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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 868, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 868

एकनवतितमोऽध्यायः ८४६ मनुलक्षं जपेन्मन्त्रं ततसहस्रं यथाविधि । जुहुयान्मधुरासिक्तै रारग्वधसमिद्वरैः ॥३६॥ प्राक्प्रोक्ते पूजयेत्पीठे गंधपुष्पैरुमापतिम् । अंगावृत्तैर्बहिः पूज्या हृल्लेखाद्या यथापुरा ॥४०॥ मध्यप्राग्दक्षिणोदीच्यपश्चिमेषु विधानतः । यजेत्पूर्वादिपत्रेषु , वृषभाग्याननुक्रमात् ॥४१॥ शूलटंकाक्षवलयकमंडलुलसत्करम् । रक्ताकारं त्रिनयनं चंडेशमथ पूजयेत् ॥४२॥ चक्रशंखाभयाभीष्टकरां मरकतप्रभाम् । दुर्गा प्रपूजयेत्सौम्यां त्रिनेत्रां चारुभूषणाम् ॥४३॥ कल्पशाखांतरे घंटां दधानं द्वादशेक्षणम् । बालार्कभं शिशुं कांतं षण्मुखं पूजयेत्ततः ॥४४॥ नंदिनं च यजेत्सौम्यं रत्नभूषणमंडितम् । परश्वधवराभीतिटंकि नं श्यामविग्रहम् ॥४५॥ पाशांकुशवराभीष्टधारिणं कुंकुमप्रभम् । विघ्ननायकमभ्यर्चेच्चंद्राद्धंकृतशेखरम् ॥४६॥ श्यामं रक्तोत्पलकरं वामांक न्यस्ततत्करम् । द्विनेत्रं रक्तवस्त्राढ्यं सेनापतिमथार्चयेत् ॥४७॥ ततोऽष्टमातरः पूज्या ब्राह्माद्याः प्रोक्तलक्षणाः । इंद्रादिकांल्लोकपालान्स्वस्वदिक्षु समर्चयेत् ॥४८॥ वज्रादीनि तदस्त्राणि तद्बहिः क्रमतोऽर्चयेत् । एवं यो भजते मन्त्री देवं शंभुमुमापतिम् ॥४६॥ स भवेत्सर्वलोकानां सौभाग्यश्रेयसां पदम् । सांतसद्यांतसंयुक्तो बिन्दुभूषितमस्तकः ॥५०॥ प्रासादाख्यो मनुः प्रोक्तो भजतां सर्वसिद्धिदः । षड्दीर्घयुक्तबीजेन षडंगविधिरोरितः ॥५१॥ षडर्णवत्तु मुन्याद्याः प्रोक्ताश्चास्यापि नारद । ईशानाद्या न्यसेन्मूर्तीरंगुष्ठादिषु देशिकः ॥५२॥

चितन करे । दोपहरिया फूल के समान आभा वाले, तीन नेत्र वाले, शशिखंड धारण करने वाले, मंद मुसकान युक्त मुख वाले, करों में शूल, कपाल, वरदास्त्र तथा अभयास्त्र धारण करने वाले, मनोहर आभूषणों से विभू- षित, बाँयीं जंघा पर पार्वती को बिठाने वाले, उनकी भुजाओं से आलिंगित शरीर वाले विभु शंकर का ध्यान कर एक लाख मन्त्र जप करे और उतने ही हजार मधुरमिश्रित छितिवन की समिधा से हवन करे ॥३२-३९॥ पूर्व कथित पीठ पर गंध-पुष्पों से उमापति की पूजा कर हृल्लेखा आदि शक्तियों की पूजा करे । फिर मध्य पूर्व, दक्षिण, उत्तर एवम् पश्चिम दिशाओं में विधानपूर्वक वृषभ आदि देवों का क्रमशः पूजन करे । अनन्तर हाथों में शूल, टंक, रुद्राक्ष, वलय, तथा कमंडलु धारण करने वाले, रक्ताकार, त्रिनेत्र, चंडेश की अर्चना करे । उसके बाद करों में चक्र, शंख, अभयास्त्र तथा वरदास्त्र धारण करने वाली, मरकत मणि के समान प्रभावानी तीन नेत्रों वाली और मनोहर आभूषणोंवाली दुर्गा की पूजा कर घंटा धारण करने वाले, बारह नेत्रों वाले बाल- सूर्य के समान प्रभाववाले, कमनीय कान्तिवाले शिशु कार्तिकेय का पूजन करे ॥४०-४४॥ तब सौम्य, रत्न के आभूषणों से अलंकृत, परशु, वरदास्त्र, अभयास्त्र, तथा टंक नायक अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कुंकुम के समान प्रभा वाले और श्याम शरीरवाले नन्दी की पूजा कर ललाट पर अर्धचन्द्र धारण करने वाले, श्याम वर्ण वाले, रक्त कमल के सदृश करों वाले, दो नेत्रों वाले और रक्तवस्त्र पहनने वाले गणेश की अर्चना करे । तदुपरान्त उक्त लक्षण ब्राह्मी आदि माताओं की पूजा कर अपनी-अपनी दिशा में इंद्र आदि लोकपालों की पूजा करे । फिर बाहर उनके वज्र आदि अस्त्रों का क्रमशः पूजन करे । जो साधक इस तरह उमापति शंभु की आराधना करता है, वह समस्त लोकों के सौभाग्य एवम् श्रेय का निधान होता है । सांत सद्यांत संयुक्त और ऊपर बिन्दु से भूषित प्रसाद नामक मंत्र साधकों को समस्त सिद्धियां प्रदान करता है ॥४५-५१॥ नारद ! छह दीर्घ मात्राओं से युक्त बीज मन्त्र से षडंगन्यास करना चाहिये । इस मंत्र के छः ही वर्ण हैं । साधक अंगुष्ठ आदि में ईशान आदि मूर्तियों का न्यास करे । पश्चात् ईशान पुरुष, अघोर, वामदेव, सद्योजातबीज तथा उकार आदि पाँच १०७ ना० पु०