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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 886, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 886

त्रिनवतितमोऽध्यायः ८६७ नित्यलीलानुकथनं यत्र कृष्णावतारिणः । माधवस्नानमाहात्म्यं स्नानदानाच्चने फलम् ॥२२॥ धरावराहसंवादो यमब्राह्मणयोः कथा । संवादो राजदूतनां कृष्णस्तोत्रनिरूपणम् ॥२३॥ शिवशंभुसमायोगो दधीच्याख्यानकं ततः । भस्ममाहात्म्यमतुलं शिवमाहात्म्यमुत्तमम् ॥२४॥ देवरातसुताख्यानं पुराणप्रशंसनम् । गौतमाख्यानकं चैव शिवगोता ततः स्मृता ॥२५॥ कल्पांतरे रामकथा भारद्वाजाश्रमस्थिता । पातालखंडमेतद्धि शृण्वतां पठतां सदा ॥२६॥ सर्वपापप्रशमनं सर्वाभीष्टफलप्रदम् । पर्वताख्यानकं पूर्वं गौर्ये प्रोक्तं शिवेन वै ॥२७॥ जालंधरकथा पश्चाच्छ्रीशैलाद्यनुकीर्तनम् । सगरस्य कथा पुण्या ततः परमुदीरितम् ॥२८॥ गंगाप्रयागकाशीनां गयायाश्चाधिपुण्यकम् । अन्नादिदानमाहात्म्यं तन्महाद्वादशीव्रतम् ॥२९॥ चतुर्विशेकादशीनां माहात्म्यं पृथगीरितम् । विष्णुधर्मसमाख्यानं विष्णुनामसहस्रकम् ॥३०॥ कार्त्तिकव्रतमाहात्म्यं माघस्नानफलं ततः । जम्बूद्वीपस्य तीर्थानां माहात्म्यं पापनाशनम् ॥३१॥ साभ्रमत्ययाश्च माहात्म्यं नृसिंहोत्पत्तिवर्णनम् । देवशर्मादिकाख्यानं गीतामाहात्म्यवर्णनम् ॥३२॥ भक्त्याख्यानं च माहात्म्यं श्रीमद्भागवतस्य ह । इन्द्रप्रस्थस्य माहात्म्यं बहुतीर्थकथान्वितम् ॥३३॥ मन्त्ररत्नाभिधानं च त्रिपाद्भूत्यनुवर्णनम् । अवतारकथाः पुण्या मत्स्यादीनामतः परम् ॥३४॥ रामनामशतं दिव्यं तन्माहात्म्यं च वाडव । परीक्षणं च भृगुणा श्रीविष्णोर्वैवमस्य च ॥३५॥ इत्येतदुत्तरं खण्डं पंचमं सर्वपुण्यदम् । पंचखंडयुतं पाद्मं यः शृणोति नरोत्तमः ॥३६॥ स लभेद्वैष्णवं धाम भुक्त्वा भोगानिहेप्सितान् । एतद्वै पंचपंचाशत्सहस्रं पद्मसंज्ञकम् ॥३७॥ पुराणं लेखयित्वा वै ज्येष्ठयां स्वर्णब्जसंयुक्तम् । यः प्रदद्यात्सुसत्कृत्य पुराणज्ञाय मानव ॥३८॥

वाराह का संवाद, यम और ब्राह्मण की कथा, राजा का दूतों से संवाद, कृष्णस्तोत्रनिरूपण, शिव तथा शम्भु का समायोग, दधीच का आख्यान, अतुलनीय भस्ममाहात्म्य, उत्तम शिवमाहात्म्य, देवरात के पुत्र का आख्यान, पुराणों की प्रशंसा, गौतमाख्यान, शिवगोता और कल्पांतर में भारद्वाजआश्रम सम्बन्धी राम की कथा जिसमें वर्णित है, वह पातालखंड है, जो सुनने तथा पढ़ने वालों के लिये सकलपापनाशक एवम् वांछितफलदायक है ॥१४- २६॥ पांचवें खण्ड का नाम उत्तर है। इसमें गौरी के प्रति शंकर द्वारा पर्वत का आख्यान, जालंधर कथा, श्रीशैल आदि का कीर्तन, सगर की पवित्र कथा, गंगा, प्रयाग, काशी तथा गया का पुण्यवर्णन, अन्नादिदान माहात्म्य, महाद्वादशीव्रत, चोबीस एकादशियों का पृथक्-पृथक् माहात्म्यवर्णन, विष्णुधर्म का आख्यान, विष्णु- सहस्रनाम, कार्तिक व्रतमाहात्म्य, माघस्नानफल, जम्बूद्वीप के तोर्थों का पापनाशक माहात्म्य, साभ्रमती का माहात्म्य, नृसिंहोत्पत्तिवर्णन, देवशर्मा आदि का आख्यान, गीतामाहात्म्यवर्णन, भक्ति का आख्यान, श्रीमद्भागवत का माहात्म्य, अनेक तीर्थ कथाओं के साथ इन्द्रप्रस्थ का माहात्म्य, मन्त्ररत्न का कथन, त्रिपाद्भूति का वर्णन, मत्स्य आदि अवतारों की पवित्र कथायें, राम नाम का सतनाम तथा दिव्यमाहात्म्य और भृगु द्वारा श्रीविष्णु के वैभव का परीक्षण बतलाये गये हैं। यह खंड समस्त पुण्यों को देने वाला है ॥२७-३५॥ जो श्रेष्ठ मनुष्य पांच खंडों से युक्त पद्मपुराण का श्रवण करेगा, वह इस लोक में अभिलषित भोगों का भोग कर वैकुण्ठ को जायेगा । मानद ! जो व्यक्ति पचपन हजार श्लोकों से परिपूर्ण पद्मपुराण को लिखकर ज्येष्ठ की पूर्णिमा में पौराणिक ब्राह्मण को स्वर्ग कमल सहित यह पुराण प्रदान करता है, वह सर्वदेववन्द्य होकर