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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

८४६ नारदीयपुराणम् एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं नित्यापटलमादितः। ज्ञातव्यं सर्वमेवात्र यन्त्रसाधनपूर्वकम् ॥२३८॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे नित्यापटलकथनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥९०॥ एकनवतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये महेशस्य मन्त्रं सर्वार्थसाधकम्। यं समाराध्य मनुजो भुक्तिं मुक्तिं च विंदति ॥१॥ हृदयं सबकः सूक्ष्मो लांतोऽनन्तान्वितो मरुत्। पंचाक्षरो मनुः प्रोक्तस्ताराद्योऽयं षडक्षरः ॥२॥ वामदेवो मुनिश्च्छंदः पंक्तिरीशोऽस्य देवता। षड्भिर्वर्णैः षडङ्गानि कुर्यान्मंवेण देशिकः ॥३॥ मंत्रवण्ण्विकान्यस्येन्मंत्रमूर्तीर्यथाक्रमम् । तर्जनीमध्ययोरंत्यानामिकांगुष्ठके पुनः ॥४॥ होमादि दशांश करे। मुनीश्वर ! चित्रा का एक लाख मन्त्र जप और दशांश हवन आदि करना चाहिये। संक्षेप में नित्या का पटल आदि से वर्णन किया गया है। यहाँ सब कुछ यन्त्रसाधन पूर्वक जानना चाहिये ॥२३०-२३८॥ श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में नित्यापटल कथन नामक नब्बेवाँ अध्याय समाप्त ॥९०॥ अध्याय ९१ स्तोत्र सहित श्री महेश्वर मन्त्र का विधान सनत्कुमार बोले-अब सकल प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले महेश के मन्त्र को बतलाऊँगा जिसकी आराधना करने से मनुष्य को भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है। "हृदयम्"-यह पंचाक्षर मन्त्र है। तार (प्रणव) आदि में जोड़ने से षडक्षर होता है। इसके मुनि वामदेव हैं, छंद पंक्ति है और देवता महेश हैं। मन्त्र के छहों वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१-३॥ साधक क्रमशः मन्त्ररूप मन्त्रवर्णों का न्यास करे। (पहले) तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठिका, और अंगुष्ठा से अंगुलियों में उनका न्यास करे। घोर, भव, वाम, तथा ईश

एकनवतितमोऽध्यायः ८४७ ताः स्युस्तत्पुरुषाघोरभववामेशसंज्ञिकाः । वक्त्रहृत्पादगुह्येषु निजमूर्द्धनि ताः पुनः ॥५॥ प्राच्याम्यवारुणोदीच्यमध्यवक्त्रेषु पंचसु । मन्त्रांगानि न्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट् क्रमात् ॥६॥ कुर्वीत गोलकन्यासं रक्षायै तदनन्तरम् । हृदि वक्त्रेऽसयोर्द्व्योः कंठे नाभौ द्विपार्श्वयोः ॥७॥ पृष्ठे हृदि तथा मूर्ध्नि वदने नेत्रयोर्नसोः । दोःपत्संधिषु साप्रेषु विन्यसेत्तदनन्तरम् ॥८॥ शिरोवदनहृत्कुक्षिसोरुपादद्वये पुनः । हृदि वक्रांबुजे टंकमृगौ भयवरैष्वथ ॥८॥ वक्त्रांसत्सपदो रुजठरेषु क्रमान्न्यसेत् । मूलमन्त्रस्य षड् वर्णान्यावद्वैशिकोत्तमः ॥१०॥ मूर्ध्नि भालोदरांसेषु हृदये ताः पुनर्न्यसेत् । पश्चादनेन मन्त्रेण कुर्वीत व्यापकं सुधीः ॥११॥ नमोस्त्वनन्तरूपाय ज्योतिर्लिंगामृतात्मने । चतुर्मूतिवपुश्छायाभासितांगाय शंभवे ॥१२॥ एवं न्यस्तशरीरोऽसौ चिन्तयेत्पार्वतीपतिम् । ध्यायेन्नित्यं महेशानं रोप्यपर्वतसन्निभम् ॥१३॥ चारुचंद्रावतंसं च रत्नकल्पोज्ज्वलांगकम् । परश्वधवराभीतिमृगहस्तं शुभाननम् ॥१४॥ पदमासीनं समंतात्तु स्तुतं सुमनसां गणैः । व्याघ्रकृत्ति वसानं च विश्वाद्यं विश्वरूपकम् ॥१५॥ त्रिनेत्रं पंचवक्त्रं च सर्वभीतिहरं शिवम् । तत्त्वलक्षं जपेन्मंत्रं दीक्षितः शैववर्त्मना ॥१६॥ तावत्संख्यसहस्राणि जुहुयात्पायसैः शुभैः । ततः सिद्धो भवेन्मन्त्रः साधकाऽभीष्टसिद्धिदः ॥१७॥ देवं संपूजयेत्पीठे वामादिनवशक्तिके । वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली कलपदादिका ॥१८॥ विकारिण्याह्वया प्रोक्ता बलाद्या विकरिण्यथ । बलप्रमथनी पश्चात्सर्वभूतदमन्यथ ॥१९॥ मनोन्मनोति संप्रोक्ताः शैवपीठस्य शक्तयः । नमो भगवते पश्चात्सकलादि वदेत्ततः ॥२०॥ संज्ञक पुरुष ही मन्त्र की मूर्तियां हैं। अतएव मुख, हृदय, चरण, गुह्य, तथा अपने मस्तक पर पुनः मंत्रमूर्तियों का न्यास करे। अनन्तर पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और मध्य की दिशा में क्रमशः जातियुक्त छह मन्त्रांगों का न्यास करना चाहिए। रक्षा के निमित्त गोलकन्यांस करना चाहिये ॥४-६३॥ बाद में हृदय, मुख, स्कंध, तल, कंठ, नाभि, पार्श्व, पृष्ठ, मस्तक, नेत्र, नासिका, भुजा, चरण तथा अस्थिसंधियों में न्यास करे। पुनः शिर, वदन, हृदय, उदर, ऊरु तथा चरण रूप अंगों और टंक, मृग, अभय तथा वर रूप अस्त्रों में न्यास करके क्रमशः मुख, स्कंध, पाद, ऊरु तथा उदर में न्यास करना चाहिये । उत्तम साधक मूल मन्त्र के छह वर्णोंका शिर, ललाट, स्कन्ध तथा हृदय में न्यास करे। पश्चात् पंडित व्यक्ति “तयो......शंभवे” इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥७-१२॥ इस प्रकार संपूर्ण शरीर में न्यास करके पार्वतीपति का इस प्रकार ध्यान करे। चांदनी के पर्वत के समान धवल, चारुचन्द्र के समान कांतिमान्, रत्न के सदृश प्रदीप्त अंगों वाले, हाथों में परशु (फरसा), मृग, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, पवित्र मुखवाले, कमलों पर आसीन, चारों ओर देवगणों से स्तूय- मान, व्याघ्रचर्म पहनने वाले, विश्व के आदि, विश्व के रूप, त्रिनेत्र, पंचमुख और सबके भय का हरण करने वाले, कल्याणकारी, ईशान शिव का ध्यान कर शैवमार्ग से दीक्षित हुआ व्यक्ति उनके मन्त्र का पांच लाख जप फिर उतनी संख्या में पवित्र पायस से हवन करे। ऐसा करने से साधक को सकल अभीष्ट दायक मन्त्र सिद्ध हो जाता है। अनन्तर पीठ पर वामा आदि नौ शक्तियों समेत शंकर देव की अर्चना करे। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलपदा, विकरिणी, बला, बलप्रमथनी और मनोन्मनी-ये नवों शैव पीठ की शक्तियाँ हैं। “नमो......” इस मन्त्र से गिरिजापति को आसन प्रदान करना चाहिये। फिर मूल मन्त्र से मूर्ति की

यहाँ पृष्ठ का संपूर्ण पाठ प्रस्तुत है:

८४८ नारदीयपुराणम् गुणात्मशक्तिमक्ताय ततोऽनंताय तत्परम्। योगपीठात्मने भूयो नमस्तारादिको मनुः ॥२१॥ अमुना मनुना दद्यादासनं गिरिजापतेः। मूर्तिं मूलेन संकल्प्य तत्रावाह्य यजेच्छिवम् ॥२२॥ कर्णिकायां यजेन्मूर्तीरीशमीशानदिग्गजम्। शुद्धस्फटिकसंकाशं दिक्षु तत्पुरुषादिका ॥२३॥ पीतांजनश्वेतरक्ताः प्रधानसदृशायुधाः। चतुर्वक्त्रसमायुक्ता यथाभत्त्या प्रपूजयेत् ॥२४॥ कोणेष्वर्चन्निवृत्त्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात्। अङ्गानि केसरस्थानि विघ्नेशान्पन्नगान्न्यजेत् ॥२५॥ अनन्तं सुखनामानं शिवोत्तममनंतरम्। एकनेत्रमेकरुद्रं त्रिमूर्तिं तदनंतरम् ॥२६॥ पश्चाच्छ्रीकंठनामानं शिखंडिनमिति क्रमात्। रक्तपोतसितारक्तकृष्णरक्तांजनासितान् ॥२७॥ किरीटारितबालेंदून्पद्मस्थान्भूषणान्वितान्। त्रिनेत्राञ्छूलवज्रास्त्रचापहस्तान्मनोरमान् ॥२८॥ उत्तरादि यजेत्पश्चाद्रुद्रं चण्डेश्वरं पुनः। ततो नन्दिमहाकालौ गणेशं वृषभं पुनः ॥२९॥ अथ भृंगि रिटिं स्कन्दमेतान्पद्मासनस्थितान्। स्वर्णतोयारुणश्यामशुक्लेंदुसितपाटलान् ॥३०॥ इंद्रादयस्ततः पूज्या वज्राद्यायुधसंयुताः। इत्थं संपूजयेद्देवं सहस्रं नित्यशो जपेत् ॥३१॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नुयाद्वांछितं श्रियम्। द्विसहस्रं जपन् रोगन्मुच्यते नात्र संशयः ॥३२॥ त्रिसहस्रं जपन्मंत्रं दीर्घमायुरवाप्नुयात्। सहस्रवृद्ध्या प्रजपन्सर्वकामानवाप्नुयात् ॥३३॥ आज्यान्वितैस्तिलैः शुवेञ्जुहुयाल्लक्षमादरात्। उत्पातजनितान् क्लेशान्नाशयेन्नात्र संशयः ॥३४॥ शतलक्षं जपन्साक्षाच्छिवो भवति मानवः। षडक्षरः शक्तिरुद्धः कथितोऽष्टाक्षरो मनुः ॥३५॥ ऋषिश्च्छन्दः पुरा प्रोक्तो देवता स्यादुमापतिः। अङ्गानि पूर्वमुक्तानि सौम्यमीशं विचितयेत् ॥३६॥ बन्धूकाभं त्रिनेत्रं च शशिखंडधरं विभुम्। स्मेरास्यं स्वकरैः शूलं कपालं वरदाभये ॥३७॥ वहंतं चारुभूषाढ्यं वामोरुस्थाम्विकन्यया। भुजेनाश्लिष्टदेहं तं चिंतयेन्मनसा हृदि ॥३८॥

कल्पना कर कमल पुष्पों पर शंकर का आवाहन करके पूजन करे ॥१३-२२॥ ईश तथा शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ वर्ण वाले ईशानदिग्गज की पूजा करनी चाहिये। दिशाओं में पीत, कृष्ण, श्वेत, तथा रक्तवर्ण वालों, शक्तियों की पूजा कर कोणों में निवृत्ति आदि तेजोरूप कलाओं का क्रमशः पूजन करे। अनन्तर केसरस्थित अंगों, विघ्नेशों तथा पन्नगों की अर्चना करे। फिर सुखनामा अनन्त, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकंठ, और शिखंडी का पूजन कर रक्त, पीत, शुक्ल तथा कृष्ण वर्णवाले, मुकुट पर बालचन्द्र को धारण करने वाले, कमलों पर आसान, आभूषणों से विभूषित, त्रिनेत्र, करों में शूल, वज्र तथा धनुष धारण करने वाले, मनोरम देवों की पूजा करे। पश्चात् पद्मासनस्थित रुद्र चंडेश्वर, नन्दी, महाकाल, गणेश, वृषभ, भृंगि, रिटि तथा स्कंद की पूजा करे, जिनका वर्ण क्रमशः अरुण, श्याम, श्वेत, रक्त, शुक्ल एवम् सुवर्ण, जलमुक्ता, तथा चंद्रमा के समान है। तदुपरान्त वज्र आदि आयुधों समेत इन्द्र आदि देवों की पूजा करे ॥२३-३२॥ इस प्रकार नित्य शंकर का पूजन कर सहस्र बार मन्त्र जप किया करे ऐसा करने से मनुज सकल पापों से मुक्त होकर यथेच्छ श्री को प्राप्त करता है। दो सहस्र मन्त्र जप करने से रोग निवृत्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। तीन हजार मन्त्र जप जरने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है। मन्त्र जप में प्रति दिन एक सहस्र वृद्धि कर देने से समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति हो जाती है। एक लाख मन्त्रजप तथा घृत घृतयुक्त तिल से होम करने से उत्पातजन्य क्लेशों का नाश होता है, इसमें संशय नहीं। सौ लाख जप करने वाला मानव साक्षात् शिव होता है। शक्तिरुद्ध षडक्षर मन्त्र ही अष्टाक्षर मन्त्र कहलाता हैं। इसके ऋषि, छन्द तथा अंग पहिले बता दिये गये हैं इससे देवता उमापति हैं। (इस मंत्र का) साधक सौम्य शंकर का

एकनवतितमोऽध्यायः ८४६ मनुलक्षं जपेन्मन्त्रं ततसहस्रं यथाविधि । जुहुयान्मधुरासिक्तै रारग्वधसमिद्वरैः ॥३६॥ प्राक्प्रोक्ते पूजयेत्पीठे गंधपुष्पैरुमापतिम् । अंगावृत्तैर्बहिः पूज्या हृल्लेखाद्या यथापुरा ॥४०॥ मध्यप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु विधानतः । यजेत्पूर्वादिपत्रेषु , वृषभाग्याननुक्रमात् ॥४१॥ शूलटंकाक्षवलयकमंडलुलसत्करम् । रक्ताकारं त्रिनयनं चंडेशमथ पूजयेत् ॥४२॥ चक्रशंखाभयाभीष्टकरां मरकतप्रभाम् । दुर्गा प्रपूजयेत्सौम्यां त्रिनेत्रां चारुभूषणाम् ॥४३॥ कल्पशाखांतरे घंटां दधानं द्वादशेक्षणम् । बालार्कभं शिशुं कांतं षण्मुखं पूजयेत्ततः ॥४४॥ नंदिनं च यजेत्सौम्यं रत्नभूषणमंडितम् । परश्वधवराभीतिटंकि नं श्यामविग्रहम् ॥४५॥ पाशांकुशवराभीष्टधारिणं कुंकुमप्रभम् । विघ्ननायकमभ्यर्चेच्चंद्राद्धंकृतशेखरम् ॥४६॥ श्यामं रक्तोत्पलकरं वामांक न्यस्ततत्करम् । द्विनेत्रं रक्तवस्त्राढ्यं सेनापतिमथार्चयेत् ॥४७॥ ततोऽष्टमातरः पूज्या ब्राह्माद्याः प्रोक्तलक्षणाः । इंद्रादिकांल्लोकपालान्स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् ॥४८॥ वज्रादीनि तदस्त्राणि तद्बहिः क्रमतोऽर्चयेत् । एवं यो भजते मन्त्री देवं शंभुमुमापतिम् ॥४६॥ स भवेत्सर्वलोकानां सौभाग्यश्रेयसां पदम् । सांतसद्यांतसंयुक्तो बिन्दुभूषितमस्तकः ॥५०॥ प्रासादाख्यो मनुः प्रोक्तो भजतां सर्वसिद्धिदः । षड्दीर्घयुक्तबीजेन षडंगविधिरोरितः ॥५१॥ षडर्णवत्तु मुन्याद्याः प्रोक्ताश्चास्यापि नारद । ईशानाद्या न्यसेन्मूर्तीरंगुष्ठादिषु देशिकः ॥५२॥

चितन करे । दोपहरिया फूल के समान आभा वाले, तीन नेत्र वाले, शशिखंड धारण करने वाले, मंद मुसकान युक्त मुख वाले, करों में शूल, कपाल, वरदास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, मनोहर आभूषणों से विभू- षित, बाँयीं जंघा पर पार्वती को बिठाने वाले, उनकी भुजाओं से आलिंगित शरीर वाले विभु शंकर का ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उतने ही हजार मधुरमिश्रित छितिवन की समिधा से हवन करे ॥३२-३९॥ पूर्व कथित पीठ पर गंध-पुष्पों से उमापति की पूजा कर हृल्लेखा आदि शक्तियों की पूजा करे । फिर मध्य पूर्व, दक्षिण, उत्तर एवम् पश्चिम दिशाओं में विधानपूर्वक वृषभ आदि देवों का क्रमशः पूजन करे । अनन्तर हाथों में शूल, टंक, रुद्राक्ष, वलय, तथा कमंडलु धारण करने वाले, रक्ताकार, त्रिनेत्र, चंडेश की अर्चना करे । उसके बाद करों में चक्र, शंख, अभयास्त्र तथा वरदास्त्र धारण करने वाली, मरकत मणि के समान प्रभावानी तीन नेत्रों वाली और मनोहर आभूषणोंवाली दुर्गा की पूजा कर घंटा धारण करने वाले, बारह नेत्रों वाले बाल- सूर्य के समान प्रभाववाले, कमनीय कान्तिवाले शिशु कार्तिकेय का पूजन करे ॥४०-४४॥ तब सौम्य, रत्न के आभूषणों से अलंकृत, परशु, वरदास्त्र, अभयास्त्र, तथा टंक नायक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कुंकुम के समान प्रभा वाले और श्याम शरीरवाले नन्दी की पूजा कर ललाट पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले, श्याम वर्ण वाले, रक्त कमल के सदृश करों वाले, दो नेत्रों वाले और रक्तवस्त्र पहनने वाले गणेश की अर्चना करे । तदुपरान्त उक्त लक्षण ब्राह्मी आदि माताओं की पूजा कर अपनी-अपनी दिशा में इंद्र आदि लोकपालों की पूजा करे । फिर बाहर उनके वज्र आदि अस्त्रों का क्रमशः पूजन करे । जो साधक इस तरह उमापति शंभु की आराधना करता है, वह समस्त लोकों के सौभाग्य एवम् श्रेय का निधान होता है । सांत सद्यांत संयुक्त और ऊपर बिन्दु से भूषित प्रसाद नामक मंत्र साधकों को समस्त सिद्धियां प्रदान करता है ॥४५-५१॥ नारद ! छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास करना चाहिये । इस मंत्र के छः ही वर्ण हैं । साधक अंगुष्ठ आदि में ईशान आदि मूर्तियों का न्यास करे । पश्चात् ईशान पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजातबीज तथा उकार आदि पाँच १०७ ना० पु०

८५० नारदीयपुराणम् ईशानाख्यं तत्पुरुषमघोरं तदनंतरम् । वामदेवाव्हयं सद्योजातबीजं क्रमाद्विदुः ॥५३॥ उकाराद्यैः पञ्चह्रस्वैर्विलोमात्संप्रयुतं च यत् । तत्तदंगुलिभिर्भ्यस्तत्तद्बीजादिकान्न्यसेत् ॥५४॥ शिरोवदनहृद्गुह्यपाददेशे यथाक्रमात् । ऊर्ध्वप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु मुखेषु च ॥५५॥ ततः प्रविन्सेद्विद्वानष्टाविंशत्कलास्तनौ । ईशानाद्या ऋचः सम्यगंगुलीषु यथाक्रमात् ॥५६॥ अंगुष्ठादिकनिष्ठांतं न्यसेद्देशिकसत्तमः । मूर्द्धास्यहृदघांभोजगुह्यपादे तु ताः पुनः ॥५७॥ वक्त्रे मूर्धादिषु न्यस्य भूयोऽङ्गानि प्रकल्पयेत् । तारपंचकमुच्चार्य सर्वज्ञाय हृदीरितम् ॥५८॥ अमृते तेजो मालिनि तृप्तायेति पदं पुनः । तदंते ब्रह्मशिरसे शिरोगं ज्वलितं ततः ॥५९॥ शिखि शिखाय परतोऽनादिबोधाय तच्छिखा । वज्रिणे वज्रहस्ताय स्वतंत्राय तनुच्छदम् ॥६०॥ सौं खौं हौंमिति संभाष्य परतो तों गुह्यशक्तये । नेत्रमुक्तं शलीपशुं हुं फडंते नेत्रं शक्तये ॥६१॥ अस्त्रमुक्तं षडंगानि कुर्यादेवं समाहितः । पूर्वदक्षिणपश्चात्प्राक्सौम्यमध्येषु पंचसु ॥६२॥ वक्त्रेषु पंच विन्यस्येदोशानस्य कलाः क्रमात् । ईशानः सर्वविद्यानां शशिनी प्रथमा कला ॥६३॥ ईश्वरः सर्वभूतानां मंगला तदनंतरम् । ब्रह्माधिपतिःशब्दांते ब्रह्मणोऽधिपतिः पुनः ॥६४॥ ब्रह्मोष्टदा तृतीयास्याच्छिवो मे अस्तु तत्परा । मरीचिः कथिता विप्र चतुर्थी च सदाशिवे ॥६५॥ अंशुमालिन्यथ परा प्रणवाद्या नमोन्विताः । पूर्वपश्चिमयाम्योदग्वक्त्रेषु तदनंतरम् ॥६६॥ चतस्रो विन्यसेन्मंत्री पुरुषस्य कलाः क्रमात् । आद्या तत्पुरुषायेति विद्महे शांतिरीरिता ॥६७॥ महादेवाय शब्दांते धीमहि स्यात्ततः परम् । विद्या द्वितीया कथिता तन्नो रुद्रः पदं ततः ॥६८॥ प्रतिष्ठा कथिता पश्चात्तुतीया स्यात्प्रचोदयात् । निवृत्तिस्तत्परा सर्वा प्रणवाद्या नमोन्विता ॥६९॥ हृदि चांसद्वये नाभिमुक्षौ पृष्ठेऽथ वक्षसि । अथोरसि कला न्यस्येदष्टौ मंत्री यथाविधि ॥७०॥ अघोरेभ्यस्तथा पूर्वमीरिता प्रथमा कला । अथ घोरेभ्य इत्यंते मोहास्यात्तदनंतरम् ॥७१॥ अघोरांते क्षमा पश्चात्तुतीया परिकीर्तिता । घोरतरेभ्यो निद्रा स्यात्सर्वेभ्यः सर्वतत्परा ॥७२॥ ह्रस्वमात्राओं से युक्त देव का न्यास करे । पुनः तत्तत् अंगुलियों से तत्तत् बीज आदिकों का न्यास कर शिर, वदन, हृदय, गुह्य, चरण, ऊपर पूर्व, दक्षिण, उत्तर और पश्चिम दिशाओं में न्यास करे । तदनंतर विद्वान् व्यक्ति शरीर में अड़तीस कलाओं का और अंगुलियो में ईशान आदि ऋचाओं का क्रमशः न्यास करे । अंगूष्ठा से लेकर कनिष्ठा तक न्यास कर मस्तक, मुख, हृदय, गुह्य, तथा चरणों में न्यास करे । पुनः मुख, शिर आदि में न्यास करके अंगों की रचना करे ॥५२-५७½॥ तदनन्तर तारपंचक का उच्चारण कर “सर्वज्ञाय . . . . . . . . . .” होम्-इसका पाठ करे । फिर “तों ˙ ˙ शक्तयें”-इसको पढ़कर षडंग न्यास करे । पश्चात् पूर्व, दक्षिण, पश्चिम उत्तर और मध्य में न्यास करके ईशान की पाँच कलाओं का क्रमशः न्यास करे । अखिल विद्याओं के अधिष्ठाता ईशान, प्रथमा कला शशिनी, समस्त भूतों के ईश्वर मंगला, ब्रह्माधिपति, ब्रह्मणोधिपति, ब्रह्मोष्टदा, शिव, मरीचि, सदाशिव तथा अंशुमालिनी का न्यास कर पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवम् दक्षिण दिशा में पुरुष की चार कलाओं का क्रमशः न्यास करे । ॥५८-६६½॥ “आद्या ˙ ˙ ˙ ˙ ˙ ˙ नमः” इस मन्त्र को पढ़कर हृदय, स्कंध, नाभि, उदर, पृष्ठ, वक्ष तथा उर में विधि-पूर्वक आठ कलाओं का न्यास करे । अघोरों के लिये पहली कलाघोरों के लिये मोहा, अघोरों के अन्त में क्षमा, घोरतरों के लिये निद्रा, शर्वेवों के लिये व्याधि, छठी कला मृत्यु, रुद्ररूपों के लिये सातवीं कला क्षुधा ओर आठवीं कला तृषा कही गई है ।

\hfill एकनवतितमोऽध्यायः \hfill ८५१

व्याधिस्तु पंचमी प्रोक्ता शर्वेभ्यस्तदनंतरम् । मृत्युर्निगदिता षष्ठी नमस्ते अस्तु तत्परम् ॥७३॥ क्षुधा स्यात्सप्तमी रुद्ररूपेभ्यः कथिता तृषा । अष्टमी कथिता एता ध्रुवाद्या नमसान्विताः ॥७४॥ गुह्ययुग्मोरुयुग्मेषु जानुजंघास्फिजोः पुनः । कट्यां पार्श्वद्वये वामकला न्यस्येत्त्रयोदश ॥७५॥ प्रथमा वामदेवाय नमोऽंते स्याद्रजा कला । स्याज्ज्येष्ठाय नमो रक्षा द्वितीया परिकीर्तिता ॥७६॥ कलकामा पंचमी स्यात्ततो विकरणाय च । नमः संयमनी षष्ठी कथिता तदनंतरम् ॥७७॥ बलक्रिया सप्तमीष्टा कला विकरणाय च । नमो वृद्धिस्र्व्वष्टमी स्याद्बलांते च स्थिरा कला ॥७८॥ पश्चात्प्रमथनायांते नमो रात्रिरुदीरिता । सर्वभूतदमनाय नमो॑ते भ्रामणी कला ॥७९॥ नमोऽन्ते मोहिनी प्रोक्ता मन्त्रज्ञैर्द्वादशी कला । मनोन्मन्यै नमः पश्चाज्ज्वरा प्रोक्ता त्रयोदशी ॥८०॥ प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यंता नमोतास्तु प्रकीर्तिताः । पाददोस्तननासासु मूर्ध्नि बाहुयुगे न्यसेत् ॥८१॥ सद्योजातभवाः सम्यगष्टौ मन्त्राः कलाः क्रमात् । सद्योजातं प्रपद्यामि सिद्धिः स्यात्प्रथमा कला ॥८२॥ सद्योजाताय वै भूयो नमः स्याद् बुद्धिरीरिता । भवेद्युतिस्तृतीया स्याद्भववे तदनंतरम् ॥८३॥ लक्ष्मी चतुर्थी कथिता ततो नातिभवेपदम् । मेधा स्यात्पञ्चमी प्रोक्ता कलाभूयो भवस्व माम् ॥८४॥ प्राज्ञा समीरीता षष्ठी भवांते स्यात्प्रभा कला । उद्भबाय नमः पश्चात्सुधा स्यादष्टमी कला ॥८५॥ प्रणवाद्याश्चतुर्थ्यंता कला सर्वा नमोन्विताः । अष्टांत्रिशत्कलाः प्रोक्ताः पंच ब्रह्मपदादिकाः ॥८६॥ इति विन्यस्तदेहोऽसौ भवेद्गंगाधरः स्वयम् । ततः समाहितो भूत्वा ध्यायेद्देवं सदाशिवम् ॥८७॥ सितपीतासितश्वेतजपामैः पंचभिर्मुखैः । अक्षैर्युक्तं ग्लौमुकुटं कोटिपूर्णेंदुसंप्रभम् ॥८८॥ शूलं टंकं कृपाणं च वज्राम्न्यहिपतीन्करैः । दधानं भूषणोद्दीप्तं घण्टापाशवराभयान् ॥८९॥ एवं ध्यात्वा जपेन्मंत्रं पञ्चलक्षं मधुप्लुतैः । प्रसूनैः करवीरोत्थैर्जुहुयात्तद्दशांशतः ॥९०॥ पूर्वोदिते यजेत्पीठे मूर्तिं मूलेन कल्पयेत् । आवाह्य पूजयेत्तस्यां मूर्त्तावावरणैः सह ॥९१॥

गुह्य प्रदेश, ऊरुयुग्म, जानु, जंघा, चूतड़, कटि, तथा दोनों पाश्वों में तेरह वामकलाओं का न्यास करना चाहिये । वामदेव के लिये पहली कला रजा बताई गई है, ज्येष्ठ के लिये रक्षा और विकरण के लिये कल- कामा । चौथी कला संयमनी, पांचवीं बलक्रिया, छठी वृद्धि, सातवीं स्थिरा, आठवीं रात्रि, नवीं भ्रामणी, दशवीं मोहिनी, ग्यारहवीं मनोन्मनी, बारहवीं ज्वरा, और तेरहवीं बना कहलाती हैं ॥६७-८०॥ इनके आदि में प्रणव और अन्त में चतुर्थी विभक्ति तथा नमः शब्द आते हैं। चरण, भुजा, स्तन, नासिका तथा मस्तक पर आठ सद्योजात मन्त्रकलाओं का न्यास करना चाहिये । सिद्धि, वृद्धि, द्युति, लक्ष्मो, मेधा, प्राज्ञा, प्रभा तथा सुधा- ये आठ सद्योजात कलायें हैं । इनके आदि में प्रणव तथा अन्त में चतुर्थी विभक्ति और नमः शब्द आते हैं। इस तरह पाँच ब्रह्मपदा आदि को मिलाकर अड़तीस कलायें होती हैं ॥८१-८६॥

जो व्यक्ति उपर्युक्त प्रकार से शरीर न्यास करता है, वह साक्षात् शिव होता है । इसके बाद समा- हित होकर सित, पीत, असित श्वेत तथा रक्तवर्ण वाले पाँच मुखों से युक्त, रुद्राक्ष एवम् देदीप्यमान मुकुट धारण करने वाले, कोटि पूर्णचन्द्र के समान प्रभा वाले, करों में त्रिशूल, टंक, कृपाण, वज्र, अग्नि, अहिपति, घण्टा पाश, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले और आभूषणों से विभूषित शंकर का ध्यान कर पाँच लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुयुक्त करवीर के पुष्पों से हवन करे। फिर पूर्वकथित पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर आवाहन करके पूजन करे ॥८७-६१॥ मूर्ति में आवरणों के साथ पूजन करना

८५२ नारदीयपुराणम् शक्तिं डमरुकाभीतिवरान्संदधतं करैः । ईशानं त्रीक्षणं शुभ्रमैशान्यं दिशि पूजयेत् ॥६२॥ परश्वेणवराभीतिर्दधानं विद्युदुज्ज्वलम् । चतुर्मुखं तत्पुरुषं त्रिनेत्रं पूर्वतोऽर्चयेत् ॥६३॥ अक्षस्रजं वेदपाशो ऋषिं डमरुकं ततः । खट्वांगं निशितं शूलं कपालं बिभ्रतं करैः ॥६४॥ अंजनाभं चतुर्वक्त्रं भीमदंतं भयावहम् । अघोरं त्रीक्षणं याम्ये पूजयेन्मंत्रवित्तमः ॥६५॥ कुंकुमाभचतुर्वक्त्रं वामदेवं त्रिलोचनम् । हरिणाक्षगणाभीतिवरहस्तं चतुर्मुखम् ॥६६॥ बालेंदुशेखरोल्लासिमुकुटं पश्चिमे यजेत् । कर्पूरेंदुनिभं सौम्यं सद्योजातं त्रिलोचनम् ॥६७॥ वराभयाक्षवलयकुठारान्संदधतं करैः । विलासिनं स्मेरवक्त्रं सौम्ये सम्यक्समर्चयेत् ॥६८॥ कोणेष्वर्चेश्चिन्निवृत्त्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात् । विघ्नेश्वराननन्ताद्यान्पत्रेषु परितो यजेत् ॥६९॥ उमादिकास्ततो बाह्ये शक्राद्यानायुधैः सह । इति संपूज्य देवेशं भक्त्या परमया युतः ॥१००॥ प्रीणयेन्नृत्यगीताद्यैः स्तोत्रैमंत्रौ मनोहरैः । तारो मायावियद्विंदुमनुस्वरसमन्वितः ॥१०१॥ पञ्चाक्षरसमायुक्तो वसुवर्णो मनुर्मतः । पंचाक्षरोक्तवत्कुर्यादंगन्यासादिकं बुधः ॥१०२॥ सिंदूराभं लसद्रत्नमुकुटं चन्द्रमौलिनम् । दिव्यभूषांगरागं च नागयज्ञोपवीतिनम् ॥१०३॥ वामोरुस्थप्रियारोज न्यस्तहस्तं च बिभ्रतम् । वेदटंकेंष्टमभयं ध्यायेत्सर्वेश्वरं शिवम् ॥१०४॥ अष्टलक्षं जपेन्मंत्रं तत्सहस्रं घृतान्वितैः । पायसैर्जुहुयात्पीठे मूर्तिं संकल्य मूलतः ॥१०५॥ चाहिये । ईशान कोण में शक्ति, डमरु, अभयास्त्र, तथा वरास्त्र को हाथों में रखने वाले तीन नेत्रों वाले और शुक्लवर्ण वाले शंकर की पूजा करे। पूर्व दिशा में परशु, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, विद्युत् के समान चमकने वाले, चार मुख तथा तीन नेत्रों वाले शिव की अर्चना करे । दक्षिण दिशा में रुद्राक्ष की माला, वेद, पाश, डमरु, खट्वांग, तीक्ष्ण त्रिशूल तथा कपाल धारण करनेवाले, अंजन के समान आभा वाले, चार मुख तथा भयंकर दांत वाले, भयानक, अघोर एवम् त्रिनयनयुक्त शंभु की पूजा करे । पश्चिम दिशा में कुंकुम के सदृश प्रभावोले, चार मुख एवम् तीन नेत्र वाले, करों में रुद्राक्ष, अभयास्त्र, तथा वरास्त्र, धारणा करने वाले ललाट पर बाल चन्द्र से सुशोभित मुकुट वाले वामदेव की पूजा करे उत्तर दिशा में कर्पूर तथा इन्दु के समान धवल, तीन नेत्रों वाले, हाथों में वरास्त्र, अभयास्त्र, रुद्राक्ष तथा कुठार धारण करने वाले, मंद मुसकान से सुशोभित मुख वाले, विलासी महादेव की आराधना करे ॥६२-९८॥ कोणों में निवृत्ति आदि तेजोरूप कलाओं की क्रमशः पूजा कर चारों ओर पत्रों पर विघ्नेश्वर, अनन्त आदि देवों की अर्चना करे । बारह उमा आदि देवियों तथा आयुध सहित शक्र आदि देवों का पूजन करे । मन्त्री इस प्रकार परम भक्ति से देवेश कीपूजा कर नृत्य, गीत, तथा मनोहर स्तोत्र आदि से उनको प्रसन्न करे । प्रणव, माया वियत् तथा बिंदुयुक्त मन्त्र अष्टाक्षर मन्त्र कहलाता है । सुधी व्यक्ति इसमें भी पंचा- क्षर मन्त्र की तरह अंगन्यास आदि करे । तत्पश्चात् सिंदूर के समान आभा वाले, ललाट पर चंद्रमा को धारण करने वाले, रत्न मुकुट, दिव्य आभूषण, अंगराग तथा नागयज्ञोपवीत से विभूषित, बांयी जंघे पर बैठी प्रिया के उरोज पर हाथ रखने वाले, वेद, टंक, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले सर्वेश्वर शिव का ध्यान कर आठ लाख मन्त्र का जप करे । और उतने ही सहस्र घृतयुक्त खीर से हवन करे । अनन्तर पीठ पर मूल- मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर सांगोपांग पूजन करे । बारह उमा आदि देवियों तथा आयुध समेत शक्र आदि देवों की पूजा करनी चाहिये ।

अंगैरावरणं पूर्वमनंताद्यैरनन्तरम् । उमादिभिः समुद्दिष्टं तृतीयं लोकनायकैः ॥१०६॥ चतुर्थं पंचमं तेषामायुधैः परिकीर्तितम् । एवं प्रतिदिनं देवं पूजयेत्साधकोत्तमः ॥१०७॥ पुत्रपौत्रादिकां लक्ष्मीं संप्राप्य ह्यत्र मोदते । तारः स्थिरा सर्कर्णेन्दुर्भृगुः सर्गसमन्वितः ॥१०८॥ अक्षरात्मा निगदितो मन्त्रो मृत्युञ्जयात्मकः । ऋषिः कहोलो देव्यादिगायत्री छन्द ईरितम् ॥१०९॥ मृत्युञ्जयो महादेबो देवतास्य समीरितः । भृगुणा दीर्घयुक्तेन षडंगानि समाचरेत् ॥११०॥ चंद्रांकहुतभुङ्नेत्रं स्मितास्यं युग्मपद्मगम् । मुद्रापाशैणाक्षसूत्रलसत्पाणिं शशिप्रभम् ॥१११॥ मालेन्दुविगलत्पीयूषप्लुतांगमलंकृतम् । हाराद्यैर्निजकांत्या तु ध्यायेद्विश्वविमोहनम् ॥११२॥ गुणलक्षं जपेन्मन्त्रं तद्दशांशं हुनेत्सुधीः । अमृताशकलैः शुद्धदुग्धाज्यसमभिप्लुतैः ॥११३॥ शैवे संपूजयेत्पीठे मूर्ति संकल्पमलतः । अंगावरणमाराध्य पश्चाल्लोकेश्वरान्यजेत् ॥११४॥ तवस्त्राणि ततो बाह्ये पूजयेत्साधकोत्तमः । जपपूजादिभिः सिद्धे मन्त्रेऽस्मिन्मुनिसत्तमः ॥११५॥ कुर्यात्प्रयोगान्कल्पोक्तानभीष्टफलसिद्धये । दुग्धसिक्तैः सुधाखंडैर्हुत्वा प्रत्यहमादरात् ॥११६॥ सहस्रमासपर्यंतं लभेदायुर्धनं सुतान् । सुधावटतितान्पूर्वापयः सर्पिः पयो हविः ॥११७॥ सप्त द्रव्याणि वारेषु क्रमाद्दशशतं हुनेत् । सप्ताधिकान् द्विजान्नित्यं भोजयेन्मधुरान्वितम् ॥११८॥ ऋत्विग्भ्यो दक्षिणां दद्यादरुणां गां पयस्विनीम् । गुरुं संप्रीणयेत्पश्चाद्धनाद्यैर्देवताबिया ॥११९॥ अनेन विधिना साध्यः कृत्याद्रोहज्वरादिभिः । विमुक्तः सुचिरं जीवेच्छरदां शतमज्जसा ॥१२०॥ अभिचारे ज्वरे स्तंभघोरोन्मादे शिरोगदे । असाध्यरोगे श्वेडातौ मोहे दाहे महाभये ॥१२१॥ होमोऽयं शांतिदः प्रोक्तः सर्वाभयप्रदायकः । द्रव्यैरेतैः प्रजुहुयात्त्रिजन्मसु यथाविधि ॥१२२॥

जो साधक प्रतिदिन इस तरह शंकर को अर्चना करता है वह पुत्र, पौत्र तथा लक्ष्मी को प्राप्त कर आनन्द करता है ॥९९-१०७॥ तार, स्थिर, कर्ण, इन्दु, भृगु, तथा सर्ग सहित अक्षर रूप मन्त्र मृत्युंजय कहा गया है, इसके ऋषि कहोल, छन्द गायत्री और देवता मृत्युंजय महादेव माने गये हैं। दीर्घयुक्त भृगु से षडंग- न्यास करना चाहिये । तदनन्तर सूर्य, चंद्र तथा अग्निरूप नेत्र वाले, मंद मुसकान से युक्त मुखवाले, पद्मों पर आसीन होनेवाले, मुद्रा, पाश, मृगचर्म तथा अक्षसूत्र से सुशोभित पाणिवाले शशि के समान प्रभावाले, ललाट स्थित चंद्रमा से टपकते हुए अमृत से सिक्त गात्रवाले और हार आदि से अलंकृत विश्व विमोहन शिव का ध्यान कर विज्ञ व्यक्ति तीन लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश शुद्ध दूध तथा घी से युक्त गुडूच की समिधा से हवन करे । उत्तम साधक शैव पीठ पर मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर सांगोपांग देव की पूजा करे । पीठ से बाहर आयुध सहित लोकपालों को भी अर्चना करनी चाहिये ॥१०८-११४॥ मुनिश्रेष्ठ ! जप, पूजा आदि से मन्त्र सिद्ध हो जाने पर अभीष्ट-फल-प्राप्ति के लिये मन्त्र का प्रयोग करे । प्रतिदिन दुग्धसिक्त गुडूच के खण्डों से आदर पूर्वक होम करे । एक मास तक ऐसा करने से आयु, धन तथा पुत्रों की प्राप्ति होती हैं। गुडूची की समिधा, दूध, घी तथा सात द्रव्यों से एक सहस्र होम करे, सात से अधिक ब्राह्मणों को नित्य मधुर भोजन कराये । ऋत्विजों को पयस्विनी गो दक्षिणा में दे और गुरू को देव बुद्धया धन आदि से संतुष्ट करे । इस तरह साधन करने से मनुष्य कृत्या, द्रोह, ज्वर आदि से विमुक्त होकर आनन्दपूर्वक सो वर्ष जीता है । यह होम भूतोपद्रव, ज्वर, स्तंभन, घोर उन्माद, शिरोव्यथा, असाध्यरोग, कफ, मोह, दाह तथा महाभय को शान्त करनेवाला तथा भयनाशक है ॥११५-१२१॥ तीन बार जन्म नक्षत्रों के दिन उपर्युक्त द्रव्यों से विधिपूर्वक हवन तथा वेदपारंगत विप्रों को मधुर भोजन कराने से दीर्घ आयु और अभिलषित श्री को

८५४ नारदीयपुराणम् भोजयेन्मधुरैर्भोज्यैर्ब्राह्मणान्वेदपारगान् । दीर्घमायुरवाप्नोति वांछितां विदति श्रियम् ॥१२३॥ एकादशाहुतीर्नित्यं दूर्वाभिर्जुहुयाद् बुधः । अपमृत्युजिदेव स्यादायुरारोग्यवर्द्धनम् ॥१२४॥ त्रिजन्मसु सुधावल्लीकाश्मीरीबकुलोद्भवैः । समिद्वरैः कृतो होमः सर्वमृत्युगदापहः ॥१२५॥ सिद्धार्थैर्विहितो होमो महाज्वरविनाशनः । अपामार्ग समिद्धोमः सर्वमयनिषूदनः ॥१२६॥ दक्षिणामूर्तये पूर्वं तुभ्यं पदमनंतरम् । वटमूलपदस्यांते प्रवदेच्च निवासिने ॥१२७॥ ध्यानेकनिरतांगाय पश्चाद् ब्रूयान्नमः पदम् । रुद्राय शंभवे तारशक्तिरुढोऽयमीरितः ॥१२८॥ षट्त्रिंशदक्षरो मंत्रः सर्वकामफलप्रदः । मुनिः शुकः समुद्दिष्टश्छंदोऽनुष्टुप्प्रकीर्तितम् ॥१२९॥ देवता दक्षिणामूर्तिर्नाम्ना शंभुरुदीरितः । तारशक्तियुतैः पूर्वं ह्रीमाद्यैस्तैश्च मंत्रजैः ॥१३०॥ षट्ष्वष्ठाष्टेषु वह्निचर्णैर्हृदयाद्यंगकल्पनम् । मूर्ध्नि भाले दृशोः श्रोत्रे गंडयुग्मे सनासिके ॥१३१॥ आस्यदोःसंधिषु गले स्तनहृन्नाभिमंडले । कट्यां गुह्ये पुनः पादसंधिष्वर्णान्यसेन्मनोः ॥१३२॥ व्यापकं तारशक्तिभ्यां कुर्याद्देहे ततः परम् । हिमाचलतटे रम्ये सिद्धकिन्नरसेविते ॥१३३॥ विविधद्रुमशाखाभिः सर्वतो वारितातपे । सुपुष्पितैलताजालैराश्लिष्टकुसुमद्रुमे ॥१३४॥ शिलाविवरनिर्गच्छन्निर्झरानिलशीतले । गायद्देवांगनासंघे नृत्यद्वर्हिकदम्बके ॥१३५॥ कूजत्कोकिलसंघेन मुखरीकृतदिक्मुखे । परस्परविनिर्मुक्तमात्सर्यमृगसेविते ॥१३६॥ जलजैः स्थलजैः पुष्पैरामोदिभिरलंकृते । आद्यैः शुकाद्यैर्मुनिभिरजस्रसुखसेविते ॥१३७॥ पुरंवरमुखैर्देवैः सांगनाथैर्विलोकिते । वटवृक्षं महोच्छ्रायं पद्मरागफलोज्ज्वलम् ॥१३८॥ प्राप्ति होती है । नित्य दूर्वाओं से ग्यारह आहुतियां देने से अपमृत्यु का नाश एवम् आयु और आरोग्य की वृद्धि होतो है । तीन जन्मक्षत्रों में गुडूच, कुंकुम तथा मोलसिरी की समिधा से होम करने से सकल अपमृत्युओं का नाश होता है । उजले सरसों से हवन करने से महाज्वर का नाश होता है । अपामार्ग की समिधा से होम करने से समस्त रोगों का नाश होता है ॥१२२-१२६॥ पहिले ‘दक्षिणामूर्ति’ पश्चात् ‘तुभ्यम्’ पद को रखे । फिर ‘वटमूल’ पद को रख कर अन्त में ‘निवासिने’ ‘ध्यानेकनिरतांगाय’, ‘नमः’, ‘तारशक्ति’ और ‘रुद्राय शंभवे’ को जोड़े । इस तरह यह छत्तीस अक्षरों का मन्त्र समस्त कामनाओं को पूर्ण करता है । इसके मुनि शुक हैं, छन्द अनुष्टुप् है ओर देवता दक्षिणामूर्ति हैं । शंभु के नाम से इसका व्यवहार होता है । आदि अन्त में ‘ह्रीं’, ‘मा’, तथा तारशक्ति से युक्त मन्त्रों से छह एवम् आठ अंगों का न्यास करे । मस्तक, भाल, नेत्र, कर्ण, कपोल, नासिका, मुख, भुजा, अस्थिसंधि, कंठ, स्तन, नाभि, कटि, गुह्य तथा पाद संधियों में मन्त्रवर्णों का न्यास करे ॥१२७-१३२॥ शरीर में स्मर तथा शक्तियों से व्यापक न्यास करे । तत्पश्चात् रमणीय हिमालय के तट पर वटवृक्ष के मूल में आसीन शंकर का न्यास करे । कल्पना करे कि हिमालय का तट सिद्ध तथा किन्नरगणों से सुसेवित हैं । वहाँ विविध वृक्ष लगे हुए हैं, जिनकी शाखायें धूप को नहीं आने देतीं । वृक्षों में नाना प्रकार के फूल खिले हुए हैं । लतायें, वृक्षों से लिपट कर शोभा बढ़ा रही हैं । शीतल वायु तथा खिले मन को आनन्दित कर देती हैं । देवांगनायें गाती हैं, मयूर नाचते हैं । कोकिल समूह अपने कलरव से दिशाओं को प्रतिध्वनित करते हैं । इन्द्र आदि देवगण अपनी अपनी प्रियतमाओं के साथ उस स्थान को देखने के लिये आते हैं । उसी स्थान में एक महाविशाल वटवृक्ष अवस्थित है, उसके फल पद्मराग मणि की तरह उज्ज्वल होते हैं ॥१३३-१३८॥ पत्र नो रत्नों के बने हुए से प्रतीत होते हैं । वे बहुत

गारुत्मतमयैः पत्रैर्निबिडैरुपशोभितम् । नवरत्नमयाकल्पैर्विमानैरलंकृतम् ॥१३६॥ संसारतापविच्छेदकुशलच्छायमद्भुतम् । तस्यमूले सुसंकॢप्तरत्नसिंहासने शुभे ॥१४०॥ आसीनमसिताकल्पं शरच्चंद्रनिभाननम् । कैलासाद्रिनिभं त्र्यक्षं चंद्रांकितकपर्दकम् ॥१४१॥ नासाग्रालोकनपरं वीरासनसमाश्रितम् । भद्राटके कुरंगाढ्यजानुस्थकरपल्लवम् ॥१४२॥ कक्षाबद्धभुजंगं च सुप्रसन्नं हरं स्मरेत् । अयुतद्वयसंयुक्तगुणलक्षं जपेन्मनुम् ॥१४३॥ तद्दशांशं तिलैः शुद्धैर्जुहुयात्क्षीरसंयुतैः । पंचाक्षरोविते पीठे तद्विधानेन पूजयेत् ॥१४४॥ भिक्षाहारो जपेन्मासं मनुमेमं जितेंद्रियः । नित्यं सहस्रमष्टाढ्यं परां विंदति वाग्विभूयम् ॥१४५॥ त्रिवारं जप्तमेतेन पयस्तु मनुना पिबेत् । दक्षिणामूर्तिसंधानाच्छास्त्रव्याख्यानकृद्भवेत् ॥१४६॥ प्रणवो हृदयं पश्चाद्भवेद्भगवतेपदम् । ङेयुतं दक्षिणामूर्ति महामेधामुपोरयेत् ॥१४७॥ प्रयच्छ ठद्वयांतोऽयं द्वाविंशत्यक्षरो मनुः । मुनिश्चतुर्मुखश्छंदो गायत्री देवतोदिता ॥१४८॥ ताररुद्धैः स्वरैर्दीर्घैः षड्भिरंगानि कल्पयेत् । पदैर्मंत्रभवैर्वापि ध्यानाद्यं पूर्ववन्मतम् ॥१४९॥ लोहितोऽन्यासतः सद्यो बिंदुमान्प्रथमं ततः । द्वितीयं वह्निबीजस्था दीर्घा शांत्यांदुभूषिता ॥१५०॥ तृतीया लांगलीशार्णमंत्रो बीजत्रयान्वितः । नीलकंठात्मकः प्रोक्तो विषद्वयहरः परः ॥१५१॥ हरद्वयं वह्निजाया हृदयं परिकीर्तितम् । कपर्दिने पदयुगं शिरोमंत्र उदाहृतः ॥१५२॥ नीलकंठाय द्वंद्वंदं शिखामंत्रोऽयमीरितः । कालकूटपदस्यांते विषभक्षणडेयुतम् ॥१५३॥ हुं फट् कवचमुद्दिष्टं नीलकंठिन इत्यतः । स्वाहांतमस्त्रमेतानि पंचांगानि मनोर्विदुः ॥१५४॥ मूर्ध्नि कंठे हृदंभोजे क्रमाद्बीजत्रयं न्यसेत् । बालार्कयुतवर्चस्कं जटाजूटेंदुशोभितम् ॥१५५॥


सघन तथा मरकतमणि के समान नील हैं। छाया संसार के ताप को विनष्ट करती है। उस वृक्ष के मूल में शुक्लकाय शंकर विराजमान हैं, उनका मुख शरत्कालीन चंद्रमा के समान है। शरीर की आभा कैलासपर्वत जैसी है, नेत्र तीन हैं। भाल चंद्रमा से सुशोभित है। दृष्टि नासिका के अग्र भाग पर गिर रही है। स्वयं वीरासन लगाये हुए हैं। जानु पर करपल्लव रखे हुए हैं। उनके कक्षों में सर्प बन्धे हुए हैं और मन में अत्यन्त प्रसन्नता है, ऐसे शिव का ध्यान कर तीन लाख बीस हजार मन्त्र का जप करे। और उसका दशांश क्षीरयुक्त शुद्ध तिलों से हवन करे। पश्चात् पंचाक्षर मन्त्र से पीठ पर विधान पूर्वक पूजन करे ॥१३९-१४४॥ जो व्यक्ति एक मास तक भिक्षाटन करते हुए इंद्रिय निग्रह पूर्वक नित्य एक हजार आठ बार उपर्युक्त मंत्र का जप करता है, वह महाश्री तथा वाणी को प्राप्त करता है। जो दक्षिणामूर्ति का ध्यान करते हुए इस मन्त्र को तीन बार जप कर जल पीता है, वह शास्त्रव्याख्याता होता है। 'प्रणव ..... तोयम्'--यह बाईस अक्षरों का मंत्र है। इसके ऋषि चतुर्मुख हैं। छंद गायत्री है, और देवता दक्षिणामूर्ति हैं। मन्त्र के तारयुक्त दीर्घ वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये। मंत्र के पदों से ध्यान आदि पूर्ववत् करना चाहिये ॥१४५-१४९॥ "लोहित ... लांगली"--यह ईशाणमन्त्र है। "नीलकंठ ... पदयुगम्"--यह शिरो मंत्र है। "नील- कंठाय द्वन्द्वम्"--यह शिखामन्त्र है। 'कालकूट' पद के अन्त में 'विषभक्षण' से लेकर 'स्वाहा' तक जोड़ने से पंचांग मन्त्र बनता है। मस्तक, कंठ तथा हृत्कमल में क्रमशः तीनों बीजों का न्यास करे। तदनन्तर बालचन्द्र के समान तेजस्वी, जटाकलाप से उपशोभित, सर्पों से विभूषित हाथों में जपवटी, त्रिशूल, ब्रह्मकपाल तथा खट्वांग धारण करने वाले त्रिनेत्र शिव का ध्यान कर तीन लाख मंत्र का जप करे और उसका दशांश घी से

८५६ नारदीयपुराणम् नागभूषं जपवटीं शूलं ब्रह्मकपालकम् । खट्वांगं दधतं दोर्भित्रिनेत्रं चिंतयेद्धरम् ॥१५६॥ लक्षत्रयं जपेन्मंत्रं तद्दशांशं ससर्पिषा । हविषा जुहुयात्सम्यक्संस्कृते हव्यवाहने ॥१५७॥ शैवं पीठे यजेद्देवं नीलकंठं समाहितः । मृत्युंजयविधानेन विषद्वयविनाशनम् ॥१५८॥ अग्निः संवर्तकादित्यरानिलौ षष्टिर्बिंदुमान् । चिंतामणिरिति ख्यातं बीजं सर्वसमृद्धिदम् ॥१५९॥ कश्यपो मुनिश्र्ाख्यातश्छंदोऽनुष्टुबुदाहृतम् । अर्धनारीश्वरः प्रोक्तो देवता जगतां पतिः ॥१६०॥ रेफादिव्यंजनैः षड्भिः कुर्यादंगानि षट् क्रमात् । त्रिनेत्रं नीलमणिभं शूलपाशं कपालकम् ॥१६१॥ रक्तोत्पलं च हस्ताब्जैर्दधतं चारुभूषणम् । बालेंदुबद्धमुकुटमर्धनारीश्वरं स्मरेत् ॥१६२॥ एकलक्षं जपेन्मंत्रं त्रिंशतं मधुराप्लुतैः । तिलैहुनेद्यजेत्पीठे शैवेगावरणैः सह ॥१६३॥ वृषाद्यैर्मातृभिः पश्चाल्लोकपालैस्तदायुधैः । प्रासादाद्यं जपेन्मंत्रमयुतं रोगशांतये ॥१६४॥ स्वाहावृत्तमिदं बीजं विगलत्परमामृतम् । चंद्रबिम्बस्थितं मूर्ध्नि ध्यातं श्लेष्मगदापहम् ॥१६५॥ प्रतिलोमस्वराढ्या च बीजं वह्निगृहे स्थितम् । रेफादिव्यंजनोल्लासिषट्कोणाभिवृतं बहिः ॥१६६॥ भूतार्तस्य स्मृतं मूर्ध्नि भूतमाशु विनाशयेत् । पीडितांगे स्मृतं तत्तत्पीडां शमयति ध्रुवम् ॥१६७॥ प्रणवो हृदयं पश्चान् ड़ेन्तः पशुपतिः पुनः । तारो नमो भूतपदं ततोऽधिपतये ध्रुवम् ॥१६८॥ नमो रुद्राय युगलं खड्गरावण शब्दतः । विहरद्वितयं पश्चान्नरीनृत्ययुगं पृथक् ॥१६९॥ श्मशानभस्माचितांते शरण्याय ततः परम् । घंटाकपालमालाविधरायति पदं पुनः ॥१७०॥ व्याघ्रचर्मपदस्यांते परिधानाय तत्परम् । शशांककृतशब्दांते शेखराय ततः परम् ॥१७१॥ कृष्णसर्पपदात्पश्चाद्वेद्येत्युपवीतिने । बलयुग्मं चलायुग्ममनिर्वर्तकपालिने ॥१७२॥ हनुयुग्मं ततो भूतास्त्रासयद्वितयं पुनः । भूयो मंडलमध्ये स्यात्कटयुग्मं ततः परम् ॥१७३॥ रुद्रांकुशेन शमय प्रवेशययुगं ततः । आवेशययुगं पश्चाच्चंडासिपदमीरयेत् ॥१७४॥

सुसंस्कृत अग्नि में हवन करे । सावधान होकर शैव पीठ पर नीलकंठ देव की अर्चना करे । दोनों प्रकार के विष नष्ट करने वाले शंकर की मृत्युंजय मंत्र से पूजा करनी चाहिये ॥१५०-१५८॥ "अग्निः · · · · · ·चिंतामणिः" --यह बीज मन्त्र है । इसके मुनि कश्यप हैं । छंद अनुष्टुप् है और देवता अर्धनारीश्वर जगत्पति शंकर हैं । रेफ आदि छह व्यंजनों से क्रमशः षडंगन्यास करके तीन नेत्र वाले, नीलमणि के समान आभावाले, करकमलों में त्रिशूल, पाश, कपाल तथा रक्तकमल धारण करने वाले, सुन्दर आभूषण पहननेवाले, बालचंद्र से संबद्ध मुकुटवाले अर्धनारीश्वर शंकर का ध्यान करे । पश्चात् एक लाख मन्त्र जप और तीन सौ बार मधुरयुक्त तिलों से हवन करे ॥१५९-१६३॥ फिर शैव पीठ पर अंगावरणों के साथ शंकर का पूजन कर मातृगण, आयुध सहित लोकपाल तथा नंदी आदि देवों की अर्चना करे । इस मंत्र के दश हजार जप करने से रोगशान्ति होती है । यह बीज मन्त्र स्वाहा से आवृत है, परम अमृत रूप है । मस्तक पर इसका ऐसा ध्यान करे कि यह चंद्रबिंब में अवस्थित है । इस तरह करने से कफरोग का नाश होता है । प्रति लोमस्वरसंपन्न बीज मंत्र वह्निगृह में संस्थित होता है । उसके छह कोण रेफ आदि व्यंजनों से सुशोभित हैं । जो भूतपीड़ा से दुःखी हो, उसके शिर को इस मंत्र से अभिमन्त्रित कर देने पर भूत शीघ्र नष्ट हो जाता है । अंगों में चाहे किसी प्रकार की पीड़ा हो, इसके जप से तुरन्त शान्त हो जाती है । "प्रणवः · · · · · ·" यहाँ से लेकर "अग्निसुन्दरी · · · · · ·" पर्यन्त पदों को जोड़ने से सौ से

एकनवतितमोऽध्यायः ८५७ धारादिपतिरुद्रोऽयं ज्ञापयत्यनिसुन्दरी । खङ्गरावणमंत्रोऽयं सप्तत्यूर्ध्वशताक्षरः ॥१७५॥ भूताधिपतये स्वाहा पूजामन्त्रोऽयमीरितः । सिद्धमन्त्रोऽयमुदितो जपादेव प्रसिद्ध्यति ॥१७६॥ अयुतद्वितयात्पश्चाद्भूतादिग्रहणे क्षमः । माया स्फुरद्वयं भूयः प्रस्फुरद्वितयं पुनः ॥१७७॥ घातयद्वितयं वर्म फडन्तः समुदीरितः । एकपंचाशद्वर्णोऽयमघोरास्त्रं महामनुः ॥१७८॥ अघोरोऽस्य मुनिः प्रोक्तस्त्रिष्टुप्छंद उदाहृतम् । अघोररुद्रः संदिष्टो देवता मन्त्रनायकः ॥१७९॥ हृदयं पंचभिः प्रोक्तं शिरः षड्भिरुदाहृतम् । शिखा दशभिराख्याता नवभिः कवचं मतम् ॥१८०॥ वसुवर्णैः स्मृतं नेत्रं दशाणैरस्त्रमीरितम् । मूर्ध्नि नेत्रास्यकंठेषु हृन्नाभ्यामूरुषु क्रमात् ॥१८१॥ जानुजंघापदद्वंद्वे रुद्रभिन्नाक्षरैर्न्यसेत् । पञ्चषट्काष्टवेदांगद्विद्व्यब्धिरसलोचनैः ॥१८२॥ श्यामं त्रिनेत्रं सर्पाढ्यं रक्तवस्त्रांगरागकम् । नानाशस्त्रधरं ध्यायेदघोराख्यं सदाशिवम् ॥१८३॥ भूतवेतालकादीनां क्षमोऽयं निग्रहे मनुः । तारो वांतो धरासंस्थो वामनेत्रेंदुभूषितः ॥१८४॥ पाशी बकः कर्णनेत्रवर्मास्त्रांतः षडक्षरः । मनुः पाशुपतास्त्राख्यो ग्रहक्षुद्रनिवारणः ॥१८५॥ षड्भिर्वर्णैः षडंगानि हुंफडंतैः सजातिभिः । मध्याह्नाकप्रभं भीमं त्र्यक्षं पन्नगभूषणम् ॥१८६॥ नानाशस्त्रं चतुर्वक्त्रं स्मरेत्पशुपति हरम् । वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः ॥१८७॥ गव्येन सर्पिषा मन्त्रो संस्कृते हव्यवाहने । शैवे पीठे यजेदंगमातृलोकेशवरायुधैः ॥१८८॥ अनेन मन्त्रितं तोयं भूतग्रस्तमुखे क्षिपेत् । सद्यः स मुंचति ह्येतन्महामंत्रप्रभावतः ॥१८९॥ अनेन मन्वितान्बाणान्स्त्वित्सृजेद्युधि यो नरः । जयेत्क्षणेन निखिलाञ्छत्रून्पार्थ इवापरः ॥१९०॥ वर्णान्तिमो बिंदुयुतः क्षेत्रपालाय हृन्मनुः । ॥१९१॥

अधिक अक्षरों वाला मन्त्र बनता है । "भूताधिपतये स्वाहा" यह पूजा का मन्त्र कहा गया है। इसको सिद्धमन्त्र भी कहते हैं। जप से ही इसकी सिद्धि हो जाती है ॥१६४-१७६॥ "अयुत................... फट्" - यह अघोरास्त्र नामक महामन्त्र है। इसके ऋषि अघोर हैं, छंद त्रिवृत् है और मन्त्रनायक देवता अघोररुद्र हैं। इसके पाँच अक्षरों से हृदय, छह अक्षरों से शिर, दश से शिखा, नौ से कवच, आठ से नेत्र और दस से अस्त्र कहे गये हैं। मस्तक, नेत्र, मुख, कंठ, हृदय, नाभि, ऊरु, जानु, जंघा तथा पादद्वय में पाँच, छः, आठ, छः, दो, दो, चार, छः, एवम् दो में रुद्र (११) भिन्न अक्षरों से न्यास करना चाहिये । तत्पश्चात् श्यामवर्ण, त्रिनेत्र, सर्पभूषित, रक्तवस्त्र, अंगराग तथा अनेक शस्त्र धारण करने वाले अघोर नामक सदाशिव का ध्यान करे! यह मंत्र भूत बेताल आदि का निग्रह करने में समर्थ है। "तारः............" यह पाशुपत नामक षडक्षर मन्त्र क्षुद्र ग्रहों का निवारण करता है। 'हृ' 'फट्' आदि छह वर्गों से षडंगन्यास करना चाहिये ।१७७-१८५½॥ पश्चात् मध्याह्नकालीन सूर्य के समान प्रभाववाले, भयंकर रूपवाले, सर्पों के आभूषण वाले, तीन नेत्रवाले, विविध शस्त्रों के जानने वाले चार मुखवाले पशुपति महादेव का ध्यान कर छः लाख मंत्र को जपे और उसका दशांश गोघृत से सुसंस्कृत अग्नि में हवन करे। फिर शैव पीठ पर अंगावरण सहित मातृगण और आयुध सहित लोकपालों की अर्चना करे। इस मन्त्र से जल को अभिमन्त्रित करके भूत ग्रस्त व्यक्ति के मुख में डालने से भूत छोड़ देता है, ऐसा इस महामन्त्र का प्रभाव है। जो नर संग्राम में इस मन्त्र से बाणों को अभिमन्त्रित करके शत्रुओं पर छोड़ता है, वह क्षणभर में इस तरह विजय पा लेता है जैसे अर्जुन । वर्णों के अंतिम अक्षर बिंदु तथा प्रणव से युक्त अष्टाक्षर मंत्र क्षेत्रपाल का कहा गया है ॥१८६-१९१½॥ छह दीर्घ मात्राओं से शा०-१०८

८५८ | नारदीयपुराणम् ताराद्यो वसुवर्णोऽयं क्षेत्रपालस्य कीर्तितः । षड्दीर्घयुक्तबीजेन षडंगं न्यस्य चिन्तयेत् ॥१६२॥ नीलाचलाभं दिग्वस्त्रं सर्पभूषं त्रिलोचनम् । पिंगोध्वंकेशान्दधतं कपालं च गदां स्मरेत् ॥१६३॥ लक्षमेकं जपेन्मन्त्रं जुहुयात्तद्दशांशतः । चरुणा घृतसिक्तेन ततः क्षेत्रे समर्चयेत् ॥१६४॥ धर्मादिकल्पिते पीठे सांगावरणमादरात् । तस्मै सपरिवाराय बलिमेतेन निर्हरेत् ॥१६५॥ पूर्वमेद्विद्वयं पश्चाद्विद्विषं पुरुपं द्वयम् । भञ्जय द्वितयं भूयो नर्तय द्वितयं पुनः ॥१६६॥ ततो विघ्नपडूद्वन्द्वं महाभैरव तत्परम् । क्षेत्र पालवलिं गृह्णद्वयं पावकसुन्दरी ॥१६७॥ बलिमन्त्रोऽयमाख्यातः सर्वकामफलप्रदः । सोपदेशं बृहत्पिण्डे कृत्वा रात्रिषु साधकः ॥१६८॥ स्मृत्वा यथोक्तं क्षेत्रेशं तस्य हस्ते बलिं हरेत् । बलिदानेन सन्तुष्टः क्षेत्रपालः प्रयच्छति ॥१६६॥ कांतिं मेधां बलारोग्यं तेजः पुष्टिं यशः श्रियम् । उद्धरेद्वटुकं ङेतमापदुद्धारणं तथा ॥२००॥ कुरुद्वयं ततः पश्चाद्वटुकं ङेतमुच्चरेत् । शक्विरुद्रौ ध्रुवादिश्च द्वाविंशत्यक्षरो मनुः ॥२०१॥ द्विचतुःसप्तवेदाब्धिचंद्रांगैरंगकं मनोः । वालं स्फटिकसंकाशं तल्लोललसिताननम् ॥२०२॥ दिव्या कल्पैः प्रदीप्तांगं त्र्यक्षं दंडत्रिशूलिनम् । सुप्रसन्नं स्मरेद्भक्त्या भक्तानामभयंकरम् ॥२०३॥ वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं हविष्याशी जितेन्द्रियः । तद्दशांशं प्रजुहुयात्तिलैर्मधुरसंयुतैः ॥२०४॥ धर्मादिकल्पिते पीठे पंकेजे चातिशोभने । षट्कोणांतस्त्रिकोणस्थव्योमपंकजसंयुते वटुकं पूजयेद्देवं सांगावरणकं क्रमात् । शत्रुपक्षस्य रुधिरं पिशितं च दिने दिने । भक्षयस्व गणैः सार्द्ध सारमेयसमन्वितः ॥२०५॥ ॥२०६॥ बलिमन्त्रोऽयमाख्यातः शत्रुनाम्ना विदर्भितः । अनेन बलिना हृष्टो वटुकः परसैन्यकम् ॥२०७॥ छित्त्वा गणेभ्यो विभजेदामिषं क्रुद्धमानसः । अङ्क शो वह्निशिखरो लांतवांत इतीरितः ॥२०८॥ युक्त बीजमंत्र से षडंगन्यास करके नील पर्वत के समान आभा वाले, दिगम्बर, सर्पों से विभूषित, त्रिलोचन, भूरे तथा ऊर्ध्व विस्तृत केशवाले, कपाल एवम् गदा धारण करने वाले शिव का ध्यान करे । तत्पश्चात् एक लाख मन्त्र का जप कर उसका दशांश घृतसिक्त चरु से हवन करे । तदनन्तर धर्मादि कल्पित पीठ पर आदर पूर्वक अंगावरण सहित क्षेत्रपाल की पूजा करके परिवार सहित उनको बलि चढ़ाये । 'पूर्वम्...पावक- सुन्दरी' - यह बलिमन्त्र है, जो अखिल कामनाओं को प्रदान करता है । रात्रि में साधक एक उपकरण सहित बृहत् पिण्ड को लेकर क्षेत्रेश का स्मरण करते हुए उनके हाथ में बलि समर्पित करे ॥१६२-१६९॥ बलि से संतुष्ट होकर क्षेत्रपाल साधक को कांति, मेधा, बल, आरोग्य, तेज, पुष्टि, यश तथा श्री प्रदान करते हैं। "उद्धरेत् ...... ध्रुवादिः"- यह बाईस, अक्षरों का मन्त्र है । मंत्र के दूसरे, चौथे, सातवें और पहले अक्षर से अंगन्यास करना चाहिये । तदनन्तर स्फटिक के समान स्वच्छ वर्ण वाले, चंचल मुख वाले, दिव्य आभूषणों से प्रदीप्त अंग वाले, तीन नेत्र वाले, दण्ड और त्रिशूल धारण करने वाले, भक्तों को अभय दान देने वाले, सदा सुप्रसन्न रहने वाले बाल रूप शंकर का ध्यान करे। फिर हविष्य भोजन तथा इंद्रिय-संयम करते हुए बाईस लाख मन्त्र का जप करे और उसका दशांश मधुरयुक्त तिल से हवन करे ॥२००-२०४॥ अनन्तर धर्मादिकल्पित अत्यन्त मनोहर पद्मपीठ पर अंगावरण सहित बटुक देव की पूजा करे । "शत्रुपक्षस्य... "- यह बलि देने का मन्त्र है। शत्रु का नाम लेकर इस मन्त्र से बटुक को बलि समर्पण करने से उक्तदेव हृष्ट होकर शत्रुसेना को छिन्न-भिन्न करते हुए क्रोध से उसके मांस के टुकड़े-टुकड़े कर

एकूनविंशतितमोऽध्यायः। ८५९ फट्न्तश्चण्डमन्त्रोऽयं त्रिवर्णात्मा समीरिनः । अस्य त्रितो मुनिः प्रोक्तश्छन्दोऽनुष्टुबुदाहृतम् ॥२०८॥ चंडेशो देवता प्रोक्ता वक्ष्यतेऽङ्गप्रकल्पनम् । हृदयं दीप्तफट् प्रोक्तं ज्वलफट् शिर ईरितम् ॥२०९॥ शिखाज्वालिनि फट् प्रोक्ता वहफट् कवचं मतम् । ॥२११॥ हलफट् नेत्रमाख्यातं सर्वज्वालिनि फट् परम् विन्यस्यैवं षडंगानि ततो देवं विचिंतयेत् । चंडेश्वरं रक्ततनुं त्र्यक्षं रक्तांबरावृतम् ॥२१२॥ दधतं च त्रिशूलाक्षमालाटं ककमंडलूं । वर्णलक्षं जपेन्मन्त्रं होमं कुर्याद्दशांशतः ॥२१३॥ मधुत्रयसंयुक्तैर्विशुद्धैस्तिलतंडुलैः । पंचाक्षरोदिते पीठे मूर्ति मूलेन कल्पयेत् ॥२१४॥ कर्मेशो बिंदुसंयुक्तस्ततश्चंडेश्वराय च । हृदयं मनुराख्यातश्चंडेशस्य प्रपूजने ॥२१५॥ अंगैर्मातृभिराशैश्चवज्राद्यैरावृतिर्भवेत् । शैवमंन्त्रेषु निष्णातश्चण्डेश्वरमनुं जपेत् ॥२१६॥ सर्वान्कामानवाप्नोति परत्रेह च नंदति । शृणु नारद वक्ष्यामि दिव्यं माहेश्वरं स्तवम् ॥२१७॥ यस्य पाठेन पूजायां सिद्ध्यंति मन्त्रोऽखिलाः ॥२१८॥ धराम्ब्वग्निमरुद्व्योममखेशेन्द्वर्कमूर्तये । सर्वभूतान्तरस्थाय शंकराय नमोनमः ॥२१९॥ श्रूयंतकृतवासाय श्रुतये श्रुतिजन्मने । अतीन्द्रियाय महसे शाश्वताय नमोनमः ॥२२०॥ स्थलसूक्ष्मविभागाभ्यामनिर्देश्याय शंभवे । भवाय भवसद्भूतदुःखहन्त्रे नमोनमः ॥२२१॥ तर्कमार्गातिदूराय तपसां फलदायिने । चतुर्वर्गवदान्याय सर्वज्ञाय नमोनमः ॥२२२॥ आदिमध्यांतशून्याय निरस्ताशेषभीतये । योगिध्येयाय महते निर्गुणाय नमोनमः ॥२२३॥ विश्वात्मने विविक्ताय विलसच्चंद्रमौलये । कंदर्पदर्पनाशाय कालहंत्रे नमोनमः ॥२२४॥ देते हैं। "अंकुश ....... फट्" —यह चन्द्रमन्त्र कहलाता है। इसके मुनि त्रित हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता चण्डेश हैं। 'दीप्त फट्' 'ज्वल फट्' आदि पदों का उच्चारण कर हृदय, शिर, नेत्र आदि छह अंगों का न्यास करे ॥२०५-२११॥। तदुपारन्त रक्त शरीर वाले, तीन नेत्र वाले, त्रिशूल, रुद्राक्षमाला, टंक, कमंडलु तथा रक्त वस्त्र धारण करने वाले शंकर का ध्यान कर तीन लाख मन्त्र को जपे और उसका दशांश त्रिमधुयुक्त शुद्ध तिल- तंडुल से होम करे। पुनः पंचाक्षर पीठ पर मूल मन्त्र से मूर्ति की कल्पना कर “कूर्म्मेशः च..... हृदयम्"—इस मन्त्र से चंडेश की पूजा करे। तत्पश्चात् सांगोपांग मातृगण और वज्र आदि आयुधों समेत लोकपालों की अर्चना कर शैव मन्त्रों में निष्णात साधक चण्डेश्वर के मन्त्र का जप करे ॥२१२-२१६॥ उपर्युक्त प्रकार से शिव की आराधना करने वाला व्यक्ति इस लोक में समस्त कामनाओं को प्राप्त कर परलोक में आनन्दोपभोग करता है। नारद ! अब मैं महेश्वर के दिव्य स्तोत्र को बता रहा हूँ, जिसका पूजा के समय पाठ करने से सकल मन्त्र सिद्ध हो जाते हैं--"पृथ्वी, जल, वायु, आकाश, अग्नि, इन्द्र, चन्द्र, तथा सूर्य रूपी शंकर को नमस्कार है। सकल प्राणियों में वास करने वाले शिव को नमस्कार है। श्रुतियों के अन्त में वास करने वाले, श्रुतिरूप, श्रुतिजन्मा, इन्द्रियों से परे, तेजोरूप, शाश्वत शम्भु को नमस्कार है। स्थूल तथा सूक्ष्म विभाग से अनिर्देश्य, सांसारिक दुःख का हरण करने वाले भवरूप शिव को नमस्कार है ॥२१७-२२१॥ तर्कमार्ग से अत्यन्त दूर रहने वाले, तपस्या के फल देने वाले धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त कराने वाले सर्वज्ञ शिव को नमस्कार है । आदि, मध्य और अन्त से रहित, समस्त प्रकार के भयों से शून्य, योगियों के ध्यान करने योग्य, निर्गुण, महान्, शंकर को नमस्कार है। विश्वात्मा एकान्तप्रिय, चन्द्रमा से सुशोभित ललाट

८६० नारदीयपुराणम् विषाशनाय विहरद्वृषस्कंधानुपेषुषे । सरिद्दामसमाबद्धकपर्दाय नमो नमः ॥२२५॥ शुद्धाय शुद्धभावाय शुद्धानांमन्तरात्मने । पुरांतकाय पूर्णाय पुण्यनाम्ने नमो नमः ॥२२६॥ भक्ताय निजभक्तानां भुक्तिमुक्तिप्रदायिने । विवाससे निवासाय विश्वेशां पतये नमः ॥२२७॥ त्रिमूर्तिमूलभूताय त्रिनेत्राय त्रिशूलिने । त्रिधाम्ने धामरूपाय जन्मदाय नमो नमः ॥२२८॥ देवासुरशिरोरत्नकिरीटारुणितांघ्रये । कांताय निजकांतायै दत्तार्द्धाय नमो नमः ॥२२९॥ एतत्स्तोत्रं महेशस्य प्रोक्तं सर्वार्घनाशनम् । शिवसान्निध्यदं विप्र सर्वतंत्रप्रकाशकम् ॥२३०॥ एतत्ते सुमहत्तन्त्रं सर्वदेवप्रकाशकम् । लोकाभिलाषपूर्तिक्रियासाधनसंगतम् । ॥२३१॥ ये तु सामान्यतः प्रोक्तास्तंत्रेऽस्मिन्मनवो द्विज । ते तु लोकोपकाराय ज्ञातव्याः सिद्धिदायकाः ॥२३२॥ विशेषतो वैष्णवा ये मंत्राः सर्वोत्तमोत्तमाः । त एव साधनीयाः स्युश्चतुर्वर्गफलाप्तये ॥२३३॥ राममन्त्राः कृष्णमन्त्राः सांगा राधेशिमन्त्राः । शाक्ताः सौराश्च गाणेशाः शैवाः प्रोक्ताः शुभावहाः ॥२३४॥ तेषु स्वात्मप्रकाशाय भजेन्मुक्तिफलप्रदान् । एतत्ते सर्वमाख्यातं यत्त्वयाभ्यर्थितं मुने । देवताराधनं भक्त्या किं भूयः श्रोतुमिच्छसि ॥२३५॥ इति श्री बृहन्नार० पूर्वभागे बृहदु० तृतीयपादे महेशमन्त्रकथनं नामैकनवतितमोऽध्यायः ॥६१॥ ॥ इति तृतीय पादः ॥

वाले, कंदर्प के दर्प का दलन करने वाले, कालनाशन शिव को नमस्कार है । विष भक्षण करने वाले, विहरणशील वृषभ के कन्धे पर बैठने वाले, गंगा रूपी रस्सी से आबद्ध जटा वाले शंकर को नमस्कार हैं । शुद्ध रूप, शुद्ध भाव वाले, शुद्ध व्यक्तियों के अन्तरात्मा, पुरांतक, पूर्ण तथा पुण्यनामा शिव को नमस्कार है ॥२२२-२२६॥ भक्त, अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति देने वाले दिगम्बर, विश्वपति शिव को नमस्कार है । त्रिमूर्तियों के मूलभूत, त्रिनेत्र, त्रिशूल धारण करने वाले तीनों धाम वाले, धामरूप, जन्मदाता शिव को नमस्कार है । देवों तथा असुरों के मस्तक स्थित मुकुटों के रत्नों से अरुणित चरण वाले, कमनीय रूप वाले, निज कांता को अर्धशरीर प्रदान करने वाले शिव को नमस्कार है।" विप्र ! महेश का यह स्तोत्र समस्त पापों का नाश करने वाला, शिव के सान्निध्य को देने वाला और समस्त रहस्यों को प्रकाशित करने वाला है ॥२२७-२३० ॥ द्विज ! सकल देवों का दर्शन कराने वाला, लोगों की अभिलाषा को पूर्ण करने वाला यह महान् तन्त्र मैंने बतला दिया । इसमें जो मुख्य-मुख्य मन्त्र बताये गये हैं, वे सिद्धिदायक हैं । उन्हें लोकोपकार की दृष्टि से जान लेना चाहिये । विशेष करके सर्वोत्तम वैष्णव मन्त्र जो कहे गये हैं, उनका साधन तो चतुर्वर्ग की प्राप्ति के लिये अवश्य करना चाहिये । इसमें कल्याणकारक राममन्त्र, कृष्णमन्त्र, राधिकामन्त्र, शक्ति, सौर, गाणेश, तथा शैवमन्त्र भी बताये गये हैं । आत्मप्रकाश के लिये उन मोक्षदायक मन्त्रों की साधना करनी चाहिये । मुने ! देवाराधना के विषय में जो कुछ तुमने पूछा वह मैं बता चुका । अब क्या सुनना चाहते हो ॥२३१-२३५॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीय पाद में महेश मन्त्र कथन नामक इक्यान्बेवां अध्याय समाप्त ॥९१॥

द्विनवतितमोऽध्यायः सूत उवाच एतच्छ्रुत्वा नारदस्तु कुमारस्य वचो मुदा । पुनरप्याह सुप्रीतो जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम् ॥१॥ नारद उवाच साधु साधु महाभाग सर्वलोकोपकारकम् । महातंत्रं त्वया प्रोक्तं सर्वतंत्रोत्तमोत्तमम् ॥२॥ अधुना श्रोतुमिच्छामि पुराणाख्यानमुत्तमम् । यस्मिन्यस्मिन्पुराणे तु यद्यदाख्यानकं मुने । तत्सर्वं मे समाचक्ष्व सर्वज्ञस्त्वं यतो मतः ॥३॥ सूत उवाच तच्छ्रुत्वा वचनं विप्रा नारदस्य शुभावहम् । पुराणाख्यानसंप्रश्नं कुमारः प्रत्युवाच ह ॥४॥ सनत्कुमार उवाच पुराणाख्यानकं विप्र नानाकल्पसमुद्भवम् । नानाउथासमायुक्तमद्भुतं बहुविस्तरम् ॥५॥ ऋषिः सनातनश्चायं यथा वेद तथाऽपरः । न वेद तस्मात्पृच्छ त्वं बहुकल्पविदां वरम् ॥६॥ अध्याय ६२ संक्षेप में ब्रह्मपुराण का इतिहास सूत बोले- कुमार के वचन को सुनकर जिज्ञासु नारद परम प्रसन्न हुए और कल्याण की बातें फिर पूछने लगे ॥१। नारद बोले- महाभाग ! साधु ! साधु ! आपने अखिल लोकोपकारक तथा समस्त तन्त्रों में उत्तम महा- तन्त्र को बता दिया । अब मैं पुराणों के पवित्र आख्यान को सुनना चाहता हूँ । मुने ! जिस-जिस पुराण में जो आख्यान आते हैं, वह सब मुझे बता दीजिये, क्योंकि आप सर्वज्ञ हैं ॥२-३॥ सूत बोले- विप्रवृन्द ! नारद के पुराणाख्यान सम्बन्धी कल्याणकारक प्रश्न को सुनकर कुमार कहने लगे ॥४॥ सनत्कुमार बोले- "विप्र ! अनेक कल्पों में होने वाले, पुराणों के आख्यान विविध कथाओं से युक्त, अद्भुत तथा अत्यन्त विस्तृत हैं। ये सनातन नामक ऋषि अपर वेदावतार ही हैं। ये अनेक कल्पज्ञाताओं में श्रेष्ठ हैं। इनसे तुम अपनी जिज्ञासा पूरी कर लो ॥५-६॥"

८६२ नारदीयपुराणम् श्रुत्वेत्थं नारदो वाक्यं कुमारस्य महात्मनः । प्रणम्य विनयोपेतः सनातनमथाब्रवीत् ॥७॥ नारद उवाच ब्रह्मन्पुराणविच्छ्रेष्ठ ज्ञानविज्ञानतत्पर । पुराणानां विभागं मे साकल्येनानुकीर्तय ॥८॥ यस्मिन् श्रुते श्रुतं सर्वं ज्ञाते ज्ञातं कृते कृतम् ॥६॥ वर्णाश्रमाचारधर्मं साक्षात्कारमुपैष्यति । कियन्ति च पुराणानि कियत्संख्यानि मानतः ॥१०॥ किंकिमाख्यानयुक्तानि तद्वदस्व मम प्रभो । चातुर्वर्ण्याश्रया नानाव्रतादीनां कथास्तथा ॥११॥ सृष्टिकमेण वंशानां कथाः सम्यक्प्रकाशय । त्वत्तोऽधिको न चान्योऽस्ति पुराणाख्यानवित्प्रभो ॥१२॥ तस्मादाख्याहि मह्यं त्वं सर्वसन्देहभंजनम् । सूत उवाच ॥१३॥ ततः सनातनो विप्राः श्रुत्वा नारदभाषितम् । नारायणं क्षणं ध्यात्वा प्रोवाचाथ विदां वरः । सनातन उवाच ॥१४॥ साधु साधु मुनिश्रेष्ठ सर्वलोकोपकारिका पुराणाख्यानविज्ञाने यज्जाता नैष्ठिकी मतिः । तुभ्यं समभिधास्यामि यत्प्रोक्तं ब्रह्मणा पुरा ॥१५॥ मरीच्यादिऋषिभ्यस्तु पुत्रस्नेहावृतात्मना । एकदा ब्रह्मणः पुत्रो मरीचिर्नाम विश्रुतः ॥१६॥ स्वाध्यायश्रुतसंपन्नो वेदवेदांगपारगः । उपसृत्य स्वपितरं ब्रह्माणं लोकभावनम् ॥१७॥ प्रणम्य भक्त्या पप्रच्छ इदमेव मुनीश्वर । पुराणाख्यानममलं यस्त्वं पृच्छसि मानव ॥१८॥ महात्मा कुमार की यह बात सुनकर नारद विनयपूर्वक सनातन को प्रणाम करके निवेदन करने लगे ॥७॥ नारद बोले—ब्रह्मन् ! पुराणवेत्ताओं में श्रेष्ठ ! ज्ञान-विज्ञान से भरे पुराणों के आख्यानों को समग्रतया मुझे बता दीजिये, जिनके सुनने से सब कुछ सुना हुआ जानने से जाना हुआ तथा करने से किया हुआ हो जाता है और जिनमें वर्णाश्रमधर्म एवम् आचारधर्म का साक्षात्कार कराया गया है। प्रभो ! कितने पुराण हैं ? उनकी कितनी संख्या है ? कौन-कौन-से आख्यान कहे गये हैं ? सब कुछ मुझे बतला दीजिये। नानाव्रत, चातुर्वर्ण्य तथा सृष्टिक्रम से वंशों की कथायें सम्यक् प्रकार से कहिये। आपसे बढ़ कर पुराणों का ज्ञाता कोई नहीं है। इसलिये मेरे समस्त संशयों का आप निराकरण कीजिये। सूत बोले—विप्रगण ! तदुपरान्त नारद का वचन सुनकर वेत्ताओं में श्रेष्ठ सनातन क्षण भर नारायण का ध्यान कर कहने लगे। सनातन बोले—मुनिश्रेष्ठ ! साधु ! साधु ! पुराणों के आख्यान सुनने में जो तुम्हारी प्रीति हुई है, उससे सकल लोकों का उपकार होगा। प्राचीन काल में पुत्र-स्नेह-वशीभूत ब्रह्मा ने मरीचि आदि ऋषियों से जो बताया था, वह मैं तुमसे कहूँगा। मुनीश्वर ! एक समय अत्यन्त विख्यात, वेदवेदांगपारंगत स्वाध्याय संपन्न ब्रह्मपुत्र मरीचि अपने पिता लोककर्ता ब्रह्मा के समीप जाकर भक्ति पूर्वक प्रणाम करते हुए यही पुराणों के पवित्र आख्यान, जो तुमने प्रश्न किया है, पूछ बैठे ॥८-१८॥

द्विनवतितमोऽध्यायः ८६३ मरीचिरुवाच भगवन्देवदेवेश लोकानां प्रभवाप्यय । सर्वज्ञ सर्वकल्याण सर्वाध्यक्ष नमोऽस्तु ते ॥१९॥ पुराणबीजमाख्याहि मह्यं शुश्रूषवे पितः । लक्षणं च प्रमाणं च वक्तारं पृच्छकं तथा ॥२०॥ ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणानां समुच्चयम् । यस्मिञ्ज्ञाते भवेज्ज्ञातं वाङ्मयं सचराचरम् ॥२१॥ पुराणमेकमेवासीत्सर्वकल्पेषु मानव । चतुर्वर्गस्य बीजं च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२२॥ प्रवृत्तिः सर्वशास्त्राणां पुराणादभवत्ततः । कालेनाग्रहणं दृष्ट्वा पुराणस्य महामतिः ॥२३॥ हरिर्व्यासस्वरूपेण जायते च युगे युगे । चतुर्लक्षप्रमाणेन द्वापरे द्वापरे सदा ॥२४॥ तदष्टादशधा कृत्वा भूर्लोके निर्दिशत्यपि । अद्यापि देवलोके तु शतकोटिप्रविस्तरम् ॥२५॥ अस्त्येव तस्य सारस्तु चतुर्लक्षेण वर्ण्यते । ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं च वायवीयं तथैव च ॥२६॥ भागवतं नारदीयं मार्कंडेयं च कीर्तितम् । आग्नेयं च भविष्यं च ब्रह्मवैवर्तलिंगके ॥२७॥ वाराहं च तथा स्कांदं वामनं कूर्मसंज्ञकम् । मात्स्यं च गारुडं तद्वद्ब्रह्मांडाख्यमिति त्रिषट् ॥२८॥ एकं कथानकं सूत्रं वस्तुः श्रोतुः समाह्वयम् । प्रवक्ष्यामि समासेन निशामय समाहितः ॥२९॥ ब्राह्मं पुराणं तत्रादौ सर्वलोकहिताय वै । व्यासेन वेदविदुषा समाख्यातं महात्मना ॥३०॥ तद्वै सर्वपुराणाद्ययं धर्मकामार्थमोक्षदम् । नानाख्यानेतिहासाढ्यं दशसाहस्रमुच्यते ॥३१॥ देवानां च सुराणां च यत्रोत्पत्तिः प्रकीर्तिता । प्रजापतीनां च तथा दक्षादीनां मुनीश्वर ॥३२॥ मरीचि बोले—भगवन् ! देवदेवेश ! लोकों के उत्पादक तथा विनाशक ! सर्वज्ञ ! सर्वकल्याण ! सर्वाध्यक्ष आपको नमस्कार है । पिता ! मुझ शुश्रूषु को पुराण के बीज, लक्षण, प्रमाण, वक्ता तथा प्रष्ठा के विषय में समझाइये ॥१९-२०॥ ब्रह्मा बोले—वत्स ! सुनो, मैं पुराणों का संग्रह बतला रहा हूँ, जिसके जान लेने से चराचर सहित संपूर्ण वाङ्मय ज्ञात हो जाता है । मानद ! समस्त कल्पों में एक ही पुराण चतुर्वर्ग का बीजरूप तथा सौ करोड़ श्लोकों में विस्तृत था । उस पुराण से सकल शास्त्रों की उत्पत्ति हुई । समय-समय पर लोकों में उस विस्तृत पुराण के ग्रहण करने की अक्षमता देखकर महामति हरि व्यासरूप से युग-युग में अवतार लेते हैं । प्रत्येक द्वापर युग में चतुर्लक्ष श्लोकों के प्रमाण से उस पुराण को अट्ठारह भागों में विभक्त करके भूलोक में छोड़ देते हैं ॥२१-२४ १/२॥ देवलोक में आज भी उस पुराण का सौ करोड़ श्लोकों में विस्तार है । उस शतकोटि विस्तृत पुराण का सार चार लाख श्लोकों में वर्णन किया गया है । ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, वायवीय, भागवत, नारदीय, मार्कंडेय, आग्नेय, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, लिंग, वाराह, स्कांद, वामन, कूर्म, मात्स्य, गारुड, तथा ब्रह्मांड—ये अठारह पुराणों के नाम हैं । सब का एक ही कथानक-सूत्र हैं । उस सूत्र को तथा वक्ता और श्रोता के नाम को मैं संक्षेप से बता देता हूँ, तुम सावधानी से सुनो । सब पुराणों में प्रथम पुराण ब्राह्म है, जिसकी रचना वेद के विद्वान् महात्मा व्यास ने अखिल लोकों के कल्याण के लिये की । वह सर्वप्रथम पुराण कहलाता है; धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को देता है । उसमें अनेक आख्यान तथा इतिहास भरे हैं; श्लोकों की संख्या दस हजार हैं ॥२५-३१॥ मुनीश्वर ! ब्रह्मपुराण में देवों, असुरों, प्रजापतियों तथा दक्ष, आदिकों की उत्पत्ति बताई गई हैं; लोकेश्वर

८६४ नारदीयपुराणम् ततो लोकेश्वरस्याथ सूर्यस्य परमात्मनः । वंशानुकीर्तनं पुण्यं महापातकनाशनम् ॥३३॥ यत्रावतारः कथितः. परमानन्दरूपिणः । श्रीमतो रामचंद्रस्य चतुर्व्यूहावतारिणः ॥३४॥ ततश्च सोमवंशस्य कीर्तनं यत्र वर्णितम् । कृष्णस्य जगदीशस्य चरितं कल्मषापहम् ॥३५॥ द्वीपानां चैव सर्वेषां वर्षाणां चाप्यशेषतः । वर्णनं यत्र पातालस्वर्गाणां च प्रदृश्यते ॥३६॥ नरकाणां समाख्यानं सूर्यस्तुतिकयानकम् । पार्वत्याश्च तथा जन्म विवाहश्च निगद्यते ॥३७॥ दक्षाख्यानं ततः प्रोक्तमेकाम्रक्षेत्रवर्णनम् । पूर्वभागोऽयमुदितः पुराणस्यास्य नारद ॥३८॥ अस्योत्तरे विभागे तु पुरुषोत्तमवर्णनम् । विस्तरेण समाख्यातं तीर्थयात्राविधानतः ॥३९॥ अत्रैव कृष्णचरितं विस्तरात्समुदीरितम् । वर्णनं यमलोकस्य पितृश्राद्धविधस्तथा ॥४०॥ वर्णाश्रमाणां धर्माश्च कीर्तिता यत्र विस्तरात् । विष्णुधर्मयुगाख्यानं प्रलयस्य च वर्णनम् ॥४१॥ योगानां च समाख्यानं सांख्यानां चापि वर्णनम् । ब्रह्मवादसमुद्देशः पुराणस्य प्रशंसनम् ॥४२॥ एतद्ब्रह्मपुराणं तु भागद्वयसमन्वितम् । वर्णितं सर्वपापघ्नं सर्वसौख्यप्रदायकम् ॥४३॥ सूतशौनकसंवादं भुक्तिमुक्तिप्रदायकम् । लिखित्त्वैतत्पुराणं यो वैशाख्यां हेमसंयुतम् ॥४४॥ जलधेनुयुतं चापि भक्त्या दद्याद्विजातये । पौराणकाय संपूज्य वस्त्रभोज्यविभूषणैः ॥४५॥ स वसेद्ब्रह्मणो लोके यावच्चंद्रार्कतारकम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि ब्राह्मानुक्रमणीं द्विज ॥४६॥ सोऽपि सर्वपुराणस्य श्रोतुर्वक्तुः फलं लभेत् । शृणोति यः पुराणं तु ब्राह्मं सर्वं जितेंद्रियः ॥४७॥ परमात्मा सूर्य के वंश का वर्णन किया गया है, जो महापातकों का नाशक है; चतुर्व्यूहावतारी परमानन्दरूपी श्रीमान् रामचन्द्र का अवतार वर्णित है; सोमवंश का कीर्तन तथा जगदीश कृष्ण के पापनाशन चरित्र का वर्णन आता है; अखिल द्वीपों, वर्षों, पाताल, स्वर्ग तथा नरक का आख्यान मिलता है; सूर्य की स्तुति एवम् कथा, पार्वती का जन्म और विवाह वर्णित किया गया है; दक्ष का आख्यान और एकाम्रक्षेत्र का वर्णन भी मिलता है। नारद ! इतना तो उस पुराण के पूर्वभाग का विषय है ॥३२-३८॥ उत्तर भाग में विस्तार से पुरुषोत्तम क्षेत्र का वर्णन और तीर्थयात्रा का विधान बताया गया है। इसी भाग में विस्तार से कृष्णचरित्र यमलोक, पितृश्राद्ध, वर्णाश्रमधर्म, विष्णुधर्म, युग, प्रलय, योग तथा सांख्य का वर्णन किया गया है; ब्रह्मवाद का उद्देश्य कथन तथा पुराण की प्रशंसा की गई है । बस, यही विषय ब्रह्मपुराण के दोनों भागों में आते हैं । यह पुराण सकल पापनाशक, सर्वसौख्यदायक एवम् भुक्ति-मुक्ति प्रदायक हैं। उसमें सूत और शौनक का संवाद हुआ है ॥३९-४३॥ वैशाख की पूर्णिमा को जो व्यक्ति वस्त्र, भोज्य तथा आभूषणों से पौराणिक ब्राह्मण का पूजन कर सुवर्ण तथा जलधेनु सहित लिखित ब्रह्मपुराण की पुस्तक प्रदान करता है, वह जब तक सूर्य-चन्द्रमा रहते हैं तब तक ब्रह्मलोक में वास करता है। जो द्विज ब्रह्मपुराण का श्रवण या पाठ करता है, उसे समस्त पुराणों के पारायण तथा श्रवण करने का फल मिलता है। जो जितेन्द्रिय होकर नियमपूर्वक हविष्य भक्षण करते हुए ब्रह्मपुराण का श्रवण

द्विनवतितमोऽध्यायः ८६५ हविष्याशी च नियमात्स लभेदब्रह्मणः पदम् । किमत्र बहुनोक्तेन यद्यदिच्छति मानवः तत्सर्वं लभते वत्स पुराणस्यास्य कीर्तनात् ॥४८॥ इति श्री बृहन्ना० पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे ब्राह्मपुराणेतिहासकथनं नाम द्विनवतितमोऽध्यायः ॥६२॥ त्रिनवतितमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु पुत्र प्रवक्ष्यामि पुराणं पद्मसंज्ञकम् । महत्पुण्यप्रदं नृणां शृण्वतां पठतां मुदा ॥१॥ यथा पंचेन्द्रियः सर्वः शरीरीति निगद्यते । तथेदं पंचभिः खंडैरुदितं पापनाशनम् ॥२॥ पुलस्त्येन तु भीष्माय सृष्ट्यादिक्रमतो द्विज । नानाख्यानेतिहासाद्यैर्यत्रोक्तो धर्मविस्तरः ॥३॥ पुष्करस्य च माहात्म्यं विस्तरेण प्रकीर्तितम् । ब्रह्मयज्ञविधानं च वेदपाठादिलक्षणम् ॥४॥ करता है, उसे ब्रह्मपद की प्राप्ति होती है। वत्स ! अधिक क्या कहें, उस पुराण के कीर्तन करने से मनुष्य जो कुछ चाहता है, वह सब उसे मिल जाता है ॥४४-४८॥ श्रीनारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में ब्रह्मपुराण का इतिहास कथन नामक बानबेवाँ अध्याय समाप्त ॥६२॥ अध्याय ६३ पद्मपुराण की विषय-सूची ब्रह्मा बोले—पुत्र ! सुनो, अब मैं हर्ष से पद्मपुराण के सम्बन्ध में कहूँगा, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के लिये महापुण्यदायक है। जैसे पांच इन्द्रियों से युक्त प्राणी शरीरी कहलाता है, उसी तरह पांच खण्डों से युक्त यह पुराण पापनाशन कहा जाता है। द्विज ! इस पुराण में जहाँ पुलस्त्य ने भीष्म से सृष्टि के आदि से लेकर अनेक आख्यान, इतिहास, धर्म, पुष्करमाहात्म्य, ब्रह्मयज्ञविधान, वेदपाठ आदि के लक्षण, दान तथा व्रतों का पृथक् १०९ ना० पु०