बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 898, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंशततमोऽध्यायः ८७६ ब्रह्मज्ञानं ततः पश्चात्पुराणश्रवणे फलम् । एतदाग्नेयकं विप्र पुराणं परिकीर्तितम् ॥२२॥ तल्लिखित्वा तु यो दद्यात्सुवर्णकमलान्वितम् । तिलधेनुयुतं चापि मार्गशीर्ष्यां विधानतः ॥२३॥ पुराणार्थविदे सोऽथ स्वर्गलोके महीयते । एषानुक्रमणी प्रोक्ता तवाग्नेयस्य मुषितवा ॥२४॥ शृण्वतां पठतां चैव नृणां चेह परत्र च ॥२५॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपावेऽग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपणं नामैकोनशततमोऽध्यायः ॥६६॥
शततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ ते संप्रवक्ष्यामि पुराणं सर्वसिद्धिदम् । भविष्यं भवतः सर्वलोकाभीष्टप्रदायकम् ॥१॥ यत्राहं सर्वदेवानामादिकर्ता समुद्गतः । सृष्ट्यर्थं तत्र संजातो मनु स्वायंभुवः पुरा ॥२॥ स मां प्रणम्य पप्रच्छ धर्मं सर्वार्थसाधकम् । अहं तस्मै तदा प्रीतः प्रावोचं धर्मसंहिताम् ॥३॥ पुराणानां यदा व्यासो व्यासं चक्रे महामतिः । तदा तां संहितां सर्वां पंचधा व्यभजन्मुनिः ॥४॥
ब्रह्मज्ञान, और पुराणश्रवण का फल बतलाया गया है । विप्र ! यह आग्नेय पुराण का वर्णन हुआ । जो व्यक्ति इस पुराण को लिखकर अग्रहण की पूर्णिमा में विधिपूर्वक सुवर्ण कमलं तथा तिलधेनु सहित यह पुराण पौराणिक द्विज को समर्पित करता है, वह स्वर्ग में पूजित होता है । आग्नेय पुराण की इस अनुक्रमणी को जो सुनेगा तथा पढ़ेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी ॥१९-२५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में अग्निपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक निन्यानवेवां अध्याय समाप्त ॥६६॥
अध्याय १०० भविष्यपुराण की विषयानुक्रमणी श्री ब्रह्मा बोले— अब मैं सर्वसिद्धिदायक तथा अखिलकामनापूरक भविष्यपुराण के संबन्ध में कहूँगा । उस पुराण में मैं सब देवों का आदिकर्ता माना गया हूँ । पहले सृष्टिकार्य के लिये स्वायंभुव मनु का प्रादुर्भाव हुआ । उसने मुझे प्रणाम कर समस्त प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले धर्म के विषय में प्रश्न किया । तब मैं प्रीतिपूर्वक धर्मसंहिता को सुनाने लगा । जब महामति व्यास को पुराणों के व्यष्टीकरण करने की इच्छा हुई तब