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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 934, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 934

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ६१५ दुरासदो दुराधर्षो जायते भुवि मानवः । इह कामान्वरान्भुक्त्वा यात्यंते ब्रह्मणः पदम् ॥२८॥ सर्वदेवस्तुताऽभीक्ष्णं विमानवरमास्थितः । अथ फाल्गुनशुक्लायां द्वितीयायां द्विजोत्तमः ॥२६॥ पुष्पैः शिवं समभ्यर्च्य सुश्वेतैश्च सुगंधिभिः । पुष्पैर्वितानकं कृत्वा पुष्पालंकरणैः शुभैः ॥३०॥ नैवेद्यैर्विविधैर्धूपैर्दीपैर्नीराजनाविधिः । प्रसाद्य प्रणमेच्चैव साष्टांगं पतितो भुवि ॥३१॥ एवमभ्यर्च्य देवेशं मर्त्यो व्याधिविवर्जितः । धनधान्यसमायुक्तो जीवेद्वर्षशतं ध्रुवम् ॥३२॥ यद्विधानं द्वितीयासु शुक्लपक्षगतासु वा । प्रोक्तं तदेव कृष्णासु कर्त्तव्यं विधिकोविदैः ॥३३॥ वह्निरेव पृथङ्मास्तु नानारूपवपुर्धरः । पूज्यते हि द्वितीयासु ब्रह्मचर्यादि पूर्ववत् ॥३४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासदितीयाव्रतनिरूपणं नामैकादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥१११॥

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु नारद वक्ष्यामि तृतीयाया व्रतानि ते । यानि सम्यग्विधायाशु नारी सौभाग्यमाप्नुयात् ॥१॥ चैत्रशुक्लतृतीयायां गौरीं कृत्वा समातृकाम् । सौवर्णीं राजतीं वापि ताम्नीं वा मृण्मयीं द्विज ॥२॥

अन्त में उत्तम विमान पर चढ़कर ब्रह्मलोक को जाता है, जहां देवगण उसकी सतत स्तुति किया करते हैं ॥२८- २८३॥ फाल्गुन-शुक्ल-द्वितीया में सुगंधित श्वेत पुष्पों से शंकर की अर्चना कर पुष्पों के वितान (चन्दवा) तथा अलंकरणों से उन्हें सुसज्जित करे । फिर अनेक प्रकार के नैवेद्य, धूप, दीप, आरती आदि से उन्हें प्रसन्न कर साष्टांग प्रणाम करे । इस प्रकार अर्चना करने वाला मानव रोगों से मुक्त तथा धन-धान्यों से युक्त होकर निःसन्देह सौ वर्ष जीता है । शुक्ल पक्षों की द्वितीयाओं में जिस प्रकार की विधि बताई गई है, उसी विधि से कृष्ण- द्वितीयाओं में भी विधान वेत्ता व्यक्ति पूजन किया करे । पृथक्-पृथक् मासों की द्वितीयाओं में नानारूपधारी अग्नि ही पहिले कहे गये ब्रह्मचर्य आदि नियमों के साथ पूजे जाते हैं ॥२९-३४॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में वृहदुपाख्यान युक्त चतुर्थ पाद में बारह मासों की द्वितीयाओं का व्रत निरूपण नामक एक सौ ग्यारहवां अध्याय समाप्त ॥१११॥

अध्याय ११२ बारह मासों का तृतीया व्रत सनातन बोले--नारद ! सुनो, अब तृतीया तिथि के व्रतों को बतला रहा हूँ जिनके अनुष्ठान से नारी को सौभाग्य शीघ्र प्राप्त हो जाता है । द्विज ! वर को चाहने वाली अथवा सौभाग्य, पुत्र एवम् स्वामी की कामना करने