बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१२ नारदीयपुराणम् सायं गोभिः सह श्रीमद्गोवर्द्धनधराधराम् । समर्च्य दक्षिणोकृत्य भुक्तिमुक्तो समाप्नुयात् ॥३७॥ अथ मार्गसिताद्यायां धनव्रतमनुत्तमम् । नक्तं विष्ण्वर्चनं होमैः सौवर्णीं हुतभुक्तनुम् ॥३८॥ रक्तवस्त्रयुगाच्छन्नां द्विजाय प्रतिपादयेत् । एवं कृत्वा धनेर्धान्यैः समृद्धो जायते भुवि ॥३९॥ वह्निना दग्धपापस्तु विष्णुलोके महीयते । पौषशुक्लप्रतिपदि भानुमभ्यर्च्य भक्तितः ॥४०॥ एकभक्तव्रतो मत्यों भानुलोकमवाप्नुयात् । माघशुक्लाद्यदिवसे वह्नि साक्षान्महेश्वरम् ॥४१॥ समभ्यर्च्य विधानेन समृद्धो जायते भुवि । अथ फाल्गुनशुक्लावौ देवदेवं दिगंबरम् ॥४२॥ धूलिधूसरसर्वांगं जलैरुक्षेत्समंततः । कर्मणा लौकिकेनापि संतुष्टो हि महेश्वरः ॥४३॥ स्वसायुज्यं विशति भक्त्या सम्यक्समर्चितः । वैशाखे तु सिताद्यायां विष्णुं विश्वविहारिणम् ॥४४॥ समभ्यर्च्य विधानेन विप्रान्संभोजयेद्व्रती । शुचिसिताद्यायां च ब्रह्माणं जगतां गुरुम् ॥४५॥ विष्णुना सहितो ब्रह्मा सर्वलोकेश्वरेश्वराः । स्वसायुज्यं प्रदिशति सर्वसिद्धिमवाप्नुयात् ॥४६॥ आसु द्वादशमासानां प्रतिपत्सु द्विजोत्तम । व्रतानि तुभ्यं प्रोक्तानि भुक्तिमुक्तिप्रदानि च ॥४७॥ व्रतेष्वेतेषु सर्वेषु ब्रह्मचर्यं विधीयते । भोजने तु भविष्यान्नं सामान्यत उदाहृतम् ॥४८॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासप्रतिपद्व्रत- निरूपणं नाम दशोत्तरशततमोऽध्यायः ॥११०॥ से अन्नकूट व्रत की आराधना करें। सायंकाल गौओं समेत श्रीमान् गोवर्धन पर्वत की अर्चना कर प्रदक्षिणा करे। ऐसा करने से भोग-मोक्ष की प्राप्ति होती है ॥३५-३७॥ अगहन की प्रतिपदा में सर्वोत्तम धनव्रत करना चाहिये। रात्रि में विष्णु-पूजा तथा हवन करके अग्नि की सुवर्णमयी प्रतिमा को एक जोड़े रक्त वस्त्र से ढक कर ब्राह्मण को दे दे। ऐसा करने से मनुष्य धनधान्य सम्पन्न हो जाता है और अग्नि से पाप को दग्ध करके (अर्थात् परिशुद्ध होकर) विष्णुलोक में पूजित होता है। पौष-शुक्ल-प्रतिपदा में भक्तिपूर्वक भानु की अर्चना करने से मनुष्य आदित्य लोक को प्राप्त करता है। माघ- शुक्ल-प्रतिपदा में साक्षात् महेश्वर रूप वह्नि की विधिपूर्वक पूजा करने से मानव भूमि पर सर्वसंपन्न हो जाता है ॥३८-४१॥ फाल्गुन-शुक्ल-प्रतिपदा में धूलि से धूसरित सर्वांग शरीर वाले दिगम्बर देव (शिव) को जल चढ़ाने से महेश्वर संतुष्ट हो जाते हैं और भक्तिपूर्वक सम्यक् प्रकार से पूजित होने पर वे अपने (सायुज्य मोक्ष) को देते हैं। वैशाख-शुक्ल-प्रतिपदा में विधिपूर्वक विश्वविहारी विष्णु की अर्चना कर व्रती ब्राह्मण-भोजन कराये, आषाढ़-शुक्ल प्रतिपदा में विष्णु सहित अखिल लोकेश्वर तथा जगद्गुरु ब्रह्मा का पूजन करने से वे अपने सायुज्यमोक्ष एवम् सकल सिद्धियों को देते हैं। द्विजश्रेष्ठ ! बारहों मासों की प्रतिपदा तिथि में जितने भुक्ति-मुक्ति-दायक व्रत होते हैं, वे सब तुमसे बता दिये। किन्तु ध्यान रखना चाहिये कि इन व्रतों के दिन ब्रह्मचर्यपालन एवम् हविष्यान्न भोजन परमावश्यक हैं ॥४२-४८॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में द्वादशमासप्रतिपदाव्रत निरूपण नामक एक सो दसवां अध्याय समाप्त ॥११०॥