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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 932, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 932

एकादशाधिकशततमोऽध्यायः सनातन उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि द्वितीयाया व्रतानि ते। यानि कृत्वा नरो भक्त्या ब्रह्मलोके महीयते ॥१॥ चैत्रशुक्लद्वितीयायां ब्रह्माणं च सशक्तिकम्। हविष्यान्नेन गन्धाद्यैः स्तोष्य सर्वक्रतूद्भवम् ॥२॥ फलं लब्ध्वाखिलांकामानंते ब्रह्मपदं लभेत् । अस्मिन्नेव दिने विप्र बालेंदुमुदितं परे ॥३॥ समभ्यर्च्य निशारंभे भुक्तिमुक्तिफलं भवेत् । अथ वास्मिन्दिने भक्त्या दस्त्रावभ्यर्च्य यत्नतः ॥४॥ सुवर्णरजते नेत्रे प्रदद्याच्च द्विजातये । पूर्णायावान्नते ह्यस्मिन्दध्ना वापि घृतेन च ॥५॥ नेत्रव्रते द्वादश वत्सरान्वै कृत्व्या भवेद्भूपतिद्विजेंद्र । सुरूपरूपोऽरिगणप्रतापी धर्माभिरामोन्नृपवंगंमुख्यः ॥६॥ राधशुक्लद्वितीयायां ब्रह्माणं विष्णुरूपिणम् । समभ्यर्च्य सप्तधान्याढ्यकुम्भोपरि विधानतः ॥७॥ विष्णुलोकमवाप्नोति भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् । ज्येष्ठशुक्लद्वितीयायां भास्करं भुवनाधिपम् ॥८॥ चतुर्वक्त्रस्वरूपं च समभ्यर्च्य विधानतः । भोजयित्वा द्विजान् भक्त्या भास्करं लोकमाप्नुयात् ॥६॥ आषाढस्य सिते पक्षे द्वितीया पुष्यसंयुता । तस्यां रथं समारोप्य रामं सह सुभद्रया ॥१०॥ द्विजादिमित्रैंतो सार्धं परिक्रम्य पुरादिकम् । जलाशयांतिकं गत्वा कारयेच्च महोत्सवम् ॥११॥

अध्याय १११ बारह मासों का द्वितीयाव्रत सनातन बोले—विप्र ! सुनो, अब मैं द्वितीया तिथि के व्रतों को बतला रहा हूँ। जिनके अनुष्ठान से मानव ब्रह्मलोक में पूजित होता है । चैत्र-शुक्ल-द्वितीया में शक्ति सहित ब्रह्मा को हविष्यान्न तथा गन्ध आदि से संतुष्ट करने से मनुष्य समस्त यज्ञों के फल को प्राप्त कर अखिल भोगों को भोगते हुए ब्रह्मपद को प्राप्त करता है ॥१-२३॥ विप्र ! उसी दिन निशारम्भ में उदित बालचन्द्र की अर्चना करने से भुक्ति-मुक्ति मिलती है। अथवा उस दिन यत्नपूर्वक अश्विनीकुमार की अर्चना कर सुवर्ण और चाँदी की दो नेत्र-प्रतिमा द्विजाति को समर्पित करे । द्विजश्रेष्ठ ! इस व्रत को पूर्णायत्राव्रत तथा नेत्रव्रत कहा जाता है। इसमें ब्राह्मण को दही या घृत से संतुष्ट करना पड़ता है । बारह वर्षों तक इसके करने से मनुष्य अत्यन्त रूपवान् धर्मात्मा तथा नृपशिरोमणि होता है । वैशाख- शुक्ल-द्वितीया में सप्तधान्य युक्त घट के ऊपर विधिपूर्वक विष्णु रूपी ब्रह्मा की पूजा करने वाला मनुष्य मनोरम भोगों को भोग कर विष्णुलोक को जाता है ॥३-७३॥ ज्येष्ठ शुक्ल-द्वितीया में चतुर्मुख के समान स्वरूप वाले भुवनाधिप भास्कर की विधिपूर्वक पूजा कर भक्ति से द्विजों को भोजन कराने वाला व्यक्ति सूर्यलोक को जाता है । आषाढ-शुक्ल-पक्ष की द्वितीया में रथ पर सुभद्रा सहित राम को चढ़ाकर ब्राह्मण आदि के साथ व्रती नगर की परिक्रमा करते हुए जलाशय के समीप जाकर खूब धूम-धाम से उत्सव मनाये । अनन्तर देवालय में आकर व्रत की पूर्ति के लिये ब्राह्मणों को भोजन कराये । श्रावण- ११९ ना० पु०