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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 896, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 896

नरिष्यंतस्य चरितं इक्ष्वाकुचरितं ततः । नलस्य चरितं पश्चाद्रामचन्द्रस्य सत्कथा ॥१२॥ कुशवंशसमाख्यानं सोमवंशानुकीर्तनम् । पुरुरवःकथा पुण्या नहुषस्य कथाद्भुता ॥१३॥ ययातिचरितं पुण्यं यदुवंशानुकीर्तनम् । श्रीकृष्णबालचरितं माथुरं चरितं ततः ॥१४॥ द्वारकाचरितं चाथ कथा सर्वावताराजा । ततः सांख्यसमुद्देशः प्रपञ्चासत्त्वकीर्तनम् ॥१५॥ मार्कण्डेयस्य चरितं पुराणश्रवणे फलम् । यः शृणोति नरो भक्त्या पुराणमिदमादरात् ॥१६॥ मार्कण्डेयाभिधं वत्स स लभेत्परमां गतिम् । यस्तु व्याकुरुते चैतच्छैवं स लभते पदम् ॥१७॥ तत्तच्छ्लोल्लिखित्वा यः सौवर्णकरिसंयुतम् । कार्तिकां द्विजवर्याय स लभेद्ब्रह्मणः पदम् ॥१८॥ शृणोति श्रावयेद्वापि यश्चानुक्रमणीमिमाम् । मार्कण्डेयपुराणस्य स लभेद्वान्छितं फलम् ॥१९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नामाष्टनवतितमोऽध्यायः ॥९८॥

नवनवतितमोऽध्यायः

ब्रह्मोवाच अथातः संप्रवक्ष्यामि त्वाग्नेयपुराणकम् । ईशानकल्पवृत्तांतं वसिष्ठायानलोऽब्रवीत् ॥१॥ तत्पंचदशसाहस्रं नानाचरितमद्भुतम् । पठतां शृण्वतां चैव सर्वपापहरं नृणाम् ॥२॥

कथा, सांख्यशास्त्र का उद्देश, प्रपंचसत्त्वकीर्तन, मार्कण्डेयचरित्र तथा पुराणश्रवण का फल बताया गया है। वत्स ! जो मानव भक्ति एवम् आदर से मार्कण्डेयपुराण का श्रवण करता है, उसे परम गति की प्राप्ति होती है। जो इसका पाठ करता है उसे शिवलोक की प्राप्ति होती है। जो इसे लिखकर कार्त्तिकी पूर्णिमा के दिन उत्तम ब्राह्मण को स्वर्णगजसहित इसे समर्पित करता है, वह ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। मार्कण्डेयपुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनता है या सुनाता है, उसे वांछित फल की प्राप्ति होती है ॥१-१९॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में मार्कण्डेयपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक अठानबेवां अध्याय समाप्त ॥९८॥

अध्याय ९९

अग्निपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले--अब इसके बाद मैं तुम्हें अग्निपुराण सुनाऊंगा । अग्नि ने वसिष्ठ से ईशानकल्प का वृत्तान्त सुनाया था। यह पुराण अनेक अद्भुत चरित्रों से युक्त तथा पन्द्रह सहस्र श्लोकों में विभक्त है।