बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१६ नारदीयपुराणम् अभ्यर्च्य गन्धपुष्पाद्यैर्वस्त्रैरभरणैः शुभैः । दूर्वाकाण्डैश्च विधिवत्सोपवासा तु कन्यका ॥३॥ वराङ्गिनी च सौभाग्यपुत्रभर्त्तृविवर्धिनी तथा । द्विजभार्या भर्त्तृमतीः कन्यका वा सुलक्षणाः ॥४॥ सिन्दूरांजनवस्त्राद्यैः प्रतोष्य प्रीतमानसा । रात्रौ जागरणं कुर्याद्व्रतसंपूर्तिकाम्यया ॥५॥ ततस्तां प्रतिमां विप्र गुरवे प्रतिपादयेत् । धातुजां मृण्मयीं वा तु निक्षिपेच्च जलाशये ॥६॥ एवं द्वादशवर्षाणि कृत्वा गौरीव्रतं शुभम् । धेनुद्वादशसंकल्पं दद्यादुत्सर्गसिद्धये ॥७॥ किमत्र बहुनोक्तेन गौरी सौभाग्यदायिनी । स्त्रीणां यथा तथा नान्या विद्यते भुवनत्रये ॥८॥ धनं पुत्रान्पतिं विद्यामाज्ञासिद्धिं यशः सुखम् । लभते सर्वमेवेष्टं गौरीमभ्यर्च्य भक्तितः ॥६॥ राधशुक्लतृतीया या साक्षया परिकीर्तिता । तिथिश्चैतायुगाद्या सा कृतस्याक्षयकारिणी ॥१०॥ द्वे शुक्ले द्वे तथा कृष्णे युगादो कथयो विदुः । शुक्ले पूर्वाह्णिके ग्राह्ये कृष्णे चैव तपस्यथ ॥११॥ द्वापरं हि कलिमद्वि प्रवृत्तानि युगानि वै । तत्र राधतृतीयायां श्री समेतं जगद्गुरुम् ॥१२॥ नारायणं समभ्यर्च्यत्पुष्पधूपविलेपनैः । यद्वा गंगांभसि स्नातो मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥१३॥ अक्षतैः पूजयेद्विष्णुं स्नायाद्व्यक्षतैरंनरः । सक्तून्संभोजयेद्विप्रांन्स्वयमभ्यवहरेच्च तान् ॥१४॥ एवं कृतविधिर्विप्र नरो विष्णुपरायणः । विष्णुलोकमवाप्नोति सर्वदेवनमस्कृतः ॥१५॥ अथ ज्येष्ठतृतीया तु शुक्ला रंभेति नामतः । तस्यां सभार्यं विधिवत्पूजयेद्ब्राह्मणोत्तमम् ॥१६॥ गन्धपुष्पांशुकाद्यैस्तु नारी सौभाग्यकाम्यया । रंभाव्रतमिदं विप्र विधिवत्समुपाश्रितम् ॥१७॥ वाली कन्या चैत्र-शुक्ल-तृतीया में उपवास करती हुई गंध, पुष्प, वस्त्र, आभूषण दूर्वा आदि सामग्रियों से शिव सहित गौरी की सोने या चाँदी या ताँबे या मिट्टी की प्रतिमा की विधिवत् अर्चना कर पतिवती द्विजभार्या या सुलक्षणा कुमारी को सिंदूर, अंजन, वस्त्र आदि से संतुष्ट करे और व्रत की पूर्णता के लिए रात्रि में जागरण करे। तदनन्तर वह प्रतिमा गुरु को समर्पित कर दे । यदि धातु या मृत्तिका की बनी प्रतिमा हो तो जलाशय में प्रवाहित कर दे ॥१-६॥ इस प्रकार बारह वर्षों तक पवित्र गौरी व्रत को सम्पन्न करके दानसिद्धि के लिए बारह धेनुओं का उत्सर्ग करना चाहिए इस व्रत के संबन्ध में बहुत कुछ क्या कहें तीनों लोक में स्त्रियों के लिए गौरी जैसी सौभाग्यदायिनी कोई नहीं है । भक्तिपूर्वक गौरी की आराधना करने से धन, पुत्र, पति, विद्या, आज्ञासिद्धि, यश, सुख तथा सकल कामनाओं की प्राप्ति होती है ॥७-९॥ वैशाख शुक्ल की अक्षय तृतीया त्रेतायुग की आदि तिथि कहलाती है। इसमें किये गये दान-पुण्य आदि अक्षय हो जाते हैं । विद्वानों ने दो शुक्ल पक्ष की तथा दो कृष्ण पक्ष की तिथियों को युगादि माना है । शुक्ल तथा कृष्ण दोनों पक्षों में पूर्वाह्णकालिक तृतीया ग्रहण करनी चाहिए। फाल्गुन में द्वापर और भाद्रपद में कलियुग की प्रवृत्ति हुई है। वैशाख की अक्षय तृतीया में लक्ष्मी सहित जगद्गुरु नारायण की पुष्प, धूप चन्दन आदि से पूजा करनी चाहिये । उस दिन गंगास्नान करने से समस्त पातकों का नाश हो जाता है ॥१०-१३॥ मानव अक्षत से विष्णु का पूजन कर स्वयं अक्षतस्नान करे (अर्थात् मस्तक पर अक्षत को रखकर स्नान करे) तद- नन्तर ब्राह्मणों को सत्तू खिलाकर स्वयं भी सत्तू खाये । विप्र ! इस प्रकार व्रत अनुष्ठान करने वाला विष्णुपरायण मनुष्य निखिल देवों से वंदनीय होकर विष्णुलोक को जाता है ॥१४-१५॥ ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया का का नाम रंभा है। उस दिन गंध, पुष्प, वस्त्र आदि से भार्या सहित उत्तम ब्राह्मण की विधिपूर्वक पूजा करे। ऐसा करने से नारी को सौभाग्य की प्राप्ति होती है । विप्र ! इस रंभाव्रत के यथाविधि अनुष्ठान करने से वित्त, पुत्र तथा धार्मिक बुद्धि का लाभ होता है ॥१६-१७॥ सौभाग्य की