बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१० नारदीयपुराणम् वत्सरादौ वसंतादौ बलिराज्ये तथैव च । पूर्वविद्वैव कर्तव्या प्रतिपत्सर्वदा बुधैः ॥६॥ तत्र कार्या महाशांतिः सर्वकल्मषनाशिनी । सर्वोत्पातप्रशमनी कलिदुष्कृतहारिणी ॥७॥ आयुःप्रदा पुष्टिकरी धनसौभाग्यवर्द्धिनी । मंगल्या च पवित्रा च लोकद्वयसुखावहा ॥८॥ तस्यामादौ तु संपूज्यो ब्रह्मा वह्निवपुर्धरः । पाद्यार्घ्यपुष्पधूपैश्च वस्त्रालंकारभोजनैः ॥६॥ होमैर्बल्युपहारैश्च तथा ब्राह्मणतर्पणैः । ततः क्रमेण देवेभ्यः पूजा कार्या पृथक्पृथक् ॥१०॥ कृत्वोंकारं नमस्कारं कुशोदकतिलाक्षतैः । सवस्त्रं सहिरण्यं च ततो दद्याद्विजातये ॥११॥ दक्षिणां वेदविदुषे व्रतसंपूर्तिहेतवे । एवं पूजाविशेषेण व्रतं स्यात्सौरिसंज्ञकम् ॥१२॥ आरोग्यदं नृणां विप्र तस्मिन्नेव दिने मुने । विद्याव्रतमपि प्रोक्तमस्यामेव तिथौ मुने ॥१३॥ तिलकं नाम च प्रोक्तं कृष्णेनाजातशत्रवे । अथ ज्येष्ठे सिते पक्षे पञ्चम्यां दिवसोदये ॥१४॥ देवोद्यानभवं हृद्यं करवीरं समर्चयेत् । रक्ततन्तुपरीधानं गंधधूपविलेपनैः ॥१५॥ प्ररूढसप्तधान्यैश्च नारंगैर्बीजपूरकैः । अभ्युक्ष्याक्षततोयेन मंत्रेणेत्थं क्षमापयेत् ॥१६॥ करवीर वृक्षावास नमस्ते भानुवल्लभ । दंभोलिमृडदुर्गादिदेवानां सततं प्रिय ॥१७॥ आकृष्णेनेति वेदोक्तमंत्रेणेत्थं क्षमापयेत् । एवं भक्त्या समभ्यर्च्य दत्त्वा विप्राय दक्षिणाम् ॥१८॥ प्रदक्षिणं ततः कुर्यात्पश्चात्स्वभवनं व्रजेत् । नभःशुक्ले प्रतिपदि लक्ष्मीबुद्धिप्रदायकम् ॥१६॥ धर्मार्थकाममोक्षाणां निदानं परमं व्रतम् । सोमवारं समारभ्य सार्धमासत्रयं द्विज ॥२०॥ की, जो वर्ष एवम् वसन्त ऋतु का प्रारंभिक समय माना जाता है । (अतः उस दिन व्रत रखना चाहिये) परन्तु विद्वान् व्यक्ति सदा पूर्वविद्धा ही प्रतिपदा किया करे । उस तिथि को महाशान्ति करनी चाहिये । वह समस्त पापों का नाश करने वाली, अखिल उपद्रवों को शान्त करने वाली, कलि के दुष्कृत का हरण करने वाली, आयु देने वाली, पुष्टिकरी, धनसौभाग्यवर्धिनी, मंगलमयी, पवित्र तथा उभय लोक में सुख देने वाली है ॥४-८॥ इस तिथि में पहले अग्निदेहधारी ब्रह्मा का पाद्य, अर्घ्य, पुष्प, धूप, वस्त्र, अलंकार, भोजन, होम, बलि, उपहार तथा ब्राह्मण भोजन द्वारा पूजन करे । अनन्तर क्रमशः देवताओं की पृथक्-पृथक् पूजा करे, । फिर ओंकार को नमस्कार कर तिल, जल, अक्षत तथा कुश लेकर वस्त्र एवम् सुवर्ण द्विजाति को प्रदान करे । व्रत की पूर्णता के लिए वेदवेत्ता विप्र को दक्षिणा दे । इस प्रकार पूजाविशेष से युक्त व्रत 'सौरि' कहलाता है । विप्र ! उसी दिन विद्याव्रत भी करना चाहिये जो आरोग्य प्रदान करता है मुने ! कृष्ण ने तो अजातशत्रु से उसी तिथि में तिलकव्रत भी करने को कहा है ॥९-१३॥ ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि में सूर्योदय होने पर देवोद्यान के किसी सुन्दर करवीर पुष्प के वृक्ष की अर्चना करे । उसमें लाल डोरे लपेट कर गन्ध, धूप, चन्दन, प्रियंगु, सप्तधान्य, नारंग तथा बीजपूर से पूजन करे । अनन्तर स्वच्छ जल से सिक्त कर मन्त्रपूर्वक इस प्रकार क्षमा प्रार्थना करे—"करवीर ! वृक्षावास ! भानुवल्लभ ! आपको नमस्कार है । आप इन्द्र, शंकर, दुर्गा आदि देवों के सदा प्रिय हैं॥१४-१७॥ पुनः आकृष्णेन इस वेदोक्त मन्त्र से पूजासमाप्ति करते हुए भक्तिपूर्वक ब्राह्मण को दक्षिणा दे । पश्चात् प्रदक्षिणा करके अपने घर को लौटे । द्विज ! श्रावण-शुक्ल की प्रतिपदा में लक्ष्मी, बुद्धि, धर्म, अर्थ, काम एवम् मोक्ष को देने वाला महाव्रत करना चाहिये । सोमवार से लेकर साढ़े तीन मास तक यह व्रत किया जाता है । कार्तिक-कृष्ण-चतुर्दशी को उपवास कर व्रतनिष्ठ व्यक्ति पूर्णिमा में शिव की अर्चना करे और धनवृद्धि के लिये