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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 899, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 899

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८८० | नारदीयपुराणम् अघोरकल्पवृत्तांतं नानावर्यकथान्वितम् । तत्रादिमं स्मृतं पर्व ब्राह्मं यत्रास्त्युपक्रमः ॥५५॥ सूतशौनकसंवादे पुराणप्रश्नसंक्रमः । आदित्यचरितप्रायः सर्वाख्यानसमन्वितः ॥५६॥ सृष्ट्यादिलक्षणोपेतः शास्त्रसर्वस्वरूपकः । पुस्तलेखकलेखानां लक्षणं च ततः परम् ॥५७॥ संस्काराणां च सर्वेषां लक्षणं चात्र कीर्तितम् । पक्षस्यादितिथीनां च कल्पाः सप्त च कीर्तिताः ॥५८॥ अष्टम्याद्याः शेषकल्पा वैष्णवे पर्वणि स्मृताः । शैवे च कामतो भिन्नाः सौरे चांत्यकथान्वयः ॥५६॥ प्रतिसर्गाद्वयं पश्चान्नानाख्यानसमन्वितम् । पुराणस्योपसंहारसंहितं पर्व पंचमम् ॥६०॥ एषु पंचसु पूर्वेस्मिन् ब्रह्मणो महिमाधिकाः । धर्मे कामे च मोक्षे तु विष्णोश्चापि शिवस्य च ॥६१॥ द्वितीये च तृतीये च सौरे वर्गचतुष्टये । प्रतिसर्गाद्वयं त्वंत्यं प्रोक्तं सर्वकथान्वितम् ॥६२॥ सप्तविष्यं विनिर्दिष्टं पर्वव्यासेन धीमता । चतुर्दशसहस्रं तु पुराणं परिकीर्तितम् ॥६३॥ भविष्यं सर्वदेवानां साम्यं यत्र प्रकीर्तितम् । गुणानां तारतम्येन समं ब्रह्म ति हि श्रुतिः ॥६४॥ तं लिखित्वा तु यो दद्यात्पौष्यां विद्वान्विमत्सरः । गुडधेनुयुतं हेमवस्त्रमाल्याविभूषणैः ॥६५॥ वाचकं पुस्तकं चापि पूजयित्वा विधानतः । गंधाद्यैर्भोज्यभक्ष्यैश्च कृत्वा नीराजनादिकम् ॥६६॥ यो वै जितेंद्रियो भूत्वा सोपवासः समाहितः । अथ वैकहविष्यासी कीर्तयेच्छृणुयादपि ॥६७॥ स मुक्तः पातकैर्घोरैः प्रयाति ब्रह्मणः पदम् । योऽप्यनुक्रमणीमेतां भविष्यस्य निरूपिताम् ॥६८॥ पठेद्वा शृणुयाच्चैतां भुक्तिं मुक्तिं च विदति ॥६९॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे भविष्यपुराणानुक्रमणी- निरूपणं नाम शततमोऽध्यायः ॥१००॥


तब मुनिने संपूर्ण संहिता को, पाँच भागों में विभक्त कर दिया। उसमें अनेक आश्चर्यजनक कथाओं से युक्त अघोर कल्प का वृत्तान्त है। उसका पहिला पर्व ब्राह्म है, जिसमें उसका उपक्रम है ॥५५॥ उसी पर्व में सूत और शौनक के संवाद में पुराणप्रश्न, सर्वाख्यानयुक्त आदित्यचरित्र, सृष्टि आदि के लक्षणों से युक्त सकलशास्त्र स्वरूप, पुस्तक लेखक और लेख्य का लक्षण, समस्त संस्कारों का लक्षण और प्रतिपदादि तिथियों के सात कल्प वर्णित हुए हैं। वैष्णवपर्व में अष्टमी आदि अवशिष्ट कल्पों का वर्णन है। शैव पर्व में कामानुसार विभिन्नता सौर पर्व में अन्त्यकथा और प्रतिसर्ग पर्व में अनेक आख्यान तथा पुराण का उपसंहार बतलाया गया है। इस तरह पाँच पर्व होते हैं। प्रथम पर्व में ब्रह्मा का महिमा, द्वितीय में विष्णु एवम् धर्म, काम और मोक्ष को तृतीय में शिव की, चतुर्थ में सूर्य की और पांचवे में समस्त कथायें बताई गई है। धीमान् व्यास ने पर्वों में विभक्त करके भविष्यपुराण की रचना की है। इस पुराण में चौदह हजार श्लोक हैं ॥५६-६३॥ इसमें सकल देवों की कथा समभाव से कही गई है। श्रुति भी 'गुणों के तारतम्य से ब्रह्म सम है' ऐसा कहती है। जो विद्वान् इस पुराण को लिखकर पौषी पूर्णिमा के दिन गुडधेनु, सुवर्ण, वस्त्र, माला, सुगंधित द्रव्य, भोज्य तथा भक्ष्य पदार्थों से विधिपूर्वक ब्राह्मण एवम् पुस्तक की पूजा कर इसे समर्पित करता है, वह घोर पातकों से विमुक्त होकर ब्रह्मपद को प्राप्त करता है। जो इन्द्रियसंयमपूर्वक उपवास या हविष्यभोजन करते हुए सावधानी से इसका श्रवण तथा कीर्तन करता है, उसे भी पूर्वकथित फल की प्राप्ति होती है। जो भविष्यपुराण की इस अनुक्रमणी को पढ़ेगा या सुनेगा, वह भोग-मोक्ष लाभ करेगा ॥६४-१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में भविष्यपुराणानुक्रमणिनिरूपण नामक सौवां अध्याय समाप्त ॥१००॥