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भारतकोश
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बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ८६६ पुराणप्रश्नः प्रथमं ब्रह्मशीर्षच्छिदा ततः । कपालमोचनाख्यानं दक्षयज्ञविहिंसनम् ॥३॥ हरस्य कालरूपाख्या कामस्य दहनं ततः । प्रह्लादनारायणयोर्युद्धं देवासुराहवः ॥४॥ सुकेश्यर्कसमाख्यानं ततो भुवनकोशकम् । ततः काम्यव्रताख्यानं श्रीदुर्गाचरितं ततः ॥५॥ तपतीचरितं पश्चात्कुरुक्षेत्रस्य वर्णनम् । सत्यभामामाहात्म्यमतुलं पार्वतीजन्मककीर्तनम् ॥६॥ तपस्तस्या विवाहश्च गौर्युपाख्यानकं ततः । ततः कौशिकोपाख्यानं कुमारचरितं ततः ॥७॥ ततोऽन्धकवधाख्यानं साध्योपाख्यानकं ततः । जाबालिचरितं पश्चादरजायाः कथाद्भुता ॥८॥ अंधकेश्वरयोर्युद्धं गणत्वं चांधकस्य च । मरुतां जन्मकथनं बलेश्च चरितं ततः ॥९॥ ततस्तु लक्ष्म्याश्चरितं त्रैविक्रममतः परम् । प्रह्लादतीर्थयात्रायां प्रोच्यंतेऽथ कथाः शुभाः ॥१०॥ ततश्च धुन्धुचरितं प्रेतोपाख्यानकं ततः । नक्षत्रपुरुषाख्यानं श्रीदामचरितं ततः ॥११॥ त्रिविक्रमचरितांते ब्रह्मप्रोक्तः स्तवोत्तमः । प्रह्लादबलिसंवादे सुतले हरिशंसनम् ॥१२॥ इत्येष पूर्वभागोऽस्य पुराणस्य तवोदितः । शृण्वतोऽस्योत्तरं भागं बृहद्वामनसंज्ञकम् ॥१३॥ माहेश्वरी भागवती सौरी गाणेश्वरी तथा । चतस्रः संहिताश्चात्र पृथक् साहस्त्रसंख्यया ॥१४॥ माहेश्वर्यां तु कृष्णस्य तद्भक्तानां च कीर्तनम् । भागवत्यां जगन्मातुरवतारकथाऽद्भुता ॥१५॥ सौर्यां सूर्यस्य महिमा गदितः पापनाशनः । गाणेश्वर्यां गणेशस्य चरितं च महेशितुः ॥१६॥ इत्येतद्वामनं नाम पुराणं सुविचित्रकम् । पुलस्त्येन समाख्यातं नारदाय महात्मने ॥१७॥ ततो नारदतः प्राप्तं व्यासेन सुमहात्मना । व्यासात्तु लब्धवांश्चैतत् तच्छिष्यो रोमहर्षणः ॥१८॥ स चाख्यास्यति विप्रेभ्यो नैमिषीयेभ्य एव च । एवं परम्पराप्राप्तं पुराणं वामनं शुभम् ॥१९॥ ये पठंति च शृण्वंति तेऽपि यांति परां गतिम् । लिखित्‍वैतत्पुराणं तु यः शरदृतुष्वर्पयेत् ॥२०॥ पुराणप्रश्न, ब्रह्मशीर्षच्छेद, कपालमोचनाख्यान, दक्षयज्ञध्वंस, हर का कालरूपाख्यान, कामदहन, प्रह्लाद और नारायण का युद्ध, देवासुरसंग्राम, सुकेशी और अर्क का आख्यान, भुवनकोश, काम्यव्रताख्यान, श्रीदुर्गाचरित, तपती का चरित कुरुक्षेत्रवर्णन, सत्यभामा का माहात्म्य, पार्वती का अनुपम जन्म वर्णन उनका तप, विवाह, गौरी का उपाख्यान कौशिकी का उपाख्यान, कुमार कार्तिकेय का चरित्र, अंधकवधाख्यान, साध्योपाख्यान, जावालिचरित, अरजा की अद्भुत कथा, अंधक तथा ईश्वर का युद्ध, अंधक की गणत्वप्राप्ति, मरुतों की जन्म- कथा, बलिचरित्र ।।३-९।। लक्ष्मीचरित्र, त्रिविक्रमचरित, प्रह्लादतीर्थयात्रा की अनेक पवित्र कथायें, धुंधुचरित, प्रेतोपाख्यान, नक्षत्रपुरुषाख्यान, श्रीदामा का चरित्र, त्रिविक्रम के चरित्तान्त में ब्रह्मा द्वारा की गई उत्तम स्तुति, प्रह्लाद और बलि के संवाद में सुतल में हरि का वास--इतने विषय वर्णित हुए हैं। पुराण का यह पूर्व भाग तुमसे बतला दिया। इसके बृहद्वामन नामक उत्तर भाग में माहेश्वरी, भागवती, सौरी और गाणेश्वरी नामक चार संहितायें हैं; प्रत्येक संहिता एक सहस्र श्लोकों से पूर्ण है ॥१०-१४॥ माहेश्वरी में कृष्ण तथा उनके भक्तों का कीर्तन, भागवती में जगन्माता की अवतार-कथा, सौरी में पापनाशन सूर्यमाहात्म्य और गाणेश्वरी में महेश गणेश का चरित्र चित्रित हुआ है। पहले इस विचित्र वामन पुराण को पुलस्त्य ने महात्मा नारद से बतलाया। तब नारद से सुमहात्मा व्यास ने प्राप्त किया। व्यास से उनके शिष्य रोमहर्षण ने लाभ किया। उन्होंने नैमिषारण्यवासी विप्रों को सुनाया। इस तरह पवित्र वामनपुराण परंपरा से प्राप्त हुआ है। जो इसका श्रवण तथा पाठ करता है, उसे सद्गति मिलती है। जो मानव इस पुराण को लिखकर शरद् ऋतु में

६०० नारदीयपुराणम् विप्राय वेदविदुषे घृतधेनुसमन्वितम् । स समुद्धृत्य नरकान्नयेत्स्वर्गं पितृन्स्वकान् ॥२१॥ देहान्ते भुक्तभोगोऽसौ याति विष्णोः परं पदम् । ॥२२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे वामनपुराणानुक्रमणीवर्णनं नाम पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः ॥१०५॥ षडधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स मरीचे त्वं पुराणं कूर्मसंज्ञकम् । लक्ष्मीकल्पानुचरितं यत्र कूर्मवपुर्हरिः ॥१॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां माहात्म्यं च पृथक्पृथक् । इंद्रद्युम्नप्रसंगेन प्राहर्षिभ्यो दयान्वितः ॥२॥ तत्सप्तदशसाहस्रं सुचतुः संहितं शुभम् । यत्र ब्राह्माः पुरा प्रोक्ता धर्मा नानाविधा मुने ॥३॥ नाना कथाप्रसंगेन नृणां सद्गतिदायकाः । तत्र पूर्वविभागे तु पुराणोपक्रमः पुरा ॥४॥ लक्ष्मींद्रद्युम्नसंवादः कूर्मर्षिगणसंकथा । वर्णाश्रमाचारकथा जगदुत्पत्तिकीर्तनम् ॥५॥ कालसंख्या समासेन लयान्ते स्तवनं विष्णोः । ततः संक्षेपतः सर्गः शांकरं चरितं तथा ॥६॥ सहस्रनाम पार्वत्या योगस्य च निरूपणम् । भृगुवंशसमाख्यानं ततः स्वायम्भुवस्य च ॥७॥ देवादीनां समुत्पत्तिर्दक्षयज्ञाहूतिस्ततः । दक्षसृष्टिकथा पश्चात्कश्यपान्वयकीर्तनम् ॥८॥ आत्रेयवंशकथनं कृष्णस्य चरितं शुभम् । मातंडकणसंवादो व्यासपाण्डवसंकथा ॥६॥ वेदवेत्ता द्विज को घृतधेनु सहित समर्पित करता है, वह अपने पितरों को नरक से उद्धार करके स्वर्ग को पहुँचाता हैं और स्वयं सुखोपभोग करते हुए देहान्त में वैकुण्ठ को जाता है ।।१५-२०।। श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में वामनपुराणानुक्रमणी वर्णन नामक एक सौ पाँचवां अध्याय समाप्त ॥१०५॥ अध्याय १०६ कूर्मपुराण की विषयानुक्रमणी ब्रह्मा बोले--हे वत्स ! मरीचे ! लक्ष्मीकल्पानुचरित कूर्म नामक पुराण सुनो, जिसमें हरि के कूर्मावतार और धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, के माहात्म्य का पृथक्-पृथक् रूप से वर्णन किया गया है । यह पुराण इंद्रद्युम्न के प्रसंग में दयालु व्यास द्वारा ऋषियों को बतलाया गया है । इसमें चार संहितायें तथा सत्रह हजार श्लोक हैं। मुने ! इसके पूर्व भाग में विविध कथा प्रसंग से मनुष्यों को सद्गति देने वाले अनेक ब्राह्मण धर्मों का प्रतिपादन, पुराणोपक्रम, लक्ष्मी और इंदुद्युम्न का संवाद, कूर्म और ऋषियों का संवाद, वर्णाश्रमाचारकथा, जगदुत्पत्तिकी- र्तन, संक्षेप से कालसंख्या, लयान्त में भगवान् की स्तुति, संक्षेप से सृष्टि वर्णन, शंकरचरित्र, पार्वतीसहस्रनाम,

षडधिकशततमोऽध्यायः ६०१ युगधर्मानुकथनं व्यासजैमिनिकीर्तनम् । वाराणस्याश्च माहात्म्यं प्रयागस्य ततः परम् ॥१०॥ त्रैलोक्यवर्णनं चैव वेदशाखानिरूपणम् । उत्तरेऽस्या विभागे तु पुरा गीतेश्वरी ततः ॥११॥ व्यासगीता ततः प्रोक्ता नानाधर्मप्रबोधिनी । नानाविधानां तीर्थानां माहात्म्यं च पृथक् ततः ॥१२॥ प्रतिसर्गप्रकथनं ब्राह्मीयं संहिता स्मृता । अतः परं भागवतीसंहितार्थं निरूपणम् ॥१३॥ कथिता यत्र वर्णानां पृथग्वृत्तिरुदाहृता । पादेऽस्याः प्रथमे प्रोक्ता ब्राह्मणानां व्यवस्थितिः ॥१४॥ सदाचारात्मिका वत्स भोगसौख्यविवर्द्धनी । द्वितीये क्षत्रियाणां तु वृत्तिः सम्यक्प्रकीर्तिता ॥१५॥ यया स्वाश्रितया पापं विधूयेह व्रजेद्दिवम् । तृतीये वैश्यजातीनां वृत्तिरुक्ता चतुर्विधा ॥१६॥ यया चरितया सम्यल्लभते गतिमुत्तमाम् । चतुर्थेऽस्यास्तथा पादे शूद्रवृत्तिरुदाहृता ॥१७॥ यया संतुष्यति श्रीशो नृणां श्रेयोविवर्द्धनः । पंचमेऽस्यास्ततः पादे वृत्तिः संकरजोदिता ॥१८॥ यया चरितमाप्नोति भाविनों गतिमुत्तमाम् । इत्येषा पंचपद्युक्ता द्वितीया संहिता मुने ॥१९॥ तृतीयात्रोदिता सौरी नृणां कार्यविधायिनी । षोढा षट्कर्मसिद्धिं बोधयन्ती च कामिनाम् ॥२०॥ चतुर्थी वैष्णवी नाम मोक्षदा परिकीर्तिता । चतुष्पदी द्विजातीनां साक्षाद्ब्रह्मस्वरूपिणी ॥२१॥ ताः क्रमात्षट्चतुर्द्विद्विसाहस्राः परिकीर्तिताः । ॥२२॥ एतत्कूर्मपुराणं तु चतुर्वर्गफलप्रदम् । पठतां शृण्वतां नृणां सर्वोत्कृष्टगतिप्रदम् ॥२३॥ लिखितवैतत्तु यो भक्त्या हेमकूर्मसमन्वितम् । ब्राह्मणायायने दद्यात्स याति परमां गतिम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे कूर्मपुराणानुक्रमणकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥१०६॥

योगनिरूपण, युगधर्मकथन, व्यास और जैमिनि की कथा, वाराणसी और प्रयाग का माहात्म्य, त्रैलोक्यवर्णन और वेदशाखानिरूपण--इतने विषय आये हैं ॥१।१-१०१/२॥ उत्तर भाग के ब्राह्मी संहिता में प्रथमतः ईश्वरीगीता, व्यासगीता, नानाविध तीर्थमाहात्म्य, अनेकधर्मकथा तथा प्रतिसर्गनिरूपण किया गया है। भागवती संहिता के प्रथम पाद में, सदाचारयुक्त भोगसौख्य को बढ़ाने वाली ब्राह्मणों की व्यवस्था बताई गई है। द्वितीय पाद में क्षत्रिय की वृत्ति का सम्यक्रूप से प्रतिपादन किया गया है, जिसके अनुष्ठान से निष्पाप होकर क्षत्रिय स्वर्ग को जाते हैं। तृतीय पाद में वैश्यों की चार प्रकार वृत्ति का निरूपण किया गया है, जिसके संपादन से वैश्य उत्तम गति को लाभ करते हैं। चौथे पाद में शूद्रों की वृत्ति का कथन हुआ है, जिसके करने से मानवकल्याणवर्धक नारायण संतुष्ट होते हैं। पाँचवें पाद में संकरों की वृत्ति कथित हुई है, जिसके सम्यक् आचरण से उत्तम गति की प्राप्ति होती है। मुने ! यह पंचपदी द्वितीय संहिता कही गई ॥११-१९॥ तीसरी सौरी संहिता मनुष्यों के कार्य सम्पन्न करने वाली तथा कामियों के छह कर्मों को सिद्ध करने वाली है। चौथी वैष्णवी संहिता मोक्ष देने वाली, चार पादों वाली तथा द्विजातियों के लिये साक्षात् ब्रह्मस्वरूपि- णी है। वे संहितायें क्रमशः छह, चार तथा दो हजार श्लोकों में परिपूर्ण हैं (?)। यह कूर्मपुराण चतुर्वर्ग के फल को देने वाला है। इसके पाठ तथा श्रवण से मानवों को उत्कृष्ट गति मिलती है। जो इस पुराण को लिखकर ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक सुवर्णकच्छप सहित यह प्रदान करता है उसे परम गति की प्राप्ति होती है ॥२०-२१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में कूर्मपुराणानुक्रमणकथन नामक एक सौ छठा अध्याय समाप्त ॥१०६॥

सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच अथ मात्स्यं पुराणं ते प्रवक्ष्ये द्विजसत्तम । यत्रोक्तं सप्तकल्पानां वृत्तं संक्षिप्य भूतले ॥१॥ व्यासेन वेदविदुषा नारसिंहोपवर्णने । उपक्रम्य तदुद्दिष्टं चतुर्दशसहस्रकम् ॥२॥ मनुमत्स्यसुसंवादो ब्रह्मांडकथनं ततः । ब्रह्मदेवासुरोत्पत्तिर्मारुतोत्पत्तिरेव च ॥३॥ मदनद्वादशी तद्वल्लोकपालाभिपूजनम् । मन्वन्तरसमुद्देशो वैश्यराज्याभिवर्णनम् ॥४॥ सूर्यवैवस्वतोत्पत्तिर्बुधसंगमनं तथा । पितृवंशानुकथनं श्राद्धकालस्तथैव च ॥५॥ पितृतीर्थप्रचारश्च सोमोत्पत्तिस्तथैव च । कीर्तनं सोमवंशस्य ययातिचरितं तथा ॥६॥ कार्तवीर्यस्य चरितं सृष्टवंशानुकीर्तनम् । भृगुशापस्तथा विष्णोर्दशधा जन्मने क्षितौ ॥७॥ कीर्त्तनं पूरुवंशस्य वंशो हौताशनः परम् । क्रियायोगस्ततः पश्चात्पुराणपरिकीर्तनम् ॥८॥ व्रतं नक्षत्रपुरुषं मार्तण्डशयनं तथा । कृष्णाष्टमीव्रतं तद्वद्रोहिणीचन्द्रसंज्ञितम् ॥६॥ तडागविधिमाहात्म्यं पादपोत्सर्ग एव च । सौभाग्यशयनं तद्वदगस्त्यव्रतमेव च ॥१०॥ तथानन्ततृतीयाया रसकल्याणीव्रतं । तथैवानंदकर्याश्च व्रतं सारस्वतं पुनः ॥११॥ उपरागाभिषेकश्च सप्तमीशयनं तथा । भीमाख्या द्वादशी तद्वदनंगशयनं तथा ॥१२॥ अशून्यशयनं तद्वत्तथैवांगारकव्रतम् । सप्तमीसप्तकं तद्वद्विशोकद्वादशीव्रतम् ॥१३॥ मेरुप्रदानं दशधा ग्रहशान्तिस्तथैव च । ग्रहस्वरूपकथनं तथा शिवचतुर्दशी ॥१४॥ तथा सर्वफलत्यागः सूर्यवारव्रतं तथा । संक्रांतिस्नपनं तद्वद्विभूतिद्वादशीव्रतम् ॥१५॥ अध्याय १०७ मत्स्यपुराण की विषयानुक्रमणी ब्रह्मा बोले-द्विजश्रेष्ठ ! अब मात्स्यपुराण तुम्हें सुनाऊँगा, जिसमें भूतलास्थित वेदवेत्ता व्यास ने सात कल्पों का संक्षिप्त वृत्तान्त बतलाया है। उसके उपक्रम में नरसिंह का वर्णन है। वह चौदह हजार श्लोकों से परि- पूर्ण है ॥१-२॥ पहले मनु और मत्स्य का संवाद पश्चात् ब्रह्मांडकथन, ब्रह्मदेव, असुर तथा मरुत् की उत्पत्ति, मदनद्वादशी, लोकपाल पूजा, मन्वन्तरनिर्देश, वैन्यराज्यवर्णन, सूर्यवैवस्वतोत्पत्ति, बुधसंगम, पितृवंशकथन, श्राद्ध- काल, पितृतीर्थप्रचार, सोमोत्पत्ति, सोमवंशकीर्तन, ययातिचरित, कार्तवीर्यचरित, सृष्टवंशकीर्तन, विष्णु का भृगु- शाप, पृथ्वी पर उनका दशावतार ॥३-७॥ पुरुवंशसंकीर्तन, हुताशनवंश, क्रियायोग, पुराण परिकीर्तन, पुरुषव्रत, मार्तंड- शयनव्रत, कृष्णाष्टमीव्रत, रोहिणीचंद्रव्रत, तडागविधिमाहात्म्य, वृक्षोत्सर्ग, सौभाग्यशयन, अगस्त्यव्रत, अनन्ततृती- याव्रत, रसकल्याणीव्रत, भानन्दकारीव्रत, सारस्वतव्रत, उपरागाभिषेक, सप्तमीशयन, भीमाद्वादशीव्रत, अनंगशयनव्रत, अशून्यशयनव्रत, अंगारकव्रत, सप्तमीसप्तकव्रत, विशोकद्वादशीव्रत, मेरुप्रदान, दशधा ग्रहशान्ति, ग्रहस्वरूपकथन, शिवचतुर्दशी, सर्वफलत्याग, सूर्यवारव्रत, संक्रान्तिस्नपन, विभूतिद्वादशीव्रत, षष्टिव्रत का माहात्म्य, स्नानविधिक्रम,

सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ६०३ षष्टिव्रतानां माहात्म्यं तथा स्नानविधिक्रमः । प्रयागस्य तु माहात्म्यं द्वीपलोकानुवर्णनम् ॥१६॥ तथांतरिक्षचारश्च ध्रुवमाहात्म्यमेव च । भवनानि सुरेंद्रेणां त्रिपुरोद्योतनं तथा ॥१७॥ पितृप्रवरमाहात्म्यं मन्वंतरविनिर्णयः । चतुर्युगस्य संभूतिर्युगधर्मनिरूपणम् ॥१८॥ वज्रांगस्य तु संभूतिस्तारकोत्पत्तिरेव च । तारकासुरमाहात्म्यं ब्रह्मदेवानुकीर्तनम् ॥१९॥ पार्वतीसंभवस्तद्वत्तथा शिवतपोवनम् । अनंगदेहदाहश्च रतिशोकस्तथैव च ॥२०॥ गौरीतपोवनं तद्वच्छिवेनाथ प्रसादनम् । पार्वतीऋषिसंवादस्तथैवोद्वाहमंगलम् ॥२१॥ कुमारसंभवस्तद्वत्कुमारविजयस्तथा । तारकस्य वधो घोरो नरसिंहोपवर्णनम् ॥२२॥ पद्मोद्भवविसर्गस्तु तथैवांधकघातनम् । वाराणस्यास्तु माहात्म्यं नर्मदायास्तथैव च ॥२३॥ प्रवरानुक्रमस्तद्वत्पितृगाथानुकीर्तनम् । तथोभयमुखीदानं दानं कृष्णाजिनस्य च ॥२४॥ ततः सावित्र्युपाख्यानं राजधर्मास्तथैव च । विविधोत्पातकथनं ग्रहशांतस्तथैव च ॥२५॥ यात्रानिमित्तकथनं स्वप्नमंगलकीर्तने । वामनस्य तु माहात्म्यं वाराहस्य ततः परम् ॥२६॥ समुद्रमथनं तद्वत्कालकूटाभिशांतनम् । देवासुरविमर्दश्च वास्तुविद्या तथैव च ॥२७॥ प्रतिमालक्षणं तद्वद्देवतायतनं तथा । प्रासादलक्षणं तद्वन्मंडपान च लक्षणम् ॥२८॥ भविष्यराज्ञामुद्देशो महादानानुकीर्तनम् । कल्पानुकीर्तनं तद्वत्पुराणेऽस्मिन्प्रकीर्तितम् ॥२९॥ पवित्रमेतत्कल्याणमायुः कीर्तिविवर्द्धनम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति भवनं हरेः ॥३०॥ लिखित्त्वैतत्तु यो दद्याद्धेममत्स्यगवान्वितम् । विप्रायाभ्यर्च्य विषुवे स याति परमं पदम् ॥३१॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे मत्स्यपुराणानुक्रमणीकथनं नाम सप्ताधिकशततमोऽध्यायः ॥१०७॥ प्रयागमाहात्म्य, द्वीपलोकवर्णन ।।८-१६।। अन्तरिक्षसंचरण, ध्रुवमाहात्म्य, सुरेन्द्रभवन, त्रिपुरप्रभाव, पितृप्रवरमा- हात्म्य, मन्वन्तरनिर्णय, चतुर्युगोत्पत्ति, युगधर्मनिरूपण, वज्रांग की उत्पत्ति, तारकोत्पत्ति, तारकासुरमाहात्म्य, ब्रह्म- देवकीर्तनं, पार्वती की उत्पत्ति, शिवतपोवन, कामदेहदाह, रतिशोक, गौरीतपोवन, शिवप्रसादन, पार्वती तथा ऋषि का संवाद, परिणयमंगल ।।१७-२१।। कुमारसंभव, कुमारीविजय, तारकवध, नरसिंहवर्णन, पद्मोद्भवविसर्ग, अंधकपातन, वाराणसी तथा नर्मदा का माहात्म्य, प्रवरानुक्रम, पितृगाथाकीर्तन, उभयमुखीदान, कृष्णाजिनदान, सावित्री-उपाख्यान, राजधर्म, विविधोत्पातकथन, ग्रहशान्ति, यात्रानिमित्तकथन, स्वप्नमंगलकीर्तन, वामनमाहात्म्य, बाराहमाहात्म्य, समुद्रमंथन, कालकूट-निःसरण, देवासुरसंघर्ष, वास्तुविद्या, प्रतिमालक्षण, देवतास्थापन, प्रासादलक्षण, मंडपलक्षण, भविष्य- राजगण का कथन, महादानकीर्तन और कल्पों का कीर्तन इस पुराण में किया गया है। यह पवित्र पुराण कल्याण, आयु तथा कीर्ति को बढ़ाने वाला है जो इसका पाठ और श्रवण करता है, उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है। इस पुराण को लिखकर विषुवे में (जब दिनरात का मान बराबर होता है) सुवर्ण के मत्स्य तथा गाय सहित यह समर्पित करता है, वह परम पद को प्राप्त करता है ।।२२-३१।। श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में मत्स्यपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ सातवां अध्याय समाप्त ॥१०७॥

अष्टाधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच मरीचे शृणु वक्ष्यामि पुराणं गारुडं शुभम् । गरुडायाब्रवीत्पृष्टो भगवान्गरुडासनः ॥१॥ एकोनविंशसाहस्रं तार्क्ष्यकल्पकथान्वितम् । पुराणोपक्रमप्रश्नः सर्गः संक्षेपतस्ततः ॥२॥ सूर्यादिपूजनविधिर्दीक्षाविधिस्ततः परम् । श्राद्धपूजा ततः पश्चान्नवव्यूहार्चनं द्विज ॥३॥ पूजाविधानं च तथा वैष्णवं पंजरम् ततः । योगाध्यायस्ततो विष्णोर्नामसाहस्रकीर्तनम् ॥४॥ ध्यानं विष्णोस्ततः सूर्यपूजा मृत्युंजयार्चनम् । मालामंत्रः शिवार्चाथ गणपूजा ततः परम् ॥५॥ गोपालपूजा त्रैलोक्यमोहनश्रीधरार्चनम् । विष्ण्वर्चा पंचतत्त्वार्चा चक्रार्चा देवपूजनम् ॥६॥ न्यासादिसंध्योपास्तिश्च दुर्गाार्चाथ सुरार्चनम् । पूजा माहेश्वरी चातः पवित्रारोपणार्चनम् ॥७॥ मूर्तिध्यानं वास्तुमानं प्रासादानां च लक्षणम् । प्रतिष्ठा सर्वदेवानां पृथक्पूजा विधानतः ॥८॥ योगोऽष्टांगो दानधर्माः प्रायश्चित्तविधिक्रिया । द्वीपेशनरकाख्यानं सूर्यव्यूहश्च ज्योतिषम् ॥९॥ सामुद्रिकं स्वरज्ञानं नवरत्नपरीक्षणम् । माहात्म्यमथ तीर्थानां गयामाहात्म्यमुत्तमम् ॥१०॥ ततो मन्वंतराख्यानं पृथक्पृथग्विभागशः । पित्राख्यानं वर्णधर्मा द्रव्यशुद्धिः समर्पणम् ॥११॥ श्राद्धं विनायकस्यार्चा ग्रहयज्ञस्तथा श्रमाः । जननाख्यं प्रेतशौचं नीतिशास्त्रं व्रतोक्तयः ॥१२॥ अध्याय १०८ गरुड़पुराण की विषयानुक्रमणी ब्रह्मा बोले-वत्स मरीचे ! सुनो, मैं पवित्र गरुडपुराण को बतलाता हूँ। पूछे जाने पर भगवान् श्री कृष्ण ने यह पुराण गरुड से कहा था। यह तार्क्ष्यकल्प की कथा से युक्त एवं उन्नीस हजार श्लोकों से परिपूर्ण है। इसके पूर्व खंड में पुराणोपक्रम का प्रश्न, संक्षेप से सृष्टि वर्णन, सूर्यादिपूजन विधि, 'दीक्षाविधि, श्राद्धपूजा, नव व्यूहादि अर्चना, पूजा-विधान, वैष्णवपंजर, योगाध्याय, विष्णुसहस्रनाम, विष्णुध्यान, सूर्यपूजा, मृत्युंजय की आराधना, मालामंत्र, शिवार्चा, गणपूजा ॥१-५॥ गोपालपूजा, त्रैलोक्यमोहनश्रीधरार्चन, विष्णुपूजा, पंचतत्त्वों की अर्चा, चक्रार्चन, देवपूजन, न्यासादि, संध्योपासन, दुर्गाार्चा, सुरार्चन, माहेश्वरीपूजा, पवित्रारोपणार्चन, मूर्तिध्यान, वास्तुमान, प्रासादों का लक्षण, सकल देवों की प्रतिष्ठा तथा पृथक्-पृथक् पूजाविधान, अष्टांगयोग, दानधर्म, प्रायश्चित्तविधि, द्वीपेश तथा नरकों का आख्यान, सूर्यव्यूह, ज्योतिष, सामुद्रिक, स्वरज्ञान, नवरत्नपरीक्षण, तीर्थमाहात्म्य, उत्तम गयामाहात्म्य, पृथक्-पृथक् रूप से मन्वन्तराख्यान, पित्राख्यान, वर्णधर्म, द्रव्यशुद्धि, समर्पण ॥६-११॥ श्राद्ध, गणेशपूजन, ग्रहयज्ञ, आश्रम, जन्माख्यान, प्रेतशौच, नीतिशास्त्र, व्रतविधान, सूर्यवंश, सोमवंश, हरि

सूर्यवंशः सोमवंशोऽवतारकथनं हरेः । रामायणं हरिवंशो भारताख्यानकं ततः ॥१३॥ आयुर्वेदनिदानं प्राक् चिकित्सा द्रव्यजा गुणाः । रोगघ्नं कवचं वैष्णो गारुडं त्रैपुरो मनुः ॥१४॥ प्रश्नचूडामणिश्चांतो हयायुर्वेदकीर्तनम् । ओषधीनामकथनं ततो व्याकरणोहनम् ॥१५॥ छंदःशास्त्रं सदाचारस्ततः स्नानविधिः स्मृतः । तर्पणं वैश्वदेवं च संध्या पार्वणकर्म च ॥१६॥ नित्यश्राद्धं सर्पिडाख्यं धर्मसारोऽधनिष्कृतिः । प्रतिसंक्रम उक्ताः स्म युगधर्माः कृतेः फलम् ॥१७॥ योगशास्त्रं विष्णुभक्तिर्नमस्कृतिफलं हरेः । माहात्म्यं वैष्णवं चाथ नारसिंहस्तबोत्तमम् ॥१८॥ ज्ञानामृतं गुहाष्टकं स्तोत्रं विष्ण्वर्चनाव्रध्वम् । वेदांतसांख्यसिद्धांतो ब्रह्मज्ञानं तथात्मकम् ॥१९॥ गीतासारः फलोत्कीर्तिः पूर्वखंडोऽयमीरितः । अथास्यैवोत्तरे खंडे प्रेतकल्पः पुरोदितः ॥२०॥ यत्र ताक्ष्र्येण संपृष्टो भगवानाह वाडवाः । धर्मप्रकटनं पूर्वं योगिनां गतिकारणम् ॥२१॥ दानादिकं फलं चापि प्रोक्तमन्त्रौर्ध्वदैहिकम् । यमलोकस्य मार्गस्य वर्णनं च ततः परम् ॥२२॥ षोडशश्राद्धफलको वृत्तांतश्चात्र बर्णितः । निष्कृतिर्यममार्गस्य धर्मराजस्य वैभवम् ॥२३॥ प्रेतपीडाविनिर्देशः प्रेतचिह्न निरूपणम् । प्रेतानां चरिताख्यानं कारणं प्रेततां प्रति ॥२४॥ प्रेतकृत्यविचारश्च सपिंडीकरणोक्तयः । प्रेतत्वमोक्षमाख्यानं दानानि च विमुक्तये ॥२५॥ आवश्यकौत्तमं दानं प्रेतसौख्यकरोहनम् । शारीरकविनिर्देशो यमलोकस्य वर्णनम् ॥२६॥ प्रेतत्वोद्धारकथनं कर्मकर्तृविनिर्णयः । मृत्योः पूर्वक्रियाख्यानं पश्चात्कर्मनिरूपणम् ॥२७॥ मध्यषोडशक श्राद्धं स्वर्गप्राप्तिक्रियोहनम् । सूतकस्याथ संख्यानं नारायणबलिक्रिया ॥२८॥ वृषोत्सर्गस्य माहात्म्यं निषिद्धपरिवर्जनम् । अपमृत्युक्रियोक्तिश्च विपाकः कर्मणां नृणाम् ॥२९॥ कृत्याकृत्यविचारश्च विष्णुष्यानविमुक्तये । स्वर्गसौ विहिताख्यानं स्वर्गसौख्यनिरूपणम् ॥३०॥

का अवतारकथन, रामायण, हरिवंश, भारताख्यान, आयुर्वेदनिदान, प्राथमिक चिकित्सा, द्रव्यगुण, रोगनाशी विष्णुकवच, गारुड़ और त्रैपुरमंत्र, प्रश्नचूड़ामणि, हयायुर्वेदकीर्तन, ओषधिनामकथन, व्याकरण, छंदःशास्त्र, सदा- चार, स्नानविधि, वैश्वदेवतर्पण, संध्या, पार्वणकर्म नित्यश्राद्ध, सपिंडाख्यश्राद्ध, धर्मसार, पापनिवृत्ति, प्रतिसंक्रम, युगधर्म, कर्तव्यफल, योगशास्त्र, विष्णुभक्ति, हरिनमस्कारफल, वैष्णवमाहात्म्य, नारसिंहस्तोत्र, ज्ञानामृत, गुहाष्टक- स्तोत्र, विष्णु की अर्चा, वेदान्त तथा सांख्य का सिद्धान्त, ब्रह्मज्ञान गीतासार तथा फलकथन-इतने विषय वर्णित हैं ॥१२-१९३॥ उत्तर खंड में पहले गरुड़ के पूछने पर भगवान् प्रेतकल्प ही बतलाया । पश्चात् धर्मप्रकटन, योगियों की गति का कारण दानादिक फल, और्ध्वदैहिक मंत्र, यमलोक के भागं का वर्णन, षोडश श्राद्ध का फल वृत्तांत, यममार्ग की निष्कृति, धर्मराज का वैभव, प्रेतपीड़ा का निर्देश, प्रेतचिह्ननिरूपण, प्रेतों के चरित्र का आख्यान, प्रेतत्व प्राप्त होने का कारण, प्रेतकृत्य का विवरण, सपिंडीकरण का आख्यान, प्रेतत्वमोक्षण, मुक्तयर्थं दान, आवश्यक उत्तमदान, प्रेत को सुख पहुंचाने वाली क्रिया, शारीरिक निर्देश, यमलोकवर्णन, प्रेतत्व से उद्धार, कर्म और कर्ता का निर्णय, मृत्यु से पूर्व की क्रिया का आख्यान, कर्मनिरूपण, षोडशश्राद्ध, स्वर्गप्राप्तिक्रिया, सूतकसंख्यान, नारायण बलिक्रिया, ॥२०-२८॥ वृषोत्सर्गमाहात्म्य, निषिद्धत्याग, अपमृत्युक्रियाकथन, मनुष्यों का कर्मविपाक, कृत्याकृत्यविचार, मुक्ति के लिए विष्णुक्यान, स्वर्गगति के संबंध में विहिताख्यान, स्वर्गसौख्यनिरूपण, भूलोकवर्णन, सप्तअधोलोकवर्णन, पंचऊर्ध्व- ११४ ना० पु०

६०६ नारदीयपुराणम् भूर्लोकवर्णनं चैव सप्ताधोलोकवर्णनम् । पंचोर्ध्वलोककथनं ब्रह्मांडस्थितिकीर्तनम् ॥३१॥ ब्रह्मांडानेकचरितं ब्रह्मजीवनिरूपणम् । आत्यंतिकं लयाख्यानं फलस्तुतिनिरूपणम् ॥३२॥ इत्येतद्गारुडं नाम पुराणं भुक्तिमुक्तिदम् । कीर्तितं पापशमनं पठतां शृण्वतां नृणाम् ॥३३॥ लिखित्त्वैतत्पुराणं तु विषुवे यः प्रयच्छति । सौवर्णहंसयुग्माढ्यं विप्राय स दिवं व्रजेत् ॥३४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे गारुडानुक्रमणीवर्णनं नामाष्टोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०८॥ नवाधिकशततमोऽध्यायः ब्रह्मोवाच शृणु वत्स प्रवक्ष्यामि ब्रह्मांडाख्यं पुरातनम् । यच्च द्वादशसाहस्रमादिकल्पकथायुतम् ॥१॥ प्रक्रियाख्योऽनुषंगाख्य उपोद्घातस्तृतीयकः । चतुर्थ उपसंहारः पादाश्चत्वार एव हि ॥२॥ पूर्वपादद्वयं पूर्वो भागोऽत्र समुदाहृतः । तृतीयो मध्यमो भागश्चतुर्थस्तूत्तरो मतः ॥३॥ लोककथन, ब्रह्मांडस्थितिकीर्तन, ब्रह्मांड के अनेक चरित्र, ब्रह्मजीवनिरूपण, आत्यंतिकलयाख्यान और फलस्तुति- निरूपण इतने विषयों का दिग्दर्शन कराया। यह गरुड़पुराण पढ़ने तथा सुनने वालों के लिए भुक्ति-मुक्तिदायक तथा पापनाशक है। इस पुराण को लिखकर विषुव में जो व्यक्ति ब्राह्मण को युगल स्वर्णहंससहित यह प्रदान करता है, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है ॥२९-३४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में गरुड़ानुक्रमणीवर्णन नामक एक सौ आठवां अध्याय समाप्त ॥१०८॥ अध्याय १०६ ब्रह्माण्डपुराण की विषयानुक्रमणी ब्रह्मा बोले-वत्स ! सुनो; मैं प्राचीन ब्रह्मांडपुराण को कहता हूँ। यह बारह हजार श्लोकों से परिपूर्ण तथा आदि कल्प की कथाओं से युक्त है। इस पुराण के प्रक्रिया, अनुषंग, उपोद्घात और उपसंहार नामक चार पाद हैं। दो पाद इसका पूर्व भाग है, तीसरा पाद मध्यम भाग है और चतुर्थ उत्तर भाग है ॥१-३॥

नवाधिकशततमोऽध्यायः ६०७ आदौ कृत्यसमुद्देशो नैमिषाख्यानकं ततः । हिरण्यगर्भोत्पत्तिश्च लोककल्पनमेव च ॥४॥ एष वै प्रथमः पादो द्वितीयं शृणु मानव । कल्पमन्वन्तराख्यानं लोकज्ञानं ततः परम् ॥५॥ मानसीसृष्टिकथनं रुद्रप्रसववर्णनम् । महादेवविभूतिश्च ऋषिसर्गस्ततः परम् ॥६॥ अग्नीनां विजयश्चाथ कालसद्भाववर्णनम् । प्रियव्रतान्वयोद्देशः पृथिव्यायामविस्तरः ॥७॥ वर्णनं भारतस्यास्य ततोऽन्येषां निरूपणम् । जम्ब्वादिसप्तद्वीपाख्या ततोऽधोलोकवर्णनम् ॥८॥ उर्ध्वलोकानुकथनं ग्रहचारस्ततः परम् । आदित्यव्यूहकथनं देवग्रहानुकीर्तनम् ॥६॥ नीलकंठाद्युपाख्यानं महादेवस्य वैभवम् । अमावास्यानुकथनं युगतत्त्वनिरूपणम् ॥१०॥ यज्ञप्रवर्तनं चाथ युगयोरन्त्ययोः कृतिः । युगप्रजालक्षणं च ऋषिप्रवरवर्णनम् ॥११॥ देवानां व्यसनाख्यानं स्वायंभुवनिरूपणम् । शेषमन्वन्तराख्यानं पृथ्वोदोहनं ततः ॥१२॥ चाक्षुषेऽद्यतने सर्गे द्वितीयोऽङ्घ्रिः पुरोदले । अथोपौद्घातपादे तु सप्तर्षिपरिकीर्तनम् ॥१३॥ प्रजापत्यन्वयस्तस्माद्देवादीनां समुद्भवः । ततो जयाभिलाषश्च मरुदुत्पत्तिकीर्तनम् ॥१४॥ काश्यपेयानुकथनं ऋषिवंशनिरूपणम् । पितृकल्पानुकथनं श्राद्धकल्पस्ततः परम् ॥१५॥ वैवस्वतसमुत्पत्तिः सृष्टिरतस्य ततः परम् । मनुपुत्रान्वयश्चान्तो गान्धर्वस्य निरूपणम् ॥१६॥ इक्ष्वाकुवंशकथनं वंशोऽत्रेः सुमहात्मनः । अमावसोरन्वयश्च रजेश्चरितमद्भुतम् ॥१७॥ ययातिचरितं चाथ यदुवंशनिरूपणम् । कार्तवीर्यस्य चरितं जामदग्न्यं ततः परम् ॥१८॥ वृष्णिवंशानुकथनं सगरस्याथ संभवः । भार्गवस्यान्नुचरितं पितृकार्यवधाश्रयम् ॥१९॥ सगरस्याथ चरितं भार्गवस्य कथा पुनः । देवासुराहवकथा कृष्णाविर्भाववर्णनम् ॥२०॥ इंद्रस्य तु स्तवः पुण्यः शुक्रेण परिकीर्तितः । विष्णुमाहात्म्यकथनं बलिवंशनिरूपणम् ॥२१॥ भविष्यराजचरितं संप्राप्तेऽथ कलौ युगे । समुपोद्घातपादोऽयं तृतीयो मध्यमे बले ॥२२॥ प्रथम पाद में कर्तव्यनिर्देश, नैमिषार्यान, हिरण्यगर्भोत्पत्ति, तथा लोककल्पन—इतने विषय वर्णित हैं। मानद ! दूसरे कल्प को सुनो । उसमें कल्प, मन्वन्तराख्यान, लोकज्ञान, मानसी सृष्टिकथन, रुद्रप्रसववर्णन, महादेव- विभूति, ऋषिसर्ग, अग्नियों का विजय, कालसद्भाववर्णन, प्रियव्रत का वंशवर्णन, पृथिवी का दैर्घ्य और विस्तार, भारतवर्षवर्णन, जम्बू आदि सात द्वीपों का आख्यान, अधोलोकवर्णन, ऊर्ध्वलोककथन, ग्रहचार, आदित्यव्यूहकथन, देवग्रहों का अनुकीर्तन, नीलकंठाख्यान, महादेव का वैभव, अमावास्यानुकथन, युगतत्त्वनिरूपण, यज्ञप्रवर्तन, शेषयुग का कार्य, युगप्रजालक्षण, ऋषिप्रवरवर्णन, देवों का व्यसनावस्थान, स्वायंभुवनिरूपण, अवशिष्ट मन्वन्तरों का आख्यान तथा पृथिवीदोहन--इतने विषयों की चर्चा की गई है । यही दूसरा पाद है, जिसमें चाक्षुष मन्वन्तर का वर्णन है ॥४-१२॥ उपोद्घातपाद में सप्तर्षियों की कथा, प्रजापतिवंशवर्णन, देव आदिकों की उत्पत्ति उनकी विजयाभिलाषा, मरुत् की उत्पत्ति, काश्यपेयानुकथन, ऋषिवंशनिरूपण, पितृकल्पवर्णन, श्राद्धकला, वैवस्वतसमुत्पत्ति, सृष्टिवर्णन, मनुपुत्र-वंश, गान्धर्वनिरूपण, इक्ष्वाकुवंशकथन, महात्मा अत्रि का वंशवर्णन, अमावसुवंशकथन, रजिचरित्र, ययाति- चरित्र यदुवंशनिरूपण, कार्तवीर्यचरित, जामदग्न्यचरित, वृष्णिवंशानुकथन, सगरोत्पत्ति, पितृवधसंबन्धी भार्गवचरित्र, सगरवर्णन, पुनः भार्गव की कथा, देवासुरसंग्रामवर्णन, कृष्णावतारवर्णन, शुक्र द्वारा इंद्र की उत्तम स्तुति, विष्णु- माहात्म्यकथन, बलिवंशनिरूपण, और कलियुग उपस्थित होने पर भविष्यराजचरित चित्रित किया गया है । यही तीसरा उपोद्घात पाद है, जो पुराण का मध्यम भाग कहलाता है ॥१३-२२॥

६०८ नारदीयपुराणम् चतुर्थमुपसंहारं वक्ष्ये खण्डे तथोत्तरे। वैवस्वतांतराख्यानं विस्तरेण यथातथम् ॥२३॥ पूर्वमेव सबुद्धिष्टं संक्षेपादिह कथ्यते । भविष्याणां मनूनां च चरितं हि ततः परम् ॥२४॥ कल्पप्रलयनिर्देशः कालमानं ततः परम् । लोकाश्चतुर्दश ततः कथिताः प्राप्तलक्षणैः ॥२५॥ वर्णनं नरकाणां च विकर्माचरणैस्ततः । मनोमयपुराख्यानं लयः प्राकृतिकस्ततः ॥२६॥ शेषस्याथ पुरस्यापि वर्णनं च ततः परम् । विविधागुणसंबंधाज्जंतूनां कीर्तिता गतिः ॥२७॥ अनिर्देश्याप्रतर्क्यस्य ब्रह्मणः परमात्मनः । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां वर्णनं हि ततः परम् ॥२८॥ इत्येष उपसंहारपादो वृत्तः सहोत्तरः । चतुष्पादं पुराणं ते ब्रह्मांडं समुदाहृतम् ॥२६॥ अष्टादशमनौपम्यं सारात्सारतरं द्विज । ब्रह्मांडं यच्चतुर्लक्षं पुराणं येन पठ्यते ॥३०॥ तदेतदस्य गदितमष्टादशधा पृथक् । पाराशर्येण मुनिना सर्वेषामपि मानव ॥३१॥ वस्तुतस्तूपदेष्ट्राथ मुनीनां भावितात्मनाम् । मत्तः श्रुत्वा पुराणानि लोकेभ्यः प्रकाशिर ॥३२॥ मुनयो धर्मशीलास्ते दीनानुग्रहकारिणः । मया चेदं पुराणं तु वसिष्ठाय पुरोदितम् ॥३३॥ तेन शक्तिसुतायोक्तं जातकूण्याय तेन च । व्यासो लब्ध्वा ततश्चैतत्प्रभंजनमुखोद्गतम् ॥३४॥ प्रमाणीकृत्य लोकेऽस्मिन्प्रावर्तयदनुत्तमम् । य इदं कीर्तयेद्भक्त्या शृणोति च समाहितः ॥३५॥ स विधूयेह पापानि याति लोकमनामयम् । लिखित्वातत्पुराणं तु स्वर्णसिंहासनस्थितम् ॥३६॥ वस्त्रेणाच्छादितं यस्तु ब्राह्मणाय प्रयच्छति । स याति ब्रह्मणो लोकं नात्र कार्या विचारणा ॥३७॥ मरीचेऽष्टादशैतानि मया प्रोक्तानि यानि ते । पुराणानि तु संक्षेपाच्छ्रोतव्यानि च विस्तरात् ॥३८॥ अष्टादश पुराणानि यः शृणोति नरोत्तमः । कथयेद्वा विधानेन नेह भूयः स जायते ॥३६॥

अब उत्तर भागस्य चतुर्थ उपसंहार पाद का वर्णन करूँगा। पूर्व में वैवस्वतान्तराख्यान विस्तृत रूप से उक्त होने पर भी इस पाद में संक्षेप से कहा गया है। तदनन्तर भावी मनुष्यों का चरित्र, कल्पप्रलयनिर्देश, काल- मान, चौदह लोकों का कथन, नरकों का वर्णन, कुत्सित कर्मों का आचरण, मनोमयपुराख्यान, प्राकृतिकलय, शेषपुर का वर्णन, गुणों के संपर्क से जीवों की तीन प्रकार की गति, अन्वयव्यतिरेक से अनिर्देश्य तथा अतर्क्य पर- मात्मा ब्रह्म का वर्णन हुआ है। यहो उत्तरखंडीय उपसंहारपाद है। चार पादों से युक्त ब्रह्मांडपुराण तुम्हें बतला दिया गया ॥२३-२९॥ द्विज ! यह अठारहवाँ पुराण है जो सब पुराणों का सार माना गया है। इसमें चार लाख श्लोक भी कहे जाते हैं। पराशरपुत्र व्यास ने इसी पुराण को अठारह भागों में विभक्त करके प्रकाशित किया है। मानव ! संयतात्मा मुनियों को वस्तु तत्त्व का उपदेश देने वाले व्यास ने मुझसे पुराणों को सुनकर लोक में प्रचार किया। दीनों के ऊपर अनुग्रह करने वाले धर्मशील मुनियों ने व्यास से पुराणों को प्राप्त किया। पूर्वकाल में वसिष्ठ से मैंने ब्रह्मांड पुराण को बतलाया था। पश्चात् उन्होंने शक्तिसुत व्यास से और व्यास ने जातूकर्ण्य से कहा। व्यास ने प्रभंजन के मुख से निःसृत इस पुराण को प्राप्त कर लोक में प्रमाणित करके प्रचार किया। वत्स ! जो व्यक्ति समाहित होकर इसका पाठ तथा श्रवण करेगा, वह निष्पाप होकर अक्षयलोक को जायेगा। जो इस पुराण को लिखकर स्वर्ण के सिंहासन पर ऊनी वस्त्र से आच्छादित करके ब्राह्मण को समर्पित करता है, उसे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है, इसमें विचार करने की आवश्यकता नहीं ॥३०-३७॥ मरीचे ! यह जो मैंने संक्षेप से पुराणों को बतलाया है, उन्हें विस्तार से सुनना चाहिये। जो उत्तम मानव अठारहों पुराणों को विधिपूर्वक सुनता है या कथा करता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता। अभी जो सूत्र रूप में

दशाधिकशततमोऽध्यायः ६०६ सूत्रमेतत्पुराणानां यन्मयोक्तं तवाधुना । तन्नित्यं शीलनीयं हि पुराणफलमिच्छता ॥४०॥ न दांभिकाय पापाय देवगुर्वसुसूयवे । देयं कदापि साधूनां द्विषे न शठाय च ॥४१॥ शांताय शमचित्ताय शुश्रूषाभिरताय च । निर्मत्सराय शुचये देयं सद्धैष्णवाय च ॥४२॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे ब्रह्मांडपुराणानुक्रमणीनिरूपणं नाम नवोत्तरशततमोऽध्यायः ॥१०९॥ दशाधिकशततमोऽध्यायः नारद उवाच पुराणसूत्रमखिलं श्रुतं तव मुखाद्विभो । मरीचये यथा प्रोक्तं ब्रह्मणा परमेष्ठिना ॥१॥ अधुना तु महाभाग तिथीनां वै कथानकम् । क्रमतो मह्यमाख्याहि यथा स्याद्व्रतनिश्चयः ॥२॥ यस्मिन्मासे तु या पुण्या तिथियेन उपासिता । यद्विधानं च पूजादेस्तत्सर्वं वद सांप्रतम् ॥३॥ सनातन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तिथीनां ते व्रतं पृथक् । तिथीशानुक्रमादेव सर्वसिद्धिविधायकम् ॥४॥ चैत्रे मासि जगद्ब्रह्मा ससर्ज प्रथमेऽहनी । । शुक्लपक्षे समग्रं वै तदा सूर्योदये सति ॥५॥ पुराणों की अनुक्रमणिका तुमसे बतलाई गई है, उसका अनुशीलन पुराणफल के इच्छुक को अवश्य करना चाहिये । पुराण दांभिक, पापी, देव-गुरु के निंदक, साधु-द्रोही तथा शठ को नहीं देना चाहिए । यह शांत, भगवदु- पासक, शुश्रूषु, मत्सरशून्य, पवित्र एवम् वैष्णव को देना चाहिये ॥३८-४२॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में ब्रह्मांडपुराणानुक्रमणीनिरूपण नामक एक सौ नवां अध्याय समाप्त ॥१०९॥ अध्याय ११० बारह मासों का प्रतिपदाव्रत नारद बोले—विभो ! सूत ! जैसे परमेष्ठी ब्रह्मा ने मरीचि से कहा, उस प्रकार मैं अखिल पुराणों को सुन चुका । महाभाग ! इस समय तिथियों के कथानक को सुनना चाहता हूँ । अतः क्रम से कहिये, जिससे व्रतों का निश्चय हो जाय । जिस मास में जो पवित्र तिथि मानी गई है, जिसने उसकी उपासना की है और उसके पूजन आदि का जो विधान बतलाया गया है, वह सब विस्तार से बताइये ।।१-३।। सनातन बोले— नारद ! सुनो, में सकलसिद्धिदायक तिथियों का व्रत पृथक्-पृथक् क्रमशः बतलाऊंगा । बलि के राज्यकाल में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन में सूर्योदय होने के उपरान्त ब्रह्मा ने जगत् की सृष्टि

६१० नारदीयपुराणम् वत्सरादौ वसंतादौ बलिराज्ये तथैव च । पूर्वविद्वैव कर्तव्या प्रतिपत्सर्वदा बुधैः ॥६॥ तत्र कार्या महाशांतिः सर्वकल्मषनाशिनी । सर्वोत्पातप्रशमनी कलिदुष्कृतहारिणी ॥७॥ आयुःप्रदा पुष्टिकरी धनसौभाग्यवर्द्धिनी । मंगल्या च पवित्रा च लोकद्वयसुखावहा ॥८॥ तस्यामादौ तु संपूज्यो ब्रह्मा वह्निवपुर्धरः । पाद्यार्घ्यपुष्पधूपैश्च वस्त्रालंकारभोजनैः ॥६॥ होमैर्बल्युपहारैश्च तथा ब्राह्मणतर्पणैः । ततः क्रमेण देवेभ्यः पूजा कार्या पृथक्पृथक् ॥१०॥ कृत्वोंकारं नमस्कारं कुशोदकतिलाक्षतैः । सवस्त्रं सहिरण्यं च ततो दद्याद्विजातये ॥११॥ दक्षिणां वेदविदुषे व्रतसंपूर्तिहेतवे । एवं पूजाविशेषेण व्रतं स्यात्सौरिसंज्ञकम् ॥१२॥ आरोग्यदं नृणां विप्र तस्मिन्नेव दिने मुने । विद्याव्रतमपि प्रोक्तमस्यामेव तिथौ मुने ॥१३॥ तिलकं नाम च प्रोक्तं कृष्णेनाजातशत्रवे । अथ ज्येष्ठे सिते पक्षे पञ्चम्यां दिवसोदये ॥१४॥ देवोद्यानभवं हृद्यं करवीरं समर्चयेत् । रक्ततन्तुपरीधानं गंधधूपविलेपनैः ॥१५॥ प्ररूढसप्तधान्यैश्च नारंगैर्बीजपूरकैः । अभ्युक्ष्याक्षततोयेन मंत्रेणेत्थं क्षमापयेत् ॥१६॥ करवीर वृक्षावास नमस्ते भानुवल्लभ । दंभोलिमृडदुर्गादिदेवानां सततं प्रिय ॥१७॥ आकृष्णेनेति वेदोक्तमंत्रेणेत्थं क्षमापयेत् । एवं भक्त्या समभ्यर्च्य दत्त्वा विप्राय दक्षिणाम् ॥१८॥ प्रदक्षिणं ततः कुर्यात्पश्चात्स्वभवनं व्रजेत् । नभःशुक्ले प्रतिपदि लक्ष्मीबुद्धिप्रदायकम् ॥१६॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां निदानं परमं व्रतम् । सोमवारं समारभ्य सार्धमासत्रयं द्विज ॥२०॥ की, जो वर्ष एवम् वसन्त ऋतु का प्रारंभिक समय माना जाता है । (अतः उस दिन व्रत रखना चाहिये) परन्तु विद्वान् व्यक्ति सदा पूर्वविद्धा ही प्रतिपदा किया करे । उस तिथि को महाशान्ति करनी चाहिये । वह समस्त पापों का नाश करने वाली, अखिल उपद्रवों को शान्त करने वाली, कलि के दुष्कृत का हरण करने वाली, आयु देने वाली, पुष्टिकरी, धनसौभाग्यवर्धिनी, मंगलमयी, पवित्र तथा उभय लोक में सुख देने वाली है ॥४-८॥ इस तिथि में पहले अग्निदेहधारी ब्रह्मा का पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, धूप, वस्त्र, अलंकार, भोजन, होम, बलि, उपहार तथा ब्राह्मण भोजन द्वारा पूजन करे । अनन्तर क्रमशः देवताओं की पृथक्-पृथक् पूजा करे, । फिर ओंकार को नमस्कार कर तिल, जल, अक्षत तथा कुश लेकर वस्त्र एवम् सुवर्ण द्विजाति को प्रदान करे । व्रत की पूर्णता के लिए वेदवेत्ता विप्र को दक्षिणा दे । इस प्रकार पूजाविशेष से युक्त व्रत 'सौरि' कहलाता है । विप्र ! उसी दिन विद्याव्रत भी करना चाहिये जो आरोग्य प्रदान करता है मुने ! कृष्ण ने तो अजातशत्रु से उसी तिथि में तिलकव्रत भी करने को कहा है ॥९-१३॥ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि में सूर्योदय होने पर देवोद्यान के किसी सुन्दर करवीर पुष्प के वृक्ष की अर्चना करे । उसमें लाल डोरे लपेट कर गन्ध, धूप, चन्दन, प्रियंगु, सप्तधान्य, नारंग तथा बीजपूर से पूजन करे । अनन्तर स्वच्छ जल से सिक्त कर मन्त्रपूर्वक इस प्रकार क्षमा प्रार्थना करे—"करवीर ! वृक्षावास ! भानुवल्लभ ! आपको नमस्कार है । आप इन्द्र, शंकर, दुर्गा आदि देवों के सदा प्रिय हैं॥१४-१७॥ पुनः आकृष्णेन इस वेदोक्त मन्त्र से पूजासमाप्ति करते हुए भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को दक्षिणा दे । पश्चात् प्रदक्षिणा करके अपने घर को लौटे । द्विज ! श्रावण-शुक्ल की प्रतिपदा में लक्ष्मी, बुद्धि, धर्म, अर्थ, काम एवम् मोक्ष को देने वाला महाव्रत करना चाहिये । सोमवार से लेकर साढ़े तीन मास तक यह व्रत किया जाता है । कार्तिक-कृष्ण-चतुर्दशी को उपवास कर व्रतनिष्ठ व्यक्ति पूर्णिमा में शिव की अर्चना करे और धनवृद्धि के लिये

दशाधिकशततमोऽध्यायः ६११ कार्त्तिकासितभूतायामुपोष्य व्रततत्परः। पूर्णायां शिवमभ्यर्च्य सुवर्णं वंशसंयुतम् ॥२१॥ वायनं सुमहत्पुण्यं देवताप्रीतिवर्धनम् । दद्याद्विप्राय संकल्प्य धनवृद्ध्यै मुनीश्वर ॥२२॥ भाद्रशुक्लप्रतिपदि व्रतं नाम्ना महत्तसम् । व्रतं मौनाह्वयं केचित्प्राहुरत्न शिवोऽर्च्यते ॥२३॥ नैवेद्यं तु पचेन्मौनी षोडशत्रिगुणानि च । फलानि पिष्टपक्वानि दद्याद्विप्राय षोडश ॥२४॥ देवाय षोडशान्यानि भुज्यंते षोडशात्मना । सौवर्णं शिवमभ्यर्च्य कुम्भोपरि विधानवित् ॥२५॥ तत्सर्वं धेनुसहितमाचार्याय प्रदापयेत् । इदं कृत्वा व्रतं विप्र देवदेवस्य शूलिनः ॥२६॥ चतुर्दशाब्दं देहांतं भुक्तभोगः शिवं व्रजेत् । आश्विने सितपक्षस्यां कृत्वाशोकव्रतं नरः ॥२७॥ अशोको जायते विप्र धनधान्यसमन्वितः । अशोकपूजनं तत्र कार्यं नियमतत्परैः ॥२८॥ व्रतान्ते द्वादशे वर्षे मूर्ति चाशोकशाखिनः । समर्प्य गुरवे भक्त्या शिवलोके महीयते ॥२६॥ अस्यामेव प्रतिपदि नवरात्रं समारभेत् । पूर्वाह्णे पूजयेद्देवीं घटस्थापनपूर्वकम् ॥३०॥ अंकुरारोपणं कृत्वा यवैर्गोधूममिश्रितैः । ततः प्रतिदिनं कुर्यादेकभुक्तमयाचितम् ॥३१॥ उपवासं यथाशक्ति पूजापाठजपादिकम् । मार्कण्डेयपुराणोक्तं चरितत्रितयं द्विज ॥३२॥ पठनीयं नवदिनं भुक्तिमुक्ती अभीप्सता । कुमारो पूजनं तत्र प्रशस्तं भोजनादिभिः ॥३३॥ इत्थं कृत्वा व्रतं विप्र सर्वसिद्धयालयो नरः । जायते भुवि दुर्गायाः प्रसादान्नात्र संशयः ॥३४॥ अथोर्जसितपक्षस्यां नवरात्रोदितं चरेत् । विशेषादन्नकूटाख्यं विष्णुप्रीतिविवर्धनम् ॥३५॥ सर्वपाकैः सर्वदोहैः सर्वैः सर्वार्थसिद्धये । कर्तव्यमन्नकूटं तु गोवर्द्धनसमर्चने ॥३६॥ वंशयुक्त सुवर्ण तथा देवप्रीतिवर्धक बाहन विप्र को संकल्प करके दे दे। भाद्र-शुक्ल-प्रतिपदा को महत्तस नामक व्रत करना चाहिये। किन्हीं का कहना है कि यह व्रत मौनसंज्ञक है और कोई कहते हैं कि नहीं यह शिवसंज्ञक है ।।१८-२३।। व्रतो नैवेद्य के लिए पुआ-पकवान आदि पकाये, सोलह पकवान विप्र को और सोलह देवता को समर्पित करके घड़े के ऊपर सुवर्ण निमित शंकर की प्रतिमा का पूजन करे और धेनु सहित वह प्रतिमा आचार्य को अर्पित कर दे। विप्र ! चौदह वर्षों तक जो व्यक्ति पशुपति का यह व्रत करता है, वह सकल भोगों को भोग कर शिवसायुज्य मोक्ष को प्राप्त करता है। द्विज ! आश्विन-शुक्लपक्ष की प्रतिपदा में जो नर अशोकव्रत करता है, वह वीतशोक तथा धनधान्य सम्पन्न हो जाता है। उस दिन नियम-निष्ठा से अशोक पूजन करना चाहिये। बारह वर्षों तक व्रत कर लेनेके उपरान्त अशोकवृक्ष की प्रतिमा भक्तिपूर्वक गुरु को समर्पित करे। ऐसा करने वाला व्यक्ति शिवलोक में पूजित होता है। उक्त प्रतिपदा से नवरात्र-पूजन को आरम्भ करना चाहिये। पूर्वाह्न में घटस्थापन पूर्वक देवी की पूजा करे ।।२४-३०।। (घट के समीप मिट्टी के ऊपर) गेहूँ मिले जवा बोकर प्रतिदिन बिना मांगे मिला अन्न एक बार भोजन करे । यथाशक्ति उपवास, पूजा, पाठ आदि भो किया करे । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक जन उन नवों दिन मार्कंडेय पुराण में कहे गये तीनों चरित्रों (दुर्गासप्तशती) का पाठ करे । उन दिनों भोजन आदि से कुमारियों का सम्मान करना भी प्रशस्त माना गया है। विप्र ! जो मानव इस प्रकार व्रत करता है, वह दुर्गा की कृपा से पृथ्वो पर संपूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ।।३१-३४॥ एतदुपरीन्त कातिक-शुक्ल-प्रतिपदा के व्रत को सुनो। उस दिन विष्णु को प्रीति को बढ़ाने वाले अन्नकूट मामक व्रत को करना चाहिए। समस्त अभिलाषाओं की सिद्धि के लिये सब प्राणी पुआ, पकवान, दूध, दही आदि

६१२ नारदीयपुराणम् सायं गोभिः सह श्रीमद्गोवर्द्धनधराधराम् । समर्च्य दक्षिणोकृत्य भुक्तिमुक्तो समाप्नुयात् ॥३७॥ अथ मार्गसिताद्यायां धनव्रतमनुत्तमम् । नक्तं विष्ण्वर्चनं होमैः सौवर्णीं हुतभुक्तनुम् ॥३८॥ रक्तवस्त्रयुगाच्छन्नां द्विजाय प्रतिपादयेत् । एवं कृत्वा धनेर्धान्यैः समृद्धो जायते भुवि ॥३९॥ वह्निना दग्धपापस्तु विष्णुलोके महीयते । पौषशुक्लप्रतिपदि भानुमभ्यर्च्य भक्तितः ॥४०॥ एकभक्तव्रतो मत्यों भानुलोकमवाप्नुयात् । माघशुक्लाद्यदिवसे वह्नि साक्षान्महेश्वरम् ॥४१॥ समभ्यर्च्य विधानेन समृद्धो जायते भुवि । अथ फाल्गुनशुक्लावौ देवदेवं दिगंबरम् ॥४२॥ धूलिधूसरसर्वांगं जलैरुक्षेत्समंततः । कर्मणा लौकिकेनापि संतुष्टो हि महेश्वरः ॥४३॥ स्वसायुज्यं विशति भक्त्या सम्यक्समर्चितः । वैशाखे तु सिताद्यायां विष्णुं विश्वविहारिणम् ॥४४॥ समभ्यर्च्य विधानेन विप्रान्संभोजयेद्व्रती । शुचिसिताद्यायां च ब्रह्माणं जगतां गुरुम् ॥४५॥ विष्णुना सहितो ब्रह्मा सर्वलोकेश्वरेश्वराः । स्वसायुज्यं प्रदिशति सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥४६॥ आसु द्वादशमासानां प्रतिपत्सु द्विजोत्तम । व्रतानि तुभ्यं प्रोक्तानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च ॥४७॥ व्रतेष्वेतेषु सर्वेषु ब्रह्मचर्यं विधीयते । भोजने तु भविष्यान्नं सामान्यत उदाहृतम् ॥४८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासप्रतिपद्व्रत- निरूपणं नाम दशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥११०॥ से अन्नकूट व्रत की आराधना करें। सायंकाल गौओं समेत श्रीमान् गोवर्धन पर्वत की अर्चना कर प्रदक्षिणा करे। ऐसा करने से भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३५-३७॥ अगहन की प्रतिपदा में सर्वोत्तम धनव्रत करना चाहिये। रात्रि में विष्णु-पूजा तथा हवन करके अग्नि की सुवर्णमयी प्रतिमा को एक जोड़े रक्त वस्त्र से ढक कर ब्राह्मण को दे दे। ऐसा करने से मनुष्य धनधान्य सम्पन्न हो जाता है और अग्नि से पाप को दग्ध करके (अर्थात् परिशुद्ध होकर) विष्णुलोक में पूजित होता है। पौष-शुक्ल-प्रतिपदा में भक्तिपूर्वक भानु की अर्चना करने से मनुष्य आदित्य लोक को प्राप्त करता है। माघ- शुक्ल-प्रतिपदा में साक्षात् महेश्वर रूप वह्नि की विधिपूर्वक पूजा करने से मानव भूमि पर सर्वसंपन्न हो जाता है ॥३८-४१॥ फाल्गुन-शुक्ल-प्रतिपदा में धूलि से धूसरित सर्वांग शरीर वाले दिगम्बर देव (शिव) को जल चढ़ाने से महेश्वर संतुष्ट हो जाते हैं और भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकार से पूजित होने पर वे अपने (सायुज्य मोक्ष) को देते हैं। वैशाख-शुक्ल-प्रतिपदा में विधिपूर्वक विश्वविहारी विष्णु की अर्चना कर व्रती ब्राह्मण-भोजन कराये, आषाढ़-शुक्ल प्रतिपदा में विष्णु सहित अखिल लोकेश्वर तथा जगद्गुरु ब्रह्मा का पूजन करने से वे अपने सायुज्यमोक्ष एवम् सकल सिद्धियों को देते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! बारहों मासों की प्रतिपदा तिथि में जितने भुक्ति-मुक्ति-दायक व्रत होते हैं, वे सब तुमसे बता दिये। किन्तु ध्यान रखना चाहिये कि इन व्रतों के दिन ब्रह्मचर्यपालन एवम् हविष्यान्न भोजन परमावश्यक हैं ॥४२-४८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासप्रतिपदाव्रत निरूपण नामक एक सो दसवां अध्याय समाप्त ॥११०॥

एकादशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि द्वितीयाया व्रतानि ते। यानि कृत्वा नरो भक्त्या ब्रह्मलोके महीयते ॥१॥ चैत्रशुक्लद्वितीयायां ब्रह्माणं च सशक्तिकम्। हविष्यान्नेन गन्धाद्यैः स्तोष्य सर्वक्रतूद्भवम् ॥२॥ फलं लब्ध्वाखिलांकामानंते ब्रह्मपदं लभेत् । अस्मिन्नेव दिने विप्र बालेंदुमुदितं परे ॥३॥ समभ्यर्च्य निशारंभे भुक्तिमुक्तिफलं भवेत् । अथ वास्मिन्दिने भक्त्या दस्त्रावभ्यर्च्य यत्नतः ॥४॥ सुवर्णरजते नेत्रे प्रदद्याच्च द्विजातये । पूर्णायावान्नते ह्यस्मिन्दध्ना वापि घृतेन च ॥५॥ नेत्रव्रते द्वादश वत्सरान्वै कृत्व्या भवेद्भूपतिद्विजेंद्र । सुरूपरूपोऽरिगणप्रतापी धर्माभिरामोन्नृपवंगंमुख्यः ॥६॥ राधशुक्लद्वितीयायां ब्रह्माणं विष्णुरूपिणम् । समभ्यर्च्य सप्तधान्याढ्यकुम्भोपरि विधानतः ॥७॥ विष्णुलोकमवाप्नोति भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् । ज्येष्ठशुक्लद्वितीयायां भास्करं भुवनाधिपम् ॥८॥ चतुर्वक्त्रस्वरूपं च समभ्यर्च्य विधानतः । भोजयित्वा द्विजान् भक्त्या भास्करं लोकमाप्नुयात् ॥६॥ आषाढस्य सिते पक्षे द्वितीया पुष्यसंयुता । तस्यां रथं समारोप्य रामं सह सुभद्रया ॥१०॥ द्विजादिमित्रैंतो सार्धं परिक्रम्य पुरादिकम् । जलाशयांतिकं गत्वा कारयेच्च महोत्सवम् ॥११॥

अध्याय १११ बारह मासों का द्वितीयाव्रत सनातन बोले—विप्र ! सुनो, अब मैं द्वितीया तिथि के व्रतों को बतला रहा हूँ। जिनके अनुष्ठान से मानव ब्रह्मलोक में पूजित होता है । चैत्र-शुक्ल-द्वितीया में शक्ति सहित ब्रह्मा को हविष्यान्न तथा गन्ध आदि से संतुष्ट करने से मनुष्य समस्त यज्ञों के फल को प्राप्त कर अखिल भोगों को भोगते हुए ब्रह्मपद को प्राप्त करता है ॥१-२३॥ विप्र ! उसी दिन निशारम्भ में उदित बालचन्द्र की अर्चना करने से भुक्ति-मुक्ति मिलती है। अथवा उस दिन यत्नपूर्वक अश्विनीकुमार की अर्चना कर सुवर्ण और चाँदी की दो नेत्र-प्रतिमा द्विजाति को समर्पित करे । द्विजश्रेष्ठ ! इस व्रत को पूर्णायत्राव्रत तथा नेत्रव्रत कहा जाता है। इसमें ब्राह्मण को दही या घृत से संतुष्ट करना पड़ता है । बारह वर्षों तक इसके करने से मनुष्य अत्यन्त रूपवान् धर्मात्मा तथा नृपशिरोमणि होता है । वैशाख- शुक्ल-द्वितीया में सप्तधान्य युक्त घट के ऊपर विधिपूर्वक विष्णु रूपी ब्रह्मा की पूजा करने वाला मनुष्य मनोरम भोगों को भोग कर विष्णुलोक को जाता है ॥३-७३॥ ज्येष्ठ शुक्ल-द्वितीया में चतुर्मुख के समान स्वरूप वाले भुवनाधिप भास्कर की विधिपूर्वक पूजा कर भक्ति से द्विजों को भोजन कराने वाला व्यक्ति सूर्यलोक को जाता है । आषाढ-शुक्ल-पक्ष की द्वितीया में रथ पर सुभद्रा सहित राम को चढ़ाकर ब्राह्मण आदि के साथ व्रती नगर की परिक्रमा करते हुए जलाशय के समीप जाकर खूब धूम-धाम से उत्सव मनाये । अनन्तर देवालय में आकर व्रत की पूर्ति के लिये ब्राह्मणों को भोजन कराये । श्रावण- ११९ ना० पु०

६१४ नारदीयपुराणम् तदन्ते देवभवने निवेश्य च यथाविधि । ब्राह्मणान्भोजयेच्चैव व्रतस्यास्य प्रपूर्तये ॥१२॥ नभःशुक्लद्वितीयायां विश्वकर्ता प्रजापतिः । स्वपितीति तिथिः पुण्या ह्यशोकशयनाह्वया ॥१३॥ सशक्तिकं तु शय्यास्थं पूजयित्वा चतुर्मुखम् । इममुच्चारयेन्मन्त्रं प्रणम्य जगतां पतीम् ॥१४॥ श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकान्त श्रीवास श्रीपते प्रभो । गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामद ॥१५॥ चन्द्रार्द्धदानमत्रोक्तं सर्वसिद्धिविधायकम् । भाद्रशुक्लद्वितीयायां शक्ररूपं जगद्विधुम् ॥१६॥ पूजयित्वा विधानेन सर्वक्रतुफलं लभेत् । आश्विने मासि वै पुण्या द्वितीया शुक्लपक्षजा ॥१७॥ दानं प्रदत्तमेतस्यामनन्तफलमुच्यते । ऊर्जशुक्लद्वितीयायां यमो यमुनया पुरा ॥१८॥ भोजितः स्वगृहे तेन द्वितीयेषा यमाह्वया । पुष्टिप्रवर्द्धनं चात्र भगिन्या भोजनं गृहे ॥१९॥ वस्त्रालंकारपूर्वं तु तस्यै देयमतः परम् ॥२०॥ यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः संभोजितो निजकरात्स्वसृसौहृदेन । तस्यां स्वसुः करतलादिह यो भुञ्जीत, प्राप्नोति रत्नधनधान्यमनुत्तमं सः ॥२१॥ मार्गशुक्लद्वितीयायां श्राद्धेन पितृपूजनम् । आरोग्यं लभते चापि पुत्रपौत्रसमन्वयः ॥२२॥ पौषशुक्लद्वितीयायां गोशृङ्गोदकमार्जनम् । सर्वकामप्रदं नृणामास्ते बालेंदुदर्शनम् ॥२३॥ योऽर्घ्यदानेन बालेंदुं हविष्याशी जितेंद्रियः । पूजयेत्साज्यसुमनैर्धर्मकामार्थसिद्धये ॥२४॥ माघशुक्लद्वितीयायां भानुरूपं प्रजापतिम् । समभ्यर्च्य यथाचार्यं पूजयेद्रक्तपुष्पकैः ॥२५॥ रक्तैर्गन्धस्तथा स्वर्णमूर्तिं निर्माय शक्तितः । ततः पूर्णं ताम्रपात्रं गोधूमैरपि तण्डुलैः ॥२६॥ समर्प्य देवे भक्त्यैव स मूर्तिं प्रददेद्विजे । एवं कृते व्रते विप्र साक्षात्सूर्य इवोदितः ॥२७॥

शुक्ल-द्वितीया को विश्वकर्ता प्रजापति शयन करते हैं । अतः वह तिथि पवित्र है, उसका नाम अशोकशयना है । उस दिन शय्यास्थित ब्रह्मा तथा शक्ति को पूजाकर "श्रीवत्सधारिन्............." इस मन्त्र को पढ़ते हुए जगत्पति को प्रणाम करे । यह मन्त्र अर्ध चन्द्र दान करने का है । इससे समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है ॥८- १५३॥ भाद्र-शुक्ल-द्वितीया को विधिवूर्वक इन्द्ररूप ब्रह्मा का पूजन करने से निखिल यज्ञों का फल प्राप्त होता है। आश्विन-शुक्ल-द्वितीया में दान का अनन्त फल होता है । प्राचीन काल में कार्तिक-शुक्ल-द्वितीया को यमुना ने यम को अपने गृह में भोजन कराया था । इसलिए उस द्वितीया का नाम यम द्वितीया पड़ा । उस तिथि को बहिन के घर में भोजन करने से धन-धान्य बढ़ता है । उस दिन बहिन को वस्त्र तथा आभूषण आदि देने चाहिये ॥१६-२०॥ जिस तिथि में यमुना ने यमराजदेव को भगिनी-वात्सल्य से अपने हाथों भोजन कराया, उस तिथि में जो व्यक्ति बहिन के हाथों से भोजन करता है, उसे उत्तम रत्न तथा धन-धान्य की प्राप्ति होती है । अगहन-शुक्ल- द्वितीया में जो पितृपूजन एवम् श्राद्ध करता है, पुत्र, पौत्र तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है । पौष-शुक्ल-द्वितीया में जो नर गाय के सींग से स्पर्श किये जल से स्नान करता है, उसकी समस्त कामनायें पूरी होती हैं । उस दिन सूर्यास्त के उपरान्त जो हविष्य-भोजन तथा इन्द्रिय-संयम करते हुए बालचन्द्र का दर्शन करता है तथा घृत युक्त पुष्पों से पूजन कर अर्घ्य प्रदान करता है, उसे धर्म अर्थ तथा काम की सिद्धि होती है । माघ-शुक्ल-द्वितीया में यथाशक्ति रक्तपुष्पों एवम् रक्त गन्धों से भानुरूप प्रजापति की स्वर्णमूर्ति की पूजा करनी चाहिये ॥२१-२५३॥ अनन्तर एक ताम्रपात्र को चावल या गेहूँ से भर कर भक्तिपूर्वक मूर्ति सहित वह पात्र ब्राह्मण को दे दे । विप्र ! ऐसा करने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर सूर्य के समान दुर्धर्ष तेजस्वी होता है और सकल भोगों को भोग कर

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ६१५ दुरासदो दुराधर्षो जायते भुवि मानवः । इह कामान्वरान्भुक्त्वा यात्यंते ब्रह्मणः पदम् ॥२८॥ सर्वदेवस्तुताऽभीक्ष्णं विमानवरमास्थितः । अथ फाल्गुनशुक्लायां द्वितीयायां द्विजोत्तमः ॥२६॥ पुष्पैः शिवं समभ्यर्च्य सुश्वेतैश्च सुगंधिभिः । पुष्पैर्वितानकं कृत्वा पुष्पालंकरणैः शुभैः ॥३०॥ नैवेद्यैर्विविधैर्धूपैर्दीपैर्नीराजनाविधिः । प्रसाद्य प्रणमेच्चैव साष्टांगं पतितो भुवि ॥३१॥ एवमभ्यर्च्य देवेशं मर्त्यो व्याधिविवर्जितः । धनधान्यसमायुक्तो जीवेद्वर्षशतं ध्रुवम् ॥३२॥ यद्विधानं द्वितीयासु शुक्लपक्षगतासु वा । प्रोक्तं तदेव कृष्णासु कर्त्तव्यं विधिकोविदैः ॥३३॥ वह्निरेव पृथङ्मास्तु नानारूपवपुर्धरः । पूज्यते हि द्वितीयासु ब्रह्मचर्यादि पूर्ववत् ॥३४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासदितीयाव्रतनिरूपणं नामैकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥१११॥

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तृतीयाया व्रतानि ते । यानि सम्यग्विधायाशु नारी सौभाग्यमाप्नुयात् ॥१॥ चैत्रशुक्लतृतीयायां गौरीं कृत्वा समातृकाम् । सौवर्णीं राजतीं वापि ताम्नीं वा मृण्मयीं द्विज ॥२॥

अन्त में उत्तम विमान पर चढ़कर ब्रह्मलोक को जाता है, जहां देवगण उसकी सतत स्तुति किया करते हैं ॥२८- २८३॥ फाल्गुन-शुक्ल-द्वितीया में सुगंधित श्वेत पुष्पों से शंकर की अर्चना कर पुष्पों के वितान (चन्दवा) तथा अलंकरणों से उन्हें सुसज्जित करे । फिर अनेक प्रकार के नैवेद्य, धूप, दीप, आरती आदि से उन्हें प्रसन्न कर साष्टांग प्रणाम करे । इस प्रकार अर्चना करने वाला मानव रोगों से मुक्त तथा धन-धान्यों से युक्त होकर निःसन्देह सौ वर्ष जीता है । शुक्ल पक्षों की द्वितीयाओं में जिस प्रकार की विधि बताई गई है, उसी विधि से कृष्ण- द्वितीयाओं में भी विधान वेत्ता व्यक्ति पूजन किया करे । पृथक्-पृथक् मासों की द्वितीयाओं में नानारूपधारी अग्नि ही पहिले कहे गये ब्रह्मचर्य आदि नियमों के साथ पूजे जाते हैं ॥२९-३४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में वृहदुपाख्यान युक्त चतुर्थ पाद में बारह मासों की द्वितीयाओं का व्रत निरूपण नामक एक सौ ग्यारहवां अध्याय समाप्त ॥१११॥

अध्याय ११२ बारह मासों का तृतीया व्रत सनातन बोले--नारद ! सुनो, अब तृतीया तिथि के व्रतों को बतला रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से नारी को सौभाग्य शीघ्र प्राप्त हो जाता है । द्विज ! वर को चाहने वाली अथवा सौभाग्य, पुत्र एवम् स्वामी की कामना करने

६१६ नारदीयपुराणम् अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्वस्त्रैरभरणैः शुभैः । दूर्वाकाण्डैश्च विधिवत्सोपवासा तु कन्यका ॥३॥ वराङ्गिनी च सौभाग्यपुत्रभर्त्तृविवर्धिनी तथा । द्विजभार्या भर्त्तृमतीः कन्यका वा सुलक्षणाः ॥४॥ सिन्दूरांजनवस्त्राद्यैः प्रतोष्य प्रीतमानसा । रात्रौ जागरणं कुर्याद्व्रतसंपूर्तिकाम्यया ॥५॥ ततस्तां प्रतिमां विप्र गुरवे प्रतिपादयेत् । धातुजां मृण्मयीं वा तु निक्षिपेच्च जलाशये ॥६॥ एवं द्वादशवर्षाणि कृत्वा गौरीव्रतं शुभम् । धेनुद्वादशसंकल्पं दद्यादुत्सर्गसिद्धये ॥७॥ किमत्र बहुनोक्तेन गौरी सौभाग्यदायिनी । स्त्रीणां यथा तथा नान्या विद्यते भुवनत्रये ॥८॥ धनं पुत्रान्पतिं विद्यामाज्ञासिद्धिं यशः सुखम् । लभते सर्वमेवेष्टं गौरीमभ्यर्च्य भक्तितः ॥६॥ राधशुक्लतृतीया या साक्षया परिकीर्तिता । तिथिश्चैतायुगाद्या सा कृतस्याक्षयकारिणी ॥१०॥ द्वे शुक्ले द्वे तथा कृष्णे युगादो कथयो विदुः । शुक्ले पूर्वाह्णिके ग्राह्ये कृष्णे चैव तपस्यथ ॥११॥ द्वापरं हि कलिमद्वि प्रवृत्तानि युगानि वै । तत्र राधतृतीयायां श्री समेतं जगद्गुरुम् ॥१२॥ नारायणं समभ्यर्च्यत्पुष्पधूपविलेपनैः । यद्वा गंगांभसि स्नातो मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥१३॥ अक्षतैः पूजयेद्विष्णुं स्नायाद्व्यक्षतैरंनरः । सक्तून्संभोजयेद्विप्रांन्स्वयमभ्यवहरेच्च तान् ॥१४॥ एवं कृतविधिर्विप्र नरो विष्णुपरायणः । विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वदेवनमस्कृतः ॥१५॥ अथ ज्येष्ठतृतीया तु शुक्ला रंभेति नामतः । तस्यां सभार्यं विधिवत्पूजयेद्ब्राह्मणोत्तमम् ॥१६॥ गन्धपुष्पांशुकाद्यैस्तु नारी सौभाग्यकाम्यया । रंभाव्रतमिदं विप्र विधिवत्समुपाश्रितम् ॥१७॥ वाली कन्या चैत्र-शुक्ल-तृतीया में उपवास करती हुई गंध, पुष्प, वस्त्र, आभूषण दूर्वा आदि सामग्रियों से शिव सहित गौरी की सोने या चाँदी या ताँबे या मिट्टी की प्रतिमा की विधिवत् अर्चना कर पतिवती द्विजभार्या या सुलक्षणा कुमारी को सिंदूर, अंजन, वस्त्र आदि से संतुष्ट करे और व्रत की पूर्णता के लिए रात्रि में जागरण करे। तदनन्तर वह प्रतिमा गुरु को समर्पित कर दे । यदि धातु या मृत्तिका की बनी प्रतिमा हो तो जलाशय में प्रवाहित कर दे ॥१-६॥ इस प्रकार बारह वर्षों तक पवित्र गौरी व्रत को सम्पन्न करके दानसिद्धि के लिए बारह धेनुओं का उत्सर्ग करना चाहिए इस व्रत के संबन्ध में बहुत कुछ क्या कहें तीनों लोक में स्त्रियों के लिए गौरी जैसी सौभाग्यदायिनी कोई नहीं है । भक्तिपूर्वक गौरी की आराधना करने से धन, पुत्र, पति, विद्या, आज्ञासिद्धि, यश, सुख तथा सकल कामनाओं की प्राप्ति होती है ॥७-९॥ वैशाख शुक्ल की अक्षय तृतीया त्रेतायुग की आदि तिथि कहलाती है। इसमें किये गये दान-पुण्य आदि अक्षय हो जाते हैं । विद्वानों ने दो शुक्ल पक्ष की तथा दो कृष्ण पक्ष की तिथियों को युगादि माना है । शुक्ल तथा कृष्ण दोनों पक्षों में पूर्वाह्णकालिक तृतीया ग्रहण करनी चाहिए। फाल्गुन में द्वापर और भाद्रपद में कलियुग की प्रवृत्ति हुई है। वैशाख की अक्षय तृतीया में लक्ष्मी सहित जगद्गुरु नारायण की पुष्प, धूप चन्दन आदि से पूजा करनी चाहिये । उस दिन गंगास्नान करने से समस्त पातकों का नाश हो जाता है ॥१०-१३॥ मानव अक्षत से विष्णु का पूजन कर स्वयं अक्षतस्नान करे (अर्थात् मस्तक पर अक्षत को रखकर स्नान करे) तद- नन्तर ब्राह्मणों को सत्तू खिलाकर स्वयं भी सत्तू खाये । विप्र ! इस प्रकार व्रत अनुष्ठान करने वाला विष्णुपरायण मनुष्य निखिल देवों से वंदनीय होकर विष्णुलोक को जाता है ॥१४-१५॥ ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया का का नाम रंभा है। उस दिन गंध, पुष्प, वस्त्र आदि से भार्या सहित उत्तम ब्राह्मण की विधिपूर्वक पूजा करे। ऐसा करने से नारी को सौभाग्य की प्राप्ति होती है । विप्र ! इस रंभाव्रत के यथाविधि अनुष्ठान करने से वित्त, पुत्र तथा धार्मिक बुद्धि का लाभ होता है ॥१६-१७॥ सौभाग्य की

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ६१७ ददाति वित्तं पुत्रांश्च मतिं धर्मे शुभावहाम् । अथाषाढतृतीयायां शुक्लायां शुक्लवाससा ॥१८॥ केशवं तु सलक्ष्मीकं सस्त्रीके तु द्विजऽर्चयेत् । भोजनैः सुरभीदानैर्वस्त्रैश्चापि विभूषणैः ॥१९॥ प्रियैर्वाक्यैश्च संप्रीता नारी सौभाग्यवांञ्छया । समुपास्य व्रतं चैतद्धनधान्यसमन्विता ॥२०॥ देवदेवप्रसादेन विष्णुलोकमवाप्नुयात् । नभःशुक्लतृतीयायां स्वर्णगौरीव्रतं चरेत् ॥२१॥ उपचारैः षोडशभिर्भवानीमभिपूजयेत् । पुत्रान्देहि धनं देहि सौभाग्यं देहि सुव्रते ॥२२॥ अन्यांश्च सर्वकामान्मे देहि देहि नमोऽस्तु ते । एवं संप्रार्थ्य देवेशीं भवानीं भवसंयुताम् ॥२३॥ व्रतसंपूर्तिकाम्रा तु वायनं दापयेत्तथा । एवं षोडशवर्षाणि कृत्वा नारी व्रतं शुभम् ॥२४॥ उद्यापने चरेद्भक्त्या वित्तशाठ्यविवर्जिता । मंडपे मण्डले शुद्धे गणेशादिसुरार्चनम् ॥२५॥ कृत्वा ताम्रमयं पात्रं कलशोपरि विन्यसेत् । सौवर्णी प्रतिमां तत्र भवान्या प्रतिपूजयेत् ॥२६॥ गंधपुष्पादिभिः सम्यक् ततो होमं समाचरेत् । वेणुपात्रैः षोडशभिः पक्वान्नं परिपूरितैः ॥२७॥ समर्प्य देव्यै नैवेद्यं द्विजेभ्येतन्निवेदयेत् । वायनं च ततः पश्चाद्दद्यात्संबन्धिबन्धुषु ॥२८॥ प्रतिमां गुरवे दत्त्वा द्विजेभ्यो दक्षिणां तथा । पूर्णं लभेतफलं नारी व्रताचरणतत्परा ॥२६॥ भाद्रशुक्लतृतीयायां व्रतं वै हारितालकम् । कुर्याद्भक्त्या विधानेन पाद्यार्घ्यार्चनपूर्वकम् ॥३०॥ ततस्तु कांचने पात्रे राजते चापि ताम्रके । वेणवे मृन्मये वापि विन्यस्यान्नं सदक्षिणम् ॥३१॥ सफलं च सवस्त्रं च द्विजाय प्रतिपादयेत् । तदंते पारणं कुर्यादिष्टबन्धुजनैः सह ॥३२॥ एवं कृतव्रता नारी भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् । व्रतस्यास्य प्रभावेण गौरीसहचरी भवेत् ॥३३॥ सौभाग्यद्रव्यस्त्राणि वंशपात्राणि षोडश । दातव्यानि प्रयत्नेन ब्राह्मणेभ्यो यथाविधि ॥३४॥ कामना करने वाली महिला-अषाढ़-शुक्ल तृतीया के दिन श्वेत वस्त्र पहनकर लक्ष्मी सहित केशव की प्रतिमा ब्राह्मण को समर्पित करती हुई उन्हें भोजन, गोदान, वस्त्र, आभूषण तथा प्रिय वचनों से संतुष्ट करे । इस व्रत का आचरण करने वाला व्यक्ति धनधान्य से संपन्न होकर भगवान की कृपा से वैकुण्ठ को जाता है। श्रावण शुक्ल तृतीया को स्वर्णगौरीव्रत का अनुष्ठान करना चाहिए ॥१८-२१। गौरी को षोडशोपचार पूजा कर उनसे प्रार्थना करे-- 'सुव्रते ! पुत्र, धन, सौभाग्य तथा अन्य समस्त फल मुझे दीजिये । देवि ! आपको नमस्कार है । इस प्रकार शंकर सहित भवानी देवी को प्रार्थना कर व्रत-पूर्ति के लिये इष्ट-मित्रों को वायन (या नैवेद्य) दे । सोलह वर्षों तक इस व्रत के संपादन करने के उपरान्त भक्ति से इसका उद्यापन करना चाहिये । किन्तु उसमें धन रहते कृपणता न करे ॥२२-२४३॥ मंडप के शुद्ध प्रदेश में गणेश आदि की पूजा कर कलश के ऊपर ताँबे के पात्र को रखकर उस पर गंध, पुष्प आदि से गौरी की सुवर्णमयी प्रतिमा की पूजा करे । पश्चात् हवन करके पकवानों से भरी हुई सोलह डालियां देवी को चढ़ाकर ब्राह्मणों को दे दे ॥२५-२७३॥ फिर भाई-बन्धुओं को बायन देकर गुरु को प्रतिमा तथा द्विजों को दक्षिणा दे । इस प्रकार व्रतानुष्ठान करने वाली नारी पूर्ण फल को प्राप्त करती हैं। भाद्र-शुक्ल-तृतीया में पाद्य, अर्घ्य एवं पूजन करती हुई वनिता विधिपूर्वक हरितालिका व्रत करे । वह सोने, चाँदी या ताँबे या बाँस या मिट्टी के पात्र में अन्न, फल, वस्त्र तथा दक्षिणा रखकर ब्राह्मण को दे और अन्त में इष्ट-बन्धुओं के साथ स्वयं पारणा करे ॥२८-३२॥ इस तरह व्रत करने वाली नारी मनोरम भोगों को भोगकर व्रत के प्रभाव से गौरी की सहचरी होती है । उस दिन सौभाग्य द्रव्य, वस्त्र तथा सोलह वंश-पात्र ब्राह्मणों को देना चाहिये । देवी की प्रीति के लिए

६१८ नारदीयपुराणम् अन्येभ्यो विप्रवर्येभ्यो दक्षिणां च प्रयत्नतः । भूयसीं च ततो दद्याद्विप्रेभ्यो देविमुष्टये ॥३५॥ एवं या कुरुते नारी व्रतं सौभाग्यवर्द्धनम् । सा तु देवीप्रसादेन सौभाग्यं लभते ध्रुवम् ॥३६॥ यदा तृतीया भाद्रे तु हस्तर्क्षसहिता भवेत् । हस्तगौरीव्रतं नाम तदुद्दिष्टं हि शौरिणा ॥३७॥ तथा कोटीश्वरी नाम व्रतं प्रोक्तं पिनाकिना । लक्षेश्वरी चैव तथा तद्विधानमुदीर्यते ॥३८॥ अस्यां व्रतं तु संग्राह्यं यावद्वर्षचतुष्टयम् । उपवासेन कर्तव्यं वर्षे वर्षे तु नारद ॥३९॥ अखंडानां तंडुलानां तिलानां वा मुनीश्वर । लक्षमेकं विशोध्याथ क्षिपेत्पयसि संप्लुते ॥४०॥ तत्पक्वेन तु निर्माय देव्या मूर्ति सुशोभनाम् । प्रकरै गंधपुष्पाणां पुष्पमालादिभूषिताम् ॥४१॥ संस्थाप्य पार्वतीं तत्र पूजयेद्भक्तिभावितः । गन्धैः पुष्पैस्तथा धूपैर्दीपैर्नैवेद्यविस्तरैः ॥४२॥ विविधैश्च फलैर्विप्र नमस्कृत्य क्षमापयेत् । ततो विसर्जयेद्देवीं जलमध्येऽथ दक्षिणाम् ॥४३॥ दत्त्वा विधिश्रविप्रेभ्यो भुञ्जीयाच्च परे दिने । इति ते कथितं विप्र कोटिलक्षेश्वरीव्रतम् ॥४४॥ गौरीलोकं प्रयास्यंते व्रतस्यास्य प्रभावतः । इषशुक्लतृतीयायां बृहद्गौरीव्रतं चरेत् ॥४५॥ पंचवर्षं विधानेन पूर्वोक्तेनैव नारद । आचार्य पूजयेदंते विप्रानन्यानधनादिभिः ॥४६॥ सुवासिनीः पंच पूज्या वस्त्रालंकारचन्दनैः । कंचुकैश्चैव ताटंकैः कण्ठसूत्रैर्हरिप्रियाः ॥४७॥ वंशपात्राणि पंचैव सूत्रैः संवेष्टितानि च । सिंदूरं जीरकं चैव सौभाग्यद्रव्यसंयुक्तम् ॥४८॥ गोधूमपृष्टजातं च नवापूपं फलादिकम् । वायनानि च पंचैव ताभ्यो दद्याच्च भोजयेत् ॥४९॥ अर्धं दत्त्वा वायनानि पश्चाद्भुञ्जीत वाग्यता । तत्फलं धारयेत्कण्ठे सर्वकामसमृद्धये ॥५०॥ ततः प्रातः समुत्थाय सालंकारा सखीजनैः । गीतवाद्ययुता नद्यां गौरीं तां तु विसर्जयेत् ॥५१॥

अन्य उत्तम विप्रों को दक्षिणा तथा भूयसी दक्षिणा भी दे । जो नारी इस सौभाग्यवर्धक व्रत को करती है। उसे देवी की कृपा से निःसंदेह सौभाग्य लाभ होता है ॥३३-३६॥ जब भाद्रपद की तृतीया हस्त नक्षत्र से संयुक्त होती है, तब वह व्रत हस्त गौरी व्रत कहलाता है—ऐसा कृष्ण ने कहा है । शंकर कहते हैं कि उस दिन कोटीश्वरी व्रत तथा लक्षेश्वरी व्रत भी होता है। उसका विधान सुनो ॥३७-३८॥ वह व्रत चार वर्षों तक करना पड़ता है। परन्तु प्रत्येक वर्ष वह उपवास पूर्वक ही करना चाहिए । मुनीश्वर ! एक लाख अखंड चावल या तिल को परिशुद्ध करके गरम दूध में डालें पुः । उस पाक से देवी की सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे गंध पुष्प माला आदि से विभूषित करे । अनन्तर उस मूर्ति में पार्वती की प्राणप्रतिष्ठा करके भक्ति पूर्वक गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा विविध फलों से पूजन करे । फिर नमस्कार तथा क्षमाप्रार्थना कर जलमध्य में देवी का विसर्जन करे और दूसरे दिन विधिवेत्ता विप्रों को दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करे । द्विज ! यह कोटिलक्षेश्वरीव्रत तुमसे बतला दिया ॥३९-४४॥ इसके प्रभाव से नारी गौरीलोक को जाती है । आश्विन-शुक्ल-तृतीया में बृहद्गौरीव्रत करना चाहिए । पाँच वर्षों तक पूर्वोक्त विधान से ही वह व्रत किया जाना चाहिए । इसमें आचार्य का पूजन कर धन आदि से अन्य विप्रों को भी संतुष्ट करना चाहिए । पाँच सीमंतिनियों को वस्त्र, अलंकार; चंदन, कंचुकी, बाली तथा हार से संतुष्ट कर उन्हें पाँच सूत्रवेष्टित वंशपात्र, सिंदूर, जीरा, सौभाग्य की चीजें, गेहूँ के आटे का पूआ और पांच वस्तुओं का बायन देकर भोजन कराने के पश्चात् अर्ध्य प्रदान करके वाक्संयमपूर्वक स्वयं भोजन करे और सकल कामनाओं की सिद्धि के लिए कंठ में उसका फल धारण करे ॥४५-५०॥ प्रातः काल उठकर शरीर को अलं- कृत करके सखियों के साथ गाना-बजाना करते हुए गौरी का विसर्जन करते हुए कहे "भद्रे ! मैंने यथाशक्ति