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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 938, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 938

द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ६१६ आहूतासि मया भद्रे पूजिता च यथाविधि । मम सौभाग्यदानाय यथेष्टं गम्यतां त्वया ॥५२॥ एवं कृत्वा व्रतं भक्त्या द्विज देवीप्रसादतः । भुक्त्वा भोगांस्तु देहान्ते गौरीलोकमवाप्नुयात् ॥५३॥ ऊर्जे शुक्लतृतीयायां विष्णुगौरीव्रतं चरेत् । पूजयित्वा जगद्वन्द्यामुपचारैः पृथग्विधैः ॥५४॥ सुवासिनीं भोजयित्वा मङ्गलद्रव्यपूजिताम् । विसर्जयेत्प्रणम्यैनां विष्णुगौरीतृप्तये ॥५५॥ मार्गशुक्लतृतीयायां हरगौरीव्रतं शुभम् । कृत्वा पूर्वविधानेन पूजयेज्जगदम्बिकाम् ॥५६॥ एतद्व्रतप्रभावेण भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् । देवीलोकं समासाद्य मोदते च तया सह ॥५७॥ पौषशुक्लतृतीयायां ब्रह्मगौरीव्रतं चरेत् । पूर्वोक्तेन विधानेन पूजितापि द्विजोत्तम ॥५८॥ ब्रह्मगौरीप्रसादेन मोदते तत्र संगता । माघशुक्लतृतीयायां पूज्या सौभाग्यसुन्दरी ॥५९॥ पूर्वोक्तेन विधानेन नालिकेराघ्यंदानतः । प्रसन्ना दिशति स्वायं लोकं तु व्रततोषिता ॥६०॥ फाल्गुनस्य सिते पक्षे तृतीया कुलसौख्यदा । पूजिता गन्धपुष्पाद्यैः सर्वमङ्गलदा भवेत् ॥६१॥ सर्वासु च तृतीयासु विधिः साधारणो मुने । देवीपूजा विप्रपूजा दानं होमं विसर्जनम् ॥६२॥ इत्येवं कथितानीह तृतीयायां व्रतानि ते । भक्त्या कृतानि चेष्टांस्तु कामान्दद्युर्मनोगतान् ॥६३॥ इति श्रीबृहन्नारदीयपुराणे पूर्वभागे बृहदुपाख्याने चतुर्थपादे द्वादशमासतृतीया- व्रतकथनम् नाम द्वादशाधिकशततमोऽध्यायः ॥११२॥


आपका आवाहन एवं पूजन किया। अब आप मुझे सौभाग्य प्रदान कर अपनी इच्छा से जाइये।" द्विज! इस प्रकार भक्तिपूर्वक व्रत करने वाली महिला देवी की कृपा से निखिल भोगों को भोग कर अन्त में गौरीलोक को जाती है। कार्तिक-शुक्ल-तृतीया में विष्णुगौरीव्रत करना चाहिए ॥५१-५३३॥ उस दिन पृथक्-पृथक् उपचारों से जगत् वन्दनीया देवी की अर्चना कर किसी सौभाग्यवती बनिता को भोजन कराये । अनन्तर विष्णु तथा गौरी की प्रसन्नता के लिए उस नारी को मांगलिक द्रव्य प्रदान कर प्रणामपूर्वक विदा करे । अगहन-शुक्ल-तृतीया में पवित्र हर गौरीव्रत करना चाहिए । उस दिन पूर्वोक्त रीति से जगदम्बिका की पूजा की जाती है ॥५४-५६॥ उस व्रत का अनुष्ठान करने वाली महिला मनोरम भोगों को भोग कर अन्त में देवीलोक को जाती है और वहां देवी के साथ ही क्रीड़ा करती है। द्विजश्रेष्ठ ! पौष-शुक्ल-तृतीया में पूर्वोक्त विधान से ही ब्रह्मगौरीव्रत करना चाहिए उस व्रत के प्रभाव से नारी देवी के सामीप्यमोक्ष को प्राप्त करती है ॥५७-५८३॥ माघ-शुक्ल-तृतीया में सौभाग्य सुन्दरी देवी की पूजा करनी चाहिए । उस दिन पूर्वोक्त विधि से पूजन कर नारियल का अर्घ्य देने से व्रतसंतुष्टा भगवती अपने लोक में शरण देती है। फाल्गुन-शुक्ल-तृतीया में गन्ध, पुष्प आदि से कुलसौख्यदा देवी की अर्चना करने से सकल कल्याणों की प्राप्ति होती है। मुने ! समस्त तृतीयाओं का विधान एक जैसा है। उन सब में देवी पूजा, विप्रपूजा, दान, होम तथा विसर्जन करना होता है। इस प्रकार समस्त तृतीयाव्रत मैंने तुमसे बतला दिये। इनके भक्तितपूर्वक अनुष्ठान करने से सकल कामनायें पूर्ण होती हैं ॥५९-६३॥ श्री नारदीय पुराण के पूर्वार्ध में बृहदुपाख्यानयुक्त चतुर्थ पाद में बारह मासों की तृतीयाओं का व्रत- निरूपण नामक एक सौ बारहवां अध्याय समाप्त ॥११२॥