बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)
Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६१८ नारदीयपुराणम् अन्येभ्यो विप्रवर्येभ्यो दक्षिणां च प्रयत्नतः । भूयसीं च ततो दद्याद्विप्रेभ्यो देविमुष्टये ॥३५॥ एवं या कुरुते नारी व्रतं सौभाग्यवर्द्धनम् । सा तु देवीप्रसादेन सौभाग्यं लभते ध्रुवम् ॥३६॥ यदा तृतीया भाद्रे तु हस्तर्क्षसहिता भवेत् । हस्तगौरीव्रतं नाम तदुद्दिष्टं हि शौरिणा ॥३७॥ तथा कोटीश्वरी नाम व्रतं प्रोक्तं पिनाकिना । लक्षेश्वरी चैव तथा तद्विधानमुदीर्यते ॥३८॥ अस्यां व्रतं तु संग्राह्यं यावद्वर्षचतुष्टयम् । उपवासेन कर्तव्यं वर्षे वर्षे तु नारद ॥३९॥ अखंडानां तंडुलानां तिलानां वा मुनीश्वर । लक्षमेकं विशोध्याथ क्षिपेत्पयसि संप्लुते ॥४०॥ तत्पक्वेन तु निर्माय देव्या मूर्ति सुशोभनाम् । प्रकरै गंधपुष्पाणां पुष्पमालादिभूषिताम् ॥४१॥ संस्थाप्य पार्वतीं तत्र पूजयेद्भक्तिभावितः । गन्धैः पुष्पैस्तथा धूपैर्दीपैर्नैवेद्यविस्तरैः ॥४२॥ विविधैश्च फलैर्विप्र नमस्कृत्य क्षमापयेत् । ततो विसर्जयेद्देवीं जलमध्येऽथ दक्षिणाम् ॥४३॥ दत्त्वा विधिश्रविप्रेभ्यो भुञ्जीयाच्च परे दिने । इति ते कथितं विप्र कोटिलक्षेश्वरीव्रतम् ॥४४॥ गौरीलोकं प्रयास्यंते व्रतस्यास्य प्रभावतः । इषशुक्लतृतीयायां बृहद्गौरीव्रतं चरेत् ॥४५॥ पंचवर्षं विधानेन पूर्वोक्तेनैव नारद । आचार्य पूजयेदंते विप्रानन्यानधनादिभिः ॥४६॥ सुवासिनीः पंच पूज्या वस्त्रालंकारचन्दनैः । कंचुकैश्चैव ताटंकैः कण्ठसूत्रैर्हरिप्रियाः ॥४७॥ वंशपात्राणि पंचैव सूत्रैः संवेष्टितानि च । सिंदूरं जीरकं चैव सौभाग्यद्रव्यसंयुक्तम् ॥४८॥ गोधूमपृष्टजातं च नवापूपं फलादिकम् । वायनानि च पंचैव ताभ्यो दद्याच्च भोजयेत् ॥४९॥ अर्धं दत्त्वा वायनानि पश्चाद्भुञ्जीत वाग्यता । तत्फलं धारयेत्कण्ठे सर्वकामसमृद्धये ॥५०॥ ततः प्रातः समुत्थाय सालंकारा सखीजनैः । गीतवाद्ययुता नद्यां गौरीं तां तु विसर्जयेत् ॥५१॥
अन्य उत्तम विप्रों को दक्षिणा तथा भूयसी दक्षिणा भी दे । जो नारी इस सौभाग्यवर्धक व्रत को करती है। उसे देवी की कृपा से निःसंदेह सौभाग्य लाभ होता है ॥३३-३६॥ जब भाद्रपद की तृतीया हस्त नक्षत्र से संयुक्त होती है, तब वह व्रत हस्त गौरी व्रत कहलाता है—ऐसा कृष्ण ने कहा है । शंकर कहते हैं कि उस दिन कोटीश्वरी व्रत तथा लक्षेश्वरी व्रत भी होता है। उसका विधान सुनो ॥३७-३८॥ वह व्रत चार वर्षों तक करना पड़ता है। परन्तु प्रत्येक वर्ष वह उपवास पूर्वक ही करना चाहिए । मुनीश्वर ! एक लाख अखंड चावल या तिल को परिशुद्ध करके गरम दूध में डालें पुः । उस पाक से देवी की सुन्दर मूर्ति बनाकर उसे गंध पुष्प माला आदि से विभूषित करे । अनन्तर उस मूर्ति में पार्वती की प्राणप्रतिष्ठा करके भक्ति पूर्वक गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा विविध फलों से पूजन करे । फिर नमस्कार तथा क्षमाप्रार्थना कर जलमध्य में देवी का विसर्जन करे और दूसरे दिन विधिवेत्ता विप्रों को दक्षिणा देकर स्वयं भोजन करे । द्विज ! यह कोटिलक्षेश्वरीव्रत तुमसे बतला दिया ॥३९-४४॥ इसके प्रभाव से नारी गौरीलोक को जाती है । आश्विन-शुक्ल-तृतीया में बृहद्गौरीव्रत करना चाहिए । पाँच वर्षों तक पूर्वोक्त विधान से ही वह व्रत किया जाना चाहिए । इसमें आचार्य का पूजन कर धन आदि से अन्य विप्रों को भी संतुष्ट करना चाहिए । पाँच सीमंतिनियों को वस्त्र, अलंकार; चंदन, कंचुकी, बाली तथा हार से संतुष्ट कर उन्हें पाँच सूत्रवेष्टित वंशपात्र, सिंदूर, जीरा, सौभाग्य की चीजें, गेहूँ के आटे का पूआ और पांच वस्तुओं का बायन देकर भोजन कराने के पश्चात् अर्ध्य प्रदान करके वाक्संयमपूर्वक स्वयं भोजन करे और सकल कामनाओं की सिद्धि के लिए कंठ में उसका फल धारण करे ॥४५-५०॥ प्रातः काल उठकर शरीर को अलं- कृत करके सखियों के साथ गाना-बजाना करते हुए गौरी का विसर्जन करते हुए कहे "भद्रे ! मैंने यथाशक्ति