बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें८६८ नारदीयपुराणम् गोप्रचारकथा पुण्या गोपीनां द्वारकागमः । गोपीसरः समाख्यानं ब्रह्मतीर्थादिकीर्तनम् ॥२०७॥ पंचनद्यागमाख्यानं नानाख्यानसमन्वितम् । शिवलिंगगदातीर्थकृष्णपूजादिकीर्तनम् ॥२०८॥ त्रिविक्रमस्य मूर्ताख्या दुर्वासःकृष्णसं कथा । कुशदैत्यवधोच्चारविशेषाचंनं फलम् ॥२०६॥ गोमत्यां द्वारकायां च तीर्थागमनकीर्तनम् । कृष्णमंदिरसंप्रेक्षा द्वारवत्यभिषेचनम् ॥२१०॥ तत्रतीर्थावासकथा द्वारकापुण्यकीर्तनम् । इत्येष सप्तमः प्रोक्तः खंडः प्रभासिको द्विजाः ॥२११॥ : स्कांदे सर्वोत्तरकथे शिवमाहात्म्यवर्णने । लिखित्त्वैतन्तु यो दद्याद्धेमशूलसमन्वितम् ॥२१२॥ माध्यां सत्कृत्य विप्राय स शैवे मोदते पदे ॥२१३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्व० बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे स्कंदपुराणानुक्रमणीवर्णनं नाम चतुरधिकशततमोऽध्यायः
पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि पुराणं वामनाभिधम् । त्रिविक्रमचरित्राढ्यं दशसाहस्रसंख्य कम् ॥१॥ कूर्मकल्पसमाख्यानं वर्गत्रयकथानकम् । भागद्वयसमायुक्तं वक्तृश्रोतृशुभावहम् ॥२॥
नृतीर्थकथा ॥२०१-२०६॥ गोप्रचारकथा, गोपियों का द्वारिका गमन, गोपीसर का आख्यान, ब्रह्मतीर्थ आदि कीर्तन, पंचनदी समागम कथा, विविध आख्यान, शिवलिंग, गदातीर्थ तथा कृष्णपूजा आदि का कीर्तन, त्रिविक्रम की मूर्ति कथा, दुर्वासा और कृष्ण की कथा, कुशदैत्यवध, विशेष पूजन का फल, गोमती तथा द्वारका में तीर्थों के आगमन का फल, कृष्णमंदिर का निरीक्षण, द्वारवती-अभिषेक, द्वारका में तीर्थों के निवास की कथा और द्वारका पुण्यकीर्तन-इतने विषय वर्णित हैं। द्विज ! यह प्रभास नामक सातवां खंड कहा गया है। इसमें स्कन्द- पुराण के उत्तरार्ध की समस्त कथायें तथा शिव का माहात्म्य वर्णित हुआ है। जो व्यक्ति स्कंद पुराण को लिखकर माघींपूर्णिमा के दिन ब्राह्मण की पूजा करके स्वर्ण सहित यह पुराण प्रदान करता है, वह सदा शिवलोक में क्रीडा करता है ॥२०७-२१३॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में स्कंदपुराणानुक्रमणी वर्णन नामक एक सौ चौथा अध्याय समाप्त ॥१०४॥
अध्याय १०५ वामनपुराण की विषयानुक्रमणी श्रीब्रह्मा बोले- वत्स ! सुनो, मैं वामनपुराण को बतलाऊंगा, जिसमें त्रिविक्रम का चरित्र चित्रण किया गया है और श्लोकों की संख्या दश सहस्र है। इसमें कूर्मकल्प का समाख्यान और तीन वर्ग की कथा निरूपित हुई है। यह दो भागों में विभक्त है। इसके सुनने से वक्ता और श्रोता का मंगल होता है ॥१-२॥ इसमें क्रमशः