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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 867, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 867

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८४८ नारदीयपुराणम् गुणात्मशक्तिमक्ताय ततोऽनंताय तत्परम्। योगपीठात्मने भूयो नमस्तारादिको मनुः ॥२१॥ अमुना मनुना दद्यादासनं गिरिजापतेः। मूर्तिं मूलेन संकल्प्य तत्रावाह्य यजेच्छिवम् ॥२२॥ कर्णिकायां यजेन्मूर्तीरीशमीशानदिग्गजम्। शुद्धस्फटिकसंकाशं दिक्षु तत्पुरुषादिका ॥२३॥ पीतांजनश्वेतरक्ताः प्रधानसदृशायुधाः। चतुर्वक्त्रसमायुक्ता यथाभत्त्या प्रपूजयेत् ॥२४॥ कोणेष्वर्चन्निवृत्त्याद्यास्तेजोरूपाः कलाः क्रमात्। अङ्गानि केसरस्थानि विघ्नेशान्पन्नगान्न्यजेत् ॥२५॥ अनन्तं सुखनामानं शिवोत्तममनंतरम्। एकनेत्रमेकरुद्रं त्रिमूर्तिं तदनंतरम् ॥२६॥ पश्चाच्छ्रीकंठनामानं शिखंडिनमिति क्रमात्। रक्तपोतसितारक्तकृष्णरक्तांजनासितान् ॥२७॥ किरीटारितबालेंदून्पद्मस्थान्भूषणान्वितान्। त्रिनेत्राञ्छूलवज्रास्त्रचापहस्तान्मनोरमान् ॥२८॥ उत्तरादि यजेत्पश्चाद्रुद्रं चण्डेश्वरं पुनः। ततो नन्दिमहाकालौ गणेशं वृषभं पुनः ॥२९॥ अथ भृंगि रिटिं स्कन्दमेतान्पद्मासनस्थितान्। स्वर्णतोयारुणश्यामशुक्लेंदुसितपाटलान् ॥३०॥ इंद्रादयस्ततः पूज्या वज्राद्यायुधसंयुताः। इत्थं संपूजयेद्देवं सहस्रं नित्यशो जपेत् ॥३१॥ सर्वपापविनिर्मुक्तः प्राप्नुयाद्वांछितं श्रियम्। द्विसहस्रं जपन् रोगन्मुच्यते नात्र संशयः ॥३२॥ त्रिसहस्रं जपन्मंत्रं दीर्घमायुरवाप्नुयात्। सहस्रवृद्ध्या प्रजपन्सर्वकामानवाप्नुयात् ॥३३॥ आज्यान्वितैस्तिलैः शुवेञ्जुहुयाल्लक्षमादरात्। उत्पातजनितान् क्लेशान्नाशयेन्नात्र संशयः ॥३४॥ शतलक्षं जपन्साक्षाच्छिवो भवति मानवः। षडक्षरः शक्तिरुद्धः कथितोऽष्टाक्षरो मनुः ॥३५॥ ऋषिश्च्छन्दः पुरा प्रोक्तो देवता स्यादुमापतिः। अङ्गानि पूर्वमुक्तानि सौम्यमीशं विचितयेत् ॥३६॥ बन्धूकाभं त्रिनेत्रं च शशिखंडधरं विभुम्। स्मेरास्यं स्वकरैः शूलं कपालं वरदाभये ॥३७॥ वहंतं चारुभूषाढ्यं वामोरुस्थाम्विकन्यया। भुजेनाश्लिष्टदेहं तं चिंतयेन्मनसा हृदि ॥३८॥

कल्पना कर कमल पुष्पों पर शंकर का आवाहन करके पूजन करे ॥१३-२२॥ ईश तथा शुद्ध स्फटिक के समान स्वच्छ वर्ण वाले ईशानदिग्गज की पूजा करनी चाहिये। दिशाओं में पीत, कृष्ण, श्वेत, तथा रक्तवर्ण वालों, शक्तियों की पूजा कर कोणों में निवृत्ति आदि तेजोरूप कलाओं का क्रमशः पूजन करे। अनन्तर केसरस्थित अंगों, विघ्नेशों तथा पन्नगों की अर्चना करे। फिर सुखनामा अनन्त, शिवोत्तम, एकनेत्र, एकरुद्र, त्रिमूर्ति, श्रीकंठ, और शिखंडी का पूजन कर रक्त, पीत, शुक्ल तथा कृष्ण वर्णवाले, मुकुट पर बालचन्द्र को धारण करने वाले, कमलों पर आसान, आभूषणों से विभूषित, त्रिनेत्र, करों में शूल, वज्र तथा धनुष धारण करने वाले, मनोरम देवों की पूजा करे। पश्चात् पद्मासनस्थित रुद्र चंडेश्वर, नन्दी, महाकाल, गणेश, वृषभ, भृंगि, रिटि तथा स्कंद की पूजा करे, जिनका वर्ण क्रमशः अरुण, श्याम, श्वेत, रक्त, शुक्ल एवम् सुवर्ण, जलमुक्ता, तथा चंद्रमा के समान है। तदुपरान्त वज्र आदि आयुधों समेत इन्द्र आदि देवों की पूजा करे ॥२३-३२॥ इस प्रकार नित्य शंकर का पूजन कर सहस्र बार मन्त्र जप किया करे ऐसा करने से मनुज सकल पापों से मुक्त होकर यथेच्छ श्री को प्राप्त करता है। दो सहस्र मन्त्र जप करने से रोग निवृत्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं। तीन हजार मन्त्र जप जरने से दीर्घायु की प्राप्ति होती है। मन्त्र जप में प्रति दिन एक सहस्र वृद्धि कर देने से समस्त अभिलाषाओं की पूर्ति हो जाती है। एक लाख मन्त्रजप तथा घृत घृतयुक्त तिल से होम करने से उत्पातजन्य क्लेशों का नाश होता है, इसमें संशय नहीं। सौ लाख जप करने वाला मानव साक्षात् शिव होता है। शक्तिरुद्ध षडक्षर मन्त्र ही अष्टाक्षर मन्त्र कहलाता हैं। इसके ऋषि, छन्द तथा अंग पहिले बता दिये गये हैं इससे देवता उमापति हैं। (इस मंत्र का) साधक सौम्य शंकर का