बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 866, कुल 1008 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकनवतितमोऽध्यायः ८४७ ताः स्युस्तत्पुरुषाघोरभववामेशसंज्ञिकाः । वक्त्रहृत्पादगुह्येषु निजमूर्द्धनि ताः पुनः ॥५॥ प्राच्याम्यवारुणोदीच्यमध्यवक्त्रेषु पंचसु । मन्त्रांगानि न्यसेत्पश्चाज्जातियुक्तानि षट् क्रमात् ॥६॥ कुर्वीत गोलकन्यासं रक्षायै तदनन्तरम् । हृदि वक्त्रेऽसयोर्द्व्योः कंठे नाभौ द्विपार्श्वयोः ॥७॥ पृष्ठे हृदि तथा मूर्ध्नि वदने नेत्रयोर्नसोः । दोःपत्संधिषु साप्रेषु विन्यसेत्तदनन्तरम् ॥८॥ शिरोवदनहृत्कुक्षिसोरुपादद्वये पुनः । हृदि वक्रांबुजे टंकमृगौ भयवरैष्वथ ॥८॥ वक्त्रांसत्सपदो रुजठरेषु क्रमान्न्यसेत् । मूलमन्त्रस्य षड् वर्णान्यावद्वैशिकोत्तमः ॥१०॥ मूर्ध्नि भालोदरांसेषु हृदये ताः पुनर्न्यसेत् । पश्चादनेन मन्त्रेण कुर्वीत व्यापकं सुधीः ॥११॥ नमोस्त्वनन्तरूपाय ज्योतिर्लिंगामृतात्मने । चतुर्मूतिवपुश्छायाभासितांगाय शंभवे ॥१२॥ एवं न्यस्तशरीरोऽसौ चिन्तयेत्पार्वतीपतिम् । ध्यायेन्नित्यं महेशानं रोप्यपर्वतसन्निभम् ॥१३॥ चारुचंद्रावतंसं च रत्नकल्पोज्ज्वलांगकम् । परश्वधवराभीतिमृगहस्तं शुभाननम् ॥१४॥ पदमासीनं समंतात्तु स्तुतं सुमनसां गणैः । व्याघ्रकृत्ति वसानं च विश्वाद्यं विश्वरूपकम् ॥१५॥ त्रिनेत्रं पंचवक्त्रं च सर्वभीतिहरं शिवम् । तत्त्वलक्षं जपेन्मंत्रं दीक्षितः शैववर्त्मना ॥१६॥ तावत्संख्यसहस्राणि जुहुयात्पायसैः शुभैः । ततः सिद्धो भवेन्मन्त्रः साधकाऽभीष्टसिद्धिदः ॥१७॥ देवं संपूजयेत्पीठे वामादिनवशक्तिके । वामा ज्येष्ठा तथा रौद्री काली कलपदादिका ॥१८॥ विकारिण्याह्वया प्रोक्ता बलाद्या विकरिण्यथ । बलप्रमथनी पश्चात्सर्वभूतदमन्यथ ॥१९॥ मनोन्मनोति संप्रोक्ताः शैवपीठस्य शक्तयः । नमो भगवते पश्चात्सकलादि वदेत्ततः ॥२०॥ संज्ञक पुरुष ही मन्त्र की मूर्तियां हैं। अतएव मुख, हृदय, चरण, गुह्य, तथा अपने मस्तक पर पुनः मंत्रमूर्तियों का न्यास करे। अनन्तर पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम और मध्य की दिशा में क्रमशः जातियुक्त छह मन्त्रांगों का न्यास करना चाहिए। रक्षा के निमित्त गोलकन्यांस करना चाहिये ॥४-६३॥ बाद में हृदय, मुख, स्कंध, तल, कंठ, नाभि, पार्श्व, पृष्ठ, मस्तक, नेत्र, नासिका, भुजा, चरण तथा अस्थिसंधियों में न्यास करे। पुनः शिर, वदन, हृदय, उदर, ऊरु तथा चरण रूप अंगों और टंक, मृग, अभय तथा वर रूप अस्त्रों में न्यास करके क्रमशः मुख, स्कंध, पाद, ऊरु तथा उदर में न्यास करना चाहिये । उत्तम साधक मूल मन्त्र के छह वर्णोंका शिर, ललाट, स्कन्ध तथा हृदय में न्यास करे। पश्चात् पंडित व्यक्ति “तयो......शंभवे” इस मन्त्र से व्यापक न्यास करे ॥७-१२॥ इस प्रकार संपूर्ण शरीर में न्यास करके पार्वतीपति का इस प्रकार ध्यान करे। चांदनी के पर्वत के समान धवल, चारुचन्द्र के समान कांतिमान्, रत्न के सदृश प्रदीप्त अंगों वाले, हाथों में परशु (फरसा), मृग, वरास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, पवित्र मुखवाले, कमलों पर आसीन, चारों ओर देवगणों से स्तूय- मान, व्याघ्रचर्म पहनने वाले, विश्व के आदि, विश्व के रूप, त्रिनेत्र, पंचमुख और सबके भय का हरण करने वाले, कल्याणकारी, ईशान शिव का ध्यान कर शैवमार्ग से दीक्षित हुआ व्यक्ति उनके मन्त्र का पांच लाख जप फिर उतनी संख्या में पवित्र पायस से हवन करे। ऐसा करने से साधक को सकल अभीष्ट दायक मन्त्र सिद्ध हो जाता है। अनन्तर पीठ पर वामा आदि नौ शक्तियों समेत शंकर देव की अर्चना करे। वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलपदा, विकरिणी, बला, बलप्रमथनी और मनोन्मनी-ये नवों शैव पीठ की शक्तियाँ हैं। “नमो......” इस मन्त्र से गिरिजापति को आसन प्रदान करना चाहिये। फिर मूल मन्त्र से मूर्ति की