बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 906, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंचतुरधिकशततमोऽध्यायः ८८७ यः शृणोति पठेद्वापि स तु साक्षाच्छिवः स्थितः । यत्र माहेश्वरा धर्माः षण्मुखेन प्रकाशिताः ॥४॥ कल्पे तत्पुरुषे वृत्ताः सर्वसिद्धिविधायकाः । तस्य माहेश्वरश्चाथ खंडः पापप्रनाशनः ॥५॥ किंचिन्न्यूनार्कसाहस्रो बहुपुण्यो बृहत्कथः । सुचरित्रशतैर्युक्तः स्कन्दमाहात्म्यसूचकः ॥६॥ यत्र केदारमाहात्म्ये पुराणोपक्रमः पुरा । दक्षयज्ञकथा पश्चाच्छिवार्चने फलम् ॥७॥ समुद्रमथनाख्यानं देवेन्द्रचरितं ततः । पार्वत्याः समुपाख्यानं विवाहस्तदनंतरम् ॥८॥ कुमारोत्पत्तिकथनं ततस्तारकसंगरः । ततः पाशुपताख्यानं चंडाख्यानसमन्वितम् ॥९॥ द्यूतप्रवर्तनाख्यानं नारदेन समागमः । ततः कुमारमाहात्म्ये पंचतीर्थकथानकम् ॥१०॥ धर्मवर्मनृपाख्यानं नदीसागरकीर्तनम् । इंद्रद्युम्नकथा पश्चान्नाडीजंघकथान्वितम् ॥११॥ प्रादुर्भावस्ततो मह्याः कथा दमनकस्य च । महीसागरसंयोगः कुमारेशकथा ततः ॥१२॥ ततस्तारकयुद्धं च नानाख्यानसमन्वितम् । वधश्च तारकस्याथ पंचलिंगनिवेशनम् ॥१३॥ द्वीपाख्यानं ततः पुण्यमूर्ध्वलोकव्यवस्थितिः । ब्रह्मांडस्थितिमानं च वक्रेशकथानकम् ॥१४॥ महाकालसमुद्भूतिः कथा चास्य महाद्भुता । वासुदेवस्य माहात्म्यं कोटितीर्थं ततः परम् ॥१५॥ नानातीर्थसमाख्यानं गुप्तक्षेत्रे प्रकीर्तितम् । पांडवानां कथा पुण्या महाविद्याप्रसाधनम् ॥१६॥ तीर्थयात्रासमाप्तिश्च कौमारमिदमद्भुतम् । अरुणाचलमाहात्म्यं सनकब्रह्मसं कथा ॥१७॥ गौरीतपः समाख्यानं तत्तत्तीर्थनिरूपणम् । महिषासुरमाख्यानं वधश्चास्य महाद्भुतः ॥१८॥ द्रोणाचले शिवास्थानं नित्यदा परिकीर्तितम् । इत्येष कथितः स्कांदे खंडो माहेश्वरोऽद्भुतः ॥१९॥ द्वितीयो वैष्णवः खंडस्तस्याख्यानानि मे शृणु । प्रथमं भूमिवाराहसमाख्यानं प्रकीर्तितम् ॥२०॥ हैं। जो इसका श्रवण तथा पाठ करता है, उसे साक्षात् शिव समझना चाहिये । जिसके तत्पुरुष कल्प में कात्ति- केय ने सर्वसिद्धिदायक माहेश्वर धर्मों का प्रकाशन किया है, वह पापनाशी माहेश्वर खण्ड है। वह बारह हजार से कुछ कम श्लोकों में परिपूर्ण होता है । वह बहुपुण्यदायक, बृहत्कथाओं से युक्त तथा सैकड़ों अच्छे-अच्छे चरित्रों से युक्त है । स्कन्दमाहात्म्य की सूचना भी उसी से मिलती है । उसके केदार माहात्म्य के प्रारम्भ में पुराण का उपक्रम हुआ है, पश्चात् दक्षयज्ञ कथा, शिवलिंगार्चन फल, समुद्रमन्थनारूयान, देवेन्द्र चरित्र, पार्वती- उपाख्यान, उनका विवाह, कुमारोत्पत्ति, तारकासुर युद्धवर्णन, पाशुपताख्यान, चंडाख्यान ॥१-६॥ द्यूतप्रवर्तना- ख्यान, नारदसमागम, कुमारमाहात्म्य में पंचतीर्थकथानक, धर्मवर्मनृपाख्यान, नदीसागरकीर्तन, इंद्रद्युम्नकथा, नाड़ीजंघकथा, महीप्रादुर्भाव, दमनककथा, महीसागर संयोग, कुमारेशकथा, अनेक आख्यानों से युक्त तारक युद्ध, तारकवध, पंचलिंगनिवेश, द्वीपाख्यान, ऊर्ध्वलोक-व्यवस्थिति, ब्रह्मांडस्थितिमान, वक्रेशकथानक, महाकाल की उत्पत्ति, उनकी अद्भुत कथा, वासुदेव माहात्म्य, कोटितीर्थ, गुप्तक्षेत्रीय अनेक तीर्थों का आख्यान, पांडवों की पवित्र कथा, महाविद्याप्रसाधन, तीर्थयात्रा समाप्ति, अरुणाचल माहात्म्य, सनक तथा ब्रह्मा का संवाद, गौरी तप का आख्यान, तत्तत्तीर्थ निरूपण, महिषासुर की कथा, उसका आश्चर्यकारी वध, द्रोणाचल पर शिवा का अवस्थान-इतने विषय उस अद्भुत माहेश्वर खंड में आये हैं ॥१०-१९॥ अब दूसरे वैष्णव खण्ड के बारे में सुनों। उसमें पहले भूमि और वाराह का आख्यान, वेंकटकुध का पाप नाशन माहात्म्य, कमला की पवित्र कथा, श्रीनिवास-स्थिति, कुलाल का आख्यान, सुवर्णमुखरी कथा, अनेक