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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 920, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 920

षडधिकशततमोऽध्यायः ६०१ युगधर्मानुकथनं व्यासजैमिनिकीर्तनम् । वाराणस्याश्च माहात्म्यं प्रयागस्य ततः परम् ॥१०॥ त्रैलोक्यवर्णनं चैव वेदशाखानिरूपणम् । उत्तरेऽस्या विभागे तु पुरा गीतेश्वरी ततः ॥११॥ व्यासगीता ततः प्रोक्ता नानाधर्मप्रबोधिनी । नानाविधानां तीर्थानां माहात्म्यं च पृथक् ततः ॥१२॥ प्रतिसर्गप्रकथनं ब्राह्मीयं संहिता स्मृता । अतः परं भागवतीसंहितार्थं निरूपणम् ॥१३॥ कथिता यत्र वर्णानां पृथग्वृत्तिरुदाहृता । पादेऽस्याः प्रथमे प्रोक्ता ब्राह्मणानां व्यवस्थितिः ॥१४॥ सदाचारात्मिका वत्स भोगसौख्यविवर्द्धनी । द्वितीये क्षत्रियाणां तु वृत्तिः सम्यक्प्रकीर्तिता ॥१५॥ यया स्वाश्रितया पापं विधूयेह व्रजेद्दिवम् । तृतीये वैश्यजातीनां वृत्तिरुक्ता चतुर्विधा ॥१६॥ यया चरितया सम्यल्लभते गतिमुत्तमाम् । चतुर्थेऽस्यास्तथा पादे शूद्रवृत्तिरुदाहृता ॥१७॥ यया संतुष्यति श्रीशो नृणां श्रेयोविवर्द्धनः । पंचमेऽस्यास्ततः पादे वृत्तिः संकरजोदिता ॥१८॥ यया चरितमाप्नोति भाविनों गतिमुत्तमाम् । इत्येषा पंचपद्युक्ता द्वितीया संहिता मुने ॥१९॥ तृतीयात्रोदिता सौरी नृणां कार्यविधायिनी । षोढा षट्कर्मसिद्धिं बोधयन्ती च कामिनाम् ॥२०॥ चतुर्थी वैष्णवी नाम मोक्षदा परिकीर्तिता । चतुष्पदी द्विजातीनां साक्षाद्ब्रह्मस्वरूपिणी ॥२१॥ ताः क्रमात्षट्चतुर्द्विद्विसाहस्राः परिकीर्तिताः । ॥२२॥ एतत्कूर्मपुराणं तु चतुर्वर्गफलप्रदम् । पठतां शृण्वतां नृणां सर्वोत्कृष्टगतिप्रदम् ॥२३॥ लिखितवैतत्तु यो भक्त्या हेमकूर्मसमन्वितम् । ब्राह्मणायायने दद्यात्स याति परमां गतिम् ॥२४॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे कूर्मपुराणानुक्रमणकथनं नाम षडधिकशततमोऽध्यायः ॥१०६॥

योगनिरूपण, युगधर्मकथन, व्यास और जैमिनि की कथा, वाराणसी और प्रयाग का माहात्म्य, त्रैलोक्यवर्णन और वेदशाखानिरूपण--इतने विषय आये हैं ॥१।१-१०१/२॥ उत्तर भाग के ब्राह्मी संहिता में प्रथमतः ईश्वरीगीता, व्यासगीता, नानाविध तीर्थमाहात्म्य, अनेकधर्मकथा तथा प्रतिसर्गनिरूपण किया गया है। भागवती संहिता के प्रथम पाद में, सदाचारयुक्त भोगसौख्य को बढ़ाने वाली ब्राह्मणों की व्यवस्था बताई गई है। द्वितीय पाद में क्षत्रिय की वृत्ति का सम्यक्रूप से प्रतिपादन किया गया है, जिसके अनुष्ठान से निष्पाप होकर क्षत्रिय स्वर्ग को जाते हैं। तृतीय पाद में वैश्यों की चार प्रकार वृत्ति का निरूपण किया गया है, जिसके संपादन से वैश्य उत्तम गति को लाभ करते हैं। चौथे पाद में शूद्रों की वृत्ति का कथन हुआ है, जिसके करने से मानवकल्याणवर्धक नारायण संतुष्ट होते हैं। पाँचवें पाद में संकरों की वृत्ति कथित हुई है, जिसके सम्यक् आचरण से उत्तम गति की प्राप्ति होती है। मुने ! यह पंचपदी द्वितीय संहिता कही गई ॥११-१९॥ तीसरी सौरी संहिता मनुष्यों के कार्य सम्पन्न करने वाली तथा कामियों के छह कर्मों को सिद्ध करने वाली है। चौथी वैष्णवी संहिता मोक्ष देने वाली, चार पादों वाली तथा द्विजातियों के लिये साक्षात् ब्रह्मस्वरूपि- णी है। वे संहितायें क्रमशः छह, चार तथा दो हजार श्लोकों में परिपूर्ण हैं (?)। यह कूर्मपुराण चतुर्वर्ग के फल को देने वाला है। इसके पाठ तथा श्रवण से मानवों को उत्कृष्ट गति मिलती है। जो इस पुराण को लिखकर ब्राह्मण को भक्तिपूर्वक सुवर्णकच्छप सहित यह प्रदान करता है उसे परम गति की प्राप्ति होती है ॥२०-२१॥ श्री नारदीयपुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थपाद में कूर्मपुराणानुक्रमणकथन नामक एक सौ छठा अध्याय समाप्त ॥१०६॥