बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 910, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुरधिकशततमोऽध्यायः ८६१ सत्यलोकप्रभावश्चागस्त्यावासे सुरागमः। पतिव्रताचरितं च तीर्थयात्राप्रशंसनम् ॥७५॥ ततश्च सप्तपुर्याख्या संयमिन्या निरूपणम् । बुधस्य च तथैन्द्राग्न्योर्लोकाप्तिः शिवशर्मणः ॥७६॥ अग्नेः समुद्भवश्चैव क्रव्याद्रुणसंभवः । गंधवत्यलकापुर्योरीश्वर्यश्च समुद्भवः ॥७७॥ चंद्राक्र्कबुधलोकानां कुजेज्यार्कभुवां क्रमात् । मम विष्णोर्ध्रुवस्यापि तपोलोकस्य वर्णनम् ॥७८॥ ध्रुवलोककथा पुण्या सत्यलोकनिरीक्षणम् । स्कंदागस्त्यसमालापो मणिकर्णीसमुद्भवः ॥७६॥ प्रभावश्चापि गंगाया गंगानामसहस्रकम् । वाराणसीप्रशंसा च भैरवाविर्भवस्ततः ॥८०॥ दंडपाणिज्ञानवाप्योरुद्भवः समनंतरम् । ततः कलावत्याख्यानं सदाचारनिरूपणम् ॥८१॥ ब्रह्मचारिसमाख्यानं ततः स्त्रीलक्षणाति च । कृत्याकृत्यविनिर्देशो ह्यविमुक्तेश्ववर्णनम् ॥८२॥ गृहस्थ्ययोगिनो धर्माः कालज्ञानं ततः परम् । दिवोदासकथा पुण्या काशिकावर्णनं ततः ॥८३॥ मायागणपतेश्चाथ भुवि प्रादुर्भवस्ततः । विष्णुमायाप्रपंचोऽथ दिवोदासविमोक्षणम् ॥८४॥ ततः पंचनदोत्पत्तिर्बिंदुमाधवसंभवः । ततो वैष्णवतीर्थाख्या शूलिनः काशिकागमः ॥८५॥ जैगीषव्येन संवादो ज्येष्ठेशाख्या महेशितुः । क्षेत्राख्यानं कंदुकेशः व्याघ्रेश्वरसमुद्भवः ॥८६॥ शैलेशरत्नेश्वरयोः कृत्तिवासस्य चोद्भवः । देवतानामधिष्ठानं दुर्गासुरपराक्रमः ॥८७॥ दुर्गाया विजयश्चाथ ओंकारेशस्य वर्णनम् । पुनरोंकारमाहात्म्यं त्रिलोचनसमुद्भवः ॥८८॥ केदाराख्या च धर्मेश कथा विष्णुभुजोद्भवः । वीरेश्वरसमाख्यानं गंगामाहात्म्यकीर्तनम् ॥८६॥ विश्वकर्मेशमहिमा दक्षयज्ञोद्भवस्तथा । सतीशस्यामृतेशाद्येषुदस्तंभः पराशरे ॥६०॥ क्षेत्रतीर्थकदंबश्च मुक्तिमंडपसं कथा । विश्वेशविभवश्चाय ततो यात्रापरिक्रमः ॥६१॥ अतः परं त्ववन्त्याख्यं शृणु खंडं च पंचमम् । महाकालवनाख्यानं ब्रह्मशीर्षच्छिदा ततः ॥६२॥
सत्यलोक का प्रभाव, अगस्त्य के आवास में सुरागम, पतिव्रताचरित्र, तीर्थयात्रा की प्रशंसा, सप्तपुरी तथा संय- मनी का निरूपण, शिवशर्मा को बुध, इंद्र तथा अग्निलोक की प्राप्ति, अग्नि का उद्भव, क्रव्यात् एवम् मनो का निरूपण, गंधवती, अलकापुरी और ईश्वरो की उत्पत्ति, चंद्र, अर्क, बुध, कुज, बृहस्पति, सूर्यं वरुण की उत्पत्ति, ध्रुवलोक की पवित्र कथा, सत्यलोक का निरीक्षण, ब्रह्मा, विष्णु, ध्रुव, तथा तपोलोक का वर्णन ॥७४-७८॥ ध्रुवलोक की पवित्र कथा, सत्यलोक का निरीक्षण, स्कन्द और अगस्त्य का समालाप, मणिकर्णी का उद्भव, गंगा का प्रभाव, गंगा सहस्रनाम, वाराणसी प्रशंसा, भैरव का आविर्भाव, दण्डपाणि और ज्ञानवापी का उद्भव, कलावती का आख्यान, सदाचार निरूपण, ब्रह्मचारी का आख्यान, स्त्रियों के लक्षण, कृत्याकृत्य का निर्देश, अविमुक्तेश्वर का वर्णन, गृहस्थ तथा योगी के धर्म, काल ज्ञान, दिवोदास कथा, काशिका वर्णन, पृथ्वी पर माया गणपति का प्रादुर्भाव, विष्णुमाया का प्रपंच, दिवो- दास विमोक्षण, पंचनदोत्पत्ति, बिंदुमाधव का उद्भव, वैष्णवतीर्थ की आख्या, शंकर का काशी-आगमन, ज्येष्ठेश तथा जैगीषव्य का संवाद, क्षेत्राख्यान, कंदुकेश तथा व्याघ्रेश्वर की उत्पत्ति, शैलेश, रत्नेश और कृत्तिवास का उद्भव, देवताओं का अधिष्ठान, दुर्गासुरपराक्रम, दुर्गा विजय और ओंकारेश का वर्णन, ओंकार माहात्म्य, त्रिलो- चन का उद्भव, केदाराख्यान, धर्मेशकथा, विष्णुभुज की कथा, वीरेश्वर का आख्यान, गंगामाहात्म्य कीर्तन, विश्वकर्मा तथा ईश की महिमा, दक्षयज्ञ की उत्पत्ति, सत्येश और अमृतेशादि पराशर का भुजस्तम्भ, क्षेत्र- तीर्थ समूह, मुक्तिमंडपकथा, विश्वेशविभव और यात्रापरिक्रमा--इतने विषय वर्णित हैं ॥७९-९१॥ अतःपर अवन्ती नामक पांचवें खंड के सम्बन्ध में सुनो। इसमें महाकालाख्यान, ब्रह्मशीर्षच्छेद, प्रायश्चित्त