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भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 939, कुल 1008 में से

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पृष्ठ 939

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः सूत उवाच शृणु विप्र प्रवक्ष्यामि चतुर्थ्यास्ते व्रतान्यहम् । यानि कृत्वा नरा नार्योऽभीष्टान्कामानवाप्नुयुः ॥१॥ चैत्रमासचतुर्थ्यां तु वासुदेवस्वरूपिणम् । गणपं सम्यगभ्यर्च्य दत्त्वा कांचनदक्षिणाम् ॥२॥ विप्राय विष्णुलोकं तु गच्छेद्वैदेवनमस्कृतः । वैशाखस्य चतुर्थ्यां तु प्राथ्यं संकर्षणाह्वयम् ॥३॥ गृहस्थद्विजमुख्येभ्यः शंखं दत्त्वा विधानवित् । प्राप्य संकर्षणं लोकं मोदते बहुकल्पकम् ॥४॥ ज्येष्ठमासचतुर्थ्यां तु प्राच्यं प्रद्युम्नरूपिणम् । फलं मूलं च भूयेभ्यो दत्त्वा स्वर्गं लभेन्नरः ॥५॥ आषाढस्य चतुर्थ्यां तु संप्रपूज्याऽनिरुद्धकम् । यतिभ्योऽलाबुपात्राणि दत्त्वाऽभीष्टं लभेन्नरः ॥६॥ चतुर्मूत्तिव्रतान्येवं कृत्वा द्वादशवत्सरम् । उद्यापनं विधानेन कर्त्तव्य फलमिच्छता ॥७॥ अन्यज्ज्येष्ठचतुर्थ्यां तु सतीव्रतमनुत्तमम् । कृत्वा गणपतेर्मातुर्लोके मोदेत तत्समम् ॥८॥ तथाऽऽषाढचतुर्थ्यां तु व्रतमप्यच्छुभावहम् । रथंतराख्यकल्पस्य ह्यादिभूतं दिनं यतः ॥६॥ श्रद्धायुतेन मनसा गणेशं विधिना नरः । पूजयित्वा लभेच्चापि फलं देवादिसुर्गमम् ॥१०॥ श्रावणस्य चतुर्थ्यां तु जाते चंद्रोदये मुने । ॥११॥ अध्याय ११३ बारह मासो का चतुर्थी-व्रत सनातन बोले—विप्र ! सुनो, मैं चतुर्थी तिथि के व्रतों को बतलाता हूँ, जिनके अनुष्ठान से नर-नारियों को अभीष्ट-सिद्धि होती है । चैत्र मास की चतुर्थी में वासुदेव गणपति को अर्चना कर विप्र को सुवर्ण दक्षिणा देने से मनुष्य देववंद्य होकर वैकुण्ठ को जाता है । वैशाख की चतुर्थी में बलराम रूप गणपति की पूजा कर उत्तम गृहस्थ विप्र को शंख प्रदान करने से मानव संकर्षण-लोक में जाकर बहुत कल्पों तक उनके साथ आनन्द करता है ॥१-४॥ ज्येष्ठ मास की चतुर्थी में प्रद्युम्न रूप गणपति की पूजा कर ब्राह्मणों को फल, मूल प्रदान करने से मनुज स्वर्ग को जाता है। जो नर आषाढ को चतुर्थी में अनिरुद्ध रूप गणपति की अर्चना कर संन्यासियों को कमण्डलु देता है, उसका अभीष्ट सिद्ध होता है ॥५-६॥ फल के इच्छुक व्यक्ति इसी प्रकार बारह वर्षों तक उप- युक्त चतुर्मूति व्रत का सविधि संपादन करे । ज्येष्ठ मास की चतुर्थी तिथि में अत्युत्तम सतीव्रत करने वाली नारी गौरीलोक में जाकर उनके साथ आनन्द करती है । आषाढ को चतुर्थी तिथि में एक कल्याणकारी व्रत किया जाता है, क्योंकि वह दिन रथंतर कल्प का आदिम दिवस है । उस दिन श्रद्धायुक्त चित्त से विधिपूर्वक गणेश की पूजा करने से देव दुर्लभ फल की प्राप्ति होती है ॥७-१०॥ मुने ! श्रावण की चतुर्थी में चन्द्रोदय होने पर विधानवेत्ता व्यक्ति गणेश को अर्घ्य दे । लम्बे पेट, चार भुजा