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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 918, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 918

पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ८६६ पुराणप्रश्नः प्रथमं ब्रह्मशीर्षच्छिदा ततः । कपालमोचनाख्यानं दक्षयज्ञविहिंसनम् ॥३॥ हरस्य कालरूपाख्या कामस्य दहनं ततः । प्रह्लादनारायणयोर्युद्धं देवासुराहवः ॥४॥ सुकेश्यर्कसमाख्यानं ततो भुवनकोशकम् । ततः काम्यव्रताख्यानं श्रीदुर्गाचरितं ततः ॥५॥ तपतीचरितं पश्चात्कुरुक्षेत्रस्य वर्णनम् । सत्यभामामाहात्म्यमतुलं पार्वतीजन्मककीर्तनम् ॥६॥ तपस्तस्या विवाहश्च गौर्युपाख्यानकं ततः । ततः कौशिकोपाख्यानं कुमारचरितं ततः ॥७॥ ततोऽन्धकवधाख्यानं साध्योपाख्यानकं ततः । जाबालिचरितं पश्चादरजायाः कथाद्भुता ॥८॥ अंधकेश्वरयोर्युद्धं गणत्वं चांधकस्य च । मरुतां जन्मकथनं बलेश्च चरितं ततः ॥९॥ ततस्तु लक्ष्म्याश्चरितं त्रैविक्रममतः परम् । प्रह्लादतीर्थयात्रायां प्रोच्यंतेऽथ कथाः शुभाः ॥१०॥ ततश्च धुन्धुचरितं प्रेतोपाख्यानकं ततः । नक्षत्रपुरुषाख्यानं श्रीदामचरितं ततः ॥११॥ त्रिविक्रमचरितांते ब्रह्मप्रोक्तः स्तवोत्तमः । प्रह्लादबलिसंवादे सुतले हरिशंसनम् ॥१२॥ इत्येष पूर्वभागोऽस्य पुराणस्य तवोदितः । शृण्वतोऽस्योत्तरं भागं बृहद्वामनसंज्ञकम् ॥१३॥ माहेश्वरी भागवती सौरी गाणेश्वरी तथा । चतस्रः संहिताश्चात्र पृथक् साहस्त्रसंख्यया ॥१४॥ माहेश्वर्यां तु कृष्णस्य तद्भक्तानां च कीर्तनम् । भागवत्यां जगन्मातुरवतारकथाऽद्भुता ॥१५॥ सौर्यां सूर्यस्य महिमा गदितः पापनाशनः । गाणेश्वर्यां गणेशस्य चरितं च महेशितुः ॥१६॥ इत्येतद्वामनं नाम पुराणं सुविचित्रकम् । पुलस्त्येन समाख्यातं नारदाय महात्मने ॥१७॥ ततो नारदतः प्राप्तं व्यासेन सुमहात्मना । व्यासात्तु लब्धवांश्चैतत् तच्छिष्यो रोमहर्षणः ॥१८॥ स चाख्यास्यति विप्रेभ्यो नैमिषीयेभ्य एव च । एवं परम्पराप्राप्तं पुराणं वामनं शुभम् ॥१९॥ ये पठंति च शृण्वंति तेऽपि यांति परां गतिम् । लिखित्‍वैतत्पुराणं तु यः शरदृतुष्वर्पयेत् ॥२०॥ पुराणप्रश्न, ब्रह्मशीर्षच्छेद, कपालमोचनाख्यान, दक्षयज्ञध्वंस, हर का कालरूपाख्यान, कामदहन, प्रह्लाद और नारायण का युद्ध, देवासुरसंग्राम, सुकेशी और अर्क का आख्यान, भुवनकोश, काम्यव्रताख्यान, श्रीदुर्गाचरित, तपती का चरित कुरुक्षेत्रवर्णन, सत्यभामा का माहात्म्य, पार्वती का अनुपम जन्म वर्णन उनका तप, विवाह, गौरी का उपाख्यान कौशिकी का उपाख्यान, कुमार कार्तिकेय का चरित्र, अंधकवधाख्यान, साध्योपाख्यान, जावालिचरित, अरजा की अद्भुत कथा, अंधक तथा ईश्वर का युद्ध, अंधक की गणत्वप्राप्ति, मरुतों की जन्म- कथा, बलिचरित्र ।।३-९।। लक्ष्मीचरित्र, त्रिविक्रमचरित, प्रह्लादतीर्थयात्रा की अनेक पवित्र कथायें, धुंधुचरित, प्रेतोपाख्यान, नक्षत्रपुरुषाख्यान, श्रीदामा का चरित्र, त्रिविक्रम के चरित्तान्त में ब्रह्मा द्वारा की गई उत्तम स्तुति, प्रह्लाद और बलि के संवाद में सुतल में हरि का वास--इतने विषय वर्णित हुए हैं। पुराण का यह पूर्व भाग तुमसे बतला दिया। इसके बृहद्वामन नामक उत्तर भाग में माहेश्वरी, भागवती, सौरी और गाणेश्वरी नामक चार संहितायें हैं; प्रत्येक संहिता एक सहस्र श्लोकों से पूर्ण है ॥१०-१४॥ माहेश्वरी में कृष्ण तथा उनके भक्तों का कीर्तन, भागवती में जगन्माता की अवतार-कथा, सौरी में पापनाशन सूर्यमाहात्म्य और गाणेश्वरी में महेश गणेश का चरित्र चित्रित हुआ है। पहले इस विचित्र वामन पुराण को पुलस्त्य ने महात्मा नारद से बतलाया। तब नारद से सुमहात्मा व्यास ने प्राप्त किया। व्यास से उनके शिष्य रोमहर्षण ने लाभ किया। उन्होंने नैमिषारण्यवासी विप्रों को सुनाया। इस तरह पवित्र वामनपुराण परंपरा से प्राप्त हुआ है। जो इसका श्रवण तथा पाठ करता है, उसे सद्गति मिलती है। जो मानव इस पुराण को लिखकर शरद् ऋतु में

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