बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८४६ नारदीयपुराणम् एतत्संक्षेपतः प्रोक्तं नित्यापटलमादितः। ज्ञातव्यं सर्वमेवात्र यन्त्रसाधनपूर्वकम् ॥२३८॥ इति श्री बृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने तृतीयपादे नित्यापटलकथनं नाम नवतितमोऽध्यायः ॥९०॥ एकनवतितमोऽध्यायः सनत्कुमार उवाच अथ वक्ष्ये महेशस्य मन्त्रं सर्वार्थसाधकम्। यं समाराध्य मनुजो भुक्तिं मुक्तिं च विंदति ॥१॥ हृदयं सबकः सूक्ष्मो लांतोऽनन्तान्वितो मरुत्। पंचाक्षरो मनुः प्रोक्तस्ताराद्योऽयं षडक्षरः ॥२॥ वामदेवो मुनिश्च्छंदः पंक्तिरीशोऽस्य देवता। षड्भिर्वर्णैः षडङ्गानि कुर्यान्मंवेण देशिकः ॥३॥ मंत्रवण्ण्विकान्यस्येन्मंत्रमूर्तीर्यथाक्रमम् । तर्जनीमध्ययोरंत्यानामिकांगुष्ठके पुनः ॥४॥ होमादि दशांश करे। मुनीश्वर ! चित्रा का एक लाख मन्त्र जप और दशांश हवन आदि करना चाहिये। संक्षेप में नित्या का पटल आदि से वर्णन किया गया है। यहाँ सब कुछ यन्त्रसाधन पूर्वक जानना चाहिये ॥२३०-२३८॥ श्रीनारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त तृतीयपाद में नित्यापटल कथन नामक नब्बेवाँ अध्याय समाप्त ॥९०॥ अध्याय ९१ स्तोत्र सहित श्री महेश्वर मन्त्र का विधान सनत्कुमार बोले-अब सकल प्रयोजनों को सिद्ध करने वाले महेश के मन्त्र को बतलाऊँगा जिसकी आराधना करने से मनुष्य को भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है। "हृदयम्"-यह पंचाक्षर मन्त्र है। तार (प्रणव) आदि में जोड़ने से षडक्षर होता है। इसके मुनि वामदेव हैं, छंद पंक्ति है और देवता महेश हैं। मन्त्र के छहों वर्णों से षडंगन्यास करना चाहिये ॥१-३॥ साधक क्रमशः मन्त्ररूप मन्त्रवर्णों का न्यास करे। (पहले) तर्जनी, मध्यमा, अनामिका, कनिष्ठिका, और अंगुष्ठा से अंगुलियों में उनका न्यास करे। घोर, भव, वाम, तथा ईश