सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 930, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 930

दशाधिकशततमोऽध्यायः ६११ कार्त्तिकासितभूतायामुपोष्य व्रततत्परः। पूर्णायां शिवमभ्यर्च्य सुवर्णं वंशसंयुतम् ॥२१॥ वायनं सुमहत्पुण्यं देवताप्रीतिवर्धनम् । दद्याद्विप्राय संकल्प्य धनवृद्ध्यै मुनीश्वर ॥२२॥ भाद्रशुक्लप्रतिपदि व्रतं नाम्ना महत्तसम् । व्रतं मौनाह्वयं केचित्प्राहुरत्न शिवोऽर्च्यते ॥२३॥ नैवेद्यं तु पचेन्मौनी षोडशत्रिगुणानि च । फलानि पिष्टपक्वानि दद्याद्विप्राय षोडश ॥२४॥ देवाय षोडशान्यानि भुज्यंते षोडशात्मना । सौवर्णं शिवमभ्यर्च्य कुम्भोपरि विधानवित् ॥२५॥ तत्सर्वं धेनुसहितमाचार्याय प्रदापयेत् । इदं कृत्वा व्रतं विप्र देवदेवस्य शूलिनः ॥२६॥ चतुर्दशाब्दं देहांतं भुक्तभोगः शिवं व्रजेत् । आश्विने सितपक्षस्यां कृत्वाशोकव्रतं नरः ॥२७॥ अशोको जायते विप्र धनधान्यसमन्वितः । अशोकपूजनं तत्र कार्यं नियमतत्परैः ॥२८॥ व्रतान्ते द्वादशे वर्षे मूर्ति चाशोकशाखिनः । समर्प्य गुरवे भक्त्या शिवलोके महीयते ॥२६॥ अस्यामेव प्रतिपदि नवरात्रं समारभेत् । पूर्वाह्णे पूजयेद्देवीं घटस्थापनपूर्वकम् ॥३०॥ अंकुरारोपणं कृत्वा यवैर्गोधूममिश्रितैः । ततः प्रतिदिनं कुर्यादेकभुक्तमयाचितम् ॥३१॥ उपवासं यथाशक्ति पूजापाठजपादिकम् । मार्कण्डेयपुराणोक्तं चरितत्रितयं द्विज ॥३२॥ पठनीयं नवदिनं भुक्तिमुक्ती अभीप्सता । कुमारो पूजनं तत्र प्रशस्तं भोजनादिभिः ॥३३॥ इत्थं कृत्वा व्रतं विप्र सर्वसिद्धयालयो नरः । जायते भुवि दुर्गायाः प्रसादान्नात्र संशयः ॥३४॥ अथोर्जसितपक्षस्यां नवरात्रोदितं चरेत् । विशेषादन्नकूटाख्यं विष्णुप्रीतिविवर्धनम् ॥३५॥ सर्वपाकैः सर्वदोहैः सर्वैः सर्वार्थसिद्धये । कर्तव्यमन्नकूटं तु गोवर्द्धनसमर्चने ॥३६॥ वंशयुक्त सुवर्ण तथा देवप्रीतिवर्धक बाहन विप्र को संकल्प करके दे दे। भाद्र-शुक्ल-प्रतिपदा को महत्तस नामक व्रत करना चाहिये। किन्हीं का कहना है कि यह व्रत मौनसंज्ञक है और कोई कहते हैं कि नहीं यह शिवसंज्ञक है ।।१८-२३।। व्रतो नैवेद्य के लिए पुआ-पकवान आदि पकाये, सोलह पकवान विप्र को और सोलह देवता को समर्पित करके घड़े के ऊपर सुवर्ण निमित शंकर की प्रतिमा का पूजन करे और धेनु सहित वह प्रतिमा आचार्य को अर्पित कर दे। विप्र ! चौदह वर्षों तक जो व्यक्ति पशुपति का यह व्रत करता है, वह सकल भोगों को भोग कर शिवसायुज्य मोक्ष को प्राप्त करता है। द्विज ! आश्विन-शुक्लपक्ष की प्रतिपदा में जो नर अशोकव्रत करता है, वह वीतशोक तथा धनधान्य सम्पन्न हो जाता है। उस दिन नियम-निष्ठा से अशोक पूजन करना चाहिये। बारह वर्षों तक व्रत कर लेनेके उपरान्त अशोकवृक्ष की प्रतिमा भक्तिपूर्वक गुरु को समर्पित करे। ऐसा करने वाला व्यक्ति शिवलोक में पूजित होता है। उक्त प्रतिपदा से नवरात्र-पूजन को आरम्भ करना चाहिये। पूर्वाह्न में घटस्थापन पूर्वक देवी की पूजा करे ।।२४-३०।। (घट के समीप मिट्टी के ऊपर) गेहूँ मिले जवा बोकर प्रतिदिन बिना मांगे मिला अन्न एक बार भोजन करे । यथाशक्ति उपवास, पूजा, पाठ आदि भो किया करे । भुक्ति-मुक्ति के इच्छुक जन उन नवों दिन मार्कंडेय पुराण में कहे गये तीनों चरित्रों (दुर्गासप्तशती) का पाठ करे । उन दिनों भोजन आदि से कुमारियों का सम्मान करना भी प्रशस्त माना गया है। विप्र ! जो मानव इस प्रकार व्रत करता है, वह दुर्गा की कृपा से पृथ्वो पर संपूर्ण ऐश्वर्यों को प्राप्त करता है, इसमें संशय नहीं ।।३१-३४॥ एतदुपरीन्त कातिक-शुक्ल-प्रतिपदा के व्रत को सुनो। उस दिन विष्णु को प्रीति को बढ़ाने वाले अन्नकूट मामक व्रत को करना चाहिए। समस्त अभिलाषाओं की सिद्धि के लिये सब प्राणी पुआ, पकवान, दूध, दही आदि