह्म खण्ड है, जिसे सुनने से सकल पापों का नाश होता है ॥१-९॥ प्रकृतिखंड में सावर्णि तथा नारद का संवाद, कृष्ण का माहात्म्य, अनेक आख्यानक, प्रकृति के अंश भूत कलासमूह का माहात्म्य और पूजन आदि का विस्तृत रूप से वर्णन हुआ है। इस खंड के श्रवण करने से ऐश्वर्य १११ ना० पु०
६८२ नारदीयपुराणम् माहात्म्यं पूजनाद्यं च विस्तरेण यथास्थितम् । एतत्प्रकृतिखंडं हि श्रुतं श्रुतिविधायकम् ॥१२॥ गणेशजन्म संप्रश्नः सपुण्यकमहाव्रतम् । पार्वत्याः कार्तिकेयेन सह विघ्नेशसंभवम् ॥१३॥ चरितं कार्तवीर्यस्य जामदग्न्यस्य चाद्भुतम् । विवादः सुमहानासीज्जामदग्न्यगणेशयोः ॥१४॥ एतद्विघ्नेशखंडं हि सर्वविघ्नविनाशनम् । श्रीकृष्णजन्मसंश्प्रश्नो जन्माख्यानं ततोऽद्भुतम् ॥१५॥ गोकुले गमनं पश्चात्पूतनादिवधाद्भुताः । बाल्यकौमारजा लीला विविधास्तत्र वर्णिताः ॥१६॥ रासक्रीडा च गोपीभिः शारदी समुदाहृता । रहस्ये राधया क्रीडा वर्णिता बहुविस्तरा ॥१७॥ सहाक्रूरेण तत्पश्चान्मथुरागमनं हरेः । कंसादीनां वधे वृत्ते कृष्णस्य द्विजसंस्कृतिः ॥१८॥ काश्यसांदिपनेः पश्चाद्विद्योपादानमद्भुतम् । यवनस्य वधः पश्चाद्द्वारका गमनं हरेः ॥१९॥ नरकादिवधस्तत्र कृष्णेन विहितोऽद्भुतः । कृष्णखंडमिदं विप्र नृणां संसारखंडनम् ॥२०॥ पठितं च श्रुतं ध्यातं पूजितं चाभिवंदितम् । इत्येतद्ब्रह्मवैवर्तपुराणं चात्यलौकिकम् ॥२१॥ व्यासोक्तं चादि संभूतं पठञ्शृण्वन्विमुच्यते । विज्ञानाज्ञानशमनाद्धोरात्संसारसागरात् ॥२२॥ लिखित्त्वेदं च यो दद्यान्माध्यां धेनुसमन्वितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति स मुक्तोऽज्ञानबंधनात् ॥२३॥ यश्चानुक्रमणीं चापि पठेद्वा शृणुयादपि । सोऽपि कृष्णप्रसादेन लभते वांछितं फलम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने ब्रह्मवैवर्तपुराणानुक्रमणी निरूपणं नामैकोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०१॥ नाभ होता है। गणेशखंड में विघ्नेश जन्म का प्रश्न, पार्वती का पुण्यकव्रत, कार्तिकेय और विनायक की उत्पत्ति, कार्तवीर्य और जामदग्न्य का अद्भुत चरित्र, गणेश और जामदग्न्य का घोर विवाद बताया गया है। यह खण्ड समस्त विघ्नों का नाश करने वाला है ॥१०-१४३॥ कृष्ण खंड में श्रीकृष्ण के जन्म विषयक प्रश्न, अद्भुत जन्माख्यान, गोकुल में गमन, पूतनादिवध, बाल्या- वस्था तथा कौमार अवस्था में की गई अनेक लीलायें गोपियों के संग श्रीकृष्ण की शारदी रासक्रीड़ा, निर्जन में राधा के साथ क्रीडा, फिर अक्रूर के साथ हरि का मथुरागमन, कंस आदि का वध, कृष्ण का द्विजसंस्कार, काशी में सांदीपनि से विद्याग्रहण, यवन का वध, हरि का द्वारिकागमन, वहाँ कृष्ण द्वारा नरकासुर आदि का आश्चर्यजनक वध वर्णित हुआ है। विप्र ! कृष्णखंड के श्रवण करने से मनुष्यों का भवबन्धन कट जाता है। यह ब्रह्मवैवर्तपुराण अत्यन्त विलक्षण है ॥१५-२१॥ इसके पाठ, श्रवण, पूजन, ध्यान तथा अभिवन्दना करने से मनुष्य को मोक्ष की प्राप्ति होतो है। यह संसार-सागर से उद्धार करने वाला, अज्ञान का नाश करने वाला और विज्ञान का प्रकाश देने वाला है। जो इसे लिखकर माघी पूर्णिमा के दिन धेनु सहित प्रदान करता है, वह अज्ञान बन्धन से मुक्त होकर ब्रह्मलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को सुनेगा या पढ़ेगा, वह भी कृष्ण की कृपा से वांछित फल को को प्राप्त करेगा ॥२२-२४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थ पाद में ब्रह्मवैवर्तपुराण का अनुक्रमणी-वर्णन नामक एक सौ एक अध्याय समाप्त ॥१०१॥
द्वयधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं लिङ्गसंज्ञितम् । पठतां शृण्वतां चैव भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् ॥१॥ यच्च लिङ्गाभिधं तिष्ठन्वह्निलिङ्गे हरोऽभ्यधात् । मह्यं धर्मादिसिद्ध्यर्थमग्निकल्पकथाश्रयम् ॥२॥ तदेव व्यासदेवेन भागद्वयसमन्वितम् । पुराणं लिङ्गमुदितं बह्वाख्यानविचित्रितम् ॥३॥ तदेकादशसाहस्रं हरमाहात्म्यसूचकम् । परं सर्वपुराणानां सारभूतं जगत्त्रये ॥४॥ पुराणोपक्रमे प्रश्नः सृष्टिः संक्षेपतः पुरा । योगाख्यानं ततः प्रोक्तं कल्पाख्यानं ततः परम् ॥५॥ लिङ्गोद्भवस्तदर्चा च कीर्तिता हि ततः परम् । सनत्कुमारशैलादिसंवादश्चाथ पावनः ॥६॥ ततो दधीचचरितं युगधर्मनिरूपणम् । ततो भुवनकोशाख्या सूर्यसोमान्वयस्ततः ॥७॥ ततश्च विस्तरात्सर्गस्त्रिपुराख्यानकं तथा । लिङ्गप्रतिष्ठा च ततः पशुपार्शविमोक्षणम् ॥८॥ शिवव्रतानि च तथा सदाचारनिरूपणम् । प्रायश्चित्तान्यरिष्टानि काशीश्रीशैलवर्णनम् ॥९॥ अंधकाख्यानकं पश्चाद्वाराहचरितं पुनः । नृसिंहचरितं पश्चाज्जलंघरवधस्ततः ॥१०॥ शैवं सहस्रनामाथ दक्षयज्ञविनाशनम् । कामस्य वहनं पश्चाद्गिरिजायाः करग्रहः ॥११॥ ततो विनायकाख्यानं नृपाख्यानं शिवस्य च । उपमन्युकथा चापि पूर्वभाग इतीरितः ॥१२॥ अध्याय १०२ लिंगपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले- पुत्र ! सुनो, अब मैं लिंगपुराण को बतलाऊँगा, जिसके श्रवण एवम् पाठ करने से भोग- मोक्ष की प्राप्ति होती है । वह्निलिंग में रहते हुए भगवान् हर ने धर्म आदि की सिद्धि के लिये मुझसे जो अग्नि- कल्पकथा-संबन्धी लिंगपुराण को कहा था, उसी को व्यासदेव ने दो भागों में विभक्त किया । वह पुराण अनेक आख्यानों से युक्त है । उसमें ग्यारह हजार श्लोकों में शिव का माहात्म्य वर्णित हुआ है । तीनों लोक में वह सब पुराणों का सारभूत है ॥१-४॥ उसमें प्रथमतः पुराणोपक्रम संबन्धी प्रश्न और संक्षेप से सृष्टिवर्णन है । उसके पूर्व भाग में योगाख्यान, कल्पाख्यान, लिंगोत्पत्ति, उसकी अर्चना, सनत्कुमार और शैलादि का पवित्रसंवाद, दधीचि- चरित, युगधर्मनिरूपण, भुवनकोशाख्यान, सूर्य और सोमवंश, विस्तृत रूप से सृष्टि, त्रिपुराख्यान, लिंगप्रतिष्ठा, पशुपाशविमोक्षण, शिवव्रत, सदाचारनिरूपण, प्रायश्चित्त, अरिष्ट, काशी तथा श्रीशैलवर्णन, अंधकाख्यान, वाराहचरित, नृसिंहचरित, जलंधरवध, शिवसहस्रनाम, दक्षयज्ञविनाशन, कामदहन, पार्वतीविवाह, गणेशारूयान, नृपाख्यान, शिवोपाख्यान तथा उपमन्यु की कथा वर्णित है ॥५-१२॥
८८४ नारदीयपुराणम् विष्णुमाहात्म्यकथन मंबरीषकथा ततः । सनत्कुमारनंदीशसंवादश्च पुनर्मुने ॥१३॥ शिवमाहात्म्यसंयुक्तः स्ना नयागादिकं ततः । सूर्यपूजाविधिश्चैव शिवपूजा च मुक्तिदा ॥१४॥ दानानि बहुधोक्तानि श्राद्धप्रकरणं ततः । प्रतिष्ठातंत्रमुदितं ततोऽघोरस्य कीर्तनम् ॥१५॥ वज्रेश्वरी महाविद्या गायत्रीमहिमा ततः । त्र्यंबकस्य च माहात्म्यं पुराणश्रवणस्य च ॥१६॥ एवं चोपरि भागस्ते लैङ्गस्य कथितो मया । व्यासेन हि विलक्ष्य रुद्रमाहात्म्यसूचितः ॥१७॥ लिखित्वाैतत्पुराणं तु तिलधेनुसमन्वितम् । फाल्गुन्यां पूर्णिमायां यो दद्याद्भक्त्या द्विजातये ॥१८॥ स लभेच्छिवसायुज्यं जरामरणवर्जितम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्व पापापहं नरः ॥१९॥ स भुक्तभोगो लोकेऽस्मिन्नंते शिवपुरं व्रजेत् । लिङ्गानुक्रमणीमेतां पठेद्यः शृणुयात्तथा ॥२०॥ तावुभौ शिवभक्तौ तु लोकद्वितयभोगिनौ । जायेतां गिरिजापर्तः प्रसादान्नात्र संशयः ॥२१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे लिङ्गपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम द्व्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०२॥ मुने ! इसके उत्तर भाग में विष्णुमाहात्म्य, अंबरीषकथा, सनत्कुमार और नंदीश, संवाद, शिवमाहात्म्य- संयुक्त स्नान, याग आदि, सूर्यपूजाविधि, मुक्तिदायिनी शिवपूजा, विविधदान, श्राद्धप्रकरण, तंत्रोक्त प्रतिष्ठा, अघोर- कीर्तन, वज्रेश्वरी, महाविद्या, तथा गायत्री की महिमा, त्र्यंबक तथा पुराणश्रवण का माहात्म्य बताया गया है। इस प्रकार व्यास द्वारा रचित लिंगपुराण के उत्तर भाग का वर्णन हुआ, जिसमें रुद्र का माहात्म्य कहा गया है। जो व्यक्ति लिंगपुराण को लिखकर फाल्गुन की पूर्णिमा में द्विजाति को भक्तिपूर्वक तिलधेनु सहित उक्त पुराण समर्पित करता है, उसे जन्म-मरण रहित शिवसायुज्यमोक्ष की प्राप्ति होती है। जो नर पापहारी लिंग- पुराण का श्रवण या पाठ करता है, वह इस लोक में समस्त भोगों को भोगता हुआ अंत में शिवलोक को जाता है। जो इस अनुक्रमणी को पढ़ता है तथा जो इसे सुनता है, वे दोनों गिरिजापति की कृपा से उभयलोकों में सुखभोग करते हैं, इसमें संशय नहीं ॥१३-२१॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में लिंगपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ दूसरा अध्याय समाप्त ॥१०२॥
त्र्यधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि वाराहं वै पुराणकम् । भागद्वययुतं शश्वद्विष्णुमाहात्म्यसूचकम् ॥१॥ मानवस्य तु कल्पस्य प्रसंगं मत्कृतं पुरा । निबबंध पुराणेऽस्मिंश्चतुर्विंशसहस्रके ॥२॥ व्यासो हि विदुषां श्रेष्ठः साक्षान्नारायणो भुवि । तत्रादौ शुभसंवादः स्मृतो भूमिवराहयोः ॥३॥ अथादिकृतवृत्तांते रंभस्य चरितं ततः । दुर्जयस्य च तत्पश्चाच्छाद्धकल्प उदीरितः ॥४॥ महातपस आख्यानं गौर्युत्पत्तिस्ततः परा । विनायकस्य नागानां सेनान्यादित्ययोरपि ॥५॥ गणानां च तथा देव्या धनदस्य वृषस्य च । आख्यानं सत्यतपसो व्रताख्यानसमन्वितम् ॥६॥ अगस्त्यगीता तत्पश्चाद्रुद्रगीता प्रकीर्तिता । महिषासुरविध्वंसमाहात्म्यं च त्रिशक्तिजम् ॥७॥ पर्वाऽध्याग्रस्ततः श्वेतोपाख्यानं गोप्रदानिकम् । इत्यादिकृतवृत्तांतं प्रथमे दर्शितं मया ॥८॥ भगवद्धर्मके पश्चाद्व्रततीर्थकथानकम् । द्वात्रिंशदपराधानां प्रायश्चित्तं शरीरगम् ॥६॥ तीर्थानां चापि सर्वेषां माहात्म्यं पृथगीरितम् । मथुराया विशेषेण श्राद्धादीनां विधितस्ततः ॥१०॥ वर्णनं यमलोकस्य ऋषिपूत्रप्रसंगतः । विपाकः कर्मणां चैव विष्णुव्रतनिरूपणम् ॥११॥ गोकर्णस्य च माहात्म्यं कीर्तितं पापनाशनम् । इत्येवं पूर्वभागोऽयं पुराणस्य निरूपितः ॥१२॥
अध्याय १०३ वाराहपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले-वत्स ! सुनो, सनातन विष्णु के माहात्म्य को बताने वाले तथा दो भागों से युक्त वाराह पुराण के संबन्ध में कहूँगा । पूर्व में मानवकल्प का जो कुछ प्रसंग मैंने वर्णन किया है, उसे इस चौबीस सहस्र श्लोकों से परिपूर्ण पुराण में व्यास ने निबद्ध कर दिया है । व्यास विद्वानों में सबसे श्रेष्ठ हैं, पृथ्वी पर साक्षात् नारायण ही इन्हें समझना चाहिये । इस पुराण के प्रारम्भ में भूमि ओर वराह का शुभ संवाद हुआ है, तदनन्तर आदि वृत्तान्त में रंभ-चरित, श्राद्धकल्प, महातपा का आख्यान, गौरी की उत्पत्ति, विनायक, नाग, कार्तिकेय तथा आदित्य के गणों का उपाख्यान, देवी, कुबेर, और वृष का आख्यान, सत्यतपा का व्रत, अगस्त्य- गीता, रुद्रगीता, शक्तित्रय द्वारा महिषासुर विध्वंस माहात्म्य, पर्वाध्याय, श्वेतोपाख्यान, गोप्रदान आदि विषयों का वर्णन है। पुनः भगवद्धर्म में व्रततीर्थकथा, बत्तीस अपराधों का शारीरिक प्रायश्चित्त, सकल तीर्थों का पृथक्-पृथक् माहात्म्य, मथुरा में विशेष रूप से श्राद्ध आदि की विधि, ऋषिपूत्र प्रसंग में यमलोक वर्णन, कर्म- विपाक, विष्णुव्रत निरूपण, पापनाशन गोकर्ण माहात्म्य—इतने विषय पूर्वभाग में निरूपित हुए हैं ॥१-१२॥
८८६ नारदीयपुराणम् उत्तरे प्रविभागे तु पुलस्त्यकुरुराजयोः । संवादे सर्वतीर्थानां माहात्म्यं विस्तरात्पृथक् ॥१३॥ अशेषधर्माश्चाख्याताः पौष्करं पुण्यपर्व च । इत्येवं तव वाराहं प्रोक्तं पापविनाशनम् ॥१४॥ पठतां शृण्वतां चैव भगवद्भक्तिवर्धनम् । कांचनं गरुडं कृत्वा तिलधेनुसमन्वितम् ॥१५॥ लिखित्वाैतच्च यो दद्याच्चैत्र्यां विप्राय मुदितः । स लभेद्वैष्णवं धाम देवर्षिगणवंदितः ॥१६॥ यो वानुक्रमणीमेतां शृणोत्यपि पठत्यपि । सोऽपि भक्तिं लभेद्विष्णौ संसारोच्छेदकारिणीम् ॥१७॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वाराहपुराणानुक्रमणी वर्णनं नाम त्र्युत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०३॥
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं स्कन्दसंज्ञकम् । यस्मिन्प्रतिपदं साक्षान्महादेवो व्यवस्थितः ॥१॥ पुराणे शतकोटौ तु यच्छैवं वर्णितं मया । लक्षं तस्यार्थजातस्य सारो व्यासेन कीर्तितः ॥२॥ स्कन्दाह्वयस्तत्र खण्डाः सप्तैव परिकल्पिताः । एकाशीतिसहस्रं तु स्कान्दं सर्वार्थकृन्मतम् ॥३॥
उत्तर भाग में पुलस्त्य और कुरुराज के संवाद में विस्तृत रूप से समस्त तीर्थों का पृथक्-पृथक् माहात्म्य- वर्णन, अशेष धर्मों का आख्यान और पुष्कर नामक पुण्यतीर्थ का कथन हुआ है । यही पापनाशी वाराह पुराण है, जिसे पढ़ने तथा सुनने से भगवान् की भक्ति बढ़ती है । जो व्यक्ति इसे लिखकर ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक स्वर्ण निर्मित गरुड़ तथा तिलधेनु सहित यह प्रदान करता है, वह देवर्षिगण से पूजित होते हुए वैकुण्ठ को जाता है । जो इस अनुक्रमणी का श्रवण एवम् पाठ करता है, उसे भी भवबन्धननाशिनी विष्णुभक्ति की प्राप्ति होती है ॥१३-१७॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वाराह-अनुक्रमणी वर्णन नामक एक सौ तीसरा अध्याय समाप्त ॥१०३॥
अध्याय १०४ स्कन्दपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले — वत्स ! अब स्कन्दपुराण को सुनो, जिसके प्रत्येक पद में श्री महादेव अवस्थित हैं । सौ करोड़ श्लोक वाले पुराण में एक लक्ष श्लोक युक्त शैवपुराण का जो मैंने वर्णन किया है, उसी के सारभूत स्कन्दपुराण की रचना व्यास ने की है । अखिल पापनाशी स्कन्दपुराण में सात खण्ड और इक्यासी हजार श्लोक
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ८८७ यः शृणोति पठेद्वापि स तु साक्षाच्छिवः स्थितः । यत्र माहेश्वरा धर्माः षण्मुखेन प्रकाशिताः ॥४॥ कल्पे तत्पुरुषे वृत्ताः सर्वसिद्धिविधायकाः । तस्य माहेश्वरश्चाथ खंडः पापप्रनाशनः ॥५॥ किंचिन्न्यूनार्कसाहस्रो बहुपुण्यो बृहत्कथः । सुचरित्रशतैर्युक्तः स्कन्दमाहात्म्यसूचकः ॥६॥ यत्र केदारमाहात्म्ये पुराणोपक्रमः पुरा । दक्षयज्ञकथा पश्चाच्छिवार्चने फलम् ॥७॥ समुद्रमथनाख्यानं देवेन्द्रचरितं ततः । पार्वत्याः समुपाख्यानं विवाहस्तदनंतरम् ॥८॥ कुमारोत्पत्तिकथनं ततस्तारकसंगरः । ततः पाशुपताख्यानं चंडाख्यानसमन्वितम् ॥९॥ द्यूतप्रवर्तनाख्यानं नारदेन समागमः । ततः कुमारमाहात्म्ये पंचतीर्थकथानकम् ॥१०॥ धर्मवर्मनृपाख्यानं नदीसागरकीर्तनम् । इंद्रद्युम्नकथा पश्चान्नाडीजंघकथान्वितम् ॥११॥ प्रादुर्भावस्ततो मह्याः कथा दमनकस्य च । महीसागरसंयोगः कुमारेशकथा ततः ॥१२॥ ततस्तारकयुद्धं च नानाख्यानसमन्वितम् । वधश्च तारकस्याथ पंचलिंगनिवेशनम् ॥१३॥ द्वीपाख्यानं ततः पुण्यमूर्ध्वलोकव्यवस्थितिः । ब्रह्मांडस्थितिमानं च वक्रेशकथानकम् ॥१४॥ महाकालसमुद्भूतिः कथा चास्य महाद्भुता । वासुदेवस्य माहात्म्यं कोटितीर्थं ततः परम् ॥१५॥ नानातीर्थसमाख्यानं गुप्तक्षेत्रे प्रकीर्तितम् । पांडवानां कथा पुण्या महाविद्याप्रसाधनम् ॥१६॥ तीर्थयात्रासमाप्तिश्च कौमारमिदमद्भुतम् । अरुणाचलमाहात्म्यं सनकब्रह्मसं कथा ॥१७॥ गौरीतपः समाख्यानं तत्तत्तीर्थनिरूपणम् । महिषासुरमाख्यानं वधश्चास्य महाद्भुतः ॥१८॥ द्रोणाचले शिवास्थानं नित्यदा परिकीर्तितम् । इत्येष कथितः स्कांदे खंडो माहेश्वरोऽद्भुतः ॥१९॥ द्वितीयो वैष्णवः खंडस्तस्याख्यानानि मे शृणु । प्रथमं भूमिवाराहसमाख्यानं प्रकीर्तितम् ॥२०॥ हैं। जो इसका श्रवण तथा पाठ करता है, उसे साक्षात् शिव समझना चाहिये । जिसके तत्पुरुष कल्प में कात्ति- केय ने सर्वसिद्धिदायक माहेश्वर धर्मों का प्रकाशन किया है, वह पापनाशी माहेश्वर खण्ड है। वह बारह हजार से कुछ कम श्लोकों में परिपूर्ण होता है । वह बहुपुण्यदायक, बृहत्कथाओं से युक्त तथा सैकड़ों अच्छे-अच्छे चरित्रों से युक्त है । स्कन्दमाहात्म्य की सूचना भी उसी से मिलती है । उसके केदार माहात्म्य के प्रारम्भ में पुराण का उपक्रम हुआ है, पश्चात् दक्षयज्ञ कथा, शिवलिंगार्चन फल, समुद्रमन्थनारूयान, देवेन्द्र चरित्र, पार्वती- उपाख्यान, उनका विवाह, कुमारोत्पत्ति, तारकासुर युद्धवर्णन, पाशुपताख्यान, चंडाख्यान ॥१-६॥ द्यूतप्रवर्तना- ख्यान, नारदसमागम, कुमारमाहात्म्य में पंचतीर्थकथानक, धर्मवर्मनृपाख्यान, नदीसागरकीर्तन, इंद्रद्युम्नकथा, नाड़ीजंघकथा, महीप्रादुर्भाव, दमनककथा, महीसागर संयोग, कुमारेशकथा, अनेक आख्यानों से युक्त तारक युद्ध, तारकवध, पंचलिंगनिवेश, द्वीपाख्यान, ऊर्ध्वलोक-व्यवस्थिति, ब्रह्मांडस्थितिमान, वक्रेशकथानक, महाकाल की उत्पत्ति, उनकी अद्भुत कथा, वासुदेव माहात्म्य, कोटितीर्थ, गुप्तक्षेत्रीय अनेक तीर्थों का आख्यान, पांडवों की पवित्र कथा, महाविद्याप्रसाधन, तीर्थयात्रा समाप्ति, अरुणाचल माहात्म्य, सनक तथा ब्रह्मा का संवाद, गौरी तप का आख्यान, तत्तत्तीर्थ निरूपण, महिषासुर की कथा, उसका आश्चर्यकारी वध, द्रोणाचल पर शिवा का अवस्थान-इतने विषय उस अद्भुत माहेश्वर खंड में आये हैं ॥१०-१९॥ अब दूसरे वैष्णव खण्ड के बारे में सुनों। उसमें पहले भूमि और वाराह का आख्यान, वेंकटकुध का पाप नाशन माहात्म्य, कमला की पवित्र कथा, श्रीनिवास-स्थिति, कुलाल का आख्यान, सुवर्णमुखरी कथा, अनेक
६८६ नारदीयपुराणम् यत्र वेंकटकुञ्चस्य माहात्म्यं पापनाशनम् । कमलायाः कथा पुण्या श्रीनिवासस्थितिस्ततः ॥२१॥ कुलालाख्यानकं चात्र सुवर्णमुखरी कथा । नानाख्यानसमायुक्ता भारद्वाजकथाऽद्भुता ॥२२॥ मतंगांजनसंवादः कीर्तितः पापनाशनः । पुरुषोत्तममाहात्म्यं कीर्तितं चोत्कले ततः ॥२४॥ मार्कंडेयसमाख्यानमंबरीषस्य भूपतेः । इंद्रद्युम्नस्य चाख्यानं विद्यापतिकथा शुभा ॥२४॥ जैमिनेः समुपाख्यानं नारदस्यापि वाडव । नीलकंठसमाख्यानं नरसिंहोपवर्णनम् ॥२५॥ अश्वमेधकथा राज्ञो ब्रह्मलोकगतिस्तथा । रथयात्राविधिः पश्चाज्जन्मस्थानविधिस्तथा ॥२६॥ दक्षिणामूर्युपाख्यानं गुंडिवाख्यानकं ततः । रथरक्षाविधानं च शयनोत्सवकीर्तनम् ॥२७॥ श्वेतोपाख्यानमत्रोक्तं पृथूत्सर्वनिरूपणम् । दोलोत्सवो भगवतो व्रतं सांवत्सराभिधम् ॥२८॥ पूजा चाकामिका विष्णोरुद्दालकनियोगतः । योगसाधनमत्रोक्तं नानाभोगनिरूपणम् ॥२९॥ दशावतारकथनं स्नानादिपरिकीर्तनम् । ततो बदरिकायाश्च माहात्म्यं पापनाशनम् ॥३०॥ अग्न्यादितीर्थमाहात्म्यं वैनतेयशिलाप्लवम् । कारणं भगवद्वासे तीर्थं कपालमोचनम् ॥३१॥ पंचधाराभिधं तीर्थं मेरुसंस्थापनं तथा । ततः कात्तिकमाहात्म्ये माहात्म्यं मदनालसम् ॥३२॥ धूम्रकेशसमाख्यानं दिनकृत्यानि कार्तिके । पंचभीष्मव्रताख्यानं कीर्तितं भुक्तिमुक्तिदम् ॥३३॥ ततो मार्गस्य माहात्म्ये विधानं स्नानजं तथा । पुंड्रादिकीर्तनं चात्र मालाधारणपुण्यकम् ॥३४॥ पंचामृतस्नानपुण्यं घंटानादादिजं फलम् । नानापुष्पार्चनफलं तुलसीदलजं फलम् ॥३५॥ नैवेद्यस्य च माहात्म्यं हरिवासरकीर्तनम् । अखंडैकादशीपुण्यं तथा जागरणस्य च ॥३६॥ यस्योत्सवविधानं च नाममाहात्म्यकीर्तनम् । ध्यानादिपुण्यकथनं माहात्म्यं मथुरामवम् ॥३७॥ मथुरातीर्थमाहात्म्यं पृथगुक्तं ततः परम् । वनानां द्वादशानां च माहात्म्यं कीर्तितं ततः ॥३८॥
आख्यानों से युक्त भारद्वाज की अद्भुत कथा, मतंग और अंजन का पापनाशी संवाद, उत्कलवर्ती पुरुषोत्तम का माहात्म्य, मार्कंडेय राजा अंबरीष तथा इंद्रद्युम्न की कथा, विद्यापति की कथा, जैमिनि तथा नारद का आख्यान, नीलकण्ठ समाख्यान, नरसिंहोपवर्णन ॥२०-२५॥ अश्वमेध कथा, राजा की ब्रह्मलोकगति, रथयात्रा- विधि, जन्मस्थान विधि, दक्षिणामूति का उपाख्यान, गुंडिवाख्यान, रथरक्षाविधान, शयनोत्सवकीर्तन, श्वेतो- पाख्यान, पृथूत्सव निरूपण, भगवान् का दोलोत्सव, संवत्सर नामक व्रत, उद्दालक के नियोग से विष्णु की निष्काम पूजा, योग साधन, अनेक भोगों का निरूपण, दशावतार कथन, स्नान आदि का कथन, पापनाशी बदरिकाश्रम का माहात्म्य, अग्नि आदि तीर्थों का माहात्म्य, गरुड शिला का माहात्म्य, भगवद्वास का कारण, कपालमोचन नामक तीर्थ, पंचधारा नामक तीर्थ, मेरु संस्थापन नामक तीर्थ, कार्तिक माहात्म्य में मदना- लस माहात्म्य ॥२६-३२॥ धूम्रकेशसमाख्यान, कार्तिकदिन-कृत्य, मुक्ति-मुक्तिदायक पंचभीष्मव्रताख्यान, अगहन माहात्म्य में स्नान का विधान, पुंड्रादिकीर्तन, मालधारण का पुण्य, पंचामृतस्नान पुण्य, घंटानाव आदि का फल, अनेकपुष्पार्चन-फल, तुलसी दल का फल, नैवेद्य का महात्म्य, हरिवासर कीर्तन, अखंड एकादशी का पुण्य, जागरण का पुण्य, उत्सव विधान, नाममाहात्म्यकीर्तन, ध्यान आदि का पुण्यकथन, मथुरा का माहात्म्य, मथुरातीर्थ माहात्म्य, द्वादश वनों का माहात्म्य ॥३३-३८॥ श्रीमद्भागवत का माहात्म्य, वज्र और
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ८८६ श्रीमद्भागवतस्याथ माहात्म्यं कीर्तितं परम् । वज्रशांडित्यसंवाद अंतर्लीलाप्रकाशकम् ॥३९॥ ततो माघस्य माहात्म्यं स्नानदानजपोद्भवम् । नानाव्यानसमायुक्तं दशाध्यायैर्निरूपितम् ॥४०॥ ततो वैष्णवमाहात्म्ये शय्यादानादिजं फलम् । जलदानादिविधयः कामाख्यानमतः परम् ॥४१॥ श्रुतदेवस्य चरितं व्याधोपाख्यानमद्भुतम् । तथाक्षयतृतीयादेविशेषात्पुण्यकीर्तनम् ॥४२॥ ततस्त्वयोध्यामाहात्म्ये चक्रब्रह्माह्वतीर्थके । सुरापापविमोक्षाख्ये तथाधारसहस्रकम् ॥४३॥ स्वर्गद्वारं चंद्रहरिधर्मह्युपवर्णनम् । स्वर्णवृष्टेरुपाख्यानं तिलोदासरयूर्युतिः ॥४४॥ सीताकुंडं गुप्तहरिसरयूघर्घरान्वयः । गोप्रतारं च दुग्धोदं गुरुगुंडादिपञ्चकम् ॥४५॥ सोमार्कादीनि तीर्थानि त्रयोदश ततः परम् । गयाकूपस्य माहात्म्यं सर्वाघविनिवर्तकम् ॥४६॥ मांडव्याश्रमपूर्वाणि तीर्थानि तदनन्तरम् । अजितादिमानसादि तीर्थानि गदितानि च ॥४७॥ इत्येष वैष्णवः खंडो द्वितीयः परिकीर्तितः । अतः परं ब्रह्मखंडं मरीचे शृणु पुण्यदम् ॥४८॥ यत्र वै सेतुमाहात्म्ये फलं स्नाने क्षणोद्भवम् । गालवस्य तपश्चर्या राक्षसाख्यानकं ततः ॥४९॥ चक्रतीर्थादिमाहात्म्यं देवपत्तनसंयुते । वेतालतीर्थमहिमा पापनाशादिकीर्तनम् ॥५०॥ मंगलादिकमाहात्म्यं ब्रह्मकुंडादिवर्णनम् । हनुमत्कुंडमहिमागस्त्यतीर्थभवं फलम् ॥५१॥ रामतीर्थादिकथनं लक्ष्मोतीर्थनिरूपणम् । शंखादितीर्थमहिमा तथा साध्वामृतादिजः ॥५२॥ धनुष्कोट्यादिमाहात्म्यं क्षीरकुंडादिजं तथा । गायत्र्यादिकतीर्थानां माहात्म्यं चात्र कीर्तितम् ॥५३॥ रामनाथस्य महिमा तत्त्वज्ञानोपदेशनम् । यात्राविधानकथनं सेतो मुक्तिप्रदं नृणाम् ॥५४॥ धर्मारण्यस्य माहात्म्यं ततः परमुदीरितम् । स्थाणुः स्कन्दाय भगवान्यत्र तत्त्वमुपादिशत् ॥५५॥ धर्मारण्यसमुत्पत्तिस्तत्पुण्यपरिकीर्तनम् । कर्म्मसिद्धेः समाख्यानं ऋषिवंशनिरूपणम् ॥५६॥ शांडिल्य का संवाद, अंतर्लीला प्रकाश, माघस्नान, दान तथा जप का माहात्म्य, दश अध्यायों में अनेक आख्यानों का निरूपण, वैष्णव माहात्म्य में शय्यादान आदि का फल, जलदान आदि की विधि, कामाख्यान, श्रुतदेव चरित, अद्भुत व्याधोपाख्यान, अक्षय तृतीया आदि का विशेष पुण्यकीर्तन, अयोध्या माहात्म्य में चक्रब्रह्म तथा सुरापाप विमोक्ष नामक तीर्थ, आधार सहस्र, स्वर्गद्वार, चंद्रहरि तथा धर्महरि का उपवर्णन, स्वर्णवृष्टि का उपाख्यान, तिलोदा और सरयू का संगम, सीताकुण्ड, गुप्तहरि, सरयू, घर्घर, गोप्रतार, दुग्धोद, गुरुकुण्डादिपञ्चक ॥३९-४५॥ सोमार्कादि तेरह तीर्थ, सकलपापनाशक गया कूप का माहात्म्य, मांडव्य के आश्रम सहित तोर्थों का वर्णन और अजित मानस आदि तीर्थों का कथन किया गया है। यही दूसरा वैष्णव खंड है। मरीचे ! अब इसके उपरांत तीसरे पुण्यदायक ब्रह्मखंड के बारे में सुनो, जिसमें सेतु माहात्म्य, स्नान, और दर्शन का फल, गालव की तपश्चर्या, राक्षसाख्यान, चक्रतीर्थादि माहात्म्य, वेताल तीर्थ महिमा, मंगलादिमाहात्म्य, ब्रह्मकुण्डादि वर्णन, हनुमत्कुण्डमहिमा, अगस्त्य तीर्थ का फल, रामतीर्थादि कथन, लक्ष्मोतीर्थनिरूपण, शंखादितीर्थ महिमा, साध्यामृत आदि की महिमा, ॥४६-५२॥ धनुष्कोटि यादि तीर्थों का माहात्म्य, क्षीरकुण्ड आदि का माहात्म्य, गायत्री आदि तीर्थों का माहात्म्य, रामनाथ की महिमा, तत्त्वज्ञान का उपदेश, मनुष्यों के लिये मोक्षदायक सेतु की यात्रा का विधान कथन, धर्मारण्य का माहात्म्य, उस वृक्ष का वर्णन जहां भगवान् ने कार्तिकेय को तत्त्व का उपदेश किया, धर्मारण्य का उद्भव, उसके पुण्य का कीर्तन, कर्मसिद्धि का आख्यान, ऋषिवंश निरूपण, ॥५३-५६॥ अप्सरा ११२ ना० पु०
८६० नारदीयपुराणम्
अप्सरस्तीर्थमुख्यानां माहात्म्यं यत्र कीर्तितम् । वर्णानामाश्रमाणां च धर्मतत्त्वनिरूपणम् ॥५७॥ दिवः स्थानविभागश्च बकुलार्ककथा शुभा । छत्रानन्दा तथा शांता श्रीमाता च मतंगिनी ॥५८॥ पुण्यदा च समाख्याता यन्न देव्यः समास्थिताः । इन्द्रेश्वरादिमाहात्म्यं द्वारकादिनिरूपणम् ॥५६॥ लोहासुरसमाख्यानं गंगाकूपनिरूपणम् । श्रीरामचरितं चैव सत्यमंदिरवर्णनम् ॥६०॥ जीर्णोद्धारस्य कथनमासनप्रतिपादनम् । जातिभेदप्रकथनं स्मृतिधर्मनिरूपणम् ॥६१॥ ततस्तु वैष्णवा धर्मा नानाख्यानैरुदीरिताः । चातुर्मास्ये ततः पुण्ये सर्वधर्मनिरूपणम् ॥६२॥ दानप्रशंसा तत्पश्चाद्व्रतस्य महिमा सतः । तपसश्चैव पूजायाः सच्छिद्रकथनं ततः ॥६३॥ तद्वृत्तीनां भिदाख्यानं शालग्रामनिरूपणम् । झारकस्य वधोपायो वृक्षाचामहिमा तथा ॥६४॥ विष्णोः शापश्च वृक्षत्वं पार्वत्यनुतपस्ततः । हरस्य तांडवं नृत्यं रामनाम निरूपणम् ॥६५॥ हरस्य लिंगपतनं कथा बैजवनस्य च । पार्वतीजन्मचरितं तारकस्य वधोऽद्भुतः ॥६६॥ प्रणवैश्वर्यकथनं तारकाचरितं पुनः । दक्षयज्ञसमाप्तिश्च द्वादशाक्षरभूषणम् ॥६७॥ ज्ञानयोगसमाख्यानं महिमा द्वादशाक्षरेः । श्रवणादिकपुण्यं च कीर्तितं शर्मदं नृणाम् ॥६८॥ ततो ब्राह्मोत्तरे भागे शिवस्य महिमाद्भुतः । पंचाक्षरस्य महिमा गोकर्णमहिमा ततः ॥६९॥ शिवरात्रेश्च महिमा प्रदोषव्रतकीर्तनम् । सोमवारव्रतं चापि सीमंतिन्याः कथानकम् ॥७०॥ भद्रायूत्पत्तिकथनं सदाचारनिरूपणम् । शिववर्मसमुद्देशो भद्रायुद्वाहवर्णनम् ॥७१॥ भद्रायुमहिमा चापि भस्ममाहात्म्यकीर्तनम् । शबराख्यानकं चैव उमामाहेश्वरं व्रतम् ॥७२॥ रुद्राक्षस्य च माहात्म्यं रुद्राध्यायस्य पुण्यकम् । श्रवणादिकपुण्यं च ब्रह्मखंडोऽयमीरितः ॥७३॥ अतः परं चतुर्थ तु काशीखंडमनुत्तमम् । विन्ध्यनारदयोर्यत्र संवादः परिकीर्तितः ॥७४॥
आदि तीर्थों का माहात्म्य, वर्णों तथा आश्रमों का धर्म तत्त्व निरूपण, दिवस्थान का विभाग, बकुलार्ककथा, छत्रानंदा, शांता, श्रीमाता, मतंगिनी, आदि पुण्यदायिनी देवियों के स्थान का वर्णन, इन्द्रेश्वरादि माहात्म्य, द्वार- कादि निरूपण, लोहासुर समाख्यान, गंगाकूपनिरूपण, श्रीरामचरित, सत्यमंदिर वर्णन, जीर्णोद्धार कथन, आसन प्रतिपादन, जातिभेद प्रकथन, स्मृतिधर्म निरूपण, अनेक आख्यानों सहित वैष्णव धर्म का निरूपण, चातुर्मास्य के समस्त धर्मों का कथन, दानप्रशंसा, व्रतमहिमा, तप तथा पूजा का सच्छिद्र कथन, प्रकृति का भिन्नाख्यान, शालग्राम निरूपण; झारक का वधोपाय, वृक्षाचं को महिमा, विष्णु का वृक्षत्व शाप, पार्वती का अनुतप, हर का तांडवनृत्य, रामनाम निरूपण, हर का लिंगपतन, बैजवन की कथा, पार्वती जन्मचरित, तारक का अद्भुत वध, प्रणवैश्वर्य कथन, तारकाचरित, दक्षयज्ञसमाप्ति, द्वादशाक्षरभूषण, ज्ञानयोग समाख्यान, द्वादशाक्षर की महिमा, और मनुष्यों के लिये कल्याणकारक श्रवणादिक पुण्य बतलाया गया है ॥५७-६८॥ ब्रह्मखंड के उत्तर भाग में शिव की अद्भुत महिमा, पंचाक्षर की महिमा, गोकर्ण महिमा, शिवरात्रि महिमा, प्रदोषव्रत कीर्तन' सोमवार व्रत, सीमंतिनी का कथानक, भद्रायु का उत्पत्तिकथन, सदाचारनिरूपण, शिवशर्मा का उद्देश, भद्रायु का विवाह वर्णन, भद्रायु महिमा, भस्म माहात्म्य कीर्तन, शबराख्यान, उमा-माहेश्वर-व्रत, रुद्राक्ष माहात्म्य, रुद्राध्यायपुण्य, श्रवणादिक पुण्य- इतने विषय आये हैं ॥६९-७३॥ अब इसके उपरांत चौथे अत्युत्तम काशीखंड के सम्बन्ध में सुनो। उसमें विन्ध्य तथा नारद का सं...
चतुरधिकशततमोऽध्यायः ८६१ सत्यलोकप्रभावश्चागस्त्यावासे सुरागमः। पतिव्रताचरितं च तीर्थयात्राप्रशंसनम् ॥७५॥ ततश्च सप्तपुर्याख्या संयमिन्या निरूपणम् । बुधस्य च तथैन्द्राग्न्योर्लोकाप्तिः शिवशर्मणः ॥७६॥ अग्नेः समुद्भवश्चैव क्रव्याद्रुणसंभवः । गंधवत्यलकापुर्योरीश्वर्यश्च समुद्भवः ॥७७॥ चंद्राक्र्कबुधलोकानां कुजेज्यार्कभुवां क्रमात् । मम विष्णोर्ध्रुवस्यापि तपोलोकस्य वर्णनम् ॥७८॥ ध्रुवलोककथा पुण्या सत्यलोकनिरीक्षणम् । स्कंदागस्त्यसमालापो मणिकर्णीसमुद्भवः ॥७६॥ प्रभावश्चापि गंगाया गंगानामसहस्रकम् । वाराणसीप्रशंसा च भैरवाविर्भवस्ततः ॥८०॥ दंडपाणिज्ञानवाप्योरुद्भवः समनंतरम् । ततः कलावत्याख्यानं सदाचारनिरूपणम् ॥८१॥ ब्रह्मचारिसमाख्यानं ततः स्त्रीलक्षणाति च । कृत्याकृत्यविनिर्देशो ह्यविमुक्तेश्ववर्णनम् ॥८२॥ गृहस्थ्ययोगिनो धर्माः कालज्ञानं ततः परम् । दिवोदासकथा पुण्या काशिकावर्णनं ततः ॥८३॥ मायागणपतेश्चाथ भुवि प्रादुर्भवस्ततः । विष्णुमायाप्रपंचोऽथ दिवोदासविमोक्षणम् ॥८४॥ ततः पंचनदोत्पत्तिर्बिंदुमाधवसंभवः । ततो वैष्णवतीर्थाख्या शूलिनः काशिकागमः ॥८५॥ जैगीषव्येन संवादो ज्येष्ठेशाख्या महेशितुः । क्षेत्राख्यानं कंदुकेशः व्याघ्रेश्वरसमुद्भवः ॥८६॥ शैलेशरत्नेश्वरयोः कृत्तिवासस्य चोद्भवः । देवतानामधिष्ठानं दुर्गासुरपराक्रमः ॥८७॥ दुर्गाया विजयश्चाथ ओंकारेशस्य वर्णनम् । पुनरोंकारमाहात्म्यं त्रिलोचनसमुद्भवः ॥८८॥ केदाराख्या च धर्मेश कथा विष्णुभुजोद्भवः । वीरेश्वरसमाख्यानं गंगामाहात्म्यकीर्तनम् ॥८६॥ विश्वकर्मेशमहिमा दक्षयज्ञोद्भवस्तथा । सतीशस्यामृतेशाद्येषुदस्तंभः पराशरे ॥६०॥ क्षेत्रतीर्थकदंबश्च मुक्तिमंडपसं कथा । विश्वेशविभवश्चाय ततो यात्रापरिक्रमः ॥६१॥ अतः परं त्ववन्त्याख्यं शृणु खंडं च पंचमम् । महाकालवनाख्यानं ब्रह्मशीर्षच्छिदा ततः ॥६२॥
सत्यलोक का प्रभाव, अगस्त्य के आवास में सुरागम, पतिव्रताचरित्र, तीर्थयात्रा की प्रशंसा, सप्तपुरी तथा संय- मनी का निरूपण, शिवशर्मा को बुध, इंद्र तथा अग्निलोक की प्राप्ति, अग्नि का उद्भव, क्रव्यात् एवम् मनो का निरूपण, गंधवती, अलकापुरी और ईश्वरो की उत्पत्ति, चंद्र, अर्क, बुध, कुज, बृहस्पति, सूर्यं वरुण की उत्पत्ति, ध्रुवलोक की पवित्र कथा, सत्यलोक का निरीक्षण, ब्रह्मा, विष्णु, ध्रुव, तथा तपोलोक का वर्णन ॥७४-७८॥ ध्रुवलोक की पवित्र कथा, सत्यलोक का निरीक्षण, स्कन्द और अगस्त्य का समालाप, मणिकर्णी का उद्भव, गंगा का प्रभाव, गंगा सहस्रनाम, वाराणसी प्रशंसा, भैरव का आविर्भाव, दण्डपाणि और ज्ञानवापी का उद्भव, कलावती का आख्यान, सदाचार निरूपण, ब्रह्मचारी का आख्यान, स्त्रियों के लक्षण, कृत्याकृत्य का निर्देश, अविमुक्तेश्वर का वर्णन, गृहस्थ तथा योगी के धर्म, काल ज्ञान, दिवोदास कथा, काशिका वर्णन, पृथ्वी पर माया गणपति का प्रादुर्भाव, विष्णुमाया का प्रपंच, दिवो- दास विमोक्षण, पंचनदोत्पत्ति, बिंदुमाधव का उद्भव, वैष्णवतीर्थ की आख्या, शंकर का काशी-आगमन, ज्येष्ठेश तथा जैगीषव्य का संवाद, क्षेत्राख्यान, कंदुकेश तथा व्याघ्रेश्वर की उत्पत्ति, शैलेश, रत्नेश और कृत्तिवास का उद्भव, देवताओं का अधिष्ठान, दुर्गासुरपराक्रम, दुर्गा विजय और ओंकारेश का वर्णन, ओंकार माहात्म्य, त्रिलो- चन का उद्भव, केदाराख्यान, धर्मेशकथा, विष्णुभुज की कथा, वीरेश्वर का आख्यान, गंगामाहात्म्य कीर्तन, विश्वकर्मा तथा ईश की महिमा, दक्षयज्ञ की उत्पत्ति, सत्येश और अमृतेशादि पराशर का भुजस्तम्भ, क्षेत्र- तीर्थ समूह, मुक्तिमंडपकथा, विश्वेशविभव और यात्रापरिक्रमा--इतने विषय वर्णित हैं ॥७९-९१॥ अतःपर अवन्ती नामक पांचवें खंड के सम्बन्ध में सुनो। इसमें महाकालाख्यान, ब्रह्मशीर्षच्छेद, प्रायश्चित्त
८६२ नारदीयपुराणम् प्रायश्चित्तविधिश्चाग्नेरुत्पत्तिश्च सुरागमः। देवदीक्षा शिवस्तोत्रं नानापातकनाशनम् ॥६३॥ कपालमोचनाख्यानं महाकालवनस्थितिः। तीर्थं कनकलेशस्य सर्वपापनाशनम् ॥६४॥ कुण्डमप्सरसंज्ञं च सरो रुद्रस्य पुण्यदम्। कुण्डेशं च विद्याघ्रं मर्कटेश्वरतीर्थकम् ॥६५॥ स्वर्गद्वारं चतुःसिन्धुतीर्थं शंकरवापिका। शंकरार्कं गन्धवतीतीर्थं पापनाशनम् ॥६६॥ दशाश्वमेधिकानंशतीर्थे च हरिसिद्धिदम्। पिशाचिकादिलाभा हनुमत्कवचेश्वरौ ॥६७॥ महाकालेशयात्रा च वल्मीकेश्वरतीर्थकम्। शुक्ले च पञ्चमे चाऽथ कुशास्थल्याः प्रदक्षिणाः ॥६८॥ अक्रूरसंज्ञकस्त्वेकपादं चंद्रार्कवैभवम्। करमेशाह्वयंतीर्थं च लट्ठकेशाख्यतीर्थकम् ॥६९॥ मार्कण्डेशं यज्ञवापी सोमेशं नरकांतकम्। केदारेश्वररामे शसौभाग्येशनरार्ककम् ॥१००॥ केशवार्कं शक्तिभेदं स्वर्णसारमुखानि च। ओंकारेशादितीर्थानि अंधकश्रुतिकीर्तनम् ॥१०१॥ कालारण्ये लिंगसंख्या स्वर्णशृंगाभिधानकम्। कुशास्थल्या अवंत्याश्चोज्जयिन्या अभिधानकम् ॥१०२॥ पद्मावती वै कुमुद्वत्यमरावतीनामकम्। विशालाप्रतिकल्पाख्यानं च ज्वरशांतकम् ॥१०३॥ शिवानामादिकफलं नागोद्गीता शिवस्तुतिः। हिरण्याक्षवधाख्यानं तीर्थं सुन्दरकुण्डकम् ॥१०४॥ नीलगंगापुष्कराख्यं विष्यवासनतीर्थकम्। पुरुषोत्तमसंज्ञानं तु सत्तीर्थं चाघनाशनम् ॥१०५॥ गोमती वामनं कुण्डो विष्णोर्नामसहस्रकम्। वीरेश्वरसरः कालभैरवस्य च तीर्थकम् ॥१०६॥ महिमा नागपंचम्या नृसिंहस्य जयंतिका। कुटुम्बेश्वरयात्रा च देवसाधककीर्तनम् ॥१०७॥ कर्करराजाख्यतीर्थं च विघ्नेशादिसुरोहनम्। रुद्रकुण्डप्रभृतिषु बहुतीर्थनिरूपणम् ॥१०८॥ यावाष्टतीर्थजा पुण्या रेवामाहात्म्यमुच्यते। धर्मपुत्रस्य वैराग्यो मार्कण्डेयेन संगमः ॥१०९॥ प्राप्रीयानुभवाख्यानममृतापरिकीर्त्तनम्। कल्पे कल्पे पृथङ् नाम नर्मदायाः प्रकीर्तितम् ॥११०॥ स्तवमार्षं नार्मदं च कालरात्रिकथा ततः। महादेवस्तुतिः पश्चात्पृथक्कल्पकथाद्भुता ॥१११॥
विधि, अग्निरुत्पत्ति, सुरागमन, देवदीक्षा, सकलपापनाशन शिवस्तोत्र, कपालमोचनाख्यान, महाकालवनस्थिति, सर्वपापनाशी कनकलेशतीर्थ, अप्सरःकुण्ड, पुण्यदायक रुद्रसर, कुण्डवेश, विद्याघ्र, मर्कटेश्वर तीर्थ, स्वर्गद्वार, चतुः सिंधुतीर्थ, शंकरवापिका, शंकरार्क, पापनाशीगन्धवतीतीर्थ, दशाश्वमेवतीर्थ, हरिसिद्धिदायक, अनंशतीर्थ, पिशाचिकादि यात्रा, हनुमत्कवचेश्वर, महाकालेशयात्रा, वल्मीकेश्वरतीर्थ, शुक्रतीर्थ, कुशस्थली की प्रदक्षिणा ॥६३-९८॥ अक्रूर नामक तीर्थ, एकपादतीर्थ, चंद्रार्कवैभवतीर्थ, करमेशतीर्थ, लट्ठकेशतीर्थ, मार्कण्डेशतीर्थ यज्ञवापी, सोमेश, नरकांतक, केदारेश्वर, रामेश, भाग्येश, नरार्क, केशवार्क, शक्तिभेद, स्वर्णसारमुख, ओंकारेशादि तीर्थ, अंधकश्रुतिकीर्तन, कालारण्य में लिंगसंख्या, स्वर्णशृंग की कथा, कुशस्थली, अवन्ती और उज्जयिनी का कथानक, पद्मावती, कुमुद्वती, अमरावती और विशालाप्रतिकल्प का आख्यान, ज्वरशांतक, शिवानामादिक फल, नाग द्वारा की गई शिव स्तुति, हिरण्याक्षवधाख्यानतीर्थ, सुन्दरकुण्डक, नीलगंगा, पुष्कर, विष्यवासनतीर्थ, पापनाशन पुरुषोत्तम तीर्थ, गोमती, वामनकुण्ठ, विष्णुलहस्रनामतीर्थ ॥९९-१०५॥ वीरेश्वरसर, कालभैरवतीर्थ, नागपंचमीमहिमा, नृसिंहजयन्ती, कुटुम्बेश्वरयात्रा, देवसाधककीर्तन, कर्कराज- तीर्थ, विघ्नेशादिसुरोहन, रुद्रकुण्ड आदि अनेक तीर्थों का निरूपण, अष्टतीर्थ की पवित्र यात्रा, रेवामाहात्म्य, धर्मपुत्र का वैराग्य, उनका मार्कण्डेय के साथ संगम, प्राग्रीयानुभवाख्यान, अमृतापरिकीर्तन, प्रतिकल्प में नर्मदा का पृथक्-पृथक् नामनिर्देश, नर्मदा की आर्षस्तुति, कालरात्रिकथा, महादेवस्तुति, पृथक्-पृथक् कल्पों की मद्भुत