बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१४ नारदीयपुराणम् तदन्ते देवभवने निवेश्य च यथाविधि । ब्राह्मणान्भोजयेच्चैव व्रतस्यास्य प्रपूर्तये ॥१२॥ नभःशुक्लद्वितीयायां विश्वकर्ता प्रजापतिः । स्वपितीति तिथिः पुण्या ह्यशोकशयनाह्वया ॥१३॥ सशक्तिकं तु शय्यास्थं पूजयित्वा चतुर्मुखम् । इममुच्चारयेन्मन्त्रं प्रणम्य जगतां पतीम् ॥१४॥ श्रीवत्सधारिञ्छ्रीकान्त श्रीवास श्रीपते प्रभो । गार्हस्थ्यं मा प्रणाशं मे यातु धर्मार्थकामद ॥१५॥ चन्द्रार्द्धदानमत्रोक्तं सर्वसिद्धिविधायकम् । भाद्रशुक्लद्वितीयायां शक्ररूपं जगद्विधुम् ॥१६॥ पूजयित्वा विधानेन सर्वक्रतुफलं लभेत् । आश्विने मासि वै पुण्या द्वितीया शुक्लपक्षजा ॥१७॥ दानं प्रदत्तमेतस्यामनन्तफलमुच्यते । ऊर्जशुक्लद्वितीयायां यमो यमुनया पुरा ॥१८॥ भोजितः स्वगृहे तेन द्वितीयेषा यमाह्वया । पुष्टिप्रवर्द्धनं चात्र भगिन्या भोजनं गृहे ॥१९॥ वस्त्रालंकारपूर्वं तु तस्यै देयमतः परम् ॥२०॥ यस्यां तिथौ यमुनया यमराजदेवः संभोजितो निजकरात्स्वसृसौहृदेन । तस्यां स्वसुः करतलादिह यो भुञ्जीत, प्राप्नोति रत्नधनधान्यमनुत्तमं सः ॥२१॥ मार्गशुक्लद्वितीयायां श्राद्धेन पितृपूजनम् । आरोग्यं लभते चापि पुत्रपौत्रसमन्वयः ॥२२॥ पौषशुक्लद्वितीयायां गोशृङ्गोदकमार्जनम् । सर्वकामप्रदं नृणामास्ते बालेंदुदर्शनम् ॥२३॥ योऽर्घ्यदानेन बालेंदुं हविष्याशी जितेंद्रियः । पूजयेत्साज्यसुमनैर्धर्मकामार्थसिद्धये ॥२४॥ माघशुक्लद्वितीयायां भानुरूपं प्रजापतिम् । समभ्यर्च्य यथाचार्यं पूजयेद्रक्तपुष्पकैः ॥२५॥ रक्तैर्गन्धस्तथा स्वर्णमूर्तिं निर्माय शक्तितः । ततः पूर्णं ताम्रपात्रं गोधूमैरपि तण्डुलैः ॥२६॥ समर्प्य देवे भक्त्यैव स मूर्तिं प्रददेद्विजे । एवं कृते व्रते विप्र साक्षात्सूर्य इवोदितः ॥२७॥
शुक्ल-द्वितीया को विश्वकर्ता प्रजापति शयन करते हैं । अतः वह तिथि पवित्र है, उसका नाम अशोकशयना है । उस दिन शय्यास्थित ब्रह्मा तथा शक्ति को पूजाकर "श्रीवत्सधारिन्............." इस मन्त्र को पढ़ते हुए जगत्पति को प्रणाम करे । यह मन्त्र अर्ध चन्द्र दान करने का है । इससे समस्त सिद्धियों की प्राप्ति होती है ॥८- १५३॥ भाद्र-शुक्ल-द्वितीया को विधिवूर्वक इन्द्ररूप ब्रह्मा का पूजन करने से निखिल यज्ञों का फल प्राप्त होता है। आश्विन-शुक्ल-द्वितीया में दान का अनन्त फल होता है । प्राचीन काल में कार्तिक-शुक्ल-द्वितीया को यमुना ने यम को अपने गृह में भोजन कराया था । इसलिए उस द्वितीया का नाम यम द्वितीया पड़ा । उस तिथि को बहिन के घर में भोजन करने से धन-धान्य बढ़ता है । उस दिन बहिन को वस्त्र तथा आभूषण आदि देने चाहिये ॥१६-२०॥ जिस तिथि में यमुना ने यमराजदेव को भगिनी-वात्सल्य से अपने हाथों भोजन कराया, उस तिथि में जो व्यक्ति बहिन के हाथों से भोजन करता है, उसे उत्तम रत्न तथा धन-धान्य की प्राप्ति होती है । अगहन-शुक्ल- द्वितीया में जो पितृपूजन एवम् श्राद्ध करता है, पुत्र, पौत्र तथा आरोग्य की प्राप्ति होती है । पौष-शुक्ल-द्वितीया में जो नर गाय के सींग से स्पर्श किये जल से स्नान करता है, उसकी समस्त कामनायें पूरी होती हैं । उस दिन सूर्यास्त के उपरान्त जो हविष्य-भोजन तथा इन्द्रिय-संयम करते हुए बालचन्द्र का दर्शन करता है तथा घृत युक्त पुष्पों से पूजन कर अर्घ्य प्रदान करता है, उसे धर्म अर्थ तथा काम की सिद्धि होती है । माघ-शुक्ल-द्वितीया में यथाशक्ति रक्तपुष्पों एवम् रक्त गन्धों से भानुरूप प्रजापति की स्वर्णमूर्ति की पूजा करनी चाहिये ॥२१-२५३॥ अनन्तर एक ताम्रपात्र को चावल या गेहूँ से भर कर भक्तिपूर्वक मूर्ति सहित वह पात्र ब्राह्मण को दे दे । विप्र ! ऐसा करने वाला व्यक्ति पृथ्वी पर सूर्य के समान दुर्धर्ष तेजस्वी होता है और सकल भोगों को भोग कर