बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 908, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुरधिकशततमोऽध्यायः ८८६ श्रीमद्भागवतस्याथ माहात्म्यं कीर्तितं परम् । वज्रशांडित्यसंवाद अंतर्लीलाप्रकाशकम् ॥३९॥ ततो माघस्य माहात्म्यं स्नानदानजपोद्भवम् । नानाव्यानसमायुक्तं दशाध्यायैर्निरूपितम् ॥४०॥ ततो वैष्णवमाहात्म्ये शय्यादानादिजं फलम् । जलदानादिविधयः कामाख्यानमतः परम् ॥४१॥ श्रुतदेवस्य चरितं व्याधोपाख्यानमद्भुतम् । तथाक्षयतृतीयादेविशेषात्पुण्यकीर्तनम् ॥४२॥ ततस्त्वयोध्यामाहात्म्ये चक्रब्रह्माह्वतीर्थके । सुरापापविमोक्षाख्ये तथाधारसहस्रकम् ॥४३॥ स्वर्गद्वारं चंद्रहरिधर्मह्युपवर्णनम् । स्वर्णवृष्टेरुपाख्यानं तिलोदासरयूर्युतिः ॥४४॥ सीताकुंडं गुप्तहरिसरयूघर्घरान्वयः । गोप्रतारं च दुग्धोदं गुरुगुंडादिपञ्चकम् ॥४५॥ सोमार्कादीनि तीर्थानि त्रयोदश ततः परम् । गयाकूपस्य माहात्म्यं सर्वाघविनिवर्तकम् ॥४६॥ मांडव्याश्रमपूर्वाणि तीर्थानि तदनन्तरम् । अजितादिमानसादि तीर्थानि गदितानि च ॥४७॥ इत्येष वैष्णवः खंडो द्वितीयः परिकीर्तितः । अतः परं ब्रह्मखंडं मरीचे शृणु पुण्यदम् ॥४८॥ यत्र वै सेतुमाहात्म्ये फलं स्नाने क्षणोद्भवम् । गालवस्य तपश्चर्या राक्षसाख्यानकं ततः ॥४९॥ चक्रतीर्थादिमाहात्म्यं देवपत्तनसंयुते । वेतालतीर्थमहिमा पापनाशादिकीर्तनम् ॥५०॥ मंगलादिकमाहात्म्यं ब्रह्मकुंडादिवर्णनम् । हनुमत्कुंडमहिमागस्त्यतीर्थभवं फलम् ॥५१॥ रामतीर्थादिकथनं लक्ष्मोतीर्थनिरूपणम् । शंखादितीर्थमहिमा तथा साध्वामृतादिजः ॥५२॥ धनुष्कोट्यादिमाहात्म्यं क्षीरकुंडादिजं तथा । गायत्र्यादिकतीर्थानां माहात्म्यं चात्र कीर्तितम् ॥५३॥ रामनाथस्य महिमा तत्त्वज्ञानोपदेशनम् । यात्राविधानकथनं सेतो मुक्तिप्रदं नृणाम् ॥५४॥ धर्मारण्यस्य माहात्म्यं ततः परमुदीरितम् । स्थाणुः स्कन्दाय भगवान्यत्र तत्त्वमुपादिशत् ॥५५॥ धर्मारण्यसमुत्पत्तिस्तत्पुण्यपरिकीर्तनम् । कर्म्मसिद्धेः समाख्यानं ऋषिवंशनिरूपणम् ॥५६॥ शांडिल्य का संवाद, अंतर्लीला प्रकाश, माघस्नान, दान तथा जप का माहात्म्य, दश अध्यायों में अनेक आख्यानों का निरूपण, वैष्णव माहात्म्य में शय्यादान आदि का फल, जलदान आदि की विधि, कामाख्यान, श्रुतदेव चरित, अद्भुत व्याधोपाख्यान, अक्षय तृतीया आदि का विशेष पुण्यकीर्तन, अयोध्या माहात्म्य में चक्रब्रह्म तथा सुरापाप विमोक्ष नामक तीर्थ, आधार सहस्र, स्वर्गद्वार, चंद्रहरि तथा धर्महरि का उपवर्णन, स्वर्णवृष्टि का उपाख्यान, तिलोदा और सरयू का संगम, सीताकुण्ड, गुप्तहरि, सरयू, घर्घर, गोप्रतार, दुग्धोद, गुरुकुण्डादिपञ्चक ॥३९-४५॥ सोमार्कादि तेरह तीर्थ, सकलपापनाशक गया कूप का माहात्म्य, मांडव्य के आश्रम सहित तोर्थों का वर्णन और अजित मानस आदि तीर्थों का कथन किया गया है। यही दूसरा वैष्णव खंड है। मरीचे ! अब इसके उपरांत तीसरे पुण्यदायक ब्रह्मखंड के बारे में सुनो, जिसमें सेतु माहात्म्य, स्नान, और दर्शन का फल, गालव की तपश्चर्या, राक्षसाख्यान, चक्रतीर्थादि माहात्म्य, वेताल तीर्थ महिमा, मंगलादिमाहात्म्य, ब्रह्मकुण्डादि वर्णन, हनुमत्कुण्डमहिमा, अगस्त्य तीर्थ का फल, रामतीर्थादि कथन, लक्ष्मोतीर्थनिरूपण, शंखादितीर्थ महिमा, साध्यामृत आदि की महिमा, ॥४६-५२॥ धनुष्कोटि यादि तीर्थों का माहात्म्य, क्षीरकुण्ड आदि का माहात्म्य, गायत्री आदि तीर्थों का माहात्म्य, रामनाथ की महिमा, तत्त्वज्ञान का उपदेश, मनुष्यों के लिये मोक्षदायक सेतु की यात्रा का विधान कथन, धर्मारण्य का माहात्म्य, उस वृक्ष का वर्णन जहां भगवान् ने कार्तिकेय को तत्त्व का उपदेश किया, धर्मारण्य का उद्भव, उसके पुण्य का कीर्तन, कर्मसिद्धि का आख्यान, ऋषिवंश निरूपण, ॥५३-५६॥ अप्सरा ११२ ना० पु०