सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

बृहन्नारदीय पुराण (संस्कृत मूल व हिन्दी व्याख्या)

Brihan Naradiya Purana with Sanskrit & Hindi Commentary

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,008 पृष्ठ

पृष्ठ 940, कुल 1008 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 940

त्रयोदशाधिकशततमोऽध्यायः ६२१ गणेशाय प्रद्याच्च ह्यर्घ्यं विधिविदांवरः । लम्बोदरं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं रक्तवर्णकम् ॥१२॥ नानारत्नविभूषाढ्यं प्रसन्नास्यं विचितयेत् । आवाहनादिभिः सर्वैरुपचारैः समर्चयेत् ॥१३॥ नैवेद्यं मोदकं दद्याद्गणेशप्रीतिदायकम् । एवं व्रतं विधायाथ भुक्त्वा मोदकमेव च ॥१४॥ सुखं स्वप्यान्निशायां तु भूमावेव कृताचंनः । व्रतस्यास्य प्रभावेण कामान्मनसि चिन्तितान् ॥१५॥ लब्ध्वालोके परं चापि गणेशपदमाप्नुयात् । नानेन सदृशं चान्यद्व्रतमस्ति जगत्त्रये ॥१६॥ तस्मात्कार्यं प्रयत्नेन सर्वकामानभीप्सता । अथास्मिन्नेव दिवसे दूर्वागणपतिव्रतम् ॥१७॥ केचिदिच्छन्ति देवर्षे तद्विधानं वदामि ते । हैमं निर्माय गणपं ताम्रपात्रोपरि स्थितम् ॥१८॥ वेष्टितं रक्तवस्त्रेण सर्वतोभद्रमण्डले । पूजयेद्रक्तकुसुमैः पत्रिकाभिश्च पंचभिः ॥१९॥ बिल्वपत्रमपामार्गं शमी दूर्वा हरिप्रिया । अमिरन्यैश्च कुसुमैरभ्यर्च्य फलमोदकैः ॥२०॥ उपहारं प्रकल्प्याथ दद्यादर्घ्यं समुद्यते । ततः संप्राथ्यं विघ्नेशमूर्तिं सोपस्करां मुने ॥२१॥ आचार्याय विधिज्ञाय सत्कृत्य विनिवेदयेत् । कृत्वैवं पंच वर्षाणि समुपास्य यथाविधि ॥२२॥ भुक्त्वेह भोगानखिलान् लोकं गणपतेर्व्रजेत् । अथ भाद्रचतुर्थ्यां तु बहुलाधेनुसंज्ञकम् ॥२३॥ पूजनीयोऽत्र यत्नेन स्रग्गंधवषसादिभिः । ततः प्रदक्षिणीकृत्य शक्तश्चेद्दानमाचरेत् ॥२४॥ अशक्तः पुनरेतां तु नमस्कृत्य विसर्जयेत् । पंचाब्दं वा दशाब्दं वा षोडशाब्दमथापि वा ॥२५॥ व्रतं कृत्वा समुद्याप्य धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् । प्रभावेन व्रतस्यास्य भुक्त्वा भोगान्मनोरमान् ॥२६॥ सत्कृतो देवतावृन्दैर्गोलोकं समवाप्नुयात् । अथ शुक्लचतुर्थ्यां तु सिद्धवैनायकव्रतम् ॥२७॥ तीन नेत्र तथा रक्त वर्णं वाले, विविध रत्नों से विभूषित और प्रसन्न गणेश का ध्यान कर आवाहन आदि समस्त उपचारों से उनकी अर्चना करे और विघ्नराज के प्रिय लड्डू नैवेद्य में चढ़ाकर स्वयं भी मोदक ही भोजन करे । रात्रि में भूमि पर ही सुख से सोये । ऐसा करने पर व्रत के प्रभाव से मनुष्य की सकल कामनायें पूरी होती हैं । वह इस लोक में समस्त भोगों को भोग कर अन्त में गणेशपद को प्राप्त करता है ॥११-१५॥ । इसके समान दूसरा व्रत तीनों लोक में कोई नहीं है । इसलिये अशेष कामनाओं को चाहने वाला व्यक्ति सब प्रकार से इस व्रत को सम्पन्न करे । देवर्षे ! किन्ही का मत है कि उसी दिन दूर्वागणपतिव्रत भी करना चाहिये । उस व्रत का विधान मुझसे सुनो । गणपति की सुवर्णमयो प्रतिमा बनाकर ताम्रपात्र के ऊपर स्थापित करे ॥१६-१८॥ सर्वतोभद्र मण्डल में ताम्रपात्र पर अवस्थित उस प्रतिमा को रक्त वस्त्र से वेष्टित कर रक्त- कुसुमोँ तथा पांच वृक्षों के पत्रों से पूजा करे । बिल्वपत्र, अपामार्ग, शमी, दूर्वा तथा कदम्ब के पत्रों से और अन्य फल-पुष्पों से पूजा कर भेंट चढ़ाये । मुने ! पश्चात् अर्घ्य प्रदान करके उपकरण सहित वह विघ्नेश की मूति विधि जानने वाले आचार्य को सम्मान पूर्वक दे दे ॥१९-२१॥ इस प्रकार पांच वर्षों तक यथाविधि व्रत करने से मानव अखिल भोगों को भोगकर गणपति लोक को जाता है । भाद्रपद की चतुर्थी में बहुलाधेनुसंज्ञक व्रत करना चाहिये । इस दिन यत्नपूर्वक माला, गन्ध तथा घासों से गायों की पूजा कर उनकी प्रदक्षिणा करे और और यदि सामर्थ्य हो तो दान दे । यदि असमर्थता हो तो गायों को नमस्कार कर व्रत करके उद्यापन में पयस्विनी गो दान करे ॥२२-२५॥। इस व्रत के प्रभाव से मनुज संपूर्ण मनोरम भोगों को भोग कर अन्त में देवगणों से सम्मानित होते हुए गोलोक को जाता है । भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी में सिद्धवैनायक व्रत करना चाहिये । आवाहन आदि समस्त उपचारों से पूजन कर एकाग्र मन ११८ ना० पु०